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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथ त्रयोदशोऽध्यायः। ६९९
अस्मिन्नुत्तरभागे च मयानुक्तं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं गर्गहोरायां मैत्रेयत्वं विलोक्य ॥४२॥
हे मैत्रेय! इस उत्तर भाग में मैंने जो नहीं कहा है उसे तुम गर्ग जी की कही
हुई गर्ग होरा में देखना॥४२॥
इति पाराशरहोरायामुत्तरभागे आयुर्दायाभिधोद्वादशोऽध्यायः॥१२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः।
भाग्यं कर्म च वक्ष्यामि मैत्रेय ऋषि सुव्रत ।
भाग्यादेव नृणां सिद्धिर्भाग्यादेव धनायती ॥१॥
हे सुव्रत मैत्रेय! अब मैं इस अध्याय में भाग्य (वैभव) कर्म (शुभ-धर्म-कर्म)
कहूँगा तुम सुनो। क्योंकि भाग्य से ही मनुष्यों को सिद्धि (संपूर्ण कार्यों की सिद्धि)
होती है॥१॥
यशांसि भाग्यतो भाग्यविपर्यासाद्विपर्ययः ।
करिष्यमाण कर्माणि ज्ञातव्यानि प्रयत्नतः ॥२॥
भाग्य से ही द्रव्य और प्रभाव का लाभ भाग्य से ही कीर्त्ति का लाभ होता
है, भाग्य विपरीत होने से उक्त पदार्थों का नाश होता है। अतः किये हुये कर्म भाग्य
सूचक हैं अथवा अभाग्य सूचक हैं इसको प्रयत्न से जानना चाहिये॥२॥
विचारस्यरीतिः-
लग्नादिन्दोश्च नवमं भाग्यं बलवशाद्भवेत् ।
शुभपापारि मित्राख्यैर्ग्रहैरैवं शुभाशुभैः ॥३॥
लग्न और चन्द्रमा से ९ स्थान को भाग्य स्थान कहते हैं इन दोनों में जो बलवान्
हो उससे नवम स्थान लेना चाहिये॥३॥
उच्चादि पंचकाद्वृद्धिन्यस्माद्वानिरिष्यते ।
स्वस्मिन्नन्यत्र विषये स्वदेशेतरदेशयोः ॥४॥
इस स्थान में अपने उच्चादि पाँच स्थान में (उच्च, त्रिकोण, स्वर्क्ष, मित्र,
अधिमित्र) होकर शुभ या पापग्रह बैठे हों वा देखते हों तो भाग्य की वृद्धि होती
है। अन्यथा (सम, शत्रु, अधिशत्रु, नीचस्थान में हों) तो भाग्य की हानि होती है।
यदि भाग्येश अपने वर्ग में हो तो स्वदेश में भाग्योदय होता है अन्य के वर्ग में
हो तो परदेश में भाग्योदय होता है॥४॥

७०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
दशवर्गरीत्याभाग्योदयस्यविचारः-
स्वेष्वन्येषु तु वर्गेषु ज्योतिर्विद्दशसुस्थितैः ।
अद्यंशो राशिलिप्तायाः सप्तांशः संप्रकीर्त्तितः ।।५।।
हे ज्योतिर्विद्! दशवर्गों में यदि भाग्यस्थित ग्रह अपने वर्ग में हो तो स्वदेश
में अन्यथा परदेश में भाग्योदय होता है। ग्रह की राशि अंश की कला बनाकर उसमें
सात से भाग देने से लब्ध सप्तांश।।५।।
अष्टादशर्ष्कांशांस्तु कलांश इति कीर्त्तितः ।
षट्यंश एवं षष्ट्यंश क्रमेण पतयः स्मृताः ।।६।।
१८ से भाग देकर उसमें पुनः १२ का भाग देने से लब्ध षोडशांश होता
है। ६० से भाग देने से जो लब्ध हो उसे षष्ट्यंश कहते हैं।।६।।
भाग्यत्रिकोणोपगतैः शुभं स्याद्भाग्यंतु केन्द्रोपगतैः शुभैश्च।।७।।
लग्न और चन्द्र से जो नवम स्थान उससे ५।९।१।४।७।१० स्थान में
शुभग्रह हों तो शुभद भाग्य होता है।।७।।
पापैस्तथा स्यादशुभंच भाग्यं मित्रादिभिः स्यान्नियमोविशिष्टात्।।८।।
पापग्रह हों तो अशुभ भाग्य होता है। ग्रह मित्रादि गृहों में हो तो अत्युत्तम
और नीचादि में हो तो निकृष्ट फल होता है।।८।।
भाग्योदयसमयः-
एवं भाग्यविर्यासौ भावानां च वदेत्तथा ।
भावग्रहांतर्कला द्विशत्याप्ताः समादयः ।।९।।
भाव और ग्रह का अंतर करके उसका कला करके उसमें २०० का भाग देने
से वर्ष मास दिनादि होता है।।९।।
द्विस्थापिता करघ्नाश्च षष्ट्याप्ताः समादयः ।
अथेष्टादिफलघ्नं च समयो भाग्यभावयोः ।।१०।।
इसे दो जगह रखकर एक जगह दो से गुणाकर ६० से भाग देने से जो वर्षादि
फल प्राप्त हो इसका और पूर्वस्थापित फल का गुणा करने से जो वर्षादि प्राप्त हो
उसी वर्षादि में भाग्योदय का समय समझना चाहिये।।१०।।
प्रकारांतरेण-
फलेन च दशघ्नेन रश्मिना च हृतास्तथा ।
भावाष्टवर्गोत्थ समाहतं तद्ग्रहांतरोत्थास्तु समादयः स्युः ।।११।।

अथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७०१
अथवा ग्रह और भाव का अंतर करके शेष को १० से गुणाकर उसमें ग्रह
के रश्मि से भाग देने से लब्ध वर्षादि में भाग्योदय कहना ।।११।।
तत्तद्ग्रहोत्थाब्दहतास्तथा स्युरेवं तथा भाग्यफलानितत्र ।
स्थानानि नववर्गंश्च तेषां भाग्यफलं शृणु ।।१२।।
अथवा अष्टवर्गोत्थ वर्षों से भाग्योदय कहना। इसी प्रकार सभी भावों के फल
की प्राप्ति का समय निश्चित करना चाहिये और ग्रहों के स्थान और नव वर्ग हैं उनके
संबंध से भाग्य को सुनो।।१२।।
ग्रहाणांविशेषफलानि-
ख्यादीनां क्रमाच्छृंग चामरादेश्च विक्रये ।
कृषिकर्मणि सेवायां पैशून्ये लिपिकर्मणि ।।१३।।
यदि सूर्य उच्चादि शुभ वर्ग में हो तो क्रम से शृंग चामरादि राजचिह्न, कृषिकर्म,
सेवा, दुर्जन कर्म, लिपि कर्म।।१३।।
धनार्जने व्यये व्याधौ गमनागमविक्रये ।
विवादे प्रेतकार्ये च मातृणां कलहे तथा ।।१४।।
धन संपादन, रोगनाशक कर्म, द्रव्य व्यवहार, फेरी करने से, विवाद,
भ्रातृकलह ।।१४।।
धनार्जने सुते दारग्रहणे लिपिकर्मणि ।
उच्चादिस्थानवर्गेषु लाभदश्च रविः क्रमात् ।।१५।।
पुत्र से धनार्जन, विवाह, लेखन कर्म करने से लाभ होता है।।१५।।
चंद्रस्यफलम् -
शंखमाणिक्य मुक्तानां लाभो तत्क्रयविक्रये ।
सुरते · स्त्रीषु मैत्रे च राज्ञः पुरुषमित्रता ।।१६।।
यदि चन्द्रमा अपने उच्चादि शुभ वर्ग में हो तो शंख, माणिक्य मुक्ता का
लाभ और इनके खरीदने और बेचने से लाभ होता है। मैथुन, स्त्री से मैत्री, राजपुरुष
से मित्रता ।।१६।।
धनायतिस्तथा तत्र मैत्रं च कृषिकर्मणि ।
वस्त्रादि धनसिद्धिश्च ब्राह्मणेन विरोधता ।।१७।।
धन का लाभ कृषिकर्म, वस्त्रादि के व्यापार से धन की सिद्धि होती है। ब्राह्मण
से विरोध ।।१७।।

७०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
धननाशो भवेद्युद्धे पराजय पराभवौ ।
काक्षांशांश्रार्ध होरांश फलानि क्रमशःस्थिते ।।१८।।
युद्ध में धन की हानि, पराजय और पराभव होता है ।।१८।।
भौमस्यफलम् -
स्वर्णसिद्धिर्जयो वस्त्रलाभो मित्रसमागमः ।
विवादो भ्रातृभिः शत्रुकर्म स्त्रीचंचलाक्षकः ।।१९।।
यदि मंगल अपने उच्च का हो सुवर्ण की सिद्धि, विजय, वस्त्र का लाभ,
मित्र समागम, बंधुविवाद, शत्रुकर्म स्त्री विषय में चंचल नेत्र ।।१९।।
स्त्रीलाभो दासलाभश्च कृत्स्नेहा च वलक्षयः ।
वलैर्धनायतिः स्वोच्चे क्षेत्राद्यैर्न्यायतो भवेत् ।।२०।।
स्त्री लाभ, दास का लाभ, सभी इच्छाओं की पूर्ति, बल की हानि, बल से
धन का लाभ होता है ।।२०।।
मूलत्रिकोणे क्षेत्रेण राज्ञो वाथ धनायतिः ।
स्वर्क्षे वस्त्रं कांचनादि सिद्धिंश्चाथ सुहृत्फलम् ।।२१।।
मूल त्रिकोण राशि का हो तो कृषि कर्म या राजा के आश्रय से धन का लाभ
होता है। स्वराशि का भाग्य भाव में हो तो वस्त्र सुवर्णादि का लाभ होता है, मित्र
राशि का हो तो धान्य लाभ होता है ।।२१।।
धान्यायतिंश्च मैत्री च क्रूरकर्म प्रवर्तनम् ।
कुष्ठं चाप्यग्निभीतिंश्च गृहदाहोऽतिशत्रुभे ।।२२।।
अधिशत्रु की राशि का हो तो क्रूरकर्म में प्रवृत्ति होती है, अग्निभय, कुष्ठ,
सग्रहणी गुल्म आदि रोग के कारण धन हानि होती है ।।२२।।
बुधस्यफलम् -
संग्रहणीगुल्मरोगश्च धननांशंश्च तत्र तु ।
विद्यार्जने सुखं स्त्रीभिः कलहश्च धनायतिः ।।२३।।
बुध अपनी उच्चराशि का होकर भाग्य भाव में हो तो विद्या-संपादन और
सुख प्राप्ति में लाभ होता है। शत्रु राशि का हो तो स्त्री से कलह, मित्र राशि का
हो तो धन का लाभ ।।२३।।

अथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७०३
क्षेत्रदासादिलाभं च कृषिकृत्यं धनायतिः ।
विवादो बंधुभिर्युद्धे जयश्च परायजः ।।२४।।
क्षेत्रदासादि का लाभ, कृषि में लाभ, नीच राशि का हो तो वधु-विरोध, युद्ध
में हानि, पराभव।।२४।।
विद्याबुद्धिधनक्षेत्रं यशांसि च फलंति च ।
राज्ञस्तत्पुरुषेणैव स्वर्णक्षेत्रायतस्तथा ।।२५।।
उच्चादि का हो तो विद्या, बुद्धि, धन, यश, स्वर्ण, भूमि, राजपुरुष से
लाभ।।२५।।
स्वक्षे धनायतिः प्रोक्ता लिपिना शिल्पकर्मणा ।
वस्त्रस्वर्णादिसिद्धिश्च राजस्त्रीभिर्धनायतिः ।।२६।।
स्वराशि का हो तो लेखनक्रिया से, शिल्पकर्म से राजस्त्री के द्वारा, वस्त्र
स्वर्णादि से धन लाभ।।२६।।
कायस्य कर्मणा लाभो विद्यानाशः स्वकर्मणा ।
धननाशोऽश्मरी कुष्ठं कलांशादि फलंततः ।।२७।।
समराशि का हो तो शरीर कृत्य से लाभ, अधिशत्रु गृह का हो तो विद्या की
हानि, व्यापार में हानि, अदमरी (पथरी) रोग, कुष्ठ रोग हो।।२७।।
विवादाद्बंधुभिर्दायो देशपर्यटनाद्धनम् ।
क्षेत्रसिद्धिर्जयो विद्यालाभोधान्यविवर्धनम् ।।२८।।
अपने षोडशांश में हो तो बंधुविवाद से धन लाभ और देशांतर से धन लाभ,
क्षेत्रसिद्धि, जय, विद्यालाभ, धान्यवृद्धि।।२८।।
कृषिकर्मसमुद्योगः सेवाकरणकौशलम् ।
कृषिकर्म, नौकरी में तरक्की, विद्या संपादन में कुशलता हो।।
गुरोःफलम् -
विद्यार्जनमथप्रोक्तं गुरोः श्रीमान् सुखी गुणी ।।२९।।
गुरु भाग्य भाव में हो तो लक्ष्मी से युक्त, सुखी, गुणी।।२९।।
वह्वायतिरमात्यत्वं सर्वसम्पत्समन्वितः ।
धननाशः प्रमोहेण क्षेत्रनाशः पराभवः ।।३०।।
अधिक लाभ से युक्त, प्रधानत्व, सर्वसंपत्ति से युक्त होता है। शत्रु राशि का
हो तो द्रव्यनाश, क्षेत्रनाश, पराजय होती है।।३०।।

७०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
विद्यार्जनं तथा सेवाकरणं संपदस्तथा ।
पुत्रैर्धनायतिर्मित्रैः स्त्रीभिश्च कृतकर्मणा ।।३१।।
मित्रराशि का हो तो विद्या संपादन सेवा करना होता है। अधिमित्र गृह का
हो तो ऐश्वर्य प्राप्ति, पुत्र मित्रादि से धन लाभ, स्त्री द्वारा द्रव्य लाभ।।३१।।
विवाहो धनलाभश्च क्रमादेवं फलं वदेत् ।
विवाह आदि से धन का लाभ होता है।।
भृगोःफलम् -
राज्ञां कृत्यकरः श्रीमान्पुत्रबंधुसमन्वितः ।।३२।।
यदि शुक्र अपने उच्चादि वर्ग का होकर भाग्य भाव में हो तो राजकर्मचारी,
धनी, पुत्र तथा भाइयों से सुखी।।३२।।
सेनानाथस्तथामात्यो विद्यार्जन परोधनी ।
पाठको याजकश्चाथ बहुस्त्रीकोऽतिशत्रुभे ।।३३।।
सेनापति, प्रधान, विद्या संपादन में कुशल, धनी, अध्यापक, ऋत्विक्, अनेक
स्त्री से युक्त होता है।।३३।।
स्त्रीशक्तो निर्धनोमूर्खः पातकी भारकोभवेत् ।
सेनाधिकारी राज्ञश्च प्रियैर्बन्धुभिरायतिः ।।३४।।
अधिशत्रु के गृह में हो तो स्त्री लालची, दरिद्र, बुद्धिहीन, पातकी, भारवाहक
होता है। स्वगृह का हो तो सेनाधिकारी, प्रियबांधवों से इष्ट प्राप्ति।।३४।।
सेवावृत्या च कृष्या च विद्यायाः पूर्तकर्मणा ।
सर्वसंपद्युतः श्रीमान् शुक्रस्यैव 'फलं' लभेत् ।।३५।।
दूसरे की सेवा से, कृषि कर्म, विद्या से, इष्टपूर्तयज्ञ से वापी, कूप तालाब
आदि कार्य से सर्वसम्पत्तिमान हो।।३५।।
शनेःफलम् -
कुजोच्चादिफल चार्केःकलांशादि फलं भवेत् ।
कलांशादिषु यत्रोक्तं कलांशादि फलंत्विदम् ।।३६।।
उच्चादिषु तथा प्रोक्तं फलमेवं विचितयेत् ।

अथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७७५
मंगल के उच्चादि का जो फल कहा है वही शनि के कालांशादि (षोडशांशादि)
फल हैं। मंगल के षोडशांशादि जो फल कहा है वही शनि के षोडशांशादि का
फल होता है।।३६।।
स्वभाग्यर्क्षगतान्क्षात्र्यूनाश्चाप्यधिकांस्ततः ॥३७॥
स्वरश्मिघ्नान् ग्रहे युक्ते तद्रश्मिघ्नांस्तथोत्तरम् ।
त्रिभिर्विभज्य निःशेषे स्वोजराशौ नवांशके ॥३८॥
भाग्यभाव को उसकी रश्मि से गुणाकर भाग्यभाव में जो ग्रह हो उसकी रश्मि
से भी गुणाकर गुणनफल में ३ का भाग देने से यदि शून्य शेष बचे और भाग्यभाव
में विषम राशि नवांश हो तो।।३८।।
आदिमध्यावसाने स्याद्युग्मे तत्र नवांशके ।
आदौ मध्येऽवसाने स्याद्युग्मे चौजे नवांशके ॥३९॥
आदि मध्य अंत में युग्म राशि और विषम नवांश हो तो आदि मध्य अंत्य
में।।३९।।
मध्येऽवसाने चाद्ये न युग्मे मध्यांतिमादिमे ।
आदौ मध्येऽवसाने स्यादेवं चेद्भाग्यलक्षणम् ॥४०॥
तथा युग्म राशि और युग्म नवांश हो तो मध्य अंत आदि के स्थान में आदि,
मध्य अंत में भाग्य का फल होता है।।४०।।
ओजराशौ नवांशे चेद्युग्मे मध्यांतिमादिमे ।
युग्मेराशौ नवांशे चेदोजे मध्येंऽतिमेऽपिच ॥४१॥
यदि विषम राशि और समनवांश हो तो मध्य, अंतिम और आदि में और
समराशि विषम नवांश हो तो अंतिम और प्रथम में और सम राशि सम नवांश हो
तो मध्य, अंतिम और आदि में।।४१।।
प्रथमेऽपि वयस्येवं युग्मे मध्येऽन्तिमादिमे ।
शेषं द्वयं चेदेकं स्यात्कालो व्यत्यासतो भवेत् ॥४२॥
यदि १ या २ शेष बचे तो विपरीत समय में फल होता है।।४२।।
फलाभ्यां चाहते तद्वच्चराद्यंशे चरे च भे ।
आदौमध्येवसाने स्यात्स्थिरेऽन्ते मध्यमादिमे ॥४३॥
यदि भाग्यगत चरलग्न हो तो भाग्यभाव के कला को ग्रह के कला में जोड़कर .
गुणाकर पूर्वोक्तवत् भाग देने से चर स्थिर द्विश्वभाव प्राप्त होने से क्रम से आदि
मध्य अंत में, स्थिर में अंत्य, मध्य आदि में।।४३।।

७०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
उभये मध्यमेऽन्ते च आदावेवं प्रकीर्त्तिताः ।
तथा द्विस्वभाव राशि हो तो मध्य, अंत और आदि में भाग्य का फल होता
है।
भावानांविशेषविचारः-
भावानां चैव सर्वेषां चन्द्रलग्नात्तु लग्नतः ।।४४।।
सभी भावों का विचार चन्द्रलग्न से और जन्मलग्न से करना चाहिये ।।४४।।
अंशदायोक्तवत्कृत्वा शुभपापदृगाहतम् ।
षष्ठ्याप्तं तद्दलाप्तं स्याद् भावादीनां च संख्यका ।।४५।।
पहले अंशायुदाय के अनुसार गणित करके जो फल आवे उसे दो जगह रखकर
एक जगह शुभ दृष्टि योग से और दूसरे स्थान में पापदृष्टि योग से गुणाकर दोनों
स्थान में ६० से भाग देना जो फल प्राप्त हो वह भाव प्राप्त होता है।।४५।।
रश्मिघ्नं च वलाप्तं च त्वनिष्ठमपवादनम् ।।४६।।
फिर उसी अंशायु गणित को रश्मि से गुणाकर इस बल से भाग देने से अनिष्ट
और शुभ फल होता है।।४६।।
इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे भाग्यफलाध्यायत्रयोदशः।।१३।।
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ।
मुहूर्तलक्षणम् -
नाडीद्वयं मुहूर्तः स्याद्दिनाडीद्वयमेव च ।
रवेरुदयतो ह्येषाक्रमात्सर्वजितः स्मृतः ।।१।।
दो घटिका का एक मुहूर्त होता है किन्तु जब दिनमान ३० घटी का होता
है तब अन्यथा २ घटी से कम या अधिक भी होता है। प्रातः काल सूर्य जिस राशि
पर उदय हो वही लग्न होता है वहाँ से आरम्भ कर मेषादि क्रम से लग्न बीतती
हैं। दिन में १५ मुहूर्त और रात्रि में १५ मुहूर्त होते हैं।।१।।
आर्द्रश्लेषानुराधाश्च मघाश्चार्थ घनिष्ठिकाः ।
उत्तराषाढ़संज्ञश्च सर्वजिद्रोहिणी तथा ।।२।।
दिन के १५ मुहूर्त क्रम से आर्द्रा, आश्लेषा, अनुराधा, मघा, धनिष्ठा,
उत्तराषाढ़ा, सर्वजित् नाम का अभिजित्, रोहिणी।।२।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७०७
विशाखा च ततो ज्येष्ठा मूलं च शततारकम् ।
भरणीपूर्वफाल्गुन्यौ विश्वजिच्च ततो भवेत् ।।३।।
विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, शततारक, भरणी, पूर्वफाल्गुनी, विश्वजित्
अभिजित ये १५ दिन के मुहूर्त्त हैं।।३।।
उत्तराप्रौष्ठपाच्चैव रेवती च ततः परम् ।
अभिजिश्चोत्तरा चाथ कृत्तिका रोहिणी ततः ।।४।।
उत्तराभाद्रपदा, रेवती, अभिजित्, उत्तरा, कृत्तिका, रोहिणी।।४।।
मूलं च रोहिणी चाथ मृगशीर्ष च हस्तकम् ।
पुष्यश्च श्रवणो हस्तचित्रे स्वाती क्रमात्स्मृता ।।५।।
मूल, रोहिणी, मृगशीर्ष, हस्त, पुष्य, श्रवण, हस्त, चित्रा, स्वाती ये १५
मुहूर्त्त रात्रि के हैं। इन्हें विश्वजित् कहते हैं।।५।।
विनाडेः ३२ मुहूर्त्ताः-
नाडीद्वयमुहूर्त्तानां संज्ञा एता क्रमाद्विज ।
सर्वजिद्भरणीहस्तविश्वजिद्रोहिणी तथा ।।६।।
भरणी, हस्त, पूर्वाषाढा, रोहिणी।।६।।
दस्रश्च मृगशीर्षश्च शर्वः पुष्यश्च सैंद्रभम् ।
उत्तराविश्वजिच्छ्रोणी चित्रा पुष्यश्च वायुभम् ।।७।।
अश्विनी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, आर्द्रा, उत्तरा, पूर्वाषाढ़, श्रवण, चित्रा,
पुष्य, स्वाती।।७।।
अभिजिद्विसुभं पौष्णं कृत्तिका च पुनर्वसुः ।
पूर्वोत्तरप्रोष्ठपदौ शततारा च विश्वभम् ।।८।।
अभिजित्, धनिष्ठा, रेवती, कृत्तिका, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद,
शतभिष, उत्तराषाढ।।८।।
ज्येष्ठासूर्य च मूलं च भाग्यश्च क्रमशः स्मृताः ।
ज्येष्ठा चाथ विशाखा च मूलं च शततारका ।।९।।
ज्येष्ठा, हस्त, मूल, पूर्वाफाल्गुनी, ज्येष्ठा, विशाखा, मूल, शतभिष ये ३२
मुहूर्त्त विनाडी के हैं। इन्हें सर्वजित् कहते हैं।।९।।

७०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
षष्ठिघट्यात्मकमुहूर्त्ताः-
नामानि च मुहूर्त्तानां विनाडीद्वयरूपिणाम् ।
आवृत्त्याषष्ठिताः प्रोक्ताः कालांशा नाडिरुपिणः ॥१९०॥
पूर्व में दिन रात्रि के २ घटी वाले मुहूर्त्त को दूना कर देने से एक घटी के
६० मुहूर्त्त होते हैं इसे कालांश कहते हैं॥१९०॥
कालांशराशिचक्रमुहूर्त्त-
नक्षत्रसंज्ञया प्रोक्ताः षष्ठ्यावृत्त्याकलांशकाः ।
मेषोयमो वृषः कुंभो झषोजूकश्च कर्कटः ॥१९१॥
पूर्व में कहे हुये दिन और रात्रि के ३२ मुहूर्त्त को दूना कर देने से नक्षत्र
कलांश मुहूर्त्त होता है। सूर्योदय से पाँच-पाँच घटी का मेषादि राशियों का कालांश
होता है। वे मेष, मिथुन, वृष, कुंभ, मीन, तुला, कर्क॥१९१॥
सिंहोऽथ वृश्चिकश्चाथो मृगः कन्या क्रमाद्भवेत् ।
राशि चक्र कलांशे तु क्रमादेवं प्रकीर्त्तिताः ॥१९२॥
सिंह, वृश्चिक, धन, मकर, कन्या ये राशि कालांशक हैं॥१९२॥
नित्योदयस्यक्रमः-
मेषो गोर्यम कर्की लेयकन्यातुलालयः ।
धनुर्मृगघटोमीनमुदयाद्घटिकासु च ॥१९३॥
ऊपर कहे हुये कालांश के नित्योदय का क्रम कह रहे हैं! मेष, वृष, मिथुन,
कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुम्भ, मीन ये राशियाँ उदयकालीन
लग्न से क्रम से घटी तुल्य अर्थात् मीन, मेष, चार-चार घटी और वृष कुंभ साढ़े
चार घटी तथा मकर और मिथुन पाँच-पाँच घटी शेष राशियाँ साढ़े पाँच २ घटी
में उदय होती हैं॥१९३॥
सिंहान्मेषाच्च चापाच्च नक्षत्रक्रम ईरितः ।
चन्द्रज्ञ शुक्रधूमार्कपरिवेषार्ककार्मुकाः ॥१९४॥
नक्षत्र लेने का प्रकार— सिंहादि नक्षत्र से १, धनुरादि से २, मेष राशि से
यह तीन प्रकार हैं! अर्थात् जन्मलग्न सिंहादि है तो सिंह पर चन्द्रमा, कन्या पर बुध,
तुला पर शुक्र, वृश्चिक पर धूम इत्यादि क्रम से कर्क पर केतु को लिखना॥१९४॥
गुरुः पातः शनिः केतुर्ग्रहाः क्षुद्रदिश क्रमात् ।
चक्र लिप्तांशके चैवं केत्वादिस्तारकांशके ॥१९५॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७०९
इसी प्रकार धनु से एवं मेष से भी ऐसे ही १२ ग्रहों का न्यास कर नक्षत्र
का ज्ञान करना।।१५।।
नित्योदयघटीप्रमाणम् -
अर्कादि धूमपर्यन्ताः क्रमात्स्युर्धटिकांशके ।
सत्र्यंशा घटिकास्तिस्रो मेषादिनिमिषयोर्द्विज ।।१६।।
चतस्रः कुंभवृषयोस्तथा मकर युग्मयोः ।
पंच सत्र्यंशास्ताः कर्किधनुषोः स्मृताः ।।१७।।
सिंहवृश्चिकयोः षट् च अंशोनाःसप्तशेषयोः ।
नित्यं मानमिदं प्रोक्तं मेषादुदयराशिजम् ।।१८।।
हे मैत्रेय मेषादि राशियों के नित्योदय घटीमान कहता हूँ। शेष चक्र से स्पष्ट
हैं।।१६-१८।।
मेषादि राशीनां उदय घटी मान।

मे.बृ.मि.क.सिं.कं.तु.बृ.ध.म.कुं.मी.राशि
३४४५६६६६५४४३घ.
२००४०२००४०४००२०४००२०प.

प्रकारान्तरेण राशीनांमानानि-
ख्याक्रान्तातथा प्रोक्ता एकद्वित्रिचतुर्घटी ।
मानानि मेषतः सिंहाच्चापादर्कौदयात्ततः ।।१९।।
उदय लग्न से मेष से चार सिंह से चार और धन से चार लग्नों का क्रम से
एक, दो, तीन और ४ घटी प्रकारांतर से मान होता है। जो लग्न हो उसके मान
में दशवर्गाधिपों का विभाजन करना चाहिये।।१९।।
दशवर्गाधिपाश्चिन्त्याः प्रोक्ताश्चेन्दुनवांशकाः ।
अन्यत्र कीर्त्तिताः प्रश्ने नष्टद्रव्यस्य निश्चये ।।२०।।
इसका प्रयोजन-नष्टद्रव्य के निश्चय करने में तथा प्रश्न के विचार में चन्द्रनवांश
को भी देखना चाहिये।।२०।।
दशवर्गानांफलम् -
श्रीमान् रिक्तश्च मूर्खश्च कुशलोवंचनः पटुः ।
स्त्रीशक्तो वेदविद्वीरो मंदाग्निस्तीब्रशेषणः ।।२१।।

७१० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
मूलरोगी च पिशुनः सदा दानपरो शुचिः ।
सेवाकरः सुभाषी च धनवाँल्लोभसंयुतः ।।२२।।
प्रख्यातो विद्यया भीरूर्बुद्धि श्रीमान्सुशीलकः ।
परदाररतः श्रीमान्सुशीलो बलवान्गुणी ।।२३।।
अध्वन्योनिगमव्यग्रः पातकीच तपोयुतः ।
परदाररतो वेश्यासक्तोऽसत्फलवासनः ।।२४।।
सिंहासनस्थो रिक्तश्च जटिलः कुलपांशनः ।
योगी बुद्धश्च सन्यासी सेनानीर्बुद्धिमान्सुखी ।।२५।।
कुष्ठी भूतकरः श्रीमानेकपुत्र समन्वितः ।
शास्त्रज्ञो दासकृत्यश्च चंडरोष समन्वितः ।।२६।।
स्त्रीसक्तः परदारोक्तो भृत्यः पटुररोगवान् ।
कुरूपश्चापि कुशलो जितारिः पुत्रवर्जितः ।।२७।।
शूरोवीरश्च चंडश्च कुशलः कुक्षिरोगवान् ।
ग्रामणीविटपो° धूर्तः सतीपतिररिंदमः ।।२८।।
वंध्यापतिः सुरापी च रिक्तसाध्यपतिः सुखी ।
विजयी युद्धभीरुश्च चोरोऽमर्षी जनार्जकः ।।२९।।
धनार्जनाय सततमकृत्य शतकारकः ।
वृषलीपतिरिन्द्रश्च सेनानीः सत्यवाक्छुचिः ।।३०।।
शिरोरोगी च कुष्ठी च मेही च पिशुनः सुखी ।
जलवद्रोगसंयुक्तः कृतज्ञो निर्गुणो घृणी ।।३१।।
विवादशीलः सुमुखः क्रोधनः कामुकः पटुः ।
चलचित्तो धनी वाग्मी विद्यार्जनपरः सुखी ।।३२।।
अपुत्रः कृषिकृद्धीरः परदाररतः शुचिः ।
विद्याहीनश्च मूर्खश्च बुद्धिमान शास्त्रपारगः ।।३३।।
सदाभीरुर्शठो वाग्मी कृत्येषु कुशलः सुखी ।
नीतिज्ञो लेखको नीचजातिकृत्यंरतः पटुः ।।३४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७११
प्रेष्यो गोमयविक्रेता वदान्योधनवंचकः ।
सेनानीः क्षेत्रवान् वीरो लेखवृत्या च जीवति ।।३५।।
मूर्खों जितेन्द्रियो वाग्मी सदाकृत्यपरः सुखी ।
अन्नदाताच मिष्ठाशी शिवभक्तो जितेन्द्रियः ।।३६।।
कुब्जो वक्रशरीरश्च जात्यंधो वधिरः शठः ।
अमर्षी नर्तकः क्रुद्धो दुर्जनो वेदपारगः ।।३७।।
वक्ता च गायकः श्रीमान् सर्वदा चजनार्जकः ।
तालज्ञो विद्यया युक्तः पंच पंचासदुत्तरम् ।।३८।।
शतं गुणाश्च श्रीयोगा एकयोगावसानक्रमम् ।
पूर्वपूर्वयुता ओजे युग्मे राशौ तु वामतः ।।३९।।
चरे क्रमः स्थिरे वाममुभयोर्धपदादितः ।
आदौ त्रिंशद्गुणा ह्यतै वामतस्त्रिंशदेवहि ।।४०।।
षष्ठ्यंशेतु गुणः प्रोक्ताः प्राग्वदोजचरादिकाः ।
दशवर्ग से फलादेश कहते हैं जो कि स्पष्ट हैं। विशेष यह है कि विषम नवांश
हो तो श्रीमान् योग से समराशि का नवांश हो तो विद्वान् योग से आरम्भ कर श्रीमान्
योग तक और चर राशि में क्रम से स्थिर राशि में विलोम से द्विस्वभाव राशि में
अर्धभाग से क्रम लेना चाहिये।।३९-४०।।
राहोः गतिः-
मेषादुत्क्रमतो राहुः केतुर्यादि वृषात्क्रमात् ।।४१।।
राहु मेष राशि से विपरीत क्रम से और केतु वृष राशि से क्रम से जाता
है।।४१।।
अस्य प्रयोजनम् -
ऋक्ष संध्यन्तरे जातः प्रष्टासौ म्रियते भृशम् ।
केतुराहुस्थिते राशौ भसंधौ मरणं भवेत् ।।४२।।
राहु केतु नक्षत्र प्रवेशान्तर के समय जन्म हो तो निश्चय ही प्रश्नकर्त्ता की मृत्यु
होती है।।४२।।
इतरेषां त्रयाणां च प्रकाशे व्याधिपीडितः ।
दुर्बलो बुद्धिहीनश्च जायते न मृतो यदि ।।४३।।

७१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
ग्रह केतु से युक्त राशि के संधि में प्रश्न हो वा जन्म हो तो भी मृत्यु होती
हैं, इसी प्रकार अन्य धूम, कार्मुक परिवेश के उदय राशि में प्रश्नकर्त्ता व्याधि से
पीड़ित होता है।।४३।।
अथ पित्र्याद्यरिष्ट विचारः-
कलांशराशितोऽरिष्टे नक्षत्रारिष्टसंभवे ।
पित्रादीनां सुतस्यापि तद्दशाञ्चिन्तयेत्सुधीः ।।४४।।
यदि षोडशांश से और नक्षत्र से अरिष्ट योग आता हो और भाव को पापग्रह
देखता हो या उसमें पापग्रह युत हो तो पित्रादि को और पुत्र को भी अशुभ होता
है।।४४।।
पावशत्रुग्रहाकांता भावास्तद्दृष्टिसंयुताः ।
सौम्यपापादयश्चैवं शुभाशुभफलप्रदाः ।।४५।।
पाप शत्रु ग्रह से भाव युक्त हो वा उसके दृष्टि से युक्त हो, तो शुभग्रह का
दृष्टि योग हो तो शुभद होता हैं और पापग्रह का दृष्टियोग हो तो अशुभ होता
है।।४५।।
एकद्वित्रिचतुः पंचषट्सप्ताष्टदिग्धराः ।
सूर्येन्दुन्नृपमूर्च्छेन्द्रनृपभार्क नृपाजिताः ।।४६।।
पंचाष्टवसुभूतेषु सुरदंताजिनाद्रयः ।
नखास्त्रिंशत्खवेदाः षट्सप्ततिः षष्टिरिद्रियुक् ।।४७।।
नवतिश्च शतं मूर्च्छा जिना दंता जिना दिशः ।
एवं नवशतं प्रोक्ताः क्रमादैवं तु तत्रतु ।।४८।।
पूर्वं पूर्वं युता संख्या लक्ष्मीयोगफलप्रदा ।
नक्षत्रे राशिचक्रे तु दिवसे वामतः स्मृताः ।।४९।।
शेष योगों का विचार पूर्वा पर संबंध से देखना चाहिये।।४६-४९।।
सुगतिदुर्गतिअंश-
शुभमित्रग्रहाक्रांता भावास्तद्दृष्टिसंयुताः ।
द्वित्रिपंच च षट् सप्त वसुनंददिशोऽद्रयः ।।५०।।
यदि भाव शुभग्रह या मित्र ग्रह से आक्रांत हो वा देखा जाता हो तो
२।३।५।६।७।८।९।१०।७ ।।५०।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१३
त्रिंशद्दिशो नखाः षष्ठिसूर्यमूर्च्छाजिनाजिनाः ।
आकृतिर्भानिभाकार्ग्निनखाश्छंदः शतं नखाः ॥५१॥
३०।१०।२०।६०।१२।३१।२४।२१।२७।२२।३।२०।२६।१००।२०।२
॥५१॥
त्रिंशत्खवेदा दिग्विश्त्रे शतं षष्ठिः शतंजिनः ।
वेदाः खवेदाः पूर्वार्धे परार्धे प्राग्वदत्रतु ॥५२॥
एते योगवलाच्चैव केवलं दुर्मतिप्रदाः ।
३०।४०।१०।१३।१००।६०।१००।२४।४।४० के पूर्वार्ध में और
राशि के उत्तरार्ध में विलोम क्रम से दुर्गति हैं॥५२॥
कुब्जादियोगाः-
दिनर्क्ष चक्रसंख्याः स्युरादिमध्यावसानिकाः ॥५३॥
दिन, नक्षत्र और राशि इनकी संख्या आदि मध्य और अंत्यभाग का
योग॥५३॥
सप्तविंशतिसप्तत्यां शते षष्ठ्यां शतद्वये ।
षट्पंचांशतिविंशे च षण्णवत्यामशीतिके ॥५४॥
यदि २७।७०।१००।६०।२००।६।५०।२०।९६।८० ।५४।
षष्ठिभागे च विंशत्यां शतषष्ठ्यां शतद्वये ।
कुब्जः कलांशेमूकस्तु शतद्वयशतत्रये ॥५५॥
१०।६०।२०० हो तो कुब्ज होता है। यदि २००, ३०० ।।५५।।
सहस्रे द्विशते जातः पंचमे पापसंयुते ।
द्वित्रिपंचाष्टदिग्विश्नृपातिधृतिभूमयः ॥५६॥
१०००, २०० हो और पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो मूक होगा।
२।३।५।८।१०।१३।१६।१८।१ ।।५६।।
नवदिग्भसुरैस्तानैस्तिथिविश्वाष्टकैः क्रमात् ।
गुणेन वामतः प्रोक्तो लक्ष्यंशे श्रीसमन्वितः ॥५७॥
९।१०।२७।३३।४९।१५।१३।८. इनको वांयें भाग से गुंणने प्राप्त अंश
लक्ष्यंश में श्रीमान् होता है॥५७॥

७१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
योगान्तरम् -
रविचन्द्रतमपातकालेष्वरिभवेषु च ।
पंचाशीतिशते वेदे मनौद्वित्रिशते पुनः ।।५८।।
यदि सूर्य चन्द्र राहु पातकाल में ६।११ तथा ८५।२००।४।१४।२।३।२००
।।५८।।
खाब्धिपंचंसु दिग्भागे सहस्रे चाक्षिचन्द्रगे ।
खखाग्निरूपं विश्वाष्ट त्रिचन्द्रखखभूमिपैः ।।५९।।
४०।५।१०।१३००।१३।८।३।१।१६०० इन योगों में चन्द्रमा युक्त हो
तो बधिर होता है।।५९।।
मृत्युकालज्ञानम् -
शताधिके च जातोऽस्मिन्वधिरः षष्ठि संयुतो ।
कर्किवृश्चिकमीनांशे तद्राशीशांशके तथा ।।६०।।
कर्क, वृश्चिक और मीन के अंश में इनके स्वामियों के (चंद्र, भौम, गुरु)
इनके नवांश में।।६०।।
पातकेत्वोश्च शत्र्वृक्षगतयो रंशकेपुनः ।
एकादित्रिंशतैर्वित्क्रमात्तास्तु सुभाजिताः ।।६१।।
पात में अथवा उच्च, शत्रु राशि में स्थित ग्रह के अंश में जो संख्या हो उससे
१ से लेकर ३०० तक।।६१।।
आकाशपूर्णधृतयो निःशेषं लब्धसंख्यके ।
सदोषेऽतराशेतु जातस्यैतेऽपमृत्यवः ।।६२।।
१८०० में भाग देना जिससे निःशेष हो जो लब्धि प्राप्त वह यदि सदोष
(पापग्रह से युक्त हो) तो जातक का लब्धि तुल्य वर्ष में अपमृत्यु कहना।।६२।।
अल्पंमध्यदीर्घायुर्ज्ञानम् -
पंचाशतः षडावृत्या स्वल्पमध्यचिरायुषः ।
क्रमेणोत्क्रमशस्ते तु त्रैराशिकविधानतः ।।६३।।
पीछे कहे हुये ५० कुब्ज आवृत्ति के वर्ष से त्रैराशिक रीति से गणना करके
प्रथम आवृत्ति में अल्पायु दूसरे आवृत्ति में मध्यमायु और तीसरे आवृत्ति में चिरायु
चौथे आवृत्ति में उत्क्रम से दीर्घायु पाँचवीं आवृत्ति में मध्यमायु और छठी आवृत्ति
में अल्पायु समझना चाहिये।।६३।।✿
✿ वर्षण्याहं— शराः दिशास्तिथयः नखाः तिथयः दश एवं षडिति।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१५
चतुर्दशग्रहाणांषष्ठ्यंशादिः-
खाक्ष्यद्रयस्तुषष्ठ्यंशास्त्रिंशांशाः खरसान्ग्नयः ।।६४।।
बारह राशियों में ७२० षष्ट्यंश।।६४।।
अष्टषट्भूमयः कालहोराः सप्तदिनेषु च ।
वेदेन्द्रा द्वादशांशा, स्युर्नवांशा गजखेंदवः ।।६५।।
३६० त्रिंशांश, १६८ कालहोरांश, १४४ द्वादशांश, १०८ नवांश।।६५।।
सप्तांशा वेदनागास्तु द्रेक्काणास्तु षडग्नयः ।
अर्धहोराजिनाः प्रोक्ता नक्षत्राणि चराशयः ।।६६।।
८४ सप्तमांश, ३६ द्रेष्काणांश और २४ अर्धहोरांश ये क्रम से नक्षत्र राशि
के होते हैं।।६६।।
भुंजते च ग्रहाश्चैव मनुसंख्यैश्च भुंजते ।
राशयश्च ग्रहाश्चैव नक्षत्राणि च भुंजते ।।६७।।
इनको १ सूर्य, २ चन्द्र, ३ भौम, ४ बुध, ५ गुरु, ६ शुक्र, ७ शनि, ८
राहु, ९ केतु।।६७।।
ख्यादिशिखिपर्यन्ता नवभूमेन्द्रकार्मुकौ ।
पातश्च परिवेशश्च कालश्चेति चतुर्दश ।।६८।।
१० भूमा, ११ इन्द्रचाप, १२ पात, १३ परिवेश, १४ काल ये भोगते
हैं। कौन किस अंश में है इसे देखकर फल का विचार करना चाहिये।।६८।।
अथ नक्षत्रगणनाक्रमः-
तेषां प्रादुर्भावे चैव भंगदास्तु नवग्रहः ।
दस्रात्पंच भगात्षट्क पंचार्द्राद्दारूणादपि ।।६९।।
अश्विनी से ५, पूर्वाफाल्गुनी से ६, आर्द्रा से ५, शतभिष से ४।।६९।।
मित्रान्नवक्रमात्प्रोक्तास्तत्तद्देशेषु सर्वदा ।
अक्षिणी पंचदश च नखास्तत्त्वं तथामराः ।।७०।।
और अनुराधा से ७ ये नक्षत्र पूर्वोक्त अंशों में रहते हैं क्रम से
२।१५।२०।२५।३३ ।।७०।।
सत्र्यंशाश्चषडंशोनाश्चत्वारिंशत्क्रमादथ ।
शतं खेष्विंदवः प्रोक्ता विनाडीतनयोऽपिच ।।७१।।
३३।३३।४०।१००।१५० ये नाडियाँ अर्धहोरा आदि के योगकाल हैं।।७१।।

७१६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
काल्यंशवद्यर्धहोरांशभोगकालः प्रकीर्त्तितः ।
प्रमाणराशयश्चैते भागहारा कलात्मकाः ।।७२।।
तत्तद्देशकला इच्छाराशयो गुणराशयः ।
कटुको मधुरतिक्तः कषायो लवणाम्लकौ ।।७३।।
कलांश में उत्पन्न हुये का कटुक, मीठा, तीता, कषैला, नमक, अम्ल।।७२-
७३।।
कालांशेक्रमतो गण्याः षष्ठ्यंशेव्युत्क्रमात्स्मृताः ।
त्रिंशांशेतु कषायादिःकालहोरांशके पुनः ।।७४।।
क्रम से गणना करने से जो रस आवे वह उस वर्ष में उसे प्रिय होता है।
षष्ठ्यंश में उसे अम्ल से कटु पर्यन्त इस क्रम से, त्रिंशांश में कषाय से तिक्त
पर्यन्त।।७४।।
तिक्तादि द्वादशांशेषु मधुरादि नवांशके ।
अम्लादिमुनिर्भागे तु द्रेष्काणे मधुरादितः ।।७५।।
द्वादशांश में मधुरादि क्रम, नवांश में अम्लादि क्रम, सप्तांश, अर्ध होरा और
द्रेष्काण में मधुरादि क्रम से गिनना चाहिये।।७५।।
षष्ठ्यंशोत्पत्तौफलम् -
अर्धहोरांशके तद्वज्जातस्यैवं प्रजायते ।
वेदाष्टदशभैरमैः प्रषष्ठ्यंशे च भास्करे ।।७६।।
यदि कन्या के जन्म समय में सूर्य ४।८।१०।२७।३ संख्यक षष्ठ्यंश में
हो तो वह कन्या बंध्या होती हैं।।७६।।
त्रिषट्न्वत्रिर्वाकार्ध्विजिनदंतसुराः क्रमात् ।
नवदिग्भैर्जिनाकैश्र्च सूर्यैस्तांस्त्रिपंचभिः ।।७७।।
तथा ३।६।९।३।०।१२।४।२४।३२।३३ इन अंकों को क्रम से
९।१०।२७।२४।१२।१२।४९।३।५।५० से गुण ने जो प्राप्त हो उतने संख्या
के षष्ठ्यंश में सूर्य हो तो कन्या पूज्या (पूजनीया) होती हैं।।७७।।
मृतपुत्र-कन्यायोग-
पंचाशद्भिःक्रमाद्गुण्या वंध्यावंध्या प्रकीर्त्तिताः ।
त्रिवेदाद्यंकविश्वेंद्र नखच्छदोजिनायमाः ।।७८।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१७
पंचाशच्च शतं पूर्वयुताः मृतसुता स्मृता ।
पुत्राणां तु कलांशे तु शेषे जाता मृता द्विज ॥७९॥
३।४।७।९।१३।१४।२०।२६।२४।२।५०।१०० इनमें पूर्व अंकों को
जोड़ने से जो संख्या हो तत्तुल्य अंश में सूर्य हों मृतसुता उत्पन्न होती है। उक्तांश
से शेष अंशों में सूर्य हों तो उत्पन्न पुत्रों में मृत पुत्र भी होंगे॥७८-७९॥
अथ संन्यासयोगः-
द्वादशे च चतुर्विंशे चतुस्त्रिंशे सुरांशके ।
द्विसप्तांशे नवांशे षष्ठयुत्तरशतांशके ॥८०॥
यदि १२।२४।३३।७२।९।१६० ॥८०॥
षट्शते च सहस्रे च खखाहीन्द्वंशके पुनः ।
खांशातिथ्यंशके जातो भवेत्प्रव्रजितो नरः ॥८१॥
६००।१०००।१८०।१५।१० संख्यक अंश में जन्म हो तो सन्यासी होता
है॥८१॥
परमहंसादियोगाः-
गुरुशुक्रोदये राशौ तयोः परमहंसकः ।
शत्रुराशिगतौ तौ चेदप्रकाशयुतौ तु वा ॥८२॥
गुरु शुक्र के उदय की राशि में जन्म हो तो परमहंस होता है। यदि वे शत्रुराशि
में हों अथवा धूमादि अप्रकाश ग्रह से युक्त हों तो॥८२॥
भ्रष्टः स्यात्तु तथा ज्ञेतु त्रिदंडी वा वहूदकः।
रवौ जटाधरः शैवः कुजे नग्नोऽटनः स्मृतः॥८३॥
भ्रष्ट परमहंस होता है। ऐसे ही बुध हो तो त्रिदंडी सन्यासी होता है वा वहूदक-
होता है। सूर्य हो तो शिवभक्त, भौम हो तो नग्न घूमने वाला॥८३॥
मंदे बौद्धोऽथ वाग्मी स्याद्राहौ केतौ तथैव च ।
धूमे कापालिकाश्चापे काले तु परिवेषके ॥८४॥
गूढ़पापो यथा लिंगी कुलमार्गतस्तथा ।
शनि हो तो बौद्ध धर्मावलम्बी, राहु वा केतु जन्मराशि में हों तो बौद्ध सन्यासी,
धूमग्रह हो तो कापालिक, चाप, काल, परिवेष हो तो गुप्तपापी, पाखंडी,
कुलमार्गानुकूल चलने वाला होता है॥८४॥

७१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
प्रव्रज्यायांनिष्टायोगः-
षष्ठ्यंशे ऋक्षसन्ध्यंशे सार्पे पौष्णेन्द्रभांशके ।।८५।।
षष्ठ्यंश में, नक्षत्र संध्यंश में, आश्लेषा, रेवती, ज्येष्ठा के अंश में।।८५।।
त्रिंशांशे कालहोरांशे तत्तदंशांशेऽपि च ।
नवमूर्च्छासुरांशे तु यथा षष्ठितमे युतः ।।८६।।
त्रिंशांश में, कालहोरांश में, नवांश में, मूर्ना ४९ अंश में ३३वें अंश, ६०वें
अंश ।।८६।।
शतांशेखाब्धितिथ्यंशे द्वादशांशे नवांशके ।
राश्यंतांशे तु सप्तांशे ऋक्षसंधिमृगांतिके ।।८७।।
१०० वें अंश में, १५४० वें अंश में, द्वादशांश में, राशि के अतिमांश
में, सप्तांश में नक्षत्र संधि में।।८७।।
मृगकर्कालिसिंहादिर्मीनतौल्यंशकादिमे ।
अंत्यांशेऽपि च जातस्य षष्ठ्यर्थाक्षिजिनैरदे ।।८८।।
मकर, कर्क, वृश्चिक, सिंह, मेष, मीन, तुला के आदि या अंतिम अंश में
उत्पन्न होने वाले, ६, ५, २, २४, ३२ अंशों में।।८८।।
द्रेष्काणेचार्द्धहोरायां त्रिसप्ते च नखेषु तु ।
जातः प्रव्रजितश्चैषु सर्वत्रैकयुतेष्वपि ।।८९।।
द्रेष्काण में अर्द्धहोरा में ७३, २० वें अंश में वा पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने
से जो अंक हो उन अंशों में उन अंकों में उत्पन्न होनेवाले सन्यास धर्म में श्रद्धा
रखनेवाले होते हैं।।८९।।
अथ अंशविशेषजातायांस्त्रीलक्षणम् -
पापाप्रकाशसंयोगे कलत्रेत्वशुभं भवेत् ।
रवौवंध्या तु शीतांशौ क्षीणे तु व्यभिचारिणी ।।९०।।
सातवें भाव में पापग्रह हो अथवा अप्रकाशग्रह हो तों स्त्रीदुष्टा हो, सूर्य हो
तो बंध्या, क्षीणचन्द्र हो तो व्यभिचारिणी।।९०।।
कुजे तु प्रियते मन्दे दुर्भगा राहुसंयुते ।
परदाररतिः स्वीयनिषेकाभावतोऽसुताः ।।९१।।