बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ त्रयोदशोऽध्यायः । ७७५
मंगल के उच्चादि का जो फल कहा है वही शनि के कालांशादि (षोडशांशादि)
फल हैं। मंगल के षोडशांशादि जो फल कहा है वही शनि के षोडशांशादि का
फल होता है।।३६।।
स्वभाग्यर्क्षगतान्क्षात्र्यूनाश्चाप्यधिकांस्ततः ॥३७॥
स्वरश्मिघ्नान् ग्रहे युक्ते तद्रश्मिघ्नांस्तथोत्तरम् ।
त्रिभिर्विभज्य निःशेषे स्वोजराशौ नवांशके ॥३८॥
भाग्यभाव को उसकी रश्मि से गुणाकर भाग्यभाव में जो ग्रह हो उसकी रश्मि
से भी गुणाकर गुणनफल में ३ का भाग देने से यदि शून्य शेष बचे और भाग्यभाव
में विषम राशि नवांश हो तो।।३८।।
आदिमध्यावसाने स्याद्युग्मे तत्र नवांशके ।
आदौ मध्येऽवसाने स्याद्युग्मे चौजे नवांशके ॥३९॥
आदि मध्य अंत में युग्म राशि और विषम नवांश हो तो आदि मध्य अंत्य
में।।३९।।
मध्येऽवसाने चाद्ये न युग्मे मध्यांतिमादिमे ।
आदौ मध्येऽवसाने स्यादेवं चेद्भाग्यलक्षणम् ॥४०॥
तथा युग्म राशि और युग्म नवांश हो तो मध्य अंत आदि के स्थान में आदि,
मध्य अंत में भाग्य का फल होता है।।४०।।
ओजराशौ नवांशे चेद्युग्मे मध्यांतिमादिमे ।
युग्मेराशौ नवांशे चेदोजे मध्येंऽतिमेऽपिच ॥४१॥
यदि विषम राशि और समनवांश हो तो मध्य, अंतिम और आदि में और
समराशि विषम नवांश हो तो अंतिम और प्रथम में और सम राशि सम नवांश हो
तो मध्य, अंतिम और आदि में।।४१।।
प्रथमेऽपि वयस्येवं युग्मे मध्येऽन्तिमादिमे ।
शेषं द्वयं चेदेकं स्यात्कालो व्यत्यासतो भवेत् ॥४२॥
यदि १ या २ शेष बचे तो विपरीत समय में फल होता है।।४२।।
फलाभ्यां चाहते तद्वच्चराद्यंशे चरे च भे ।
आदौमध्येवसाने स्यात्स्थिरेऽन्ते मध्यमादिमे ॥४३॥
यदि भाग्यगत चरलग्न हो तो भाग्यभाव के कला को ग्रह के कला में जोड़कर .
गुणाकर पूर्वोक्तवत् भाग देने से चर स्थिर द्विश्वभाव प्राप्त होने से क्रम से आदि
मध्य अंत में, स्थिर में अंत्य, मध्य आदि में।।४३।।