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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 800 में से

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पृष्ठ 725

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१३
त्रिंशद्दिशो नखाः षष्ठिसूर्यमूर्च्छाजिनाजिनाः ।
आकृतिर्भानिभाकार्ग्निनखाश्छंदः शतं नखाः ॥५१॥
३०।१०।२०।६०।१२।३१।२४।२१।२७।२२।३।२०।२६।१००।२०।२
॥५१॥
त्रिंशत्खवेदा दिग्विश्त्रे शतं षष्ठिः शतंजिनः ।
वेदाः खवेदाः पूर्वार्धे परार्धे प्राग्वदत्रतु ॥५२॥
एते योगवलाच्चैव केवलं दुर्मतिप्रदाः ।
३०।४०।१०।१३।१००।६०।१००।२४।४।४० के पूर्वार्ध में और
राशि के उत्तरार्ध में विलोम क्रम से दुर्गति हैं॥५२॥
कुब्जादियोगाः-
दिनर्क्ष चक्रसंख्याः स्युरादिमध्यावसानिकाः ॥५३॥
दिन, नक्षत्र और राशि इनकी संख्या आदि मध्य और अंत्यभाग का
योग॥५३॥
सप्तविंशतिसप्तत्यां शते षष्ठ्यां शतद्वये ।
षट्पंचांशतिविंशे च षण्णवत्यामशीतिके ॥५४॥
यदि २७।७०।१००।६०।२००।६।५०।२०।९६।८० ।५४।
षष्ठिभागे च विंशत्यां शतषष्ठ्यां शतद्वये ।
कुब्जः कलांशेमूकस्तु शतद्वयशतत्रये ॥५५॥
१०।६०।२०० हो तो कुब्ज होता है। यदि २००, ३०० ।।५५।।
सहस्रे द्विशते जातः पंचमे पापसंयुते ।
द्वित्रिपंचाष्टदिग्विश्नृपातिधृतिभूमयः ॥५६॥
१०००, २०० हो और पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो मूक होगा।
२।३।५।८।१०।१३।१६।१८।१ ।।५६।।
नवदिग्भसुरैस्तानैस्तिथिविश्वाष्टकैः क्रमात् ।
गुणेन वामतः प्रोक्तो लक्ष्यंशे श्रीसमन्वितः ॥५७॥
९।१०।२७।३३।४९।१५।१३।८. इनको वांयें भाग से गुंणने प्राप्त अंश
लक्ष्यंश में श्रीमान् होता है॥५७॥