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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 711, कुल 800 में से

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पृष्ठ 711

अथ त्रयोदशोऽध्यायः। ६९९
अस्मिन्नुत्तरभागे च मयानुक्तं च यद्भवेत् ।
तत्सर्वं गर्गहोरायां मैत्रेयत्वं विलोक्य ॥४२॥
हे मैत्रेय! इस उत्तर भाग में मैंने जो नहीं कहा है उसे तुम गर्ग जी की कही
हुई गर्ग होरा में देखना॥४२॥
इति पाराशरहोरायामुत्तरभागे आयुर्दायाभिधोद्वादशोऽध्यायः॥१२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः।
भाग्यं कर्म च वक्ष्यामि मैत्रेय ऋषि सुव्रत ।
भाग्यादेव नृणां सिद्धिर्भाग्यादेव धनायती ॥१॥
हे सुव्रत मैत्रेय! अब मैं इस अध्याय में भाग्य (वैभव) कर्म (शुभ-धर्म-कर्म)
कहूँगा तुम सुनो। क्योंकि भाग्य से ही मनुष्यों को सिद्धि (संपूर्ण कार्यों की सिद्धि)
होती है॥१॥
यशांसि भाग्यतो भाग्यविपर्यासाद्विपर्ययः ।
करिष्यमाण कर्माणि ज्ञातव्यानि प्रयत्नतः ॥२॥
भाग्य से ही द्रव्य और प्रभाव का लाभ भाग्य से ही कीर्त्ति का लाभ होता
है, भाग्य विपरीत होने से उक्त पदार्थों का नाश होता है। अतः किये हुये कर्म भाग्य
सूचक हैं अथवा अभाग्य सूचक हैं इसको प्रयत्न से जानना चाहिये॥२॥
विचारस्यरीतिः-
लग्नादिन्दोश्च नवमं भाग्यं बलवशाद्भवेत् ।
शुभपापारि मित्राख्यैर्ग्रहैरैवं शुभाशुभैः ॥३॥
लग्न और चन्द्रमा से ९ स्थान को भाग्य स्थान कहते हैं इन दोनों में जो बलवान्
हो उससे नवम स्थान लेना चाहिये॥३॥
उच्चादि पंचकाद्वृद्धिन्यस्माद्वानिरिष्यते ।
स्वस्मिन्नन्यत्र विषये स्वदेशेतरदेशयोः ॥४॥
इस स्थान में अपने उच्चादि पाँच स्थान में (उच्च, त्रिकोण, स्वर्क्ष, मित्र,
अधिमित्र) होकर शुभ या पापग्रह बैठे हों वा देखते हों तो भाग्य की वृद्धि होती
है। अन्यथा (सम, शत्रु, अधिशत्रु, नीचस्थान में हों) तो भाग्य की हानि होती है।
यदि भाग्येश अपने वर्ग में हो तो स्वदेश में भाग्योदय होता है अन्य के वर्ग में
हो तो परदेश में भाग्योदय होता है॥४॥