बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
६७४ नारदीयपुराणम्
कार्तवीर्यः शिरः पातु ललाटं हैहयेश्वरः । सुमुखो मे मुखं पातु कर्णौ व्याप्तजगत्त्रयः ॥३३॥
सुकुमारो हनुं पातु भ्रूयुगं मे धनुर्धरः । नयनं पुण्डरीकाक्षो नासिकां मे गुणाकरः ॥३४॥
अधरोष्ठौ सदा पातु ब्रह्मज्ञेयो द्विजान्कविः । सर्वशास्त्रकलाधारी जिह्वां चिबुकमव्ययः ॥३५॥
दत्तात्रेयप्रियः कंठं स्कंधौ राजकुलेश्वरः । भुजौ दशास्यदर्पघ्नो हृदयं मे महाबलः ॥३६॥
कुक्षिं रक्षतु मे विद्वान् वक्षः परपुरंजयः । करौ सर्वार्थदः पातु कराग्राणि जगत्प्रियः ॥३७॥
रेवांबुलीलासंदृप्तो जठरं परिरक्षतु । वीरशूरस्तु मे नाभिं पार्श्वो मे सर्वदुष्टहा ॥३८॥
सहस्रभुजभृत्पृष्ठं सप्तद्वीपाधिपः कटिम् । ऊरू माहिष्मतीनाथो जानुनी वल्लभो भुवः ॥३९॥
जंघे वीराधिपः पातु पातु पादौ मनोजवः । पातु सर्वायुधधरः सर्वांगं सर्वमर्मसु ॥४०॥
सर्वदुष्टांतकः पातु धात्वष्टककलेवरम् । प्राणाविदशजीवेशान्सर्वशिष्टेष्टदोऽवतु ॥४१॥
वशीकृतेंद्रियग्रामः पातु सर्वेन्द्रियाणि मे । अनुक्तमपि यत्स्थानं शरीरांतर्बहिश्च यत् ॥४२॥
तत्सर्वं पातु मे सर्वलोकनाथेश्वरेश्वरः । वज्रात्सारतरं चेदं शरीरं कवचावृतम् ॥४३॥
बाधाशतविनिर्मुक्तमस्तु मे भयवर्जितम् । बद्ध्वेदं कवचं दिव्यमभेद्यं हैहयेशितुः ॥४४॥
विचरामि दिवा रात्रौ निर्भयेनांतरात्मना । राजमार्गे महादुर्गे मार्गे चौरादिसंकुले ॥४५॥
विषमे विपिने घोरे दावाग्नौ गिरिकंदरे । संग्रामे शस्त्रसंघाते सिंहव्याघ्रनिषेविते ॥४६॥
गह्वरे सर्वसंकीर्णे संध्याकाले नृपालये । विवादे विपुलावर्ते समुद्रे च नदीतटे ॥ ४७॥
परिपंथिजनाकीर्णे देशे दस्युगणावृते । सर्वस्वहरणे प्राप्ते प्राप्ते प्राणस्य संकटे ॥४८॥
नानारोगज्वरावेशे पिशाचप्रेतयातने । मारीदुःस्वप्नपीडासु क्लिष्टे विश्वासघातके ॥४६॥
करें ॥२८-३२॥ कार्तवीर्य मेरे शिर की रक्षा करें । हैहयेश्वर ललाट की, सुमुख मुख की और जगद्व्यापी कानों की
रक्षा करें । सुकुमार कनपटों की, धनुर्धर दोनों भौंहों की, पुण्डरीकाक्ष नेत्र की, गुणाकर नाक की, ब्रह्मज्ञेय अधर
की, कवि ओष्ठ की, सकल शास्त्रों एवम् कलाओं का धारण करने वाले जिह्वा की, अव्यय ठुड्डी की, दत्तात्रेयप्रिय
कण्ठ की, राजकुलेश्वर स्कंधों की, रावणदर्पविनाशक भुजाओं की, महाबल हृदय की, विद्वान् कुक्षि की, परपुरंजय
छाती की, सकलकामनादायक हाथों की, जगत्प्रिय करांगुलियों की, रेवा के जल में विहार करनेवाले पेट की, वीर शूर
नाभि की, समस्त दुष्टों के निहन्ता पार्श्वों की, सहस्र भुजाओं का धारण करने वाले पीठ की, सातों द्वीपों के अधीश्वर
कटि की, माहिष्मतीनाथ ऊरुओं की, भूवल्लभ जानुओं की, वीरपति जंघाओं की, मनोजव चरणों की, सर्वायुधधारी मर्म-
स्थलसहित सकल अंगों की, निखिल दुष्टों के नाशक अष्टधातु सहित संपूर्ण कलेवर की, समस्त उचित अभिलाषाओं
को पूर्ण करने वाले प्राण आदि दश जीवेशों की और इन्द्रिय समूह को जीतनेवाले सकल इन्द्रियों की रक्षा करें । जिस
स्थान के बारे में मैंने नहीं कहा या जो प्रदेश शरीर के भीतर तथा बाहर हैं, उन सब की रक्षा अखिल लोक-
नाथेश्वर ईश्वर करें । इस कवच से आवृत मेरा शरीर वज्र से भी कठोर (अर्थात् अभेद्य), विविध बाधाओं से
रहित एवम् भय से वर्जित हो ॥३३-४३॥ कार्तवीर्य के इस अभेद्य तथा दिव्य कवच को शरीर में बाँधकर
मैं दिन-रात विचरण करता रहूँ । इससे मेरी अन्तरात्मा निर्भीक हो गई है । इस कवच से आवृत मुझको राजमार्ग,
महाभयंकर मार्ग, चोरादि से व्याप्त मार्ग, घोर जंगल, भयानक दावाग्नि, पर्वतों की गुफा, संग्राम, शस्त्रप्रहार,
सिंह तथा व्याघ्रादि से परिव्याप्त पर्वतप्रान्त, संध्याकाल, नृपालय, विवाद, विपुल तरंगों से युक्त समुद्र,
नदी तट, शत्रु एवम् चोरों से आवृत देश, सर्वस्व अपहरण, प्राणसंकट, अनेक प्रकार के रोग एवम् ज्वर के
आक्रमण, पिशाच तथा प्रेत की यातना, महामारी तथा दुःस्वप्न की पीड़ा, विश्वासघातजन्य क्लेश, शारीरिक महा-
६७५
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
शारीरे च महादुःखे मानसे च महाज्वरे । आधिव्याधिभये विघ्नज्वालोपद्रवकेऽपि च ॥५०॥
न भवेत्तु भयं किंचित्कवचेनावृतस्य मे । आगंतुकामानखिलानस्मद्वस्रुविलुंपकान् ॥५१॥
निवारयतु दोर्दण्डसहस्रेण महारथः । स्वकरोद्भूतसाहस्रपाशबद्धान्सुदुर्जयान् ॥५२॥
संरुद्धगतिसामर्थ्यान्करोतु कृतवीर्यजः । सृणिसाहस्रनिर्भिन्नान्सहस्रशरखंडितान् ॥५३॥
राजचूडामणिः क्षिप्रं करोत्वस्मद्विरोधकान् । खड्गसाहस्रदलितान्सहस्रमुसलादितान् ॥५४॥
चौरादिदुष्टसत्त्वांघान्करोतु कमलेक्षणः । स्वशंखनादसंस्त्रस्तान्सहस्रारसहस्रभृत् ॥५५॥
अवतारो हरेः साक्षात्पालयत्वखिलं मम । कार्तवीर्यं महावीर्यं सर्वदुष्टविनाशन ॥५६॥
सर्वत्र सर्वदा दुष्टचौरानाश्य नाशय । किं त्वं स्वपिषि दुष्टघ्न किं तिष्ठसि चिरायसि ॥५७॥
उत्तिष्ठ पाहि नः सर्वभयेभ्यः स्वसुतानिव । ये चौरा वसुहर्तारो विद्विषो ये च हिंसकाः ॥५८॥
साधुभीतिकरा दुष्टाश्छद्मका ये दुराशयाः । दुर्हृदो दुष्टभूपाला दुष्टामात्याश्च पापकाः ॥५९॥
ये च कार्यविलोप्तारो ये खलाः परिपंथिनः । सर्वस्वहारिणां ये च पंच मायाविनोऽपरे ॥६०॥
महाक्लेशकरा म्लेच्छा दस्यवो वृषलाश्च ये । येऽग्निदा गरदातारो वंचका शस्त्रपाणयः ॥६१॥
ये पापा दुष्टकर्माणो दुःखदा दुष्टबुद्धयः । व्याजकाः कुपथासक्ता ये च नानामयप्रदाः ॥६२॥
छिद्रान्वेवरता नित्यं येऽस्मान्बाधितुमुद्यताः । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य महाशंखरवाहताः ॥६३॥
सहसा विलयं यान्तु दूरादेव विमोहिताः । ये दानवा महादित्या ये यक्षा ये च राक्षसाः ॥६४॥
पिशाचा ये महासत्त्वा ये भूतब्रह्मराक्षसाः । अपस्मारग्रहा ये च ये ग्रहाः पिशिताशनाः ॥६५॥
दुःख, मानसी पीड़ा, महाज्वर, आधि, व्याधि, विघ्न, ज्वालोपद्रव आदि का लेश मात्र भी भय न हो ॥४४-५०३॥
महारथी कार्तवीर्य अपने सहस्र भुजदण्ड से मेरे धन लूटने के लिये आने वाले दस्युओं का निवारण करें । कृतवीर्य
के पुत्र मेरे अत्यन्त दुर्जय शत्रुओं को सहस्रों पाशों में बांध कर निश्चेष्ट कर दें । राजशिरोमणि (कार्तवीर्य) मेरे
विरोधियों को शीघ्र सहस्रों अंकुशों से छिन्न-भिन्न करें, सहस्रों बाणों से विद्ध करें । हजारों तलवारों से खंडित करें
और सहस्रों मुसलों से पीड़ित करें । सहस्रों सहस्र दल कमल धारण करनेवाले कमलाक्ष सहस्रार्जुन चोर आदि दुष्ट
जीवों को अपने शंख के नाद से भयभीत करें । हरि के साक्षात् अवतार रूप कार्तवीर्य मेरी सब तरह से रक्षा करें
॥५१-५५३॥
कार्तवीर्य ! महाशक्तिशालिन् ! निखिलदुष्टविनाशक ! सबकाल, सब जगह दुष्टों एवम् चोरों का नाश
कीजिए । दुष्टों के मारने वाले ! क्या आप सो रहे हैं ? कहां खड़े हैं ? क्यों विलम्ब कर रहे हैं ? उठिये, अपने
पुत्रों की तरह मुझे सब प्रकार के भयों से बचाइए। जितने चोर, धनहर्ता, द्वेष करने वाले, हिंसक, साधुओं को
सताने वाले, दुष्ट, कपटी, दूषित हृदय वाले, दुष्ट विचार वाले, दुष्ट राजा, दुष्ट मन्त्री, पापी, कार्यध्वंसक,
खल, शत्रु, सर्वस्वहारी, मायावी, महादुःखदायक, म्लेच्छ, दस्यु, शूद्र, आग में डालने वाले, विष देने वाले,
वंचक, शस्त्रजीवी, सूदखोर, कुपथगामी, लोगों को डराने वाले, छिद्रान्वेषी तथा हमें बाधा पहुँचाने वाले हैं,
वे कार्तवीर्य के महाशंखध्वनि से निहत हो और दूर ही से मोहित होकर विनष्ट हो जायें ॥५६-६३३॥ दानव,
महादैत्य, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भयानक जीव, भूत, ब्रह्मराक्षस, अपस्मारग्रह, मांसाहारी तथा महाशोणितभक्षी
वेताल, गुह्य, गंधर्व, अप्सरोगण, सिद्धगण, देवयोनि, डाकिनी, द्रूणस, १ प्रेत, क्षेत्रपाल, विनायकगण, महाव्याघ्र,
१. एक गण, जिनकी बड़ी-बड़ी नाक होती है।
६७६ नारदीयपुराणम्
महालोहितभोक्तारो वेताला ये च गुह्यकाः । गंधर्वाप्सरसः सिद्धा ये च देवादियोनयः ॥६६॥
डाकिन्यो द्रुणसाः प्रेताः क्षेत्रपाला विनायकाः । महाव्याघ्रमहामेघा महातुरगरूपकाः ॥६७॥
महागजा महासिंहा महामहिषयोनयः । ऋक्षवाराहशुनकवानरोलूकमूर्तयः ॥६८॥
महोष्ट्रखरमार्जारसर्पगोवृषमस्तकाः । नानारूपा महासत्त्वा नानाक्लेशसहस्रदाः ॥६९॥
नानारोगकरा क्षुद्रा महावीर्या महाबलाः । वातिकाः पैत्तिका घोरा श्लैष्मिकाः सन्निपातिकाः ॥७०॥
माहेश्वरा वैष्णवाश्च वैरिच्याश्च महाग्रहाः । स्कांदा वैनायका क्रूरा ये च प्रथमगुह्यकाः ॥७१॥
महाशत्रुग्रहा रौद्रा महामारीमसूरिकाः । ऐकाहिका द्व्याहिकाश्च त्र्याहिकाश्च महाज्वराः ॥७२॥
चातुर्थिकाः पाक्षिकाश्च मास्याः षाण्मासिकाश्च ये । सांवत्सरा दुर्निवार्या ज्वराः परमदारुणाः ॥७३॥
स्वाप्निका ये महोत्पाता ये च दुःस्वाप्निका ग्रहाः । कूष्मांडा जृंभिका भौमा द्रोणाः सान्निध्यवंचकाः
भ्रमिकाः प्राणहर्तारो ये च बालग्रहादयः । मनोबुद्धीन्द्रियहराः स्फोटकाश्च महाग्रहाः ॥७५॥
महाशना बलिभुजो महाकुणपभोजनाः । दिवाचरा रात्रिचरा ये च संध्यासु दारुणाः ॥७६॥
प्रमत्ता वाऽप्रमत्ता वै ये मां बाधितुमुद्यता । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य धनुर्मुक्तशराह्ताः ॥७७॥
सहस्रधा प्रणश्यंतु भग्नसत्त्वबलोद्यमाः । य सर्पा ये महानागा महागिरिविलेशयाः ॥७८॥
कालव्याला महादंष्ट्रा महासागरसंज्ञकाः । अनंतशूलिकाद्याश्च दंष्ट्राविषमहाभयाः ॥७९॥
अनेकशतशीर्षाश्च खंडपुच्छाश्च दारुणाः । महाविषजलौकाश्च वृश्चिका रक्तपुच्छकाः ॥८०॥
आशीविषाः कालकूटा महाहालाहलाह्वयाः । जलसर्पा जलव्याला जलग्राहाश्च कच्छपाः ॥८१॥
मत्स्यका विषपुच्छाश्च ये चान्ये जलवासिनः । जलजाः स्थलजाश्चैव कृत्रिमाश्च महाविषाः ॥८२॥
महामेघ, महाअश्व, महागज, महासिंह, महामहिष, रीछ, शूकर, कुत्ता, बन्दर तथा उल्लू के समान आकृति
वाले, ऊँट, गधा, बिलार, सांप, गाय तथा बैल के सदृश शिर वाले, अनेक रूप वाले, हजारों प्रकार
के क्लेश देने वाले, अनेक तरह के रोग उत्पन्न करने वाले, क्षुद्र, महाशक्तिशाली, महाबली, वात
रोग देने वाले, पित्तव्याधि देने वाले, घोररूप, कफ रोग देने वाले, सन्निपात रोग देने वाले, माहेश्वरग्रह,
वैष्णवग्रह, विरंचिग्रह, स्कंदग्रह, गणेशग्रह, क्रूरग्रह, प्रथमगुह्यक, महाशत्रुग्रह, रुद्रग्रह, महामारीग्रह,
मसूरिकाग्रह, एक दिन वाले, दो दिन वाले तथा तीन दिन वाले महाज्वर, चार दिन वाले, पाक्षिक,
मासिक, षाण्मासिक तथा वार्षिक परम दारुण एवम् दुर्निवार ज्वर, स्वप्न में होने वाले महा उत्पात, दुःस्वाप्निक
ग्रह, कुष्मांड, जृंभिक, भौम, द्रोण, सान्निध्यवंचक, भ्रमिक, प्राणहर्ता बालग्रह, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियहारी ग्रह,
स्फोटकग्रह, महाग्रह, बहुत खाने वाले, बलि खाने वाले, शव खाने वाले, दिनचर, निशाचर, संध्याचर, दारुण,
प्रमत्त या अप्रमत्त ग्रह मुझे कष्ट देने के लिये तैयार हैं, वे कार्तवीर्य के धनुर्मुक्त शरों से आहत होकर हजारों खंडों
में विभक्त हो जायें ॥६४-७७½॥
उनके बल, वीर्य, पराक्रम भी भग्न हों । जो सर्प, महानाग, महापर्वत के बिल में सोने वाले, कालव्याल,
महादंष्ट्रा वाले, महाअजगर नाम वाले, अनंत, शूलिक, दंष्ट्रा और विष के कारण महाभयानक दीखने वाले,
सैकड़ों फण वाले, कटे पूँछ वाले, दारुण स्वरूप वाले, महाविष वाले जोंक, बिच्छू, लाल पूँछ वाले सर्प,
कालकूट, महाहलाहल नाम वाले सांप, जलसर्प, जलव्याल, जलग्रह, कच्छप, मत्स्य, विष एवम् पुच्छ वाले
अन्य जलवासी जीव, जलज, स्थलज, कृत्रिम, महाविष वाले, गुप्त रूप वाले, गुप्त विष वाले, चूहे, छिपकली,
नानाविषसंज्ञक, महोपविषसंज्ञक तथा शरीर एवम् प्राणों के नाशक जीव हमें पीड़ा देना चाहते हैं, वे पहले ही
६७७
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
गुप्तरूपा गुप्तविषा मूषिका गृहगोधिकाः । नानाविषाश्च ये घोरा महोपविषसंज्ञकाः ॥८३॥
येऽस्मान्बाधितुमिच्छंति शरीरप्राणनाशकाः । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य खड्गसाहस्रदारिताः ॥८४॥
दूरादेव विनश्यंतु प्रणष्टेंद्रियसाहसाः । मनुष्याः पशवो वृक्षावानरा वनगोचराः ॥८५॥
सिंहव्याघ्रवराहाश्च महिषा ये महामृगाः । गजास्तुरंगा गवया रासभाः शरभा वृकाः ॥८६॥
शुनका द्वीपिनः शुभ्रा मार्जारा बिललोलुपाः । शृगालाः शशकाः श्येना गरुत्मन्तो विहंगमाः ॥८७॥
भेरुंडा वायसा गृध्रा हंसाद्याः पक्षिजातयः । उद्भिज्जाश्चांडजाश्चैव स्वेदजाश्च जरायुजाः ॥८८॥
नानाभेदकुले जाता नानाभेदाः पृथग्विधाः । येऽस्मान्बाधितुमिच्छंति संध्यासु च दिवा निशि ॥८९॥
ते सर्वे कार्तवीर्यस्य गदासाहस्रदारिताः । दूरादेव विनश्यंतु विनष्टगतिपौरुषाः ॥९०॥
ये चाक्षेमप्रदातारः कूटमायाविनश्च ये । मारणोत्सादनोन्मूलद्वेषमोहनकारकाः ॥९१॥
विश्वास घातका दुष्टा ये च स्वामिद्रुहो नराः । ये चाततायिनो दुष्टा ये पापा गोप्यहारिणः ॥९२॥
बाहोपघातगरलशस्त्रपातातिदुःखदा । क्षेत्रवित्तादिहरणबंधनादिभयप्रदाः ॥९३॥
ईतयो विविधाकारा ये चान्ये दुष्टजातयः । पीडाकरा ये सततं छिद्रमिच्छंति बाधितुम् ॥९४॥
ते सर्वे कार्तवीर्यस्य चक्रसाहस्रदारिताः । दूरादेव क्षयं यांतु विनष्टबलसाहसाः ॥९५॥
ये मेघा ये महावर्षा ये वाता याश्च विद्युत । ये महाशनयो दीप्ता ये निर्घाताश्च दारुणाः ॥९६॥
उल्कापाताश्च ये घोरा ये महेंद्रायुधादयः । सूर्येन्दुगुजसौम्याश्च गुरुकाव्यशनैश्चराः ॥९७॥
राहुश्च केतवो घोरा नक्षत्रा राशयस्तथा । तिथयः संक्रमा मासा हायना युगनायकाः ॥९८॥
मन्वंतराधिपाः सिद्धा ऋषयो योगसिद्धयः । निधयो ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्चैव वह्नयः ॥९९॥
ऋतवो लोकपालाश्च पितरो देवसंहतिः । विद्याश्चैव चतुःषष्टिभेदा या भुवनत्रये ॥१००॥
कार्तवीर्य के खड्ग से सहस्र टुकड़े होकर इन्द्रिय तथा साहस सहित नष्ट हो जायें । जो मनुष्य, पशु, बन्दर, भील,
सिंह, वाघ, सूअर, भैंस, हिरन, हाथी, घोड़े, नीलगाय, गधे, ऊँट, भेड़िये, कुत्ते, चीते, बाज, गरुड़, भेरुंड, कौए
गीध तथा हंस आदि पक्षी, उद्भिज्ज, अंडज, स्वेदज तथा जरायुज जीव और भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न
नाना भेद वाले जीव दिन, रात एवम् संध्या समय मुझे कष्ट देना चाहते हैं, वे कार्तवीर्य की गदा से सहस्रधा
खंडित होकर गति-पौरुष सहित विनष्ट हो जायें। जो अमंगलकारी, कूटमायावी, मारण, मोहन, उच्चाटन तथा
विद्वेष कराने वाले, विश्वासघाती, दुष्ट, स्वामी से द्रोह करने वाले, आततायी, पापी, गुप्तधन चुराने वाले, आग
लगाने वाले, अवघात करने वाले, विष देने वाले, शस्त्रप्रहार करने वाले, अत्यन्त दुःख देने वाले, खेत, वित्त आदि
का हरण करने वाले, बंधन आदि का भय देने वाले, विविधाकार वालो ईतियाँ', अन्य दुष्ट जातियाँ और पीड़ा
देने वाले तथा छिद्रान्वेषण करने वाले जीव मुझे बाधित करना चाहते हैं वे कीर्तवीर्य के चक्र से सहस्रधा विदीर्ण
होकर बल एवम् साहस सहित नष्ट हो जायें ॥७८-९५॥ मेघ, महावर्षा, विद्युत, महावज्र, भयंकर निर्घात,
उल्कापात, इन्द्रधनुष, सूर्य चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, नक्षत्र, राशि, तिथि, संक्रान्ति,
मास, वर्ष, युगनायक, मन्वन्तराधीश, सिद्धि, ऋषि, योगसिद्धि, निधि, ऋक्, यजु, साम, अथर्व, वह्नि, ऋतु,
लोकपाल, पितर, देवगण, विद्या, चौंसठ कला और जो कहे गये और जो न भी कहे गये, वे (देवादि) महातेजस्वी,
१-“अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभाः मूषिकाः खगाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ।"-ये
छहों ईतियाँ कृषि का नाश करती हैं ।
६७८ नारदीयपुराणम्
ये त्वत्र कीर्तिताः सर्वे ये चान्य नानुकीर्तिताः । ते संतु नः सदा सौम्याः सर्वकालसुखावहाः ॥१०१॥
आज्ञया कार्तवीर्यस्य योगीन्द्रस्यामितद्युतेः । कार्तवीर्यार्जुनो धन्वी राजेन्द्रो हैहयेश्वरः ॥१०२॥
दशास्यदर्पहा रेवालीलादृप्तः सुदुर्जयः । दुःखहा चौरदमनो राजराजेश्वरः प्रभुः ॥१०३॥
सर्वज्ञः सर्वदः श्रीमान् सर्वांशिटेष्टदः कृती । राजचूडामणिर्योगी सप्तद्वीपाधिनायकः ॥१०४॥
विजयी विश्वजिद्वाग्मी महागतिरलोलुपः । यज्वा विप्रप्रियो विद्वान् ब्रह्मज्ञेयः सनातनः ॥१०५॥
माहिष्मतीपतियौधा महाकीर्तिर्महाभुजः । सुकुमारो महावीरो मारीघ्नो मदिरेक्षणः ॥१०६॥
शत्रुघ्नः शाश्वतः शूरः शंखमृद्योगिवल्लभः । महाभागवतो धीमान्महाभयविनाशनः ॥१०७॥
असाध्यविग्रहो दिव्यो भावो व्याप्तजगतत्रयः । जितेन्द्रियो जितारातिः स्वच्छंदोऽनंतविक्रमः ॥१०८॥
चक्रभृत्परचक्रघ्नः संग्रामविधिपूजितः । सर्वशास्त्रकलाधारी विरजा लोकवंदितः ॥१०६॥
वीरो विमलसत्त्वाढ्यो महाबलपराक्रमः । विजयश्रीमहासान्यो जितारिर्मंत्रनायकः ॥११०॥
खङ्गभृत्कामदः कांतः कालघ्नः कमलेक्षणः । भद्रवादप्रियो वैद्यो विबुधो वरदो वशी ॥१११॥
महाधनो निधिपतिर्महायोगी गुरुप्रियः । योगाढ्यःसर्वरोगघ्नो राजिताखिलभूतलः ॥११२॥
दिव्यास्त्रभृदमेयात्मा सर्वगोप्ता महोज्ज्वलः । सर्वायुधधरोऽभीष्टप्रदः परपुरंजयः ॥११३॥
योगसिद्धो महाकायो महावृंदशताधिपः । सर्वज्ञाननिधिः सर्वसिद्धिदानकृतोद्यमः ॥११४॥
इत्यष्टशतनामोक्त्या मूर्तयो दश दिक्पथि । सम्यग्दशदिशो व्याप्य पालयंतु च मां सदा ॥११५॥
स्वस्थाः सर्वेन्द्रियाः संतु शांतिरस्तु सदा मम । शेषाद्या मूर्तयोऽष्टौ च विक्रमेणैव भास्वराः ॥११६॥
अग्निनिर्ऋतिवाय्वीशकोणगाः पांतु मां सदा । मम सौख्यमसंबधमारोग्यमपराजायः ॥११७॥
दुःखहानिरविघ्नश्च प्रजावृद्धिः सुखोदयः । वांछाप्तिरतिकल्याणमवैषम्यमनामयम् ॥११८॥
अनालस्यमभीष्टं स्यान्मृत्युहानिर्बलोन्नतिः । भयहानिर्यशः कांतिर्विद्या ऋद्धिर्महाश्रियः ॥११६॥
योगीन्द्र कार्तवीर्य की आज्ञा से मेरे लिये सब काल में सुखदायक हों । कार्तवीर्यार्जुन, धन्वी, राजेन्द्र, हैहयेश्वर,
रावणदर्पहन्ता, रेवा में क्रीड़ासक्त, सुदुर्जय, सर्वदाता श्रीमान्, सकलेष्टदायक, कृती, राजचूडामणि, योगी,
सप्तद्वीपपति, विजयी, विश्वजित्, वाग्मी, महागर्ति, अलोलुप, यज्वा, विप्रप्रिय, विद्वान् ब्रह्मज्ञेय, सनातन,
माहिष्मतीपति, योद्धा, महाकीर्ति, महाभुज, सुकुमार, महावीर, मारीघ्न, मदिरेक्षण, शत्रुघ्न, शाश्वत, शूर, शंख-
भृत्, योगिवल्लभ, महाभागवत, धीमान्, महाभयनाशो, असाध्यशरीर, दिव्य-भाव, व्याप्तजगतत्रय, जितेन्द्रिय,
जितशत्रु, स्वच्छंद, अनंतविक्रम, चक्रभृत्, परचक्रघ्न, संग्रामविधिपूजित, सर्वशास्त्रकलाधारी, वीतराग, लोकवंदित,
वीर, विमलसत्त्वसंपन्न, महानल तथा पराक्रमशाली, विजयश्रीविभूषित, मन्त्रनायक, खड्गधारी, कामद, कांत,
कालघ्न, कमलेक्षण, भद्रवादप्रिय, वैद्य, विबुध, वरद, वशी, महाधन, निधिपति, महायोगी, गुरुप्रिय, योगसंपन्न,
सर्वरोगनाशक, संपूर्ण भूतल पर विराजमान, दिव्यास्त्र धारण करने वाले, अप्रमेयात्मा, सर्वगोप्ता, महोज्ज्वल,
सर्वायुधधारी, अभीष्टदायक, शत्रुंजय, योगसिद्ध, महाकाय, सैकड़ों महागणों के स्वामी, सर्वज्ञाननिधि, सकलसिद्धि-
दायक--ये एक सौ आठ नामों वाली मूर्तियां दशो दिशाओं को व्याप्त कर सदा मेरा पालन करें ॥९६-११५॥
मेरी समस्त इन्द्रियां स्वस्थ हों । मुझे सदा शान्ति मिले । कार्तवीर्य की शेष आदि आठ मूर्तियाँ, जो अत्यन्त
चमकती हैं, अग्नि, निर्ऋति, वायु तथा ईशान कोण में मेरी रक्षा करें । मुझे निर्विच्छिन्न सुख, आरोग्य, अपराजया,
दुःखहानि, अविघ्न, प्रजावृद्धि, सुखोदय, इच्छाप्राप्ति, अतिकल्याण, अवैषम्य, अनामय, अनालस्य, अभीष्टसिद्धि,
६७६
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
अनष्टद्रव्यता चैव नष्टस्य पुनरागमः । दीर्घायुष्यं मनोहर्षः सौकुमार्यमभीप्सितम् ॥१२०॥
अप्रधृष्यतमत्वं च महासामर्थ्यमेव च । संतु मे कार्तवीर्यस्य हैहयेन्द्रस्य कीर्तनात् ॥१२१॥
य इदं कार्तवीर्यस्य कवचं पुण्यवर्धनम् । सर्वपापप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥१२२॥
सर्वशांतिकरं गुह्यं समस्तभयनाशनम् । विजयार्थप्रदं नृणां सर्वसंपत्प्रदं शुभम् ॥१२३॥
शृणुयाद्वा पठेद्वापि सर्वकामानवाप्नुयात् । चोरैर्हृतं यदा पश्येत्पश्वादिवधनमात्मनः ॥१२४॥
सप्तवारं तदा जप्येन्निशि पश्चिमदिङ्मुखः । सप्तरात्रेण लभते नष्टद्रव्यं न संशयः ॥१२५॥
सप्तविंशतिधा जप्त्वा प्राचीदिग्वदनः पुमान् । देवासुरनिभं चापि परचक्रं निवारयेत् ॥१२६॥
विवादे कलहे घोरे पंचधा यः पठेदिदम् । विजयो जायते तस्य न कदाचित्पराजयः ॥१२७॥
सर्वरोगप्रपीडासु त्रेधा वा पंचधा पठेत् । स रोगमृत्युवेतालभूतप्रेतैर्न बाध्यते ॥१२८॥
सम्यग्द्वादशधा रात्रौ प्रजपेद्बन्धमुक्तये । त्रिदिनान्निगडाद्बद्धो मुच्यते नात्र संशयः ॥१२९॥
अनेनैव विधानेन सर्वसाधनकर्मणि । असाध्यमपि सप्ताहात्साधयेन्मंत्रवित्तमः ॥१३०॥
यात्राकाले पठित्वेदं मार्गे गच्छति यः पुमान् । न दुष्टचौरव्याघ्राद्यैर्भयं स्यात्परिपंथिभिः ॥१३१॥
जपन्नासेचनं कुर्वञ्जलेनांजलिना तनौ । न चासौ विषकृत्यादिरोगस्फोटैः प्रबाध्यते ॥१३२॥
कार्तवीर्यः खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली । सहस्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ॥१३३॥
रक्तगंधो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः । द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत् ॥१३४॥
संपदस्तस्य जायन्ते जनास्तस्य वशे सदा । यः सेवते सदा विप्र श्रीमच्चक्रावतारकम् ॥१३५॥
मृत्युहानि, बलोन्नति, भयहानि, यश, कांति, विद्या, ऋद्धि, महाश्री, अनष्टद्रव्यता, नष्ट द्रव्यों की पुनः प्राप्ति,
दीर्घायु, मन का उल्लास, सौकुमार्य, अधृष्टता और महासामर्थ्य हैहयेन्द्र के कीर्तन से प्राप्त हों ॥११६-१२१॥
जो कोई इस कार्तवीर्य के पुण्यवर्धक, सकलपापनाशक, सर्वोपद्रवध्वंसक, अखिलशांतिकारक, गोपनीय,
समस्तभयनाशन, विजयदायक एवम् निखिलसंपत्तिप्रदायक कवच को सुनेगा या पढ़ेगा, उसको सकल कामनायें
सफल होंगी । जब चोर पशु, धन आदि चुरा ले तब रात्रि में पश्चिम मुंह होकर सात बार इस कवच का पाठ
करे । सात रात ऐसा करने से अपहृत धन मिल जाता है, इसमें संशय नहीं । यदि मनुष्य पूरव मुंह होकर
सत्ताईस बार इसका पाठ करे तो वह देवासुर के समान भी शत्रुचक्र (संग्राम) निवारण (विजय) कर
सकता है । विवाद तथा कलह में जो इसका पांच बार पाठ करता है; उसकी विजय होतो है, कभी भी पराजय
नहीं । जो सब प्रकार के रोगों में तथा कष्टों में तीन बार या पाँच बार इसका पाठ करता हो, उसे रोग, मृत्यु,
वेताल, भूत एवम् प्रेतों का भय नहीं होता । बन्धनमोक्ष के लिये रात्रि में अच्छी तरह बारह बार इसका पाठ
करना चाहिए । तीन दिन ऐसा करने से अवश्य बन्धन से छुटकारा मिल जाता है । समस्त साधनाओं में इसी
प्रकार करना चाहिए । उत्तम मन्त्रवेत्ता व्यक्ति ऐसा करके एक ही सप्ताह में असाध्य वस्तु को भी सिद्ध कर
सकता है । जो मनुष्य यात्राकाल में इसका पाठ करके प्रयाण करता है, उसे दुष्ट, चोर, शत्रु एवम् व्याघ्र आदि का
भय नहीं होता । इस कवच को पढ़ कर अंजलि के जल से शरीर को सिक्त करे । ऐसा करने से विष, कृत्या
तथा फोड़े आदि रोग नहीं होते । कार्तवीर्य, दुष्टद्वेषी, कृतवीर्यसुत, बली, सहस्रबाहु, शत्रुघ्न, रक्तवासा, धनुर्धर,
रक्तगंध, रक्तमाल्य, राजा तथा स्मरण करने वालो को अभीष्टदायक इन बारह नामों का जो पाठ करता है,
उसे धन-संपत्ति मिलती है तथा जनता वशीभूत होती है । विप्र ! जो व्यक्ति सदा श्रीमान् कार्तवीर्य का सेवन
६८०
नारदीयपुराणम्
तस्य रक्षां सदा कुर्याच्चक्रं विष्णोर्महात्मनः । मयैतत्कवचं विप्र दत्तात्रेयान्मुनीश्वरात् ॥१२६॥
श्रुतं तुभ्यं निगदितं धारयस्वाखिलेष्टदम् ॥१२७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे कार्तवीर्यकवचकथनं नाम
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥७७॥
अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
कार्तवीर्यस्य कवचं कथितं ते मुनीश्वर । मोहविध्वंसनं जैत्रं मारुतेः कवचं शृणु ॥१॥
यस्य संधारणात्सद्यः सर्वे नश्यंत्युपद्रवाः । भूतप्रेतारिजं दुःखं नाशमेति न संशयः ॥२॥
एकदाहं गतो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम् । आनंदवनिकासंस्थं ध्यायंतं स्वात्मनः पदम् ॥३॥
तत्र रामं रमानाथं पूजितं त्रिदशेश्वरैः । नमस्कृत्य तदादिष्टमासनं स्थितवान् पुरः ॥४॥
तत्र सर्वं मया वृत्तं रावणस्य वधांतकम् । पृष्टं प्रोवाच राजेंद्रः श्रीरामः स्वयमादरात् ॥५॥
ततः कथांते भगवान्मारुतेः कवचं ददौ । मह्यं तत्ते प्रवक्ष्यामि न प्रकाश्यं हि कुत्रचित् ॥६॥
करता है, उसकी रक्षा महात्मा विष्णु का चक्र सदा करता है । द्विज ! मैंने इस कवच को मुनीश्वर दत्तात्रेय से
सुना था, जिसे तुम्हें बतला दिया। तुम भी इस सकल-कामनादायक कवच का धारण करो ॥१२२-१२७॥
श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त तृतीयपाद में कार्तवीर्यकवच-कथन नामक
सतहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७७॥
अध्याय ७८
हनुमान् का कवच
सनत्कुमार बोले-मुनीश्वर । कार्तवीर्य का कवच तो मैंने सुना दिया । अब हनुमान् का कवच सुनो,
जो मोहनाशक तथा विजयदायक है और जिसके धारण करने से शीघ्र ही समस्त उपद्रवों और भूत, प्रेत तथा
शत्रुजन्य दुःखों का नाश हो जाता है ॥१-२॥
एक समय रमण करने वालों में श्रेष्ठ राम को देखने के लिए मैं गया । वे आनंदवन में बैठकर अपने
लोक (वैकुण्ठ) का स्मरण कर रहे थे । उन देवपूजित रमानाथ राम को प्रणाम कर मैं उनके आदेशानुसार
आसनासीन हुआ । तब मैंने रावणवध संबन्धी वृत्तान्त उनसे पूछा । पूछने पर राजशिरोमणि राम ने स्वयं आदर-
पूर्वक सब कुछ कह सुनाया और कथा के अन्त में मुझे हनुमान् का कवच प्रदान किया । वही कवच मैं तुम्हें बता
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
६८१
भविष्यदेतन्निर्दिष्टं बालभावेन नारद । श्रीरामेणांजनासूनोर्मुक्तिप्रदायकम् ॥७॥
हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । पातु प्रतीच्यामक्षघ्नः सौम्ये सागरतारकः ॥८॥
उर्द्धं पातु कपिश्रेष्ठः केसरिप्रियनंदनः । अधस्ताद्विष्णुभक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ॥६॥
लंकाविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरंतरम् । सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनंदनः ॥१०॥
भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरंतरम् । नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥११॥
कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिंकरः । नासाग्रमंजनासुनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः ॥१२॥
पातु कंठे तु दैत्यारिः स्कंधौ पातु सुरारिजित् । भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः ॥१३॥
नखान्नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः । वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ॥१४॥
लंका विभंजनः पातु पृष्ठदेशे निरंतरम् । नाभिं श्रीरामभक्तस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ॥१५॥
गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सक्थिनी अतिथिप्रियः । ऊरू च जानुनी पातु लंकाप्रासादभंजनः ॥१६॥
जंघे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः । अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ॥१७॥
अङ्गानि पातु सत्त्वाढ्यः पातु पादांगुलीः सदा । मुखांगानि महाशूरः पातु रोमाणि चात्मवान् ॥१८॥
दिवारात्रौ त्रिलोकेषु सदागतिसुतोऽवतु । स्थितं व्रजंतमासीनं पिबंतं जक्षतं कपिः ॥१६॥
लोकोत्तरगुणः श्रीमान् पातु ह्यंतकसंभवः । प्रमत्तमप्रमत्तं वा शयानं गहनेऽम्बुनि ॥२०॥
स्थलेंऽतरिक्षे ह्यग्नौ वा पर्वते सागरे द्रुमे । संग्रामे संकटे घोरे विराड्रूपधरोऽवतु ॥२१॥
रहा हूँ। इसे यत्र-तत्र नहीं प्रकाशित करना । नारद ! श्रीराम ने हनुमान् के इस भुक्ति-मुक्तिदायक कवच को
बालभाव से मुझे बतलाया था ॥३-७॥ (यह इस तरह है—)
“पूर्व दिशा में हनुमान् मेरी रक्षा करें ! दक्षिण में पवनात्मज रक्षा करें । पश्चिम में अक्षघ्न और उत्तर
में समुद्रतारक रक्षा करें । ऊपर कपिश्रेष्ठ केसरीप्रियनंदन, नीचे विष्णुभक्त, मध्य में पवनसुत और समस्त
आपत्तियों से लंकादाहक सदा मेरी रक्षा करें । सुग्रीवसचिव मेरे मस्तक की रक्षा करें । वायुनंदन भाल की
और महावीर भौंहों के बीच की निरंतर रूप से रक्षा करें । छाया हरण करने वाले नेत्रों को, कपीश्वर कपोलों
की और श्रीरामकिंकर कर्णमूल की रक्षा करें । अंजनीपुत्र नाक के अग्रभाग की तथा हरीश्वर मुख की रक्षा
करें । दैत्यारि कण्ठ की और सुरारिजित् स्कंधों की रक्षा करें । महतेजा बाँहों की और चरणायुध हाथों की रक्षा
करें । नखायुध नखों की और कपीश्वर पेट की रक्षा करें । मुद्रापहारी छाती की और भुजायुध पार्श्व की
रक्षा करें । लंका के विध्वंसक मेरे पृष्ठदेश की निरन्तर रूप से रक्षा करें । श्रीरामभक्त नाभि की और अनिलात्मज
कमर की रक्षा करें ॥८-१५॥ गुह्य की रक्षा महाप्राज्ञ करें और हद्दियों की अतिथिप्रिय । लंका के भवनों को
नष्ट करने वाले ऊरुओं तथा जानुओं की रक्षा करें । कपिश्रेष्ठ जंघाओं की और महाबल गुल्फों (घुटने) की रक्षा
करें । पर्वतोद्धारक चरणों की और सूर्यतुल्य अंगों की रक्षा करें । सत्त्वाढ्य अंगुलियों की सदा रक्षा करें और
मुखांगों की महाशूर तथा आत्मवान् रोमों की रक्षा करें । त्रिलोकी में सदा गमन करने वाले वायु के पुत्र दिन-रात
मेरी रक्षा करें । उठते, बैठते, चलते, पीते और खाते कपि मेरी रक्षा करें । प्रमत्त या अप्रमत्त होते हुए, अथाह
जल में डूबते हुए मुझे लोकोत्तर गुण वाले और शंकर से उत्पन्न होने वाले श्रीमान् हनुमान् बचायें । स्थल पर,
अन्तरिक्ष में, अग्नि में, पर्वत पर, सागर में, वृक्ष पर, संग्राम में तथा घोर संकट में विराड्रूपधारी मेरी रक्षा
८६ ना० पु०
६८२ नारदीयपुराणम्
डाकिनीशाकिनीमारीकालरात्रिमरीचिकाः । शयानं मां विभुः पातु पिशाचोरगराक्षसीः ॥२२॥
दिव्यदेहधरो धीमान्सर्वसत्त्वभयंकरः । साधकेंद्रावतः शश्वत्पातु सर्वत एव माम् ॥२३॥
यद्रूपं भीषणं दृष्ट्वा पलायंते भयानकाः । स सर्वरूपः सर्वज्ञः सृष्टिस्थितिकरोऽवतु ॥२४॥
स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः साक्षाद्देवो महेश्वरः । सूर्यमंडलंगः श्रीदः पातु कालत्रयेऽपि माम् ॥२५॥
यस्य शब्दमुपाकर्ण्य दैत्यदानवराक्षसाः । देवा मनुष्यास्तिर्यंचः स्थावरा जङ्गमास्तथा ॥२६॥
सभया भयनिर्मुक्ता भवंति स्वकृतानुगाः । यस्यानेक्कथाः पुण्याः श्रूयंते प्रतिकल्पके ॥२७॥
सोऽवतात्साधकश्रेष्ठं सदा रामपरायणः । वैधावधातृप्रभृति यत्किंचिद्दृश्यतेऽत्यलम् ॥२८॥
विद्धि व्याप्तं यथा कीशरूपेणांजनेन तत् । यो विभुः सोऽहमेषोऽहं स्वीयः स्वयमणुर्बृहत् ॥२९॥
ऋग्यजुः सामरूपश्च प्रणवस्त्रिवृदध्वरः । तस्मै स्वस्मै च सर्वस्मै नतोऽस्म्यात्मसमाधिना ॥३०॥
अनेकानन्तब्रह्माण्डधृते ब्रह्मस्वरूपिणे । समीरणत्मने तस्मै नतोऽस्म्यात्मस्वरूपिणे ॥३१॥
नमो हनुमते तस्मै नमो मारुतसूनवे । नमः श्रीरामभक्ताय श्यामाय महते नमः ॥३२॥
नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे । लंकाविदहनाथाय महासागरतारिणे ॥३३॥
सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च । रावणांतनिदानाय नमः सर्वोत्तरातने ॥३४॥
मेघनादमखध्वंसकारणाय नमोनमः । अशोकवनविध्वंसकारिणे जयदायिने ॥३५॥
वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने । वनपालशिरश्छेत्रे लंकाप्रासादभंजिने ॥३६॥
ज्वलत्कांचनवर्णाय दीर्घलांगूलधारिणे । सौमित्रिविजयदात्रे च रामदूताय ते नमः ॥३७॥
अक्षयस्य वधकर्त्रे च ब्रह्मास्त्रनिवारिणे । लक्ष्मणांगमहाशक्तिजातक्षतविनाशिने ॥३८॥
करें । डाकिनी, शाकिनी, कालरात्रि, मरीचिका, पिशाच, सर्प तथा राक्षसी से विभु मेरी रक्षा करें ॥१९-२२॥
दिव्यदेहधारी, साधकरक्षक, धीमान् तथा समस्त जीवों के लिये भयंकर विभु सदा सब प्रकार से मेरी रक्षा करें।
जिनके भीषण रूप को देख कर भयानक जीव भाग जाते हैं, वे सर्वरूप, सर्वज्ञ तथा सृष्टि-स्थितिकारी मेरी रक्षा
करें । स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, साक्षात् महेश्वर, सूर्यमण्डलगामी तथा श्रीदायक तीनों काल में मेरी रक्षा करें।
जिनके शब्द सुनकर दैत्य, दानव, राक्षस, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर एवम् जंगम भयभीत हो जाते हैं;
भक्तगणों का भय दूर हो जाता है और प्रतिकल्प में जिनकी अनेक पवित्र कथायें सुनी जाती हैं, वे रामपरायण देव
सदा उत्तमसाधक की रक्षा करें । धाता, विधाता आदि जो कुछ देखे जाते हैं, वे कीशरूप अंजनिपुत्र से व्याप्त
हैं। जो परमात्मा हैं, वही मैं हूँ और वही हनुमान् हैं। ये सूक्ष्म एवम् महान् भी हैं। ऋक्, यजु, प्रणव, त्रिवृत् एवम्
यज्ञ इनका रूप है । इनको, अपने को तथा सबको मैं आत्मसमाधि रूप से प्रणाम करता हूँ ॥२३-३०॥ अनेक एवम्
अनंत ब्रह्मांडधारी, ब्रह्मरूपी तथा आत्मस्वरूपी पवनपुत्र को प्रणाम है । हनुमान् को नमस्कार है । वायुसुत को
नमस्कार है । वानरवीर तथा सुग्रीव को मित्रता करा देने वाले को नमस्कार है । लंकादाह करने वाले, महासागर
लांघने वाले, सीता का शोक हरने वाले, राम की मुद्रिका धारण करने वाले, रावण के नाश का कारण होने वाले
और सर्वश्रेष्ठारमा कहलाने वाले को नमस्कार है। मेघनाद के यज्ञ को ध्वस्त करने वाले को नमस्कार है । अशोक
वन को उजाड़ने वाले, जयदायी, वायुपुत्र, वीर, आकाशगामी, वनरक्षकों के शिर फोड़ने वाले, लंका के भवनों को
विनष्ट करने वाले, जाज्वल्यमान सुवर्ण के समान कान्ति वाले, लम्बी पूँछ वाले, लक्ष्मण को विजय दिलाने वाले,
रामदूत को नमस्कार है ॥३१-३७॥ अक्षयकुमार का वध करने वाले, ब्रह्मास्त्र का निवारण करने वाले, लक्ष्मण के
६८३
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
रक्षोघ्नाय रिपुघ्नाय भूतघ्नाय नमो नमः । ऋक्षवानरवीरौघप्रासादाय नमो नमः ॥३९॥
परसैन्यबलघ्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते नमः । विषघ्नाय द्विषघ्नाय भयघ्नाय नमो नमः ॥४०॥
महारिपुभयघ्नाय भक्तत्राणैककारिणे । परप्रेरितमन्त्राणां मंत्राणां स्तंभकारिणे ॥४१॥
पयःपाषाणतरणकारणाय नमो नमः । बालार्कमंडलग्रासकारिणे दुःखहारिणे ॥४२॥
नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च । विहंगमाय शैवाय वज्रदेहाय ते नमः ॥४३॥
प्रतिग्रामस्थितायाथ भूतप्रेतवधार्थिने । करस्थशैलशस्त्राय रामशस्त्राय ते नमः ॥४४॥
कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च । दक्षिणाशाभास्कराय सतां चन्द्रोदयात्मने ॥४५॥
कृत्याक्षतव्यथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च । सर्वाग्निव्याधिसंस्तंभकारिणे भयहारीणे ॥४६॥
भक्तानां दिव्यवादेषु संग्रामे जयकारिणे । किल्किलावुवकाराय घोरशब्दकराय च ॥४७॥
स्वाम्याज्ञापार्थसंग्रामसख्यसंजयकारिणे । सदा वनफलाहारसंतृप्ताय विशेषतः ॥४८॥
महार्णवशिलाबद्धसेतुबंधाय ते नमः । इत्येतत्कथितं विप्र मारुतेः कवचं शिवम् ॥४६॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं रक्षणीयं प्रयत्नतः । अष्टगंधैर्विलिख्याथ कवचं धारयेत्तु यः ॥५०॥
कंठे वा दक्षिणे बाहौ जयस्तस्य पदे पदे । किं पुनर्बहुनोक्तेन साधितं लक्षमादरात् ॥५१॥
प्रजप्तमेतत्कवचमसाध्यं चापि साधयेत् ॥५२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे हनुमत्कवचनिरूपणं
नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥७८॥
अंगों में महाशक्ति-प्रहार-जन्य व्रणों को छुड़ाने वाले, राक्षसों को मारने वाले, शत्रुओं को मारने वाले तथा भूतों
के निहन्ता को नमस्कार है । रीछों, वानरों तथा वीरों के समूह को प्रसन्न करने वाले, शत्रुसेना का नाश करने वाले
तथा शस्त्रास्त्रों के विध्वंसक को नमस्कार है । विषघ्न, शत्रुघ्न तथा भयघ्न को नमस्कार है । महाशत्रु के भय
से मुक्त कराने वाले, भक्तों का त्राण करने वाले, शत्रुपेरित मन्त्रों का स्तंभन करने वाले और जल पर पाषाणों
को तैराने वाले को नमस्कार है । बालसूर्यमण्डल का ग्रास करने वाले, दुःख हरने वाले, नख रूप आयुध वाले,
भयंकर, दन्त रूप आयुधधारी, विहंगमरूप, शिवरूप तथा वज्रदेह को नमस्कार है ॥३८-४३॥ प्रत्येक गांव में
रहने वाले, भूत-प्रेतों का वध करने वाले, हाथों में पर्वत तथा शस्त्र धारण करने वाले, राम के शस्त्ररूप, कौपीन-
धारी, रामभक्ति-निरत, दक्षिणदिशाभास्कर और सज्जनों के लिये चन्द्ररूप को नमस्कार है । कृत्याकृत व्रणों
की व्यथा को हरने वाले, समस्त क्लेशों का नाश करने वाले, स्वामी की आज्ञा से अर्जुन के साथ संग्राम तथा
मित्रता करने वाले, भक्तों को महाविवाद तथा रण में विजय दिलाने वाले, किलकिलाहट का शब्द करने वाले,
घोर शब्द करने वाले, सकल अग्नियों एवम् व्याधियों का स्तम्भन करने वाले, भयहारी, सदा वनीय फलों के
आहार से संतृप्त होने वाले, महासागर में शिलाखण्डों से सेतु बाँधने वाले को नमस्कार है ।” विप्र ! यह हनुमान्
का पवित्र कवच मैंने बतला दिया ॥४४-४९॥ इसे जिस किसी को नहीं देना, यत्नपूर्वक रक्षा करना । जो मनुष्य
अष्टगन्धों से इस कवच को लिखकर कंठ या दक्षिण बाहु में धारण करता है, उसकी विजय पग-पग पर होती है ।
बहुत कहने से क्या लाभ ? जो इस कवच का लाख बार पाठ करता है, वह असाध्य को भी सिद्ध कर लेता
है ॥५०-५२॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त तृतीयपाद में हनुमत्कवचनिरूपण नामक अठहत्तरवां
अध्याय समाप्त ॥७८॥
अथ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथापरं वायुसूनोश्चरितं पापनाशनम् । यदुक्तं स्वासु रामेण आनन्दवनवासिना ॥१॥
सद्योजाते महाकल्पे श्रुतवीर्ये हनूमति । मम श्रीरामचन्द्रस्य भक्तिरस्तु सदैव हि ॥२॥
शृणुष्व गदतो मत्तः कुमारस्य कुमारक । चरितं सर्वपापघ्नं शृण्वतां पठतां सदा ॥३॥
वांwhite/वांछाम्यहं सदा विप्र संगमं कीशरूपिणा । रहस्यं रहसि स्वस्य ममानन्दवनोत्तमे ॥४॥
परीतेऽत्र सहायो मे सख्यश्च विगतज्वराः । क्रीडंति सर्वदा चात्र प्राकट्येऽपि रहस्यपि ॥५॥
कस्मिंश्चिदवतारे तु यद्वृत्तं च रहो मम । तदद्य प्रकटं तुभ्यं करोमि प्रीतमानसः ॥६॥
आविर्भूतोऽस्म्यहं पूर्वं राज्ञो दशरथक्षये । चतुर्व्यूहात्मकस्तत्र तस्य भार्यात्रये मुने ॥७॥
ततः कतिपयैरब्दैरागतो द्विजपुंगवः । विश्वामित्रोऽर्थयामास पितरं मम भूपतिम् ॥८॥
यक्षरक्षोविधातार्थं लक्ष्मणेन सहैव माम् । प्रेषयामास धर्मात्मा सिद्धाश्रममरण्यकम् ॥९॥
तत्र गत्वाश्रममृषेर्दूषयन्तौ निशाचरौ । ध्वस्तौ सुबाहुमारीचौ प्रसन्नोऽभूत्तदा मुनिः ॥१०॥
अस्त्रग्रामं ददौ मह्यं मासं चावासयत्तथा । ततो गाधिसुतो धीमान् ज्ञात्वा भाव्यर्थमादरात् ॥११॥
मिथिलामनयत्तत्र रौद्रं चादर्शयद्धनुः । तस्य कन्यां पणीभूतां सीतां सुरसुतोपमाम् ॥१२॥
अध्याय ७६
हनुमान का चरित्र-वर्णन
सनत्कुमार बोले--अब हनुमान् का दूसरा पापनाशन चरित्र सुनो, जिसे आनन्दवनवासी राम ने
मुझसे कहा था ।
राम ने कहा--"कुमार ! महाकल्प में सद्यः उत्पन्न होने वाले अति पराक्रमी हनुमान् में सदा मेरी भक्ति
रहे । मैं हनुमान् का चरित्र वर्णन करता हूँ । जो इस चरित्र को सुनेगा या पढ़ेगा उसके सकल पाप नष्ट हो
जायेंगे । विप्र ! मैं तो सदा पवननन्दन का साथ चाहता हूँ । मेरे इस उत्तम आनन्दवन में वे गुप्त रूप से रहते
हैं । यहाँ उनके अतिरिक्त भी मेरे कतिपय सखा और सखियां प्रकट रूप से या गुप्त रूप से क्रीड़ा करती रहती हैं।
किसी अवतार में जो मेरा रहस्यमय वृत्तान्त हुआ था, उसे मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सुना देता हूँ ॥१--६॥
पूर्व समय में राजा दशरथ की तीन रानियों से चतुर्व्यूह (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) रूप में अवतीर्ण
हुआ । कुछ वर्षों के बाद द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्र ने आकर मेरे पिता से मुझे मांगा । तब धर्मात्मा भूपति ने
लक्ष्मण सहित मुझे सिद्धाश्रम को भेज दिया । वहाँ मुनि के आश्रम में पहुँचकर सुबाहु और मारीच नामक दो
उपद्रवी निशाचरों को मैंने मारा । इससे प्रसन्न होकर मुनि ने मुझे बहुत से अस्त्र-शस्त्र दिये तथा एक मास
तक अपने ही आश्रम में रखा । अनन्तर भावी वृत्तान्त को जान कर श्रीमान् विश्वामित्र आदरपूर्वक मुझे मिथिला
ले आये और शिवधनुष को दिखला दिया । धनुष को तोड़कर मैंने माननीय जनक की देवकन्यातुल्य पुत्री सीता
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ६८५
धनुर्विभज्य समिति लब्धवान्मानिनोऽस्य च । ततो मागं भृगुपतेर्दपं मूढं चिरं स्मयन् ॥१३॥
व्यपनीयागमं पश्चादयोध्यां स्वपितुः पुरीम् । ततो राज्ञाहमाज्ञाय प्रजाशीलनमानसः ॥१४॥
यौवराज्ये स्वयं प्रीत्या सम्मंत्र्याप्तैर्विकल्पितः । तच्छ्रुत्वा सुप्रिया भार्या कैकयी भूपतिं मुने ॥१५॥
देवकार्यविधानार्थं विदूषितमतिर्जगौ । पुत्रो मे भरतो नाम यौवराज्येऽभिषिच्यताम् ॥१६॥
रामश्चतुर्दशसमा दण्डकान्प्रविवास्यताम् । तदाकर्ण्याहमुद्युक्तोऽरण्यं भार्यानुजान्वितः ॥१७॥
गंतुं नृपतिनानुक्तोऽप्यगमं चित्रकूटकम् । । तत्र नित्यं वन्यफलैर्मांसैश्चावर्तितक्रियः ॥१८॥
निवसन्नेव राजस्तु निधनं चाप्यवागमम् । ततो भरतशत्रुघ्नौ भ्रातरौ मम मानदौ ॥१९॥
मातृवर्गयुतौ दीनौ साचार्यामात्यनागरौ । व्यजिज्ञपतमागत्य पंचवट्यां निजाश्रमम् ॥२०॥
अकल्पयं भ्रातृभार्यासहितश्च त्रिवत्सरम् । ततस्त्रयोदशे वर्षे रावणो नाम राक्षसः ॥२१॥
मायया हृतवान्सीतां प्रियां मम परोक्षतः । ततोऽहं दीनवदन ऋष्यमूकं हि पर्वतम् ॥२२॥
भार्यामन्वेषयन्प्राप्तः सख्यं हर्यधिपेन च । अथ वालिनमाहत्य सुग्रीवस्तत्पदे कृतः ॥२३॥
सह वानरयूथैश्च साहाय्यं कृतवान्मम । विरुध्य रावणेनालं मम भक्तो विभीषणः ॥२४॥
आगतो ह्यभिषिच्याशु लंकेशो हि विकल्पितः । हत्वा तु रावणं संख्ये सपुत्रामात्यबांधवम् ॥२५॥
सीतामादाय संशुद्धामयोध्यां समुपागतः । ततः कालांतरे विप्र सुग्रीवश्च विभीषणः ॥२६॥
निमंत्रितौ पितुः श्राद्धे षट्कुलाश्च द्विजोत्तमाः । अयोध्यायां समाजग्मुस्ते तु सर्वे निमंत्रिताः ॥२७॥
ऋते विभीषणं तत्र चिंतयाने रघूत्तमे । शंभुर्ब्राह्मणरूपेण षट्कुलैश्च सहागतः ॥२८॥
अथ पृष्टो मया शंभुर्विभीषणसमागमे । नीत्वा मां द्रविडे देशे मोचय द्विजबंधनात् ॥२९॥
से जिसके लिये प्रण किया गया था, विवाह किया। मार्ग में परशुराम के दर्प को चूर करते हुए अपने पिता की
राजधानी अयोध्या पहुँचा। तब मुझ पर प्रजा अनुरक्त रहती थी, यह जान कर पिता ने मंत्रियों से सलाह
लेकर मेरा राज्याभिषेक करना चाहा। किन्तु उनकी अत्यन्त प्रिय भार्या कैकेयी, जिसकी बुद्धि को देवताओं ने
स्वकार्य-संपादन के लिये भ्रष्ट कर दिया था, राजा के समीप जाकर कहने लगी—मेरे पुत्र भरत को युवराज के
पद पर अभिषिक्त कीजिये और राम को चौदह वर्ष का वनवास दीजिये।" यह सुनकर पिता के न कहने पर
मैंने स्त्री तथा अनुज सहित चित्रकूट को चल दिया। वहाँ पहुँच कर वन्य फल तथा मांस से जीवन निर्वाह करते
हुए हम रहने लगे। इसी समय मेरे पिता का भी देहान्त हो गया ।। १७-१८३॥ तब मेरे मनस्वी दो भाई
भरत और शत्रुघ्न ने मातृसमूह, आचार्य, मन्त्री तथा नागरिकों के साथ पंचवटी में मेरे आश्रम पर आकर सब
समाचार सुनाया (अर्थात् अयोध्या लोट चलने के लिये मुझसे प्रार्थना की; किन्तु मैंने उन्हीं को समझा-बुझा
लौटा दिया)। अनन्तर अनुज तथा स्त्री के साथ तीन वर्षों तक वहाँ रहा। तेरहवें वर्ष में रावण नामक राक्षस ने
मेरी प्रिया सीता को मेरे परोक्ष में माया से हर लिया। तब मैं दीन वदन होकर प्रियतमा को ढूंढ़ते हुए ऋष्यमूक
पर्वत पर पहुँचा। वहाँ वानराधीश सुग्रीव से मित्रता कर बाली को मारा और सुग्रीव को उसके पद पर प्रति-
ष्ठित किया। फिर संग्राम में पुत्र, अमात्य तथा बांधव सहित रावण को मारकर अग्निपरीक्षा से शुद्ध की हुई सीता
को लेकर अयोध्या आया। विप्र ! वहाँ कुछ दिनों के उपरान्त सुग्रीव, विभीषण तथा अपने छह कुलों को पिता के
श्राद्ध में निमंत्रित किया। उस श्राद्ध में एक विभीषण को छोड़कर सब आये ।।१९-२७३।। ब्राह्मण का रूप धारण
कर शंकर भी छह कुलों के साथ आये। जब मैंने विभीषण के आने के बारे में शंकर से पूछा तब उन्होंने कहा,
६८६ नारदीयपुराणम्
मया निमंत्रितः श्राद्धे ह्यगस्त्याद्या मुनीश्वराः । संभोजितास्तु प्रययुः स्वस्वमाश्रममंडलम् ॥३०॥
ततः कालांतरे विप्रा देवा दैत्या नरेश्वराः । गौतमेन समाहूताः सर्वे यज्ञसभाजिताः ॥३१॥
ते सर्वे स्फाटिकं लिंगं त्र्यंबकाद्रौ निवेशितम् । संपूज्य न्यवंसंस्तत्र देवदैत्यनृपाग्रजाः ॥३२॥
तस्मिन्समाजे वितते सर्वलिंगे समर्चिते । गौतमोऽप्यथ मध्याह्ने पूजयामास शंकरम् ॥३३॥
सर्वे शुक्लांबरधरा भस्मोद्धूलितविग्रहाः । सितेन भस्मना कृत्वा सर्वस्थाने त्रिपुंड्रकम् ॥३४॥
नत्वा तु भार्गवं सर्वे भूतशुद्धि प्रचक्रमुः । हृत्पद्ममध्ये सुषिरं तत्रैव भूतपञ्चकम् ॥३५॥
तेषां मध्ये महाकाशमाकाशे निर्मलामलम् । तन्मध्ये च महेशानं ध्यायेद्दीप्तिमयं शुभम् ॥३६॥
अज्ञानसंयुक्तं भूतं समलं कर्मसंगतः । तं देहमाकाशदीपे प्रदहेज्ज्ञानवह्निना ॥३७॥
आकाशस्यावृति चाहं दग्ध्वाकाशमथो दहेत् । दग्ध्वाकाशमथो वायुमग्निभूतं तथा वहेत् ॥३८॥
अब्भूतं च ततो दग्ध्वा पृथिवीभूतमेव च । तदाश्रितान्गुणान्दग्ध्वा ततो देहं प्रवाहयेत् ॥३९॥
एवं प्रदग्ध्वा भूतादि देही तज्ज्ञानवह्निना । शिखामध्यस्थितं विष्णुमानंदरसनिर्भरम् ॥४०॥
निष्पन्नचंद्रकिरणसंकाशकिरणं शिवम् । शिवांगोत्पन्नकिरणैरमृतद्रवसंयुतैः ॥४१॥
सुशीतला ततो ज्वाला प्रशांता चंद्ररश्मिवत् । प्रसारितसुधारश्मिः सांद्रीभूतश्च संप्लवः
अनेन प्लावितं भूतग्रामं संचितयेत्परम् ॥४२॥
इत्थं कृत्वा भतशुद्धिं क्रियार्हो मर्त्यः शुद्धो जायते ह्येव सद्यः ।
पूजां कतुं जप्यकर्मापि पश्चाद्देवं ध्यायेद्ब्रह्महत्यादिशुद्ध्यै ॥४३॥
मुझे द्रविड़ देश में ले जाकर द्विज-बंधन से मुक्त कीजिये। पश्चात् श्राद्ध में निमन्त्रित अगस्त्य आदि मुनिवर
अच्छी तरह भोजन करके अपने-अपने आश्रम को गये ॥२८-३०॥
पुनः कुछ काल के उपरान्त गौतम ने यज्ञ समारोह में ब्राह्मण, देवता, दैत्य, राजा आदि सबको बुलाया।
सबों ने कैलास पर्वत पर स्फटिकमय शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर उनकी पूजा की। देव, दैत्य तथा राजशिरोमणियों
ने जब लिंग की अर्चना कर ली तब मध्याह्न में गौतम ने भी शंकर की आराधना की। समस्त उपासक श्वेत
वस्त्र पहने, संपूर्ण शरीर में भस्म रमाये और सब स्थानों में उज्ज्वल भस्म का त्रिपुण्ड लगाये हुए थे। सब ने
शिव को प्रणाम कर भूतशुद्धि क्रिया की।
वह क्रिया इस तरह की जाती है कि हृत्पद्म के मध्य में सुषिर (छिद्र) तथा उस सुषिर के मध्य में पंच
महाभूतों का ध्यान करे ॥३१-३५॥ महाभूतों के मध्य में महाकाश, आकाश में प्रकाश और प्रकाश में देदीप्य-
मान शुभमूर्ति महेश का संस्मरण करे। अज्ञान से संपृक्त भूत समल है। इससे कर्म का संयोग होने पर शरीर
बनता है। उस शरीर को ज्ञानाग्नि के द्वारा आकाश दीप में जलाये। फिर आकाश के आवरण को जला-
कर आकाश को जलाये। फिर वायु, अग्नि, पृथिवि तथा तदाश्रित गुणों को देह को जलाये। इस प्रकार
भूतादि को ज्ञानाग्नि से जलाकर देही शिखामध्यस्थित विष्णु तथा शिव का इस प्रकार ध्यान करे कि विष्णु
आनन्द स्वरूप हैं और शिव चंद्रकिरण के समान शीतल तथा धवल हैं। शिव के अंगोत्पन्न किरणों से जो
अमृत टपकाती है, चन्द्ररश्मि की तरह प्रशांत ज्वाला निकलती है। उससे अमृत की सघन वर्षा होती है,
जिससे भूतसमूह आप्लावित हो जाता है ॥३६-४२॥ इस तरह भूतशुद्धि क्रिया करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है।
ब्रह्महत्या आदि दोष निवारण के लिये भी भूतशुद्धि करनी चाहिये। इसे कर लेने के बाद ही पूजा, जप, ध्यान
आदि करे।
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ६६७
एवं ध्यात्वा चंद्रदीप्तिप्रकाशं ध्यानेनारोप्याशु लिंगे शिवस्य ।
सदाशिवं दीपमध्ये विचिंत्य पञ्चाक्षरेणार्चनमव्ययं तु ॥४४॥
आवाहनादीनुपचारांस्तथापि कृत्वा स्नानं पूर्ववच्छंकरस्य ।
औदुम्बरं राजतं स्वर्णपीठं वस्त्रादिच्छन्नं सर्वमेवेह पीठम् ॥४५॥
अंते कृत्वा बुद्बुदाभ्यां च सृष्टिं पीठे पीठे नागमेकं पुरस्तात् ।
कुर्यात्पीठे चोर्ध्वके नागयुग्मं देवाभ्याशे दक्षिणे वामतश्च ॥४६॥
जपापुष्पं नागमध्ये निधाय मध्ये वस्त्रं द्वादशप्रातिगुण्ये ।
सुश्वेतेन तस्य मध्ये महेशं लिंगाकारं पीठयुक्तं प्रपूज्यम् ॥४७॥
एवं कृत्वा साधकास्ते तु सर्वे दत्त्वा दत्त्वा पंचगंधाष्टगंधम् ।
पुष्पैः पत्रैः श्रोतिलैरक्षतैश्चतिलोन्मिश्रैः केवलैश्च प्रपूज्य ॥४८॥
धूपं दत्त्वा विधिसंप्रयुक्तं दीपं दत्त्वा चोत्तमेवोपहारम् ।
पूजाशेषं ते समाध्याय सर्वे गीतं नृत्यं तत्र तत्रापि चक्रुः ॥४९॥
कालेचास्मिन् सुव्रते गौतमस्य शिष्यः प्राप्तः शंकरात्मेति नाम्ना ॥५०॥
उन्मत्तवेषो दिग्वासा अनेकां वृत्तिमास्थितः । क्वचिद्विप्रातिप्रवरः क्वचिच्चंडालसन्निभः ॥५१॥
क्वचिच्छूद्रसमो योगी तापसः क्वचिदप्युत । गर्जत्युत्पतते चैव नृत्यति स्तौति गायति ॥५२॥
रोदिति शृणुतेऽप्युक्तं पतत्युत्तिष्ठति क्वचित् । शिवज्ञानैकसंपन्नः परमानंदनिर्भरः ॥५३॥
संप्राप्तो भोज्यवेलायां गौतमस्यांतिकं ययौ । बुभुजे गुरुणा साकं क्वचिदुच्छिष्टमेव च ॥५४॥
क्वचिल्लिहति तत्पात्रं तूष्णीमेवाभ्यगात्क्वचित् । हस्तं गृहीत्वैव गुरोः स्वयमेवाभुनक्क्वचित् ॥५५॥
भूत शुद्धि करने के उपरान्त गौतम प्रभृति साधकों ने ध्यान से उस शिवलिंग में चंद्रिका की तरह प्रकाश
को अधिष्ठित किया । फिर दीप मध्य में सदाशिव का ध्यान कर पंचाक्षर मन्त्र से उन अव्यय शिव की अर्चना
की । आवाहन, स्नान आदि उपचारों से उनका पूजन कर गूलर की लकड़ी, चांदी तथा सोने के बने पीठों पर, जो
वस्त्र आदि से आवृत थे, उन्हें स्थापित किया । अंत में बुलबुलों से सृष्टि करके प्रत्येक पीठ पर एक-एक नाग की
स्थापना की । पीठ के ऊपर तथा शंकर के दक्षिण एवम् वाम पार्श्व में दो-दो नागों की स्थापना कर नागों के
मध्य में जपापुष्प तथा बारह श्वेत वस्त्रों को रखा । उनके मध्य में समस्त साधकों ने पंच गंध, अष्टगंध, पुष्प,
पत्र, श्रोतिल तथा तिलमिश्रित अक्षतों से शिव की समर्चर्चना कर विधिवत् धूप, दीप तथा उपहार समर्पित
किया । पूजनसमाप्ति के बाद उन लोगो ने वहाँ नृत्य गीत भी किया ॥४३-४९॥
उस महोत्सव में शंकरात्मा नामक गौतम के शिष्य वहाँ आ पहुँचे । उनका वेष उन्मत्त का-सा था । वे
दिगम्बर थे । उनकी वृत्तियां अनेक प्रकार की थीं । कहीं तो वे उत्तम ब्राह्मण के रूप में रहते थे, कहीं चांडाल
के रूप में, कहीं शूद्र, कहीं योगी और कहीं तपस्वी के रूप में उनकी स्थिति होति थी । वह कहीं गरजते, कहीं
कूदते, कहीं नाचते, कहीं स्तुति करते, कहीं गाते, कहीं रोते, कहीं स्पष्ट सुनते, कहीं गिरते और कहीं उठते
थे । भोजन करने के समय वे गौतम के समीप चले जाते थे । कभी गुरु के साथ भोजन करते तो कभी उच्छिष्ट
खा लेते थे । कभी बरतन को जीभ से चाट लेते तो कहीं चुपचाप उठ कर भाग जाते थे । कभी गुरु के हाथ से,
कभी स्वयं अपने हाथ से खाते थे । कभी वे घर के अन्दर ही मूत्र त्याग देते तो कभी शरीर में कीचड लेप लेते थे ।
६८८ नारदीयपुराणम्
क्वचिद् गृहांतरे मूत्रं क्वचित्कर्दमलेपनम् । सर्वदा तं गुरुर्दृष्ट्वा करमालंब्य मंदिरम् ॥५६॥
प्रविश्य स्वीयपीठे तमुपवेश्याप्यभोजयत् । स्वयं तदस्य पात्रेण बुभुजे गौतमो मुनिः ॥५७॥
तस्य चित्तं परिज्ञातुं कदाचिदथ सुंदरी । अहल्या शिष्यमाहूय भुङ्क्ष्वेति प्राह तं मुदा ॥५८॥
निर्दिष्टो गुरुपत्नया तु बुभुजे सोऽविशेषतः
यथा पपौ हि पानीयं तथा वह्निमपि द्विज । कंटकानन्नवद्भुक्त्वा यथापूर्वमतिष्ठत ॥५९॥
पुरो हि मुनिकन्याभिराहूतो भोजनाय च । दिने दिने तत्प्रदत्तं लोष्टमंबु च गोमयम् ॥६०॥
कर्दमं काष्ठदंडं च भुक्त्वा पीत्वाथ हर्षितः । एतादृशो मुनिरसौ चंडालसदृशाकृतिः ॥६१॥
सुजीर्णोपानहौ हस्ते गृहीत्वा प्रलपन्हसन् । अंत्यजोचितवेषश्च वृषपर्वाणमभ्यगात् ॥६२॥
वृषपर्वेशयोर्मध्ये दिग्वासाः समतिष्ठत । वृषपर्वा तमज्ञात्वा पीडयित्वा शिरोऽच्छिनत् ॥६३॥
हते तस्मिन्द्विजश्रेष्ठे जगदेतच्चराचरम् । अतीव कलुषं ह्यासीत्तवस्था मुनयस्तथा ॥६४॥
गौतमस्य महाशोकः संजातः सुमहात्मनः । निर्ययौ चक्षुषो वारि शोकं संदर्शयन्निव ॥६५॥
गौतमः सर्वदैत्यानां सन्निधौ वाक्यमुक्तवान् । किमनेन कृतं पापं येन च्छिन्नमिदं शिरः ॥६६॥
मम प्राणाधिकस्येह सर्वदा शिवयोगिनः । ममापि मरणं सत्यं शिष्यच्छद्मा यतो गुरुः ॥६७॥
शैवानां धर्मयुक्तानां सर्वदा शिववर्तिनाम् । मरणं यत्र दृष्टं स्यात्तत्र नो मरणं ध्रुवम् ॥६८॥
तच्छ्रुत्वा ह्यसुराचार्यः शुक्रः प्राह विदांवरः । एनं संजीवयिष्यामि भार्गवं शंकरप्रियम् ॥६९॥
किमर्थं म्रियते ब्रह्मन्पश्य मे तपसो बलम् । इति वादिनि विप्रेन्द्रे गौतमोऽपि ममार ह ॥७०॥
तस्मिन्मृतेऽथ शुक्लोऽपि प्राणांस्तत्याज योगतः । तस्यैवं हतिमाज्ञाय प्रह्लादाद्या दितीश्वराः ॥७१॥
गुरु उनका हाथ पकड़ कर अपने घर ले जाते । और अपने आसन पर बैठा कर भोजन कराते थे । गौतममुनि
स्वयं भी उन्हीं के पात्र में खाने लगते थे ॥५०-५७॥ किसी समय शंकरात्मा के चित्त की परीक्षा करने के लिये
सुन्दरी अहिल्या ने हर्षपूर्वक उनसे कहा--'तुम मेरे साथ भोजन करो' । गुरुपत्नी के ऐसा कहने पर बिना 'ननु-
नच' किये उन्होंने यथेच्छ भोजन किया । द्विज ! वे जैसे जल पोते वैसे आग भी पी जाते थे । कांटे को अन्न की
तरह खा कर यथापूर्व स्वस्थ रहते थे । मुनि की बालिकाएं उन्हें बुलाकर ढेले, जल, गोबर, कीचड़ तथा लकड़ी
खाने को दे देती थीं । उन चीजों को खाकर भी वे प्रसन्न रहते थे । (एक दिन) इस तरह के वे मुनि, जिनका
चंडाल का-सा वेश था, टूटे-फटे जूते को हाथ में लेकर बड़बड़ाते एवम् हंसते हुए वृषपर्वा के पास पहुँचे । वहाँ
वृषपर्वा तथा शिव के मध्य वे दिगम्बर होकर खड़े हो गये । वृषपर्वा ने उन्हें नहीं पहचाना, इसलिये बुरी तरह
उनका शिर काट डाला । उन द्विजवर का निधन हो जाने पर चराचर विश्व में हाहाकार मच गया । मुनि-
समाज तथा महात्मा गौतम को महान् शोक हुआ ॥५८-६४½॥ शोक संतप्त गौतम की आँखों से आंसू बहने
लगे । तब उन्होंने समस्त दैत्यों के समक्ष यह बात कही—"मेरे प्राणाधिक प्रिय तथा शिवयोगी शिष्य ने क्या
अपराध किया जो इसका शिर काट दिया गया ? अब मेरा भी मरण अवश्यंभावी है। जहाँ धर्मयुक्त सदाशिव-
योग में निरत रहने वाले शैवों की मृत्यु देखी जाय वहाँ हमारा भी मरण निश्चित है" ।।६५-६८।।
गौतम की बात सुनकर महाज्ञानी असुराचार्य शुक्र ने कहा-- "ब्रह्मन् ! क्यों आप मर रहे हैं? मैं इस
शंकरप्रिय भृगुवंशी को जिलाऊँगा । देखिए आप मेरा तपोबल ।"
दैत्यगुरु इतना कह ही रहे थे कि गौतम का प्राण त्याग हो गया । उनके मर जाने पर शुक्र ने भी योग
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८६
देवा नृपा द्विजाः सर्वे मृता आसंस्तदद्भुतम् । मृतमासीदथ बलं तस्य बाणस्य धीमतः ॥७२॥
अहल्या शोकसंतप्ता रुरोदोच्चैः पुनः पुनः । गौतमेन महेशस्य पूजया पूजितो विभुः ॥७३॥
वीरभद्रो महायोगी सर्वं दृष्ट्वा चुकोप ह । अहो कष्टमहोकष्टं महेशा बहवो हताः ॥७४॥
शिवं विज्ञापयिष्यामि तेनोक्तं करवाण्यथ । इति निश्चित्य गतवान्मंदराचलमध्ययम् ॥७५॥
नमस्कृत्य विरूपाक्षं वृत्तं सर्वमथोक्तवान् । ब्रह्माणं च हरिं तत्र स्थितौ प्राह शिवो वचः ॥७६॥
मद्भक्तैः साहसं कर्म कृतं ज्ञात्वा वरप्रदम् । गत्वा पश्यामि हे विष्णो सर्वं तत्कृतसाहसम् ॥७७॥
इत्युक्त्वा वृषमारुह्य वायुना धूतचामरः । नन्दिकेन सुवेषेण धृते छत्रेऽतिशोभने ॥७८॥
सुश्वेते हेमदंडे च नान्ययोग्ये धृते विभो । महेशानुमतिं लब्ध्वा हरिर्नागांतके स्थितः ॥७९॥
आरक्तनीलच्छत्राभ्यां शुशुभे लक्ष्मकौस्तुभः । शिवानुमत्या ब्रह्मापि हंसारूढोऽभवत्तदा ॥८०॥
इंद्रगोपप्रभाकारच्छत्राभ्यां शुशुभे विधिः । इन्द्रादिसर्वदेवाश्च स्वस्ववाहनसंयुताः ॥८१॥
अथ ते निर्ययुः सर्वे नानावाद्यानुमोदिताः । कोटिकोटिगणाकीर्णा गौतमस्याश्रमं गताः ॥८२॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाना दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् । स्वभक्तं जीवयामास वामकोणनिरीक्षणात् ॥८३॥
शंकरो गौतमं प्राह तुष्टोऽहं ते वरं वृणु । तदाकर्ण्य वचस्तस्य गौतमः प्राह सादरम् ॥८४॥
यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम । त्वल्लिङ्गार्चनसामर्थ्यं नित्यमस्तु ममेश्वर ॥८५॥
से प्राणों को छोड़ दिया । उनकी इस प्रकार मृत्यु जान कर प्रह्लाद आदि दैत्येश्वर, देवता, नृप तथा द्विज सब
के सब मर गये । धीमान् बाण की सेना भी मर गई । यह अद्भुत घटना हुई । इस घटना को सुनकर शोकसंतप्ता
अहल्या बड़े उच्च स्वर से आर्तनाद करने लगी । गौतम ने शिवपूजन के समय महायोगी एवम् अतुलपराक्रमी
वीरभद्र की भी पूजा की थी । उन्होंने जब इस घटना का सब समाचार सुना तो वे बहुत क्रुद्ध हुए और कहने
लगे--"हाय ! बड़े दुःख की बात है कि बहुत-से शिवभक्त मारे गये । मैं शंकर से जाकर सब बातें बतलाऊंगा और
उनके आदेशानुसार आगे कर्तव्य करूंगा ।” ऐसा निश्चय करके वे अविनाशी मंदरपर्वत पर गये । वहां त्र्यंबक
को नमस्कार कर सब समाचार सुना दिया ॥६९-७५३॥
तब शिव ने अपने समीपस्थ ब्रह्मा तथा विष्णु से कहा- "अहो ! मेरे भक्तों ने बड़ा साहस का काम
किया । उनका यह कार्य वरप्रद हुआ । विष्णु ! हमें चलकर उनका साहसपूर्ण कार्य देखना चाहिए ।।" इतन'
कहकर शंकर वृष पर आरूढ़ हो गये । वायुदेव चामर डुलाने लगे । नंदिक ने अतिमनोहर श्वेत छत्र, जिसका
दंड सुवर्ण का था और जिसे अन्य व्यक्ति धारण नहीं कर सकता था, विभु के ऊपर लगा दिया ॥७६-७८३॥
महेश की अनुमति पाकर विष्णु भी गरुड़ पर सवार हुए । श्रीवत्स चिह्न तथा कौस्तुभ मणि धारण करने वाले
हरि लाल एवम् नील रंग के छत्रों से सुशोभित हुए । शिव की अनुमति से ब्रह्मा भी हंस पर आरूढ हुए । उनके
छत्र इन्द्रगोप के समान लाल तथा प्रभा के सदृश चमकदार थे । इन्द्र आदि देवगण भी अपने-अपने वाहनों पर
चढ़कर विविध वाद्यों के साथ प्रयाण करने लगे । इस तरह कोटि-कोटि गणों से युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और
महेश गौतम के आश्रम पर पहुँचे । उन्होंने वहाँ के उस अद्भुत वातावरण को देख कर अपने भक्त को वाम
नेत्रनिरीक्षण से जिला दिया ॥७९-८३॥ फिर शंकर ने गौतम से कहा- 'मैं तुम से प्रसन्न हूँ, वर मांगो ।' उनके
वचन को सुनकर गौतम आदरपूर्वक कहने लगे- "देवेश ! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो यह
८७ ना० पु०
६६० नारदीयपुराणम्
वृतमेतन्मया देव त्रिनेत्र शृणु चापरम् । शिष्योऽयं मे महाभागो हेयादेयादिवर्जितः ॥८६॥
प्रेक्षणीयं ममत्वेन न च पश्यति चक्षुषा । न घ्राणग्राह्यं देवेश न पातव्यं न चेतरत् ॥८७॥
इति बुद्ध्या तथा कुर्वन्स हि योगी महायशाः । उन्मत्तविकृताकारः शंकारात्मेति कीर्तितः ॥८८॥
न कश्चित्तं प्रति द्वेषी न च तं हिंसयेदपि । एतन्मे दीयतां देव मृतानाममृतस्तथा ॥८९॥
तच्छ्रुत्वोमापतिः प्रीतो निरीक्ष्य हरिमव्ययः । स्वांशेन वायुना देहमाविशज्जगदीश्वरः ॥९०॥
हरिरूपः शंकरात्मा मारुतिः कपिसत्तमः । पर्यायैरुच्यतेऽधीशः साक्षाद्विष्णुः शिवः परः ॥९१॥
आकल्पमेश प्रत्येकं कामरूपमुपाश्रितः । ममाज्ञाकारको रामभक्तः पूजितविग्रहः ॥९२॥
अनंतकल्पमीशानः स्थास्यति प्रीतमानसः । त्वया कृतमिदं वेश्म विस्तृतं सुप्रतिष्ठितम् ॥९३॥
नित्यं वै सर्वरूपेण तिष्ठामः क्षणमादरात् । समर्चित्ताः प्रयास्यामः स्वस्ववासं ततः परम् ॥९४॥
अथाबभाषे विश्वेशं गौतमो मुनिपुंगवः । अयोग्यं प्रार्थयामीश ह्यर्थी दोषं न पश्यति ॥९५॥
ब्रह्माद्यलभ्यं देवेश दीयतां यदि रोचते । अथेशो विष्णुमालोक्य गृहीत्वा तत्करं करे ॥९६॥
प्रहसन्नंबुजाभाक्षमित्युवाच सदाशिवः । क्षामोदरोऽसि गोविंद देयं ते भोजनं किमु ॥९७॥
स्वयं प्रविश्य यदि वा स्वयं भुंक्ष्व स्वगेहवत् । गच्छ वा पार्वतीगेहं या कुक्षिं पूरयिष्यति ॥९८॥
दीजिये कि आपके (शिव) लिंग की पूजा करने का सामर्थ्य मुझमें सदा बना रहे । देव ! त्रिनेत्र ! एक तो मेरा यहो
वर है और दूसरा यह है कि यह महाभाग्यशाली मेरा शिष्य त्याज्य एवम् ग्राह्य कर्मों से रहित है । यह नेत्रों से
नहीं देखता, नाक से नहीं सूंघता । सब कुछ बुद्धियोग से करता हुआ यह महायशस्वी योगी है। शंकरात्मा इसका
नाम है, उन्मत्त की तरह स्वरूप है । देव ! इससे न कोई द्वेष करे ओर न इसे मारे । जितने व्यक्ति मर गये
हैं, वे सब भी जी जायें। यह वर मुझे दीजिए ॥८४-८९॥
गौतम का निवेदन सुनकर अविनाशी उमापति प्रेम से हरि को देख कर अपने अंश वायु रूप से उनकी
देह में प्रविष्ट हो गये । वही हरिरूप शंकरात्मा पवनसुत हनुमान् जी हुए। वे धीश, साक्षात् विष्णु एवम् शिव
कहलाते हैं। प्रत्येक कल्प में वे अपनी इच्छा से रूप धारण करते हैं। वे शिव के आज्ञाकारी, मेरे भक्त तथा
महाबलवान् हैं ॥९०-९२॥
तदुपरान्त शंकर ने प्रीतिपूर्वक कहा—"तुम्हारा बनाया हुआ यह मन्दिर बहुत विस्तृत एवम् सुप्रतिष्ठित
है । हम लोग नित्य इस मन्दिर में एक क्षण तक निवास करेंगे और तुम्हारी पूजा ग्रहण कर अपने-अपने
आवास को लौटेंगे" ॥९३-९४॥
इसके बाद मुनिश्रेष्ठ गौतम ने महेश से कहा--"ईश ! मैं एक अयुक्त प्रार्थना करता हूँ। क्योंकि प्रार्थी
अपने दोष को नहीं देखता है। सो यदि आप प्रसन्न हैं तो ब्रह्मा आदि को भी न मिलने वाला यह वर दीजिए
कि आप मेरे यहाँ भोजन करें।"
गौतम की प्रार्थना सुनने के पश्चात् सदाशिव विष्णु का हाथ अपने हाथ में लेकर हँसते हुए कमलाक्ष
केशव से कहने लगे--"गोविन्द ! तुम्हारा पेट क्षीण (खाली) मालूम पड़ता है। क्या तुम्हें भोजन दूँ ? या अपने
घर की तरह मेरे घर में पैठ कर स्वयं खा लोगे ? अथवा पार्वती के घर जाओ । वह तुम्हारा पेट भर देगी ।"
इतना कहकर शंकर विष्णु का हाथ पकड़े ही एकान्त स्थान में चले गये और द्वाराध्यक्ष नंदी को आदेश दे गये
कि तुम जाकर भोजन का प्रबन्ध करो। नंदी ने गौतम से जाकर विष्णु तथा शंकर का वार्तालाप सुना दिया
और कहा--"मुने ! हम देवगण भोजन करना चाहते हैं। आप प्रबन्ध कीजिए ॥९५-९८॥"
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६१
इत्युक्त्वा तत्करालम्बी ह्येकांतमगमद्विभुः । आदिश्य नन्दिनं देवो द्वाराध्यक्षं यथोक्तवत् ॥९६॥
स गत्वा गौतमं वाथ ह्यब्रूत्वान्विष्णुभाषणम् । संपाद्यान्नं देवेशा भोक्तुकामा वयं मुने ॥१००॥
इत्युक्तवैकांतमगमद्वासुदेवेन शंकरः । मृदुशय्यां समारुह्य शयितौ देवतोत्तमौ ॥१०१॥
अन्योन्यं भाषणं कृत्वा प्रोत्तस्थतुरभावपि । गत्वा तडागं गंभीरं स्नास्यन्तौ देवसत्तमौ ॥१०२॥
करांबुपातमन्योन्यं पृथक्कृत्वोभयत्र च । मुनयो राक्षसाश्चैव जलक्रीडां प्रचक्रिरे ॥१०३॥
अथ विष्णोर्महेशश्च जलपानानि शीघ्रतः । चक्रतुः शंकरः पद्मकिंजलकांजलिना हरेः ॥१०४॥
अवाकिरन्मुखे तस्य पद्मोत्फुल्लविलोचने । नेत्रे केशरसंपातात्प्रमीलयत केशवः ॥१०४॥
अत्रांतरे हरेः स्कंधमारुरोह महेश्वरः । ह्युत्तमांगं बाहुभ्यां गृहीत्वा संन्यमज्जयत् ॥१०६॥
उन्मज्जयित्वा च पुनः पुनश्चापि पुनःपुनः । पीडितः स हरिः सूक्ष्मं पातयामास शंकरम् ॥१०७॥
अथ पादौ गृहीत्वा तं भ्रामयन्विचकर्ष ह । अताडयद्धरेर्वक्षः पातयामास चाच्युतम् ॥१०८॥
अथोत्थितो हरिस्तोयमादायांजलिना ततः । शीर्षे चैवाकिरच्छंभुमथ शंभुरथो हरिः ॥१०८॥
जलक्रीडैवमभवदथ र्षषिगणांतरे । जलक्रीडासंभ्रमेण विश्लस्तजटबंधनाः ॥११०॥
अथ संभ्रमतां तेषामन्योन्यजटबंधनम् । इतरेतरबद्धासु जटासु च मुनीश्वराः ॥१११॥
शक्तिमंतोऽशक्तिमत आकर्षंति च सभ्यथम् । पातयंतोऽन्यतश्चापि क्रोशंतो रुदतस्तथा ॥११२॥
एवं प्रवृत्ते तुमुले संसूते तोयकर्मणि । आकाशे वानरेशस्तु ननर्त च ननाद च ॥११३॥
विपंचीं वादयन्वाद्यं ललितां गीतिमुज्जगौ । सुगीत्या ललिता यास्तु अगायत विधा दश ॥११४॥
शुश्राव गीति मधुरां शंकरो लोकभावतः । स्वयं गातुं हि ललितं मंदमंदं प्रचक्रमे ॥११५॥
स्वयं गायति देवेशे विश्रामं गलदेशिकम् । स्वरं ध्रुवं समादाय सर्वलक्षणसंयुक्तम् ॥११६॥
वासुदेव के साथ शंकर विविक्त स्थान में जाकर कोमल शय्या पर लेट गए। दोनों देवश्रेष्ठ आपस में
बातचीत करते-करते सो गए। नींद टूटने पर दोनों सुरवर स्नान करने के लिये एक गहरे तालाब में उतरे
वहाँ वे अपने हाथों में जल ले ले कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। उस समय मुनि तथा राक्षस भी जलक्रीड़ा में
सम्मिलित हो गये। विष्णु और महेश कमलपत्र में जल लेकर पी लेते थे। एक बार शंकर ने विष्णु के कमल-
मुख में पद्मकेसर मिश्रित जल डाल दिया। केसर के गिरने से केशव ने आँखें मूँद ली। उसी बीच महेश्वरहरि
के कंधे पर चढ़ गये और उनके शिर को हाथों से पकड़ कर बार-बार पानी में डुबाने लगे। जब हरि को इससे
थोड़ी-सी पीड़ा हुई तब उन्होंने शंकर को गिरा दिया और उनके पैरों को पकड़ कर घुमाने लगे। उस समय शिव
ने अच्युत की छाती पर लात मारी। जिससे वे गिर पड़े। फिर उठने पर उन्होंने अंजलि में जल लेकर शंकर
के मस्तक पर गिराया। तब शम्भु ने भी उनके शिर पर जल छोड़ दिया। इस प्रकार (एक ओर) हरि-हर की
जल-क्रीड़ा हो रही थी और (दूसरी ओर) ऋषिगण अपनी-अपनी जटा को खोल कर जलकेलि में विभोर हो रहे
थे। यहाँ तक कि उन मुनीश्वरों की जटायें आपस में उलझ जाती थीं तब जो सबल थे, वे दुर्बल को खींच कर
व्यथा पहुँचाते थे और एक दूसरे को गिरा कर घसीट देते एवम् रुला देते थे ॥९९-११२॥
जिस समय इस प्रकार की तुमुल जलकेलि हो रही थी उसी समय आकाश में वानरेश (हनुमान्) नाचते तथा
शब्द करते हुए वीणा एवम् अन्य वाद्यों को बजाने लगे। ललित स्वर में उन्होंने दश प्रकार के गीत गाये। उनका
मधुर संगीत सुनकर स्वयं शंकर लोक-भाव से ललित राग में मंद-मंद गाने लगे। जब महेश्वर सर्वलक्षणसम्पन्न
विश्राम, गलदेशिक तथा ध्रुव स्वर में धाराप्रवाह रूप से गा रहे थे तब वासुदेव हाथों से झाम बजा रहे थे। (उस
६६२ नारदीयपुराणम्
स्वधारामृतसंयुक्तं गानेनैवमपोनयन् । वासुदेवो मर्दलं च कराभ्यामप्यवादयत् ॥११७॥
अम्बुजांगश्चतुर्वक्त्रस्तुंबुरुर्मु खरो बभौ । तानका गौतमाद्यास्तु गायको वायुजोऽभवत् ॥११८॥
गायके मधुरं गीतं हनूमति कपीश्वरे । म्लानमम्लानमभवत्कृशाः पुष्टास्तदाभवन् ॥११९॥
स्वां स्वां गीतिमतः सर्वे तिरस्कृत्यैव मूच्छिताः । तूष्णीभूतं समभवद्देवर्षिगणदानवम् ॥१२०॥
एकः स हनुमान् गाता श्रोतारः सर्व एव ते । मध्याह्नकाले वितते गायमाने हनूमति ॥१२१॥
स्वस्ववाहनमारुह्य निर्गताः सर्वदेवताः
गानप्रियो महेशस्तु जग्राह प्लवगेश्वरम् । प्लवग त्वं मयाज्ञप्तो निःशंको बृषमारुह ॥१२२॥
मम चाभिमुखो भूत्वा गायस्वानेकगायनम् । अथाह कपिशार्दूलो भगवंतं महेश्वरम् ॥१२३॥
वृषभारोहसामर्थ्यं तव नान्यस्य विद्यते । तव वाहनमारुह्य पातकी स्यामहं विभो ॥१२४॥
मामेवारुह देवेश विहंगः शिवधारणः । तव चाभिमुखं गानं करिष्यामि विलोकय ॥१२५॥
अथेश्वरो हनूमंतमारुरोह यथा वृषम् । आरूढे शंकरे देवे हनुमत्कंधरां शिवः ॥१२६॥
छित्वा त्वचं परावृत्य सुखं गायति पूर्ववत् । शृण्वन्गीतिसुधां शंभुर्गौतमस्य गृहं ततः ॥१२७॥
सर्वे चाप्यागतास्तत्र देवर्षिगणदानवाः । पूजिता गौतमेनाथ भोजनावसरे सति ॥१२८॥
यच्छुष्कं दारुसंभूतं गृहोपकरणादिकम् । प्ररूढमभवत्सर्वं गायमाने हनूमति ॥१२९॥
तस्मिन्गाने समस्तानां चित्रं दृष्टिरतिष्ठत ॥१३०॥
द्विबाहुरीशस्य पदामिवंदनः समस्तगात्राभरणोपपन्नः ।
प्रसन्नमूर्तिस्तरुणः सुमद्ध्ये विन्यस्तमूर्द्धांजलिभिः शिरोभिः ॥१३१॥
समय) कमलयोनि ब्रह्मा तुम्बुरु (तानपूरा) बजा रहे थे । गौतम आदि राग-ताल मिला रहे थे और वायुपुत्र तो
गायक ही थे । कपीश्वर हनुमान् का गाना सुनकर सूखी चीजें हरी-भरी हो गईं और क्षीण पुष्ट हो गईं । वहाँ अन्य
जो गायकगण थे, वे लज्जा से मानो मूर्च्छित हो गये । देवता, ऋषि तथा दानवों ने मौन भाव अवलम्बन कर
लिया । केवल वे हनुमान् गाता और अन्य सब के सब श्रोता रहे । जब इस तरह महावीर के गाते-गाते दोपहर का
समय हो आया तब सकल देवगण अपने-अपने वाहन पर आरूढ होकर चले गये । अनन्तर गानप्रिय महेश ने
कपीश्वर को पकड़ कर यह कहा- "कपि ! तुम निःशंक होकर मेरे बैल पर चढ़ जाओ । और मेरे संमुख
होकर अनेक प्रकार के गाने सुनाओ । परन्तु कपिवर ने भगवान् शंकर से कहा--"विभो ! वृष पर चढ़ने का
सामर्थ्य आपको छोड़कर दूसरे किसी में नहीं है । मुझे आपके वाहन पर चढ़ने से महापाप होगा । इसलिये हे
देवेश ! आप मुझ पर ही चढ़ जायें और मैं आपको धारण करके आकाश में उड़ जाऊँगा तथा सामने गाऊँगा
और आप सुनेंगे" ॥११३-१२५॥
इसके अनन्तर उमापति जैसे वृष पर चढ़ते थे उसी तरह हनुमान् के कंधे पर चढ़ गये । शंकर के आरूढ़
हो जाने के बाद पवनसुत पश्चिम की ओर मुंह घुमा कर पहले की तरह सुख से गाने लगे । गीतिसुधा का
पान करते हुए महादेव गौतम के घर पहुँचे । वहाँ अन्य देव, ऋषि तथा दानवगण भी आये । गौतम ने सबकी
पूजा की और भोजन के लिये आग्रह किया ॥१२६-१२८॥
उस समय हनुमान् का संगीत सुनकर लकड़ी के बने जितने गृहोपकरण थे, वे सजीव-से और समस्त
श्रोतागण निर्जीव-से प्रतीत हो रहे थे । हनुमान् के दोनों हाथ शंकर की वन्दना कर रहे थे । उनके समस्त
अंगों में आभूषण थे । चेहरा प्रसन्न था । युवा अवस्था थी । ललाट के समीप अंजलि बाँधकर शिव को प्रणाम
कर रहे थे । इतने में शंकर ने अपने हाथों से हनुमान् का शिर पकड़ कर पूरब की ओर मुख घुमा दिया । तब
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६३
शिरः कराभ्यां परिगृह्य शंकरो हनूमतः पूर्वमुखं चकार ।
पद्मासनासीनहनूमतोऽञ्जलौ निधाय पादं त्वपरं मुखे च ॥१३२॥
पादांगुलीभ्यामथ नासिकां विभुः स्नेहेन जग्राह च मन्दमन्दम् ।
स्कंधे मुखे त्वंसतले च कण्ठे वक्षःस्थले च स्तनमध्यमे हृदि ॥१३३॥
ततश्च कुक्षावथ नाभिमंडले पादं द्वितीयं विदधाति चांजलौ ।
शिरो गृहीत्वाऽवनमय्य शंकरः पस्पर्श पृष्ठं चिबुकेन सोऽध्वनि ॥१३४॥
हारं च मुक्तापरिकल्पितं शिवो हनूमतः कंठगतं चकार ॥१३५॥
अथ विष्णुर्महेशानमिदं वचनमुक्तवान् । हनूमता समो नास्ति कृत्स्नब्रह्माण्डमण्डले ॥१३६॥
श्रुतिदेवाद्यगम्यं हि पदं तव कपिस्थितम् । सर्वोपनिषदव्यक्तं त्वत्पदं कपि सर्वयुक् ॥१३७॥
यमादिसाधनैर्योगैर्न क्षणं ते पदं स्थिरम् । महायोगिहृदंभोजे परं स्वस्थं हनूमति ॥१३८॥
वर्षकोटिसहस्रं तु सहस्राब्दैरथान्वहम् । भक्त्या संपूजितोऽपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ॥१३९॥
लोके वादो हि सुमहाञ्छंभुर्नारायणप्रियः । हरप्रियस्तथा शंभुर्न तादृग्भाग्यमस्ति मे ॥१४०॥
तच्छ्रुत्वा वचनं शंभुर्विष्णोः प्राह मुदान्वितः ।
न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोऽन्योऽस्ति हरे क्वचित् ॥१४१॥
पार्वती वा त्वया तुल्या वर्तते नैव भिद्यते । अथ देवाय महते गौतमः प्रणिपत्य च ॥१४२॥
व्यजिज्ञपदमयात्मन्देवेहि करुणानिधे । मध्याह्नोऽयं व्यतिक्रांतो भुक्तिवेलाखिलस्य च ॥१४३॥
विभु ने अपना एक पैर पद्मासन लगा कर बैठे हुए हनुमान् की अंजलि पर और दूसरा उनके मुख पर रखा ।
फिर स्नेह से उनकी नासिका को पैर की अंगुलियों से धीरे-धीरे पकड़ लिया। अनन्तर दूसरे चरण को हनुमान्
के कंधे, मुख, कंठ, वक्षःस्थल, स्तनमध्य, हृदय, कुक्षि, नाभिमंडल तथा अंजलि पर क्रमशः रखा। फिर शिर
को पकड़ कर झुकाते हुए अपनी ठुड्डी से उनके पीठ का स्पर्श किया और मोती का एक हार उनके गले
में पहना दिया ॥१२९-१३५॥
तदनन्तर विष्णु ने महेश से यह वचन कहा--"निखिल ब्रह्माण्डमंडल में हनुमान् के समान कोई (भाग्यवान्)
नहीं है । क्योंकि श्रुति तथा देवादि से अप्राप्य आपका चरण, जो संपूर्ण उपनिषदों का सार तथा अव्यक्त है,
हनुमान् के ऊपर अवस्थित हुआ । आपके उस चरण को यम आदि साधन तथा योगाभ्यास के द्वारा एक क्षण
के लिये भी कोई अपने हृदय में स्थिर नहीं कर पाता । परन्तु वही चरण महायोगी हनुमान् के हृदय-कमल
पर विराजमान रहा । मैंने एक सहस्र कोटि तथा एक हजार वर्षों तक भक्तिपूर्वक आपके चरणों की अर्चना
की। परन्तु कभी आपने अपना चरणदर्शन नहीं होने दिया । यद्यपि लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि शम्भु
नारायण के अत्यन्त प्रिय हैं और नारायण शम्भु के, किन्तु मैं तो अपने को ऐसा भाग्यवान् नहीं
समझता" ॥१३६-१४०॥
विष्णु की बात सुनकर शंकर ने हर्ष से कहा- "हरे ! तुम्हारे समान प्रिय मेरा कोई नहीं है अथवा
पार्वती तुम्हारी ही सदृश है, परन्तु वह तो मुझसे भिन्न नहीं है।"
एतदुपरान्त गौतम महादेव को प्रणाम कर बोले- "अमेयात्मन् ! करुणानिधे ! मध्याह्न हो गया, भोजन
का समय अतिक्रान्त हो रहा है ।"