बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 693, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६७४ नारदीयपुराणम्
कार्तवीर्यः शिरः पातु ललाटं हैहयेश्वरः । सुमुखो मे मुखं पातु कर्णौ व्याप्तजगत्त्रयः ॥३३॥
सुकुमारो हनुं पातु भ्रूयुगं मे धनुर्धरः । नयनं पुण्डरीकाक्षो नासिकां मे गुणाकरः ॥३४॥
अधरोष्ठौ सदा पातु ब्रह्मज्ञेयो द्विजान्कविः । सर्वशास्त्रकलाधारी जिह्वां चिबुकमव्ययः ॥३५॥
दत्तात्रेयप्रियः कंठं स्कंधौ राजकुलेश्वरः । भुजौ दशास्यदर्पघ्नो हृदयं मे महाबलः ॥३६॥
कुक्षिं रक्षतु मे विद्वान् वक्षः परपुरंजयः । करौ सर्वार्थदः पातु कराग्राणि जगत्प्रियः ॥३७॥
रेवांबुलीलासंदृप्तो जठरं परिरक्षतु । वीरशूरस्तु मे नाभिं पार्श्वो मे सर्वदुष्टहा ॥३८॥
सहस्रभुजभृत्पृष्ठं सप्तद्वीपाधिपः कटिम् । ऊरू माहिष्मतीनाथो जानुनी वल्लभो भुवः ॥३९॥
जंघे वीराधिपः पातु पातु पादौ मनोजवः । पातु सर्वायुधधरः सर्वांगं सर्वमर्मसु ॥४०॥
सर्वदुष्टांतकः पातु धात्वष्टककलेवरम् । प्राणाविदशजीवेशान्सर्वशिष्टेष्टदोऽवतु ॥४१॥
वशीकृतेंद्रियग्रामः पातु सर्वेन्द्रियाणि मे । अनुक्तमपि यत्स्थानं शरीरांतर्बहिश्च यत् ॥४२॥
तत्सर्वं पातु मे सर्वलोकनाथेश्वरेश्वरः । वज्रात्सारतरं चेदं शरीरं कवचावृतम् ॥४३॥
बाधाशतविनिर्मुक्तमस्तु मे भयवर्जितम् । बद्ध्वेदं कवचं दिव्यमभेद्यं हैहयेशितुः ॥४४॥
विचरामि दिवा रात्रौ निर्भयेनांतरात्मना । राजमार्गे महादुर्गे मार्गे चौरादिसंकुले ॥४५॥
विषमे विपिने घोरे दावाग्नौ गिरिकंदरे । संग्रामे शस्त्रसंघाते सिंहव्याघ्रनिषेविते ॥४६॥
गह्वरे सर्वसंकीर्णे संध्याकाले नृपालये । विवादे विपुलावर्ते समुद्रे च नदीतटे ॥ ४७॥
परिपंथिजनाकीर्णे देशे दस्युगणावृते । सर्वस्वहरणे प्राप्ते प्राप्ते प्राणस्य संकटे ॥४८॥
नानारोगज्वरावेशे पिशाचप्रेतयातने । मारीदुःस्वप्नपीडासु क्लिष्टे विश्वासघातके ॥४६॥
करें ॥२८-३२॥ कार्तवीर्य मेरे शिर की रक्षा करें । हैहयेश्वर ललाट की, सुमुख मुख की और जगद्व्यापी कानों की
रक्षा करें । सुकुमार कनपटों की, धनुर्धर दोनों भौंहों की, पुण्डरीकाक्ष नेत्र की, गुणाकर नाक की, ब्रह्मज्ञेय अधर
की, कवि ओष्ठ की, सकल शास्त्रों एवम् कलाओं का धारण करने वाले जिह्वा की, अव्यय ठुड्डी की, दत्तात्रेयप्रिय
कण्ठ की, राजकुलेश्वर स्कंधों की, रावणदर्पविनाशक भुजाओं की, महाबल हृदय की, विद्वान् कुक्षि की, परपुरंजय
छाती की, सकलकामनादायक हाथों की, जगत्प्रिय करांगुलियों की, रेवा के जल में विहार करनेवाले पेट की, वीर शूर
नाभि की, समस्त दुष्टों के निहन्ता पार्श्वों की, सहस्र भुजाओं का धारण करने वाले पीठ की, सातों द्वीपों के अधीश्वर
कटि की, माहिष्मतीनाथ ऊरुओं की, भूवल्लभ जानुओं की, वीरपति जंघाओं की, मनोजव चरणों की, सर्वायुधधारी मर्म-
स्थलसहित सकल अंगों की, निखिल दुष्टों के नाशक अष्टधातु सहित संपूर्ण कलेवर की, समस्त उचित अभिलाषाओं
को पूर्ण करने वाले प्राण आदि दश जीवेशों की और इन्द्रिय समूह को जीतनेवाले सकल इन्द्रियों की रक्षा करें । जिस
स्थान के बारे में मैंने नहीं कहा या जो प्रदेश शरीर के भीतर तथा बाहर हैं, उन सब की रक्षा अखिल लोक-
नाथेश्वर ईश्वर करें । इस कवच से आवृत मेरा शरीर वज्र से भी कठोर (अर्थात् अभेद्य), विविध बाधाओं से
रहित एवम् भय से वर्जित हो ॥३३-४३॥ कार्तवीर्य के इस अभेद्य तथा दिव्य कवच को शरीर में बाँधकर
मैं दिन-रात विचरण करता रहूँ । इससे मेरी अन्तरात्मा निर्भीक हो गई है । इस कवच से आवृत मुझको राजमार्ग,
महाभयंकर मार्ग, चोरादि से व्याप्त मार्ग, घोर जंगल, भयानक दावाग्नि, पर्वतों की गुफा, संग्राम, शस्त्रप्रहार,
सिंह तथा व्याघ्रादि से परिव्याप्त पर्वतप्रान्त, संध्याकाल, नृपालय, विवाद, विपुल तरंगों से युक्त समुद्र,
नदी तट, शत्रु एवम् चोरों से आवृत देश, सर्वस्व अपहरण, प्राणसंकट, अनेक प्रकार के रोग एवम् ज्वर के
आक्रमण, पिशाच तथा प्रेत की यातना, महामारी तथा दुःस्वप्न की पीड़ा, विश्वासघातजन्य क्लेश, शारीरिक महा-