बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 695, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६७६ नारदीयपुराणम्
महालोहितभोक्तारो वेताला ये च गुह्यकाः । गंधर्वाप्सरसः सिद्धा ये च देवादियोनयः ॥६६॥
डाकिन्यो द्रुणसाः प्रेताः क्षेत्रपाला विनायकाः । महाव्याघ्रमहामेघा महातुरगरूपकाः ॥६७॥
महागजा महासिंहा महामहिषयोनयः । ऋक्षवाराहशुनकवानरोलूकमूर्तयः ॥६८॥
महोष्ट्रखरमार्जारसर्पगोवृषमस्तकाः । नानारूपा महासत्त्वा नानाक्लेशसहस्रदाः ॥६९॥
नानारोगकरा क्षुद्रा महावीर्या महाबलाः । वातिकाः पैत्तिका घोरा श्लैष्मिकाः सन्निपातिकाः ॥७०॥
माहेश्वरा वैष्णवाश्च वैरिच्याश्च महाग्रहाः । स्कांदा वैनायका क्रूरा ये च प्रथमगुह्यकाः ॥७१॥
महाशत्रुग्रहा रौद्रा महामारीमसूरिकाः । ऐकाहिका द्व्याहिकाश्च त्र्याहिकाश्च महाज्वराः ॥७२॥
चातुर्थिकाः पाक्षिकाश्च मास्याः षाण्मासिकाश्च ये । सांवत्सरा दुर्निवार्या ज्वराः परमदारुणाः ॥७३॥
स्वाप्निका ये महोत्पाता ये च दुःस्वाप्निका ग्रहाः । कूष्मांडा जृंभिका भौमा द्रोणाः सान्निध्यवंचकाः
भ्रमिकाः प्राणहर्तारो ये च बालग्रहादयः । मनोबुद्धीन्द्रियहराः स्फोटकाश्च महाग्रहाः ॥७५॥
महाशना बलिभुजो महाकुणपभोजनाः । दिवाचरा रात्रिचरा ये च संध्यासु दारुणाः ॥७६॥
प्रमत्ता वाऽप्रमत्ता वै ये मां बाधितुमुद्यता । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य धनुर्मुक्तशराह्ताः ॥७७॥
सहस्रधा प्रणश्यंतु भग्नसत्त्वबलोद्यमाः । य सर्पा ये महानागा महागिरिविलेशयाः ॥७८॥
कालव्याला महादंष्ट्रा महासागरसंज्ञकाः । अनंतशूलिकाद्याश्च दंष्ट्राविषमहाभयाः ॥७९॥
अनेकशतशीर्षाश्च खंडपुच्छाश्च दारुणाः । महाविषजलौकाश्च वृश्चिका रक्तपुच्छकाः ॥८०॥
आशीविषाः कालकूटा महाहालाहलाह्वयाः । जलसर्पा जलव्याला जलग्राहाश्च कच्छपाः ॥८१॥
मत्स्यका विषपुच्छाश्च ये चान्ये जलवासिनः । जलजाः स्थलजाश्चैव कृत्रिमाश्च महाविषाः ॥८२॥
महामेघ, महाअश्व, महागज, महासिंह, महामहिष, रीछ, शूकर, कुत्ता, बन्दर तथा उल्लू के समान आकृति
वाले, ऊँट, गधा, बिलार, सांप, गाय तथा बैल के सदृश शिर वाले, अनेक रूप वाले, हजारों प्रकार
के क्लेश देने वाले, अनेक तरह के रोग उत्पन्न करने वाले, क्षुद्र, महाशक्तिशाली, महाबली, वात
रोग देने वाले, पित्तव्याधि देने वाले, घोररूप, कफ रोग देने वाले, सन्निपात रोग देने वाले, माहेश्वरग्रह,
वैष्णवग्रह, विरंचिग्रह, स्कंदग्रह, गणेशग्रह, क्रूरग्रह, प्रथमगुह्यक, महाशत्रुग्रह, रुद्रग्रह, महामारीग्रह,
मसूरिकाग्रह, एक दिन वाले, दो दिन वाले तथा तीन दिन वाले महाज्वर, चार दिन वाले, पाक्षिक,
मासिक, षाण्मासिक तथा वार्षिक परम दारुण एवम् दुर्निवार ज्वर, स्वप्न में होने वाले महा उत्पात, दुःस्वाप्निक
ग्रह, कुष्मांड, जृंभिक, भौम, द्रोण, सान्निध्यवंचक, भ्रमिक, प्राणहर्ता बालग्रह, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियहारी ग्रह,
स्फोटकग्रह, महाग्रह, बहुत खाने वाले, बलि खाने वाले, शव खाने वाले, दिनचर, निशाचर, संध्याचर, दारुण,
प्रमत्त या अप्रमत्त ग्रह मुझे कष्ट देने के लिये तैयार हैं, वे कार्तवीर्य के धनुर्मुक्त शरों से आहत होकर हजारों खंडों
में विभक्त हो जायें ॥६४-७७½॥
उनके बल, वीर्य, पराक्रम भी भग्न हों । जो सर्प, महानाग, महापर्वत के बिल में सोने वाले, कालव्याल,
महादंष्ट्रा वाले, महाअजगर नाम वाले, अनंत, शूलिक, दंष्ट्रा और विष के कारण महाभयानक दीखने वाले,
सैकड़ों फण वाले, कटे पूँछ वाले, दारुण स्वरूप वाले, महाविष वाले जोंक, बिच्छू, लाल पूँछ वाले सर्प,
कालकूट, महाहलाहल नाम वाले सांप, जलसर्प, जलव्याल, जलग्रह, कच्छप, मत्स्य, विष एवम् पुच्छ वाले
अन्य जलवासी जीव, जलज, स्थलज, कृत्रिम, महाविष वाले, गुप्त रूप वाले, गुप्त विष वाले, चूहे, छिपकली,
नानाविषसंज्ञक, महोपविषसंज्ञक तथा शरीर एवम् प्राणों के नाशक जीव हमें पीड़ा देना चाहते हैं, वे पहले ही