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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 696

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः
गुप्तरूपा गुप्तविषा मूषिका गृहगोधिकाः । नानाविषाश्च ये घोरा महोपविषसंज्ञकाः ॥८३॥
येऽस्मान्बाधितुमिच्छंति शरीरप्राणनाशकाः । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य खड्गसाहस्रदारिताः ॥८४॥
दूरादेव विनश्यंतु प्रणष्टेंद्रियसाहसाः । मनुष्याः पशवो वृक्षावानरा वनगोचराः ॥८५॥
सिंहव्याघ्रवराहाश्च महिषा ये महामृगाः । गजास्तुरंगा गवया रासभाः शरभा वृकाः ॥८६॥
शुनका द्वीपिनः शुभ्रा मार्जारा बिललोलुपाः । शृगालाः शशकाः श्येना गरुत्मन्तो विहंगमाः ॥८७॥
भेरुंडा वायसा गृध्रा हंसाद्याः पक्षिजातयः । उद्भिज्जाश्चांडजाश्चैव स्वेदजाश्च जरायुजाः ॥८८॥
नानाभेदकुले जाता नानाभेदाः पृथग्विधाः । येऽस्मान्बाधितुमिच्छंति संध्यासु च दिवा निशि ॥८९॥
ते सर्वे कार्तवीर्यस्य गदासाहस्रदारिताः । दूरादेव विनश्यंतु विनष्टगतिपौरुषाः ॥९०॥
ये चाक्षेमप्रदातारः कूटमायाविनश्च ये । मारणोत्सादनोन्मूलद्वेषमोहनकारकाः ॥९१॥
विश्वास घातका दुष्टा ये च स्वामिद्रुहो नराः । ये चाततायिनो दुष्टा ये पापा गोप्यहारिणः ॥९२॥
बाहोपघातगरलशस्त्रपातातिदुःखदा । क्षेत्रवित्तादिहरणबंधनादिभयप्रदाः ॥९३॥
ईतयो विविधाकारा ये चान्ये दुष्टजातयः । पीडाकरा ये सततं छिद्रमिच्छंति बाधितुम् ॥९४॥
ते सर्वे कार्तवीर्यस्य चक्रसाहस्रदारिताः । दूरादेव क्षयं यांतु विनष्टबलसाहसाः ॥९५॥
ये मेघा ये महावर्षा ये वाता याश्च विद्युत । ये महाशनयो दीप्ता ये निर्घाताश्च दारुणाः ॥९६॥
उल्कापाताश्च ये घोरा ये महेंद्रायुधादयः । सूर्येन्दुगुजसौम्याश्च गुरुकाव्यशनैश्चराः ॥९७॥
राहुश्च केतवो घोरा नक्षत्रा राशयस्तथा । तिथयः संक्रमा मासा हायना युगनायकाः ॥९८॥
मन्वंतराधिपाः सिद्धा ऋषयो योगसिद्धयः । निधयो ऋग्यजुःसामाथर्वाणश्चैव वह्नयः ॥९९॥
ऋतवो लोकपालाश्च पितरो देवसंहतिः । विद्याश्चैव चतुःषष्टिभेदा या भुवनत्रये ॥१००॥
कार्तवीर्य के खड्ग से सहस्र टुकड़े होकर इन्द्रिय तथा साहस सहित नष्ट हो जायें । जो मनुष्य, पशु, बन्दर, भील,
सिंह, वाघ, सूअर, भैंस, हिरन, हाथी, घोड़े, नीलगाय, गधे, ऊँट, भेड़िये, कुत्ते, चीते, बाज, गरुड़, भेरुंड, कौए
गीध तथा हंस आदि पक्षी, उद्भिज्ज, अंडज, स्वेदज तथा जरायुज जीव और भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न
नाना भेद वाले जीव दिन, रात एवम् संध्या समय मुझे कष्ट देना चाहते हैं, वे कार्तवीर्य की गदा से सहस्रधा
खंडित होकर गति-पौरुष सहित विनष्ट हो जायें। जो अमंगलकारी, कूटमायावी, मारण, मोहन, उच्चाटन तथा
विद्वेष कराने वाले, विश्वासघाती, दुष्ट, स्वामी से द्रोह करने वाले, आततायी, पापी, गुप्तधन चुराने वाले, आग
लगाने वाले, अवघात करने वाले, विष देने वाले, शस्त्रप्रहार करने वाले, अत्यन्त दुःख देने वाले, खेत, वित्त आदि
का हरण करने वाले, बंधन आदि का भय देने वाले, विविधाकार वालो ईतियाँ', अन्य दुष्ट जातियाँ और पीड़ा
देने वाले तथा छिद्रान्वेषण करने वाले जीव मुझे बाधित करना चाहते हैं वे कीर्तवीर्य के चक्र से सहस्रधा विदीर्ण
होकर बल एवम् साहस सहित नष्ट हो जायें ॥७८-९५॥ मेघ, महावर्षा, विद्युत, महावज्र, भयंकर निर्घात,
उल्कापात, इन्द्रधनुष, सूर्य चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, नक्षत्र, राशि, तिथि, संक्रान्ति,
मास, वर्ष, युगनायक, मन्वन्तराधीश, सिद्धि, ऋषि, योगसिद्धि, निधि, ऋक्, यजु, साम, अथर्व, वह्नि, ऋतु,
लोकपाल, पितर, देवगण, विद्या, चौंसठ कला और जो कहे गये और जो न भी कहे गये, वे (देवादि) महातेजस्वी,
१-“अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभाः मूषिकाः खगाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ।"-ये
छहों ईतियाँ कृषि का नाश करती हैं ।