भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४५
ग्रहों का दृग्बल निरूपण चक्र
[कुण्डली चक्र: १ गुरु, २ चन्द्र, ४ मंगल, ५ शनि, ८ सूर्य, १० शुक्र]
आवश्यक ज्ञातव्य—पूर्वोक्त ६ प्रकार के बलों में से किसी भी प्रकार के बल
को प्राप्त बलवान ग्रह जिस भाव में बैठा होता है जातक को उस भाव का विशेष
फल अपने स्वभावानुसार देता है। किसी भाव स्थित किसी भी ग्रह के फलाफल की
यथार्थ जानकारी के लिए उस भाव में स्थित राशि तथा ग्रह के स्वभाव एवं बल
आदि का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए।
ग्रहों की दृष्टि
ग्रहों की दृष्टियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं—
(१) एक पाद या एक चरण दृष्टि (चतुर्थांश दृष्टि)।
(२) द्विपाद या दो चरण दृष्टि (अर्धांश दृष्टि)।
(३) त्रिपाद या तीन चरण दृष्टि (तीन चौथाई दृष्टि)।
(४) पूर्ण दृष्टि (सम्पूर्ण दृष्टि)।
जन्मकुण्डली में जो ग्रह जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव से तृतीय तथा
दशम भाव को एकपाद दृष्टि से, पंचम तथा नवम भाव को द्विपाद दृष्टि से, चतुर्थ
तथा अष्टम भाव को त्रिपाद दृष्टि से तथा सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
यह नियम सभी ग्रहों पर समान रूप से लागू होता है। परन्तु इन दृष्टियों के
अतिरिक्त मंगल जिस भाव में बैठा होता है, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त चतुर्थ
तथा अष्टम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसी प्रकार गुरु जिस भाव में
बैठा हो, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त पंचम तथा नवम भाव को भी पूर्ण दृष्टि
से देखता है एवं शनि जिस भाव में बैठा हो, वहाँ के सप्तम भाव के अतिरिक्त
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तृतीय तथा दशम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। अपूर्ण दृष्टि को 'खण्ड दृष्टि'
भी कहते हैं।
राहु तथा केतु की दृष्टि अन्य ग्रहों के समान सीधी न पड़कर उल्टी पड़ती
है। जैसे लग्न में बैठा हुआ मंगल तृतीय तथा दशम भाव को एक पाद दृष्टि से
देखेगा तो लग्न में बैठे हुए राहु-केतु एकादश तथा चतुर्थ भाव को एक पाद दृष्टि से
देखेंगे।
आगे दी गई मेष राशि की उदाहरण कुण्डलियों में लग्न (प्रथम भाव) स्थित
विभिन्न ग्रहों की विभिन्न भावों पर पड़ने वाली एक पाद, द्विपाद, त्रिपाद तथा पूर्ण
दृष्टि को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है। इसी भाँति अन्यत्र भी समझ लेना
चाहिए।
'सूर्य' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चक्र: लग्न (१) सूर्य; ३ भाव - एकपाद; ४ भाव - त्रिपाद; ५ भाव - द्विपाद; ७ भाव - पूर्ण; ८ भाव - त्रिपाद; ९ भाव - द्विपाद; १० भाव - एकपाद]
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'सूर्य' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४७
'चन्द्रमा' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चक्र: चन्द्रमा प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, चतुर्थ एवं अष्टम भाव पर त्रिपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।]
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'चन्द्रमा' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'मंगल' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चक्र: मंगल प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि, अष्टम भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि, चतुर्थ भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।]
टिप्पणी—जिस भाव में भी मंगल बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४८
'बुध' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): बुध
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'बुध' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'गुरु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): गुरु
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'गुरु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर
उसका खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४६
'शुक्र' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली १: लग्न (१) में शुक्र]
३ भाव: एकपाद दृष्टि
४ भाव: त्रिपाद दृष्टि
५ भाव: द्विपाद दृष्टि
७ भाव: पूर्ण दृष्टि
८ भाव: त्रिपाद दृष्टि
९ भाव: द्विपाद दृष्टि
१० भाव: एकपाद दृष्टि
२६
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शुक्र' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'शनि' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली २: लग्न (१) में शनि]
३ भाव: एकपाद, पूर्ण दृष्टि
४ भाव: त्रिपाद दृष्टि
५ भाव: द्विपाद दृष्टि
७ भाव: पूर्ण दृष्टि
८ भाव: त्रिपाद दृष्टि
९ भाव: द्विपाद दृष्टि
१० भाव: पूर्ण, एकपाद दृष्टि
२६
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शनि' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
५०
'राहु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[चक्र: राहु की दृष्टि — भाव १: राहु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद]
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'राहु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'केतु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[चक्र: केतु की दृष्टि — भाव १: केतु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद]
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'केतु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
विशेष टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार राहु तथा केतु की खण्ड दृष्टियाँ
एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद होती ही नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राहु-
केतु की न तो ग्रहों के अन्तर्गत गणना की गई है और न इनके दृष्टि-सम्बन्ध का ही
५१
उच्चराशिस्थ ग्रहों का फलादेश
उच्चराशिस्थ ग्रहों का संक्षिप्त विशिष्ट फलादेश निम्नानुसार समझना
चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की
कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
उच्चराशिस्थ 'सूर्य'
उच्चराशिस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' उच्च
(मेष) राशि का हो, वह गौरवर्ण, भाग्यवान, धैर्यवान,
धनी, सम्पन्न, यशस्वी, सुखी, विद्वान्, दण्डाधिकारी,
सेनापति, शूरवीर तथा बलवान् होता है।
उच्चराशिस्थ 'चन्द्र'
उच्चराशिस्थ 'चन्द्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्र' उच्च
(वृष) राशि का हो, वह सुखी, यशस्वी, सम्मानित,
स्त्री-वियोगी, अलंकार-प्रिय, विलासी, मिष्ठान्न भोजी,
चपल स्वभाव, लोकप्रिय तथा उदार हृदय वाला होता है।
उच्चराशिस्थ 'मंगल'
उच्चराशिस्थ 'मंगल'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' उच्च
(मकर) राशि का हो, वह उग्र स्वभाव, अस्त्रविद्या में
निष्णात, संग्रामजयी, साहसी, कर्तव्यनिष्ठ, शूर-वीर,
बलिष्ठ, क्रोधी तथा राज्य द्वारा सम्मान प्राप्त करने
वाला होता है।
५२
उच्चराशिस्य 'बुध'
उच्चराशिस्थ 'बुध'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' उच्च
(कन्या) राशि का हो, वह बड़ा विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान,
लेखक, सम्पादक, सुखी, राजा अथवा राजमान्य, शत्रु-
नाशक तथा अपने वंश की वृद्धि करने वाला, निष्पाप,
धैर्यवान, परन्तु आलसी स्वभाव का होता है।
उच्चराशिस्थ 'बुध'
उच्चराशिस्थ 'गुरु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' उच्च
(कर्क) राशि का हो, वह सुन्दर, विद्वान्, चतुर,
सुशील, सद्गुणी, सुखी, राजप्रिय, मन्त्री, शासक, ऐश्वर्य-
शाली, सत्कर्म करने वाला, अनेक सेवकों से युक्त तथा
सदाचारी होता है।
उच्चराशिस्थ 'शुक्र'
उच्चराशिस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' उच्च
(मीन) राशि का हो, वह सुखी, भाग्यवान, संगीतप्रिय,
कामी, विलासी, कला-प्रेमी, यन्त्र-मंत्र का ज्ञाता, ज्योतिषी,
कवि, संगीतज्ञ तथा यशस्वी होता है।
उच्चराशिस्य 'शनि'
उच्चराशिस्य 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' उच्च
(तुला) राशि का हो, वह सुखी, यशस्वी, ऐश्वर्यशाली,
पृथ्वीपति, राजा, कृषक, सम्पन्न, मायावी, वाहनों से युक्त,
साहसी, दुष्टमति करने वाला, लोक-प्रसिद्ध सम्मानित
तथा धूर्त होता है।
५३
उच्चराशिस्थ 'राहु'
उच्चराशिस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु'
उच्च (मिथुन, मतान्तर से वृष) राशि का हो, वह
धनी, साहसी, लम्पट, सरदार, शूर-वीर, गुप्त-
स्वभाव वाला, दुष्ट, क्रूर, राजा द्वारा सम्मान
प्राप्त करने वाला, प्रतापी तथा धैर्यवान होता है।
उच्चराशिस्थ 'केतु'
उच्चराशिस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु'
उच्च (धनु, मतान्तर से वृश्चिक) राशि का हो वह
भ्रमण-प्रिय, सरदार, नीच प्रकृति वाला, सुखी,
अधिकार सम्पन्न व मिथ्यावादी, नीच तथा
वृद्धों जैसा आचरण करने वाला होता है।
टिप्पणी— किसी ग्रह का केवल उच्च होना ही पूर्ण फलदायक नहीं होता,
उसके साथ ही अन्य विषयों पर भी विचार करके निष्कर्ष निकालना चाहिए।
मूलत्रिकोणस्थ ग्रहों का फलादेश
मूल त्रिकोणस्थ ग्रहों का संक्षिप्त विशिष्ट फलादेश निम्नानुसार समझना
चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियाँ मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की
कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
मूलत्रिकोणस्थ 'सूर्य'
मूल त्रिकोणस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' मूल
त्रिकोणस्थ (सिंह राशि के २० अंश तक) हो, वह
सम्मानित, पूज्य, यशस्वी, सुखी, धनी तथा सब कार्यों में
कुशल होता है।
५४
मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र'
मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा'
मूल त्रिकोणस्थ (वृष राशि के ४ से ३० अंश
तक) हो, वह सुन्दर, भाग्यवान्, ऐश्वर्यशाली, धन-
वान, भोगी तथा सुखी जीवन व्यतीत करने वाला
होता है।
मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल'
मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल'
मूल त्रिकोणस्थ (मेष राशि के १८ अंश तक) हो,
वह सामान्य धनी, अपयशी, स्वार्थी, क्रोधी, दुष्ट,
निर्दय, लम्पट, खल, चरित्रहीन, क्रूर, धर्मी तथा
साहसी होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'बुध'
मूल त्रिकोणस्थ 'बुध'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध'
मूल त्रिकोणस्थ (कन्या राशि के १६ से २० अंश
तक) हो, वह विद्वान्, राजमान्य, धनवान्, प्राध्यापक
चिकित्सक, सैनिक, व्यवसायी, महत्त्वाकांक्षी,
विजयी, विनोदी तथा बुद्धिमान होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'गुरु'
मूल त्रिकोणस्थ 'गुरु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' मूल
त्रिकोणस्थ (धनु राशि के १३ अंश तक) हो,
वह तपस्वी, सुखी, यशस्वी, सम्मानित, राजप्रिय,
भोगी, उच्च अधिकारी, परम बुद्धिमान तथा नगर
या मठ का स्वामी होता है।
५५
मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र'
मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र'
मूल त्रिकोणस्थ (तुला राशि के १० अंश तक) हो,
वह अनेक पुरस्कारों का विजेता, स्त्रियों को प्रिय,
जागीरदार तथा वाहन, भूमि, भवन आदि के सुखों
से सम्पन्न, राजा के समान ऐश्वर्यवान्, प्रतापी तथा
यशस्वी होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'शनि'
मूलत्रिकोणस्थ 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' मूल-
त्रिकोणस्थ कुम्भ (राशि के २० अंश तक) हो, वह कर्त्तव्य-
निष्ठ, वैज्ञानिक, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माता एवं ज्ञाता,
यान-चालक, शूर-वीर, साहसी, सेनापति, कुल का पालन
करने वाला, सुखी तथा धन-धान्य से पूर्ण होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'राहु'
मूलत्रिकोणस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' मूल
त्रिकोणस्थ (कर्क राशि में) हो, वह धनी, लोभी तथा
वाचाल होता है।
टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'राहु' का मूलत्रिकोण
नहीं मानते।
मूलत्रिकोणस्थ 'केतु'
मूलत्रिकोणस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' मूल-
त्रिकोणस्थ (मकर राशि में) हो, वह सुखी, धनी,
वाचाल, प्रवासी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है।
टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'केतु' का मूलत्रिकोण
नहीं मानते।
५६
स्वक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश
स्वक्षेत्री अर्थात् अपनी राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश
निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण कुण्डलियां मेष लग्न की
हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त
कर लेनी चाहिए।
स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
स्वक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' स्वक्षेत्री
(सिंह राशि का) हो, वह सुन्दर, सुखी, ऐश्वर्यवान्,
पराक्रमी, व्यभिचारी, निरन्तर उद्योग तथा परिश्रम करने
वाला, धैर्यवान, साहसी, तेजस्वी तथा अत्यन्त उग्रस्वभाव
का होता है।
स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
स्वक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्र' स्वक्षेत्री
(कर्क राशि का) हो, वह सुन्दर, धनी, तेजस्वी, भाग्यवान्,
विनम्र, साधु चरित्र, परोपकारी, दयालु, मनस्वी, यशस्वी
तथा सहृदय होता है।
स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल'
स्वक्षेत्रस्थ 'मंगल'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' स्वक्षेत्री
(मेष अथवा वृश्चिक राशि का) हो, वह साहसी, बलवान,
यशस्वी, कृषक, भूस्वामी अथवा सैनिक, धनी तथा मध्यम
स्वभाव वाला होता है।
५७
स्वक्षेत्रस्थ 'बुध'
स्वक्षेत्रस्थ 'बुध'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' स्वक्षेत्री
(कन्या अथवा मिथुन राशि का) हो, वह विद्वान्, बुद्धि-
मान्, सम्पादक, शास्त्रज्ञ, लेखक तथा अनेक कलाओं का
ज्ञाता होता है।
स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु'
स्वक्षेत्रस्थ 'गुरु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' स्वक्षेत्री
(धनु अथवा मीन राशि का) हो, वह सुखी, शास्त्रज्ञ,
वैद्य, काव्य-प्रेमी, कवि, विद्वान्, आत्मबली तथा धनवान
होता है।
स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
स्वक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' स्वक्षेत्री
(वृष अथवा तुला राशि का) हो, वह विद्वान्, गुणी,
विचारक, धनवान्, स्वतन्त्र प्रकृति का, कृषि-सम्बन्धी
व्यवसाय करने वाला तथा सुन्दर होता है।
स्वक्षेत्रस्थ 'शनि'
स्वक्षेत्रस्थ 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' स्वक्षेत्री
(मकर अथवा कुम्भ राशि का) हो, वह पराक्रमी, कष्ट-
सहिष्णु, उग्र स्वभाववाला, सुन्दर नेत्रोंवाला, यशस्वी
तथा लोकप्रिय होता है।
५८
स्वक्षेत्रस्थ 'राहु'
स्वक्षेत्रस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली से 'राहु' स्वक्षेत्री
(कन्या राशि का) हो, वह सुन्दर, यशस्वी तथा भाग्य-
वान् होता है ।
स्वक्षेत्रस्थ 'केतु'
स्वक्षेत्रस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' स्वक्षेत्री
(मिथुन राशि का) हो, वह धैर्यवान्, कष्ट-सहिष्णु, कर्मठ,
चिन्ताशील तथा गुप्त-युक्तियों वाला होता है।
मित्र क्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश
अपने मित्रग्रह की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना-
नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं।
अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर
लेनी चाहिए ।
मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
मित्रक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की कुण्डली में 'सूर्य' अपने मित्रग्रहों
(चन्द्रमा, मंगल अथवा गुरु) की राशि (कर्क, मेष, धनु,
वृश्चिक अथवा मीन) में स्थित हो, वह व्यवहारकुशल,
यशस्वी, दानी, सौभाग्यवान्, शास्त्रज्ञ, सुप्रसिद्ध तथा
दृढ़मैत्री करने वाला होता है ।
५६
मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
मित्रक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने
मित्रग्रहों (सूर्य अथवा बुध) की राशि (सिंह, कन्या अथवा
मिथुन) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, गुणी, चतुर तथा
भाग्यवान होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल'
मित्रक्षेत्रस्थ 'मंगल'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल'
अपने मित्र ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा गुरु) की राशि
(सिंह, कर्क, धनु अथवा मीन) में बैठा हो, वह धनी,
मित्र-प्रेमी, तेजस्वी, पराक्रमी, शक्तिशाली, शस्त्र
द्वारा जीविकोपार्जन करने वाला तथा उग्र स्वभाव
वाला होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध'
मित्रक्षेत्रस्थ 'बुध'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने
मित्रग्रहों (सूर्य अथवा शुक्र) की राशि (सिंह, वृष
अथवा तुला) में बैठा हो, वह शास्त्रज्ञ, विनोदी-स्वभाव
का, कार्यदक्ष, सुन्दरस्वरूप वाला, यशस्वी, ज्ञानी तथा
धनवान् होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु'
मित्रक्षेत्रस्थ 'गुरु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने जिस
ग्रहों (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क,
मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह सुखी, उन्नतिशील,
बुद्धिमान, प्रसिद्ध यशस्वी, सत्कर्म करने वाला तथा श्रेष्ठ
लोगों द्वारा पूजित होता है।
६०
मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने मित्र
ग्रहों (बुध अथवा शनि) की राशि (कन्या, मिथुन, मकर
अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह सुखी, गुणी, सन्ततिवान्,
धनवान् तथा बन्धु-बान्धवों को प्रिय होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि'
मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने
मित्र ग्रहों (बुध अथवा शुक्र) की राशि (कन्या, मिथुन,
वृष अथवा तुला) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, परान्न-
भोजी, प्रेमी-स्वभाव का, कुकर्म करने वाला तथा कभी-
कभी दुःख पाने वाला होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु'
मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने
मित्र ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला,
मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह धनी, गुप्त योजना-
कर्ता, सुखी, मिथ्यावादी, बुद्धिमान, पराक्रमी, साहसी
तथा कुकर्म-रत होता है।
मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु'
मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने मित्र
ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर
अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह भ्रमणशील, दुःखी तथा
परोपकारी होता है।
६१
शत्रुक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश
अपने शत्रु की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना-
नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं।
लग्न लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर
लेनी चाहिए। जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री होते
हैं, वह उतना ही दुःखी, दरिद्र, भाग्यहीन, चिन्तित तथा निराश रहता है। यदि
तीन या इससे अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री हों, तो वह जीवनभर दुःखी रहकर अन्तिम
भाग में सुख पाता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' अपने शत्रु
(शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा
कुम्भ) में बैठा हो, वह सदैव दुःख पाने वाला, नौकरी
करने वाला, विषयों से पीड़ित तथा नीच स्वभाव का
होता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने
शत्रु (राहु अथवा केतु) की राशि (कन्या अथवा
मिथुन) में बैठा हो, वह हृदयरोगी तथा अपनी माता के
कारण दुःख पाने वाला होता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' अपने
शत्रु (बुध) की राशि (मिथुन अथवा कन्या) में बैठा हो,
वह विकलांग, व्याकुल, दीन-मलीन तथा स्त्रियों के वश में
रहने वाला होता है।
६२
शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने शत्रु
ग्रह (चन्द्रमा) की राशि (कर्क) में बैठा हो, वह सामान्य
सुख पाने वाला, वासनाशील, कर्त्तव्यहीन, दुःखी, मूर्ख
परन्तु अपनी बात का धनी होता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने शत्रु
(शुक्र अथवा बुध) की राशि (वृष, तुला, कन्या अथवा
मिथुन) में बैठा हो, वह भाग्यशाली, क्रोधी, चतुर,
क्षुधातुर तथा अपनी आजीविका को स्वयं ही नष्ट कर
लेने वाला होता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने शत्रु
(बुध अथवा चन्द्रमा) की राशि (सिंह अथवा कर्क) में
बैठा हो, वह दास्य-वृत्ति (नौकरी) करके अपनी आजी-
विका का उपार्जन करने वाला, दुःखी तथा दुर्बुद्धि
होता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने
शत्रु (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क,
मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह किसी-न-किसी
कारण से निरंतर चिन्तित एवं दुःखी बना रहने वाला,
मलिन-हृदय वाला, रोगी तथा धनहीन होता है।
६३
शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने शत्रु
(सूर्य, चन्द्र, अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष
अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा फल
प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर बैठा
हो तो उनके प्रभाव को अधिक हानि पहुँचाता है।
शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु'
शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने शत्रु
(सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष
अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा
फल प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर
बैठा हो तो उनके प्रभाव में बहुत कमी ला देता है।
नीच राशिस्थ ग्रहों का फलादेश
नीच राशिस्थ विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्नानुसार समझना
चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की
कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह नीच राशिस्थ होते हैं, वह उतना
ही अशुभ फल प्राप्त करता है। यदि तीन या अधिक ग्रह नीच राशि के हों तो वह
जातक मूर्ख होता है।
नीचराशिस्थ 'सूर्य'
नीचराशिस्थ 'सूर्य'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' नीच राशि
(तुला) का हो, वह बन्धु-सेवी, पाप कर्म करने वाला,
कटुभाषी, आत्म-बलहीन, किसी पर विश्वास न करने
वाला, अल्पकेशी तथा विकृत दांतों वाला होता है।
?"
Let's check if there is any other word: ढोल? No. बाजा? If an OCR program read it, it would read वाला.
Wait, what if the book author meant: "नाचने तथा बजाने वालों की संगति करने वाला" and accidentally wrote "वाला बजाने वालों"?
Wait! "नाचने तथा वाला बजाने वालों" -> "नाचने वाला तथा बजाने वालों"!
YES! LOOK AT THAT!
"नाचने वाला तथा बजाने वालों" -> The typesetter swapped "तथा" and "वाला"!
"नाचने तथा वाला बजाने वालों" = "नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।"!
OF COURSE!
"नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।"
The typesetter wrote: "नाचने तथा वाला बजाने वालों की संगति करने वाला होता है।"
That completely explains why the word is वाला! It is 100% वाला!
Because the original sentence was: "नाचने वाला तथा बजाने वालों की संगति..." or the typesetter swapped them!
Mystery solved! It is definitely printed as वाला.
So transcribing it as वाला is 100% accurate to the printed text:
नाचने तथा वाला बजाने वालों की संगति करने वाला
Now let's check every single word in the text to ensure 100% precision: