सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 44

४६
'शुक्र' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली १: लग्न (१) में शुक्र]
३ भाव: एकपाद दृष्टि
४ भाव: त्रिपाद दृष्टि
५ भाव: द्विपाद दृष्टि
७ भाव: पूर्ण दृष्टि
८ भाव: त्रिपाद दृष्टि
९ भाव: द्विपाद दृष्टि
१० भाव: एकपाद दृष्टि
२६
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शुक्र' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'शनि' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली २: लग्न (१) में शनि]
३ भाव: एकपाद, पूर्ण दृष्टि
४ भाव: त्रिपाद दृष्टि
५ भाव: द्विपाद दृष्टि
७ भाव: पूर्ण दृष्टि
८ भाव: त्रिपाद दृष्टि
९ भाव: द्विपाद दृष्टि
१० भाव: पूर्ण, एकपाद दृष्टि
२६
टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शनि' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार
पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।