भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र'
मूलत्रिकोणस्थ 'शुक्र'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र'
मूल त्रिकोणस्थ (तुला राशि के १० अंश तक) हो,
वह अनेक पुरस्कारों का विजेता, स्त्रियों को प्रिय,
जागीरदार तथा वाहन, भूमि, भवन आदि के सुखों
से सम्पन्न, राजा के समान ऐश्वर्यवान्, प्रतापी तथा
यशस्वी होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'शनि'
मूलत्रिकोणस्थ 'शनि'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' मूल-
त्रिकोणस्थ कुम्भ (राशि के २० अंश तक) हो, वह कर्त्तव्य-
निष्ठ, वैज्ञानिक, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माता एवं ज्ञाता,
यान-चालक, शूर-वीर, साहसी, सेनापति, कुल का पालन
करने वाला, सुखी तथा धन-धान्य से पूर्ण होता है।
मूलत्रिकोणस्थ 'राहु'
मूलत्रिकोणस्थ 'राहु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' मूल
त्रिकोणस्थ (कर्क राशि में) हो, वह धनी, लोभी तथा
वाचाल होता है।
टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'राहु' का मूलत्रिकोण
नहीं मानते।
मूलत्रिकोणस्थ 'केतु'
मूलत्रिकोणस्थ 'केतु'
जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' मूल-
त्रिकोणस्थ (मकर राशि में) हो, वह सुखी, धनी,
वाचाल, प्रवासी तथा गुप्त युक्तियों वाला होता है।
टिप्पणी—प्राचीन ज्योतिषी 'केतु' का मूलत्रिकोण
नहीं मानते।