भोजनकुतूहल: प्रथम भाग (रघुनाथ नवहस्त - आहार-रसायन, पाकशाला-व्यवस्था व विरुद्धाहार)
Bhojanakutuhala of Raghunatha Navahasta
रघुनाथ नवहस्त (सम्पादक: सूरनाड कुंजन पिल्लै) द्वारा
87
श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम्
पीनसश्वास 144 पूर्वार्धं पुरुषस्य 176
" 8 पूर्वोक्तपायसे 29
पीयूषं च 127 पृथुका गुरवो 24
पीयूषो नवदुग्धं 147 पृथुपत्रः स्थूल 61
पीयूषोपमितं 157 पृष्टे कुक्षौ 173
पुण्ड्रकस्तु 156 पुंछ वक्षौ "
पुण्ड्रोऽतिमधुरः " पेयाः सूपो रसो 202
पुत्रैस्सन्निधिभिः 222 पेया मन्थ "
पुनः पुनस्तत् 47 पेया लघुतरा 26
पुनः सर्पिषि 53 पैत्तलं मातकृत 214
पुनरुष्णीकृतं 224 पैष्टी कट्वम्ल 168
पुनर्दामं पृथक् 217 पैष्टी पुनः "
पुनस्तदाज्ये 53 पोतास्यो भीमसेनः 119
पुनस्तां 44 पोलिका पूर्ण 49
पुराणं तिमिर 150 पौण्ड्रकः पुण्डरीकश्च 5
पुराणा विरसा 21 पीतंकं मधु 166
पुष्करस्य तु 194 पौषे वारि 186
पुष्टदः पुष्टिकृत् 67 प्रकारैः प्रकारो 43
पुष्टिं च महतीं 225 प्रकाराः कथिताः 54
पुष्टिं च वीर्यं 8 प्रकारा अमुना 42
पुष्टिं दत्ते प्रक्षाळितावहत 51
पुष्टिकृत्तर्पणो 111 प्रक्षाल्य तण्डुलान् 50
पुष्पं तदपि 87 प्रज्ञाक्षयं च 59
पुष्पमाधुविधं 107 प्रज्ञापुष्टप्रद 182
पुष्पैर्निष्टप्तगन्धस्य 190 प्रतिश्यायार्ति 86
पूगं गुरु 91 प्रतीक्ष्य वटिकां 227
पूगकर्पूर 219 प्रत्यहंतिमिर 1
पूजनात् पुत्रदान् 212 प्रदरं नाशयेदाशु 107
पूतं दधिरसं 141 प्रपानकमिदं 122
पूतिमांसं 221 प्रभाते मैथुनं 221
पूरयेद् भागयुगळं 193 प्रभूतवातं 32
पूरिका बृंहणाः 45 प्रभूताभ्यन्तर 31
पूर्वदेशोद्भवाः 183 प्रमेहकुष्ठपिटक 130 .
पूर्वमेव हि 216 प्रमेहगुल्मोदर 145
28
श्लोका• पृष्ठम् | श्लोका• पृष्ठम्
प्रमेहिणो घृते 14 | फलं तु मधुरं .90
प्रमेहंतृद 228 | फलं त्रिदोष 81
प्रमेहसूत्र- 66 | फलं हिमादि 106
प्रशस्तभूमि 185 | फलतुल्यगुणं ”
प्रशस्ता गर्मे .23 | फलपत्रे 220
प्रशस्यते 19 | फलम्मारविचं 185
” 109 | फलानि माघवतू 81
प्रसारिणी 72 | फलाव्वाहैः 216
प्रसारिता 50 | फलेषु परिणतं 105
प्रसूतदोषात् 127 | फलेषु लकुचं 211
प्रसेक्श्वास 85 | फलैः कटुकवाटैः 219
प्रस्थाधे 47 | फलोत्थदंष्ट्र 110
प्रागद्रवं पुरुषो 193 | फांटस्त्व फलं 99
प्राचीनामलकं 97 | फाणितं गुर्वाभिष्यन्दि 162
प्राच्यावन्त्युप 184 | फाल्गुने कूप 186
प्रातस्सायं 130 | फुत्कारविष 178
प्राप्यन्नं 197 | फेनोन्भैराजी 196
प्रायः पयो 126 | फोड़ाळः केन्य 6४
प्रायः प्रभातिकं 131 | बदर मधुरं 94
प्रायः शाकानि 39 | बदरीखम्भवैः 194
प्रायशो यवमध्ये 66 | बद्धमूत्रार्थोप 96
प्रावृड्जलद 178 | बद्धविट्काः 8
प्रावृड्भवन्त 192 | बदोडवडः 185
प्रियालतंले 154 | बलकृत्कफ 151
प्रियालमज्जा 97 | बलकृद्दीपनो 168
प्रीणनं मधुरं 184 | बलकृदृवृंहणं 151
प्रीणनो वात 53 | बलक्षये पाण्डुरोगे ”
प्रोक्तां रम्भा 106 | बलपुष्टिकारं च 91
प्रोक्तिक्षता 33 | बलपुष्टिकरा पथ्या 175
प्लीहगुल्म 112 | बलपुष्टिकरा वीर्ये 81
प्लीहगुल्मोदर 90 | बलपुष्टिकरी रुच्या 67
फलं कदल्याः 198 | बलपुष्टिकरी हृद्या .86
फलं तालस्य 102 | बलपुष्टिप्रदम् 170
फलं तिक्तां 99 | बलपुष्टिप्रभावण्यं 21
29
श्लोका• पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम्
बलपौष्ट्यकारिण्यः 184 | बाल्ये वह्निकरं 128
बलमेधाप्रजननं 194 | बिल्वमज्जोद्भवं 154
बलसंवर्धनं 136 | बिल्वार्जुनी 213
बलाका वारुणी 199 | बीजं स्वादु रसे 102
बलिन्स्तरूणस्य 32 | बीजपूरफलं 94
बल्यं कासाम 70 | बीजेषु त्वाहिफेनस्य 50
बल्यं दीपनदं 148 | बुद्धिं प्रज्ञां च 72
बल्यं नेत्रा ,, | बुद्धिपाटवकरं 119
बल्यं हृद्यं 122 | बृंहणं कफकृत् 171
बल्यं वृष्यकरं 171 | बृंहणं मधुरं 111
बल्यं हिमं 74 | बृंहणा मधुराः 54
बल्यः कदल्यः 62 | बृंहणा रोचना 40
बल्यः पथ्यो 5 | बृंहणा वात 55
बल्याः किलाट 147 | बृंहणी तर्पणी 28
बल्या वृद्धा च 91 | बृहतीद्वय 114
बहुपुष्टिप्रदं 170 | बृहन्मरीचं 116
बहुमूत्रपुरीष | ब्राह्मी तिक्ता 72
बहुविट्कं 151 | ब्राह्मी तु सूक्ष्म ,,
बह्वम्बुर्बहुवृक्षश्च 179 | ब्राह्मी हिमा ,,
बाकुलेन च 204 | भक्तं लघु 26
बाणाख्यमूलकं 59 | भक्तं वह्निकरं ,,
बाधिर्यमान्ध्यं 135 | भक्तं सोष्णं 222
बालं कङ्कारिकाफलं 78 | भक्षयित्वा हरितकं 197
बालं त्रिदोषज 111 | भक्ष्यः सुधापरो 50
बालं पथ्यं 86 | भक्ष्याः क्षीरकृता 55
बालं पित्तमरुत् 94 | भक्ष्याणामेक ,,
बालं पित्तानिल 103 | भगन्दरोदरग्रन्थि 146
बालं फलं 87 | भजेते विस्वरूपत्वं 200
बालं वैल्वं 113 | भर्जयेदाज्य 48
बालं राजफलं 103 | भर्जितान् तण्डुलान् 50
बालवृद्ध 126 | भल्लातकस्य 193
बालस्य नारिकेरस्य 187 | भवति सितेव 122
बाले जरति च 118 | भवन्ति ते ह्यन्तरसाः 50
बाल्ये तिक्ता 79 | भवेत्तापहरी 28
३४०
: श्लोकः • | पृष्ठम् . | श्लोकाः • | पृष्ठम्
भवेद् हि ... | १३४ | भूतुण्डी षट्कोणा | ८०
भवेश्वरीचे | १२८ | भूतोद्भवो | २९
| २४ | भून्दरी | ९४
| ३६ | भूमौ खातो | १८५
भावेन विमुखं | १९९ | भूरि शाल्म्यं | २०१
भाजने मृन्मये | १२२ | भूर्जकोटं | १०७
| १९५ | भृगपक्षी | १०६
” | १७७ | भृगं तैलादि | २२२
भावे च कूप | १८६ | भृगं वामिकरं | ११४
भारद्वास्त्वपि | १७१ | भृगं हिङ्गु च | १२३
भावितं हिङ्गु | १०९ | भृगं हिङ्गुयुते | १२४
भावो विभाव्यते | १९८ | भृगः शुणोऽपि | २०१
भिन्नागूढभगा | ३६ | भृगमांसं | १७६
भिन्द्याच्चे अपि | १९८ | भृगहिक्कादिकं | ४१
भिषक् तेषां | ५५ | भृगानि स्फुटितानि | २२
भुञ्जानस्य तु | २१९ | भृगा वराह | १९९
भुक्तस्त्ववादी | २१८ | भृतेस्तिके | ५६
भुक्तिं जगाद | २२२ | भेदकं घृतमतीव | १४९
भुक्तिमध्ये | १५७ | भेदकं नवनीतं | १४८
भुक्ते स्वारे | २२३ | भेण्डा तु | ८७
भुक्त्वा सायं | ६० | भेदनं कामला | ७३
| २१८ | भेदनं स्निग्ध | ११७
भुञ्जानं | २२७ | भेषजयन्त्रमपि | २२९
भुक्त्वा क्षतं | २१९ | भोक्तव्यं सघृतं | १
भुक्त्वा शतपदी | ” | भोजनं निन्दितं | २१५
भुक्त्वोपविष्टतः | २२१ | भोजनाग्रे सदा | २१६
भुञ्जानो न | २२५ | भोजनादौ सदा | २२४
भुञ्जीत माष | २२४ | भोजने चामृतं | १९१
भुञ्जीत घृत | २२६ | भोजने दन्तजन्मानि | २१८
भूकशुण्डारो . | ९७ | भोज्यं भक्ष्यं | २१७
भूतग्रहोपशमनी | ११९ | भोज्यं शीतं | २१६
भूतविद्यावती | ७० | भो षट्पदाः | २३०
भूतसंचारणे | २९ | भौमसम्भो | १७७
भूतांप्रस्तार | २२० | भौमाद्याम्यमखा | १८७
81
श्लोकाः पृष्टम् • श्लोका• पृष्ठम्
भ्रमक्लमहरं १२५ | मधुरं कटु १८४
भ्रमपित्तविदाह ७९ | मधुरं च तथाऽम्लं ८४
भ्रमरेर्जनितं १६५ | मधुरं त्रिदोषशमन १२९
भ्रामरं पिच्छलं १६६ | मधुरं त्वतसीतैलं १५२
मकुष्ठकः कषायः १६ | मधुरं दधि १३९
मक्षिकास्तीक्ष्ण १६६ | मधुरं पित्तनुद् १८५
मच्छण्डिका • १६१ | मधुरं कुंङ्कुमं १०४•
मच्छण्डी ग्राहिणी " | मधुरं भक्षयेत् १३९
मच्छण्डी शिशिरा ७३ | मधुरं मधूनारिकेलं ९१
मज्जत्वक् १०१ | मधुरं मधुराम्लं च ४९
मज्जयित्वा ४२ | मधुरः शाल्मली ६४
मज्जयेच्च ४३ | मधुरः श्वेत १५
मज्जा पनसजो ८३ | मधुरा ग्राहिणी २३
मजरी त्वर्धपक्वा २४ | मधुरा तृप्तिदा ७९
मण्डकेन समो ४३ | मधुरानुरसा ११३
मण्डको बृंहणो ३४ | मधुराम्लरसं १०४
मण्डपेयाविलेपी ५७ | " १३३
मण्डस्त्वसमितां ४३ | " १३७
मण्डस्तु बृंहणो ४२ | मधुराम्लेन २८
मत्स्यण्डिका १६३ | मधुरा विरसा ६८
मत्स्यण्डी " | मधुराश्च कषायाश्च ६४
मत्स्यनिरुत्कलन १९८ | मधुरास्तैल ४५
मत्स्यमांस १३४ | मधुरो धरणी ६३
मत्स्यमानूपमत्सं च २१२ | मधुरो मधु १११
मत्स्यानिष्वोः २१२ | " ९६
मत्स्यो माहिष १७४ | मधुरो लवणः १५८
मदगन्ध कषायं १५२ | मधुशर्करा • १६
मदत्रिकोणं १६८ | मधु सर्पिः १९८
मद्यति न हि २१० | मधूकमाहुर २०४
मद्यं न पेयं १६९ | मधूली तु ततः ८
मद्यं नवं " | मध्यपर्वदलनाच्च १५८
मद्यप्रयोगं " | मध्यवयसो १२१
मधुकर्कटी तु ९५ | मध्येऽग्निदीपनं २१८
मधु सुन्दर १९८ | मध्ये तु कठिनं १९८
पञ्चम विरुद्धाहार विचार, भोजन-विधि, ताम्बूल एवं भोजनकुतूहल उपसंहार
श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम्
२16 महाबबरसम्भूत 110
मज्जावर्णं च 142 महारम्भाफलं 88
मज्जावर्णस्य 140 महारास्त्री कटूः 71
मनोहरं रुचिकरं 215 महावल्ली बद्धविट्का 85
मर्त्यानुपानः 198 महाशक्तिः स्वादुः 4
मन्देन पाको 206 महासेतुकफलं 118
मन्दं दुग्धरूत 185 महाश्वेतु 175
मन्दं मन्दं 124 मांसं खड्ग 169
मन्दं स्यात् 135 मांसं शीतं 172
मन्दमाशु 56 मांसगोधूम 203
मन्दस्तीक्ष्णो 223 मांसशृङ्गाटकं 53
मन्दाग्नावथवी 143 माकन्दिकायाः 109
मन्दाग्नि च 56 माकन्दी कटुका 60
मन्दाग्नि वात 110 माकन्द्यस्थामिक्षक 114
मन्दानिर्भवति 202 माक्षिकं तैल 166
मन्दानलत्वं 104 माक्षिकं भ्रमरं 165
मन्दानलो नरो 2 माक्षिकं मधुरं 166
,, 216 माक्षिकं च 229
मयूरकण्ठतुल्योष्मा 196 माक्षिकं दाहकृत् ,,
मरीचं कटु 116 मातुलुङ्गकपित्थ 142
मरीचं क्षुपजं ,, मातुलुङ्गसिताजाजी 141
मरीचं दीपकं 41 मात्रया सेवितं 200
मरीचक्षोद 39 मात्रागुरु तु 2
मलरोगप्रशमनी 73 मात्रागुरुस्तु 217
मलशुक्रानिलकरी 85 मात्रायोगविभागेन 200
मलानुलोमनी 57 मात्स्यं तु माकन्दफलं 209
मल्लापहाद्दष्टनखोः 183 मात्स्ये सूनफलं 204
मल्लापहा भीमरथी च ,, माधूकं मधुरं 107
मसूरो मधुरः 19 माध्वीकं नारिकेलीकण्ठं 91
मस्तूनि स्यात् 196 माध्वी तु मधुरा 168
महत्यो मक्षिकाः 165 माध्व्यधा मधुरं 183
महांस्तस्य 6 मारिषो मधुरः 67
महागोधूम 8 मारिषो रेचकः ,,
महाग्रन्थिः 71 मार्जारपरोषे 145
38
पुटम् | श्लोकाः | पुटम्
मांसकूर्मः | 63 | मुद्गपिष्टीं पचेत् | 42
मांसानां स्फुटिताग्रत्वं | 196 | मुद्गपिष्टीविरचिताः | 41
| 112 | मुद्गभिज्यस्य | 21
माषः स्निग्धो | 11 | मुद्गसक्तून् | 56
माषपिष्टि | 36 | मुद्गाढकी | 10
,, | 40 | मुद्गाणां भूमयी | 46
माषमुद्गादि | 45 | मुद्गानां वटकाः | 40
माषसूप | 198 | मुद्गानां वेस | 49
माषाणां शाकव. | 36 | मुद्गार्द्रकवटाः | 42
माषाणां पिष्टिका | 38 | मुद्गास्तत्र वराः | 10
माषाणां पिष्टिकां | 37 | मुण्डकः केटुको | 90
माषान्धसोः | 209 | मुहूर्तं पवनादूर्ध्वं | 131
माषादिवटकैः | 123 | मूत्ररोधहरा | 92
माषासृताम्भोधर | 210 | मूत्रलं बृंहणं | 64
माषोडश सर्वैषु | 21 | मूत्राघातहरं | 77
मासे व्यतीते | 228 | मूत्रावरोधशमनं | 78
माहिषं दधि | 137 | मूर्च्छाकुष्ठ | 150
माहिषं नवनीतं | 147 | मूर्च्छाच्छर्दि | 122
माहिषं बलवर्णौजौ | 132 | मूर्च्छापित्ताय | 188
माहिषं सेव्यमन्नं | 148 | मूर्धशूल | 117
माहिषे पयसि | 207 | मूलकं तीक्ष्णं | 59
मिश्रितं सर्पिषाऽद | 146 | मूलकं दोष | 201
मिश्रपिण्डस्तु | 180 | मूलकं दोषजित् | 203
मिश्रवर्णफला | 86 | मूलकायाः हरितकाः | 135
मिश्रेया मधुरा | 68 | मूलपत्रकरीरा | 58
मुखं दह्यते | 209 | मूलपोतिस्त्रि | 67
मुखधाव्यकरो | 63 | मूलादूर्ध्वं तु | 157
मुखरोगहरं | 154 | मृगस्य मांसं | 170
मुखवैरस्यजित् | 115 | ,, | 209
मुखवैरस्यहरणं | 227 | मृगाक्षी कटुका | 79
मुखवैशद्य | 65 | मृणालखर्जूरक | 204
मुखाद्धः स्यात् | 62 | मृणालबिस | 216
मुख्यशाकेस्त्रिदोष | | मृत्पात्रे तु | 130
मुद्गणातास्तु | 40 | मृदुना वह्निना | 93
1081
पृष्ठम् श्लोका•
मृदुला कठिनानां च 49 यः सुशालीन्नमाद्येन
मृदूनां मांससंयु• 196 यः पीतवर्णोऽपि च
मेधैरन्तरिता 226 यः स्थूलाङ्गो
मेधिका कटु 177 यद्वत्प्लीहोदरादीनां
मेदः श्लेष्मोदरा 73 यतोऽगस्त्यस्य
मेदः श्लेष्मकरं 74 यत्किञ्चिद्रोहिणी
मेदः श्लेष्मास्र 83 यत् कुर्वन्ति
मेदोगुल्मोदर 10 यत्तदेव हिमं
मेदोदाहापहं 82 यत्तिरोहित
मेधाकृद् गुरु 163 यत्र ह्यवे
मेधाबलप्रदं 148 यत् सम्यक
मेधारुचिप्रदो 194 यत्सराजदक
मेध्यं किञ्चित् 71 यत् सारस्वत
मेध्यस्तिक्तः 148 यथा गुडस्नुरण
मेषीक्षीरं 201 यथा तैल
मेषीघृतं 133 यथा निर्गीतः
मेषीपयः 137 यथा पिण्डीभवेत्
मेषो भेड़ो 211 बापूपं भिषः
मेहं पित्तं 134 यथा यथा भवेत्
मेहकृच्छ्र 88 यथा यवैर्वा
मेहास्स्रपित्त 65 यथा लवण
मेहे हिता 10 यथा विपाकाय
मेहे कटियकृत् 81 यथा शृतसमं
मोदकाः गुरुतराः 175 यथा सर्वाणि
मोदकाः गुरवः 56 यथासम्बन्धं
मोहनं दीपनं " यथा सुराणां
मोहातीसार 91 यदि पूतिगन्ध
मौद्गस्तु पथ्यः 172 यदि स्वपेत्
मौद्द्रायूषाः 31 यद्गुणं यन्मधु
मौद्गश्च मद्गुणः 208 "
म्रियन्ते मक्षिकाः 37 यद्वृक्षकटोदर
यः काञ्चन 197 यद्वेदागम
यः कृष्णां दीर्घकायः 222 यन्मया समुदितं
174
35
श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम्
यन्मातृलङ्गी 106 योजयेत् 151
यवः कषायो 8 योऽनन्तदेवः 229
यवका हायनाः 6 योनिदोषे 149
यवजाः सक्तवः 23 योनिशूले 148
यवजा रोटिका 35 यो भुङ्क्ते 192
यवागूः बहुगुण 16 यो महांस्तेषु 12
यवागूर्ग्राहिणी ,, यो रक्तान्नो 174
यवानी कटु 115 यो लेढि शयन 221
यवानीशाकं 75 रक्तदोषकरा 78
यवास्तु निस्तुषाः 23 रक्तदोषप्रशमनः 63
यक्ष्माग्नेयौषध 57 रक्तपिण्डाळुकः 62
यक्ष्वितान् संस्मरेत् 219 रक्तपित्तकरं 80
यस्स्वेतेषां 218 रक्तपित्ततृषा 141
यस्मिन्नृतौ 225 रक्तपित्तहर 66
यस्याजुपानं 226 ,, 132
याः स्थूलास्ताभिः 165 ,, 195
या गन्धं केतकीनां 118 ,, 88
या च न्यस्ता 119 रक्तपित्तानिल 130
यात्रार्थिनां 215 रक्तपित्ते 125
याप्सु न्यस्ता 118 रक्तप्रसादनं 31
यावद्धान्यकृतं 168 रक्तमाषो गुरुः 67
यावनाळ 153 रक्तमूत्रामयघ्नश्च 11
यावनाळादि 23 रक्तशालिवरः 4
यावनाळो महान् 9 रक्तशालिस्तु 3
युक्तं मरीचचूर्णेन 28 रक्तागस्त्यफळ 74
युक्ताश्च सलिले 27 रक्तातिसार 120
युक्तेन मोदकान् 47 रक्तासृपित्त 118
यूषो बल्यस्ततः 26 रक्ते च वात 137
ये केचित् 22 रक्तोद्रेक 142
ये चान्ये वात 190 रक्तो महान् 5
ये चापि मार्गपरिसर्पण 140 रचिता रोटिका 36
येषां न साम्यं 131 रचिताश्च वज्र 89
येषां स्युः 22 रजनीद्वये 191
ये स्निग्धाश्च 165 रते सुप्तोत्थिते 212
36
श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम्
रसवीर्ययोः 141 | ” ”
” 175 | ” ”
रसवीर्यविपाकेषु 116 | लता 6
” 67 | रुचिपुष्टिप्रदः 11
रसस्तदुद्भवः 158 | ” 3
” 104 | ” 22
रसाशने कार्यं 232 | रूक्षं कासिल्वलं 17
” 64 | रूक्षं चणकवाट्यं 7
रक्ता सर्वरोगघ्नी 141 | रूक्षं च दीपनं 6
रसे कटु 227 | रूक्षं घृतक्षमोद्भूतं 10
रसेन भोज्यः 61 | रूक्षं तित्तिरिकं 17
रसेनाम्वरस्य 218 | रूक्षं तु कफदं 17
रसे फाडे च 102 | रूक्षं दीपनहृत् 18
” 107 | रूक्षं पित्त 4
रक्षसु मधुरः 211 | रूक्षं कफं 10
रक्षोघ्नो ज्वरहरो 27 | रूक्षं श्लेष्मानिलं 10
रक्षोबोजमयः 60 | रूक्षं संग्राहि 10
रक्षोघ्नश्च .. ” | रूक्षं सुगन्ध्यं 10
राजबदरः 94 | रूक्षं सुगन्धि 7
राजमाषो गुरुः 11 | रूक्षं स्वादु 8
राजमाषो नीलमाषो ” | ” 10
राजयक्ष्मणि 151 |
राजवारुणिका 67 | रूपस्तुल्यो मुनिः 10
राजसर्षपकः 18 | रूप्याः पाक्यं 9
राजादनं मातुलुङ्गं 11 | रोचनाग्निप्रदीपनो 11
राजादनं तु त्रिदोषघ्नं 3 | रोचनानि तानि 5
राजानाः कोमलाः 08 | ” 6
राजिकादियुते 52 | रुजा वातहरा 4
राजीकूर्चेन 28 | रुजा विष्टम्भ 4
रात्रौ क्षीरं 31 | रौतः कार्यं 17
रात्रौ च पर्णबहुळं 29 | र्छा च पित्त 12
रात्री सौम्यगुणत्वात् 31 | र्श हृद्यं 221
रीतिस्त्रात्रस्थितं 95 | र्श विषूच्यदोषघ्नं 91
रोचनहृद्द्दीपनं 66 | लाक्षातीतो गुरुः
- 7
श्लोकाः पृष्ठम् • श्लोकाः • पृष्ठम्
59 लघुमन्थे 228
• 82 लघुरपि रुचि 44
रक्तो मेध्याहरा• 19 लघुप्रोष्ठी 46
रक्तो मधूक 162 लघु वर्षोषितं 22
रक्तो ह्यन्यः 114 लघु वातहरं 124
रक्तांशा वातला 85 लघु श्लक्ष्णं 134
रेचनं दीपनं 68 लघुश्च दीपनः 10
रोचे बाले 151 लध्वजाजं तु 148
रोचनं ज्वरहरं 66 लक्ष्म्यो बलकरा 35
रोचनं तुवरं 185 लक्षा रुच्यां 14
रोचनं दीपनं 111 लड्डुकास्तस्य 48
रोचनो बृंहणः 50 लतावितान 185
रोटिका बलकृत् 35 लप्सिका बृंहणी 84
रोपितारोपिता 3 लवणं शीतलं 120
रोषितास्तु गवा ,, लवङ्गमरिचोन्मिश्रं 122
रोचकं तीक्ष्णं • 117 लवङ्गहिङ्गु 53
रोहितो गर्गरो 172 लवङ्गोशीर 190
रौक्ष्यं भवति 214 लवङ्गोषण 43
रौप्ये 129 लवणं तत्र 37
108 लवणं मधुरं 129
87 लवणमरिच 87
रम्भापत्रेऽथवा 214 189
रम्भाफलं त्यजेत् 212 लवणादिवृतं 83
रम्भाफल 89 लवणाम्रफल 112
लकुचः क्षुद्रपनसो 84 लवणार्द्रक 28
लक्ष्मणा मधुरा 64 • ,, ,,
लक्ष्माः कृतास्तु 39 लवणेन समायुक्ता 141
लक्ष्माः पर्पटाः 37 लवलीफल 97
लघुः कषायो 12 लशुनं षोडशांशं 121
लघुः पित्तहरो 201 लाक्षारसनिभं 150
लघु तत्केवलं 111 लाङ्गलो लोह 5
लघुता हृद्य 213 लाजाः स्युः 22
लघुत्वदं 94 ,,
लघुष्णोऽपि 201 लाजाश्च यवचावारण
88
श्लोकाः पृष्ठम् | श्लोकाः पृष्ठम्
लतापुष्पोद्भवं 106 | वलीकाशाः 166
लेपयेच्चन्दनेन 43 | वशावशेश 196
लेह्यव्यापारिकं 236 | वसितावातलवर्णं 117
लोहस्य जन्मप्रभृति ,, | वस्तोर्विचक्षणेनापि 188
लोहपात्रस्थितं 195 | वह्निकृत् कफहृत् 180
लोहितेक्षुश्च मधुरः 156 | ,, 179
वंशत्वचा वापि 121 | वह्निकृत् सर्व्वे 172
वक्रप्रवेशश्च 120 | वह्निकृद्दोषहृत् 153
वक्तव्ये नृपपक्षानु 61 | वह्निदीपनकरं 181
वटकस्य गुणैः 38 | वह्निदीप्तिकरं 128
वडकाः कफ 39 | वह्निवृद्धिकरं 134
वटा वेशवारैः 208 | वह्नेर्मान्द्यकरो 92
वटिका वेशवारस्यापि 42 | वह्नेर्वृद्धिकरं 149
वटेशार्जुन 194 | वंशं करीरं 155
वडोरी तद्गुणा 36 | वाक्यस्य शेषात् 58
वत्साडनी तु 70 | वातकुम्भीफलं 105
वन्ध्यापुत्रोदकी 67 | वातहृत् कफ 19
वन्ध्यीरचिता 35 | वातगुल्म 81
वयःस्थापकं 125 | वातघ्नं कफकृत् 188
वरकोद्दाल 6 | वातघ्नं च 108
वरको मधुरो 20 | वातघ्नं तु 180
वरा शाकेषु 70 | वातघ्नं दीपनं 68
वराहमांसं 171 | वातघ्नं पित्त 97
वर्षासूर्ये 150 | वातघ्नं मधुरं 135
वर्जयित्वा शिवाः 131 | ,, 136
वर्जयेदण्ड 134 | वातघ्नं भेषजजलं 113
वर्ज्यं सर्व्ववर्णं 131 | वातघ्ना पित्तहृत् 85
वर्णकान्तिकरो 3 | वातघ्ना मधुरा 46
वर्णमत्स्यवता 48 | वातघ्ना रोचका 38
वर्ण्यं रुच्याग्निकृद् 111 | वातघ्नाश्च 56
वर्द्धनं वीर्य्यबलभोः 171 | वातघ्नी कफकृत् 35
वर्षादिविधेषु 128 | वातघ्नी पित्त 98
वर्षाम्बुवृद्धौ 69 | वातघ्नी बृंहणी 46
वर्षासु सर्षपं 178 | वातघ्नी सारिका 168
39
श्लोका० | पुटम् | श्लोका० | पुटम् .
वातपित्तकफघ्नं | 120 | वातामं कृमि | 95
वातपित्तकफघ्नन् | 190 | वाताम उष्णः | 102
वातपित्तशमनः | 158 | वाताममञ्जा | ,,
वातपित्तहरं | 194 | वातामयंकरं | 133
,, | 53 | वातामयंकरः | 19
,, | 131 | वातामयबद्धा | 71
,, | ,, | वातामयहरा | 37
,, . | 104 | वातां मांसरुजाः | 221
,, | 111 | वातातिं कण्ठदाहं | 95
,, | 126 | वाताल्पदं | 137
,, | 194 | वाताल्पदाः | 25
वातपित्तहरा | 54 | वार्तेऽम्लं | 144
वातपित्तामयान् | 109 | वाते हितं | 120
वातपित्तोत्थ | 68 | वातोदरी | 145
वातप्रकोपनः | 90 | वान्तिकृद्वात | 71
वातप्रकोपनाः | 10 | वान्तिघ्नं | 78
वातलं बद्ध | 185 | वान्तिविद्मूर्च्छादिं | 63
वातलं बातकोपे | 203 | वापिता मधुरा | 3
वातलः कफदो | 16 | वाष्पं वारि | 185
वातलः श्लेष्म | 31 | वामदिश्यायां | 221
बातलो रक्तशमनः | 62 | वाराहं शाविभा | 198
बातश्लेष्मकरो | 67 | वाराही तिक्त | 63
वातश्लेष्मज्वर | 113 | वारिजो गिलल | 20
वातश्लेष्मप्रशमनं | 227 | वारिणा कोमळो | 31
वातश्लेष्मविवन्ध | 111 | वारि स्फाटिक | 178
वातश्लेष्महरं | 193 | वार्त्ताकी कट्टका | 86
" | 169 | वार्त्तिकं नूतनैः | 193
वातश्लेष्महरा | 41 | वास्तुकं तु मधुरं | 66
वातहृत् कफहृत् | 154 | वास्तुकाद्वितयं | ,,
वातहृत्तेऽपि | 202 | वास्तुकसिद्धार्थं | 205
वातहृद् दीपनी | 70 | बालुकी मधुरा | 79
वाताटोपं | 173 | विकण्टकः कषायः | 99
वातादिदोष | 82 | विकाराः फाणित | 161
वातानुलोमी | 32 | |
| श्लोकाः | संख्या | श्लोकाः | संख्या |
|---|---|---|---|
| विचार्य मधुरं | 99 | विपाके मधुरं | 138 |
| विचिरे जीवतुं | 186 | विषमग्रभेदिनः | 87 |
| विजोद्वमतिः | 197 | विषमध्याहन् | ” |
| विजातश्च | 190 | विषमध्याध्याय | 118 |
| विज्ञातव्यंस्वभावः | 196 | विषेरि मुशमं | 127 |
| विज्ञेया रोहिणी | 100 | विषधं वक्त्रे | 216 |
| विज्ञेया वेत | 86 | विषज्येते | 224 |
| विद्मवेदिव हव्यं | 64 | विषदं शुद्धिः | 199 |
| विन्दुषामश्व | 159 | विषद्वयपि | 197 |
| विन्दुप्राशन | 191 | विषद्रुमसङ्गं | ” |
| वितस्तारत्निकं | 182 | विषध्यते यह | ” |
| वितस्तिमात्रः | 174 | विरेऽवान्ति | 225 |
| विदम्यानिस्सह | 226 | विरेचने स्यात् | 100 |
| विदलति मुख | 44 | विरोच्यपि न | 199 |
| विदारी मधुरा | 63 | विलेपी ग्राहिणी | 57 |
| विदार्ये भूमि | 184 | विलेपी च यवः | 26 |
| विदाहि कटुकं | 60 | विलेपी तर्पणी | ” |
| विदाहि कफ | 116 | विवर्त्त विरतं | 134 |
| विदाहिनः पुंस् | 55 | विवर्णास्त्विन्द्र | 223 |
| विदाहिनस्तैल | 54 | विवृत्याऽग्नेऽस्य | 174 |
| विदाहि पिच्छल | 117 | विशदं रोचनं | 97 |
| विदाहि यड | 186 | ” | 96 |
| विदाहीन्यम्लपानानि | 123 | विशिष्ठो मग्न | 53 |
| विदाह्यामो न्नियंत्वं | 220 | विशिष्ठो मुद्र | 51 |
| विदाह्यम्ने रवे | 33 | विशुष्का वटका | 87 |
| विदाह्य वटकाकारं | 65 | विशुष्कम्लंगं | 217 |
| विद्या पूर्ण | 220 | विशेषतः प्रमेह | 116 |
| विद्यापि चोपयोगेन | 201 | विशेषात्पर्षणी | 168 |
| विद्या घोषाण्डजं | 218 | ” | 167 |
| विद्या सुहास्यं | 29 | विशेषात् पक्वयं | 88 |
| विन्ध्याद्री विजया | 100 | विशेषात् पक्वां | 197 |
| विपचेत् क्वाथयेत् | 27 | विशेषाद्विषत | 38 |
| विपरीतो गुरुः | 57 | विशेषाद्दारुकं | 81 |
| विपाके मधुरं | 188 |
41
श्लोकाः पृष्ठम् श्लोकाः पृष्ठम्
विषाग्निवापि 202 वृष्यं दीपन 182
विषह्रदः श्याम 196 वृष्यं बृंहणं 128
विषहृत्पान्त 224 वृष्यं मेदःकरं 136
विषहृद्धात्री 212 वृष्यं वर्णकरं 104
विषभूताश्चि 64 वृष्यं स्वादुतरं 77
विषमूत्रपुरीषवात 220 वृष्यः पित्तानिलं 96
विषगोमयं 90 वृष्यः शीतो 7
189 वृष्यः श्रमहरो 11
विषव्रणभ्रान् 4 वृष्यः सन्तर्पणो 80
विषभ्रमानिल 214 वृष्यः स्थौल्यकरो 8
विषसाम्यगुणत्वात् 155 वृष्ययोगैः 167
विषस्य तैजस्य ,, वृष्यश्च पित्तघ्न 156
विष्टम्भिनी न 36 वृष्यश्च मेधास्वर 61
विष्टम्भिनी हरेत् 30 वृष्यश्च रोचनः ,,
विष्टम्भिनो ज्वर 47 वृष्यश्च वीर्यवृद्धिं 94
विष्टम्भि बृंहणं 90 वृष्याः पैत्तं पित्त 50
102 वृष्या क्रिमिहरा 80
वि रुच्य 82 वृष्या क्षतक्षीण 163
विष्णुक्रान्तस्तु 63 ,, 161
विष्णुरता यथैव 218 वृष्या युतिबलप्रदा 160
विशं च रोचनं 178 ,, 164
वीराग्रंणो निशि 222 वृष्या रोचन 45
वीर्यं कफकरं 195 वृष्या वातप्रदा 81
वीर्यप्रण 112 वृष्याश्च रोचना 5-
वृक्षवाटमुवं 70 वृष्या सन्तर्पणी 70
वृक्षायाः कफहृत् 127 वृष्यो रक्तघ्न 157
वृद्धिं करोति 150 वृष्यो रुचिप्रदो 9
वृन्ताकं खण्डितं, 109 वृष्यो रुच्यो 75
वृन्ताकं पित्तल 87 वृष्यो विदाह 164
वृष्यं चकोरजं 172 वेल्लयेद्वेलनेन 44
वृष्यं दाहश्रम * 78 वैशाखे नैर्ऋतं 186
व्यङ्गवलीपलितघ्नं 191
1081
• श्लोकाः • | पुटम् | श्लोकाः • | • पुटम्
व्यञ्जनान्याशु | 196 | शर्करामरिचोन्मिश्रै | 122·
व्यञ्जनालङ्कृतिः | 73 | शर्करामरिचोपेतं | 145
व्याधि च काले | 226 | एतानि | 142
व्यायामश्रान्त | 132 | | 141
व्यायामस्निग्ध | 199 | शर्करेक्षुविकाराणां | 165
व्यायामिनां वात | 188 | ” | 162
व्रणकण्डूति | -72 | शर्करोदकं | 122
व्रणकण्डूहरं | 194 | शर्करोदकसंयुक्तं | 123
व्रणकीटादि | 71 | शल्कं स्थूलं | 174
व्रणदोषा | 81 | शशमांसं | 171
व्रणशोधनसन्धान | 167 | शशेकुन्द | 145
व्रणाक्षिरोग | 57 | शष्कुला मधुरा | 46
व्रीहिगार्ते | 5 | शस्यते बाढ | 148
व्रीह्यादिकं | 2 | शस्यते स्वर | 54
शकुनाहृतशालिः | 6 | शाकं चतुर्विधं | 58
शक्तिमहं | 58 | शाकं मिनत्ति | 59
शङ्खपाल¹ इति | 43 | शाकं षड्विध | ”
शङ्खस्य चूर्णेन | 207 | शाकवाम्बव | 134
शणस्त्वम्ल | 71 | शाकभेदा | 86
षण्डकी राजिका | 125 | शाकानि सर्वाणि | 206
शतदुर्विपाच्या च | 181 | शाके रूक्षतरौ | 69
शतपत्राम्बु | 188 | शाकेषु सर्वेषु | 59
शतपुष्पादलं | 68 | शाको जलाम्बिते | 75
शतावर्येङ्कुराः | 77 | शातपर्वकनेपाल | 156
शताह्वा कटुका | 115 | शारदो वाव | 9
शमयति बहु | 56 | शार्करं कथ्यते | 168
शमीफलं तु | 115 | शालबस्तृणाः | 24
शरद्ग्रीष्म | 136 | शालयो दग्ध | 2
शरत्पयोद | 178 | शालयो मधुराः | ”
शरदृतौ निसंरजः | 175 | घृतं | 44
शर्करां च पचेत् | 121 | शालिपिष्टदधि | 40
शर्करा उदरपित्त | 160 | शालिपिष्टो गरीयः | 201
| 164 | शालीनां लोहितः | 211
• शर्करा भातकं | 168 | शाल्मलीपुष्पं | 107
43
• श्लोका• पृष्ठम् • श्लोका• : पृष्ठम्
शाल्यूनं चेन 178 शीतः कषायो 8
शिखिकण्ठाभ . 197 शीतः पित्तविनाशनः 228
शिग्रुतैलं कटूष्णं 153 शीतकाले 145
शिग्रुपत्रभवं 66 शीतलं निर्मलत्वं च 187
शिग्रुपुष्पं गुरु 82 शीतपित्तान्न 97
शिग्रुमूलस्य 121 शीतलं कान्तिदं 158
शिग्रु रक्तं कटु 82 शीतलं शीघ्रपाकि 104
शितातेक 209 शीतलं श्लेष्मलं 111
शिम्बीधान्ये 211 ,, 228
शिम्बीनिगूढम् 2 शीता तिक्ता कटुः 114
शिम्बीभवं गुरु ,, शीता पित्तास्रं 93
शिम्बीषु माषान् 211 शीताम्बु पीत्वा 210
शिरःस्तम्भाग्न 119 शीताम्बुपूरित 192
शिराकोशातकी 81 शीतकाज्वरहृत् 215
शिरोमध्यतलानां 119 शीतिवारिशितिबरः 75
शिरोमध्ये तलं ,, शीते न तु तदायन्ते 202
शिलाकीर्णं स्वयं 185 शीतोदकं च 209
शिलायां वा 177 शीतोदनं 27
शिलायां साधु 36 शीतो रुच्यः 174
,, 123 शीतोष्णतोयासव
शिशिरं कटु 153 शीतोष्णा शुकदा 52
शिशिरः पित्त 64 शुककृत् कफकृत् 162
शिशिरकिरण 139 शुकनिद्रा 147
शिशिरा वात 70 शुक्लस्तक 37
शिशिरा वातळा 16 शुक्लाग्निनाशकं 84
शिशिरा श्वास 93 शुकवृद्धिकराः 46
शिशिरो मधुरो 9 शुक्लस्तिलः 16
शिशूनां युवां वा 4 शुक्लाङ्गः 174
शीघ्रजन्म तथा 22 शुक्ला तिक्ता 79
शीतं वर्णं 147 शुण्ठिः कटूष्णा 116
शीतं श्लेष्मं च ,, शुण्ठ्याक्त 208
शीतं शिग्रुफलं 82 शुण्ठी यतीकस्य च 207
शीतं स्वादु 180 शुद्धग 35
शीतं हारीतकीतैलं 153 शुद्धसार्थं तन् 58
44
-श्लोका०- पृष्ठम् श्लोका०
शुद्धमांसं परं 52 शेषं मांसरसं
शुद्धमांसाविधानेन 53 शैत्यप्रसाद
शुद्धस्फटिकसन्निभा 164 शैलजे मृन्मये पात्रे
" 160 शैलसाबुसवारि
शुद्धेऽर्धपक्वे 30 शोषस्य नारिकेलस्य
शुद्धेस्तुम्बे 28 शोषस्यापि बलं परं
शुभ्रे पट्टे च 141 शोषपाण्डुहरं बल्यं
शुष्कं कुस्तुम्बरी 73 शोषपाककरो
शुष्कं विरुद्धं 217 शोषोदराक्षौ
शुष्कगोधूम 35 शोषघ्नस्तर्पणो
शुष्कमूशे 13 शोषहृत्सर्पणी
शुष्कवार्ताक 114 शोणितोऽतिहितः
शुष्काः करतल 39 शोषे नवज्वरे
शुष्काः क्षीरेण 30 श्यामाकनीवार
शुष्काश्च वटकाः 38 श्यामाको मधुरः
शूककेषु वरः 6 श्यामा पीता
शूकधान्येषु 211 श्रमक्लमह्रं
शूकोद्भवं लघु 2 श्रमघ्नं बृंहणं
शूलबन्धोदरान् 116 श्रमतृष्णापहं
शूलाजीर्ण 124 श्रमदाह
शूलाजीर्णविबन्ध 95 श्रमभ्रममदा
शूलानाहार्शसां 108 श्रमवैवर्ण्यजित्
शूलामशमन 117 श्रमे कृशे
शूलांशशोष 71 श्रवणपूरण
शूलोदावर्त्त 125 श्रीगुरोः पाद
शूल्यं बल्यं 53 श्रीपर्णी
शृङ्गवेरं सलवणं 108 श्रीमत्तो कटकाम्ब्जा
शृङ्गवेररस एव 207 श्रीवारकः शुचिपत्र
शृङ्गाटकं समितया 53 श्रेष्ठमीषद्धरिद्राभं
शृङ्गाटकः शोणित 65 श्रेष्ठाः शुचिस्खली
शृङ्गाटाकृतिकान् 43 शृङ्गवेरं त्रिदोषघ्नं
शृङ्गारवीरसम्बद्धाः 225 " : पिष्टो
शतधौतं त्रिदोषघ्नं 131 ' पटे
शूर्ते तु माहिषे 121 श्लेष्मघ्नं पित्त
45
• श्लोका• | पुटम् | • श्लोका• | .. पुटम्
श्लेष्मजस्य | 228 | बहिष्पावरजः | • 5
'श्लेष्मघ्नी कृमिजित् | '111' | संक्षेप एषो• | 226
श्लेष्मलं सह | 85 | समावसद्दशा | 43
श्लेष्ममेद | 228 | संयुक्ता सूप | . 31
श्लेष्मकं गुरु | 149 | संशूलानाह | 96
श्लेष्मलः कटुकः | 67 | 'संसेव्यन्तु | 230
श्लेष्मकारवांश्च | 3 | संसेविता न | 229
श्लेष्मला स्वादु | 116 | संस्कारगुरु | 2
श्लेष्मको वात | 103 | ,, | 217
श्लेष्मातकफलं | 113 | संस्कृतं मथितं | 28
श्लेष्मात्मकः | 90 | संस्थाप्य शीतले | 49
श्वानविष्टी | 66 | संहितं धान्य | 123
श्वविद्गोधा | 208 | सकलमप्युदितानुदितं | 205
श्वासं निवारयति | 165 | सकलामयदर्शनं | 181
श्वासकासकफान् | 61 | सकल्कं श्वोदितं | 121
श्वासाङ्गमर्द | 164 | सकषायं स्वरारोग्य | 169
श्वासाङ्गमर्दहल्लास | 160 | सक्तवो लघवः | 24
| 115 | सक्तवो वातला | 201
श्वासापचार | 99 | सक्तवः शर्करा | 23
श्वानानशौ | 221 | सक्तवः शालि | 23
श्वावोर्ध्वकासा | 32 | सक्तूनामाश्रु | 217
श्वेतं दुकूलं | 229 | सक्तून् मांस | 212
,, | 229 | सक्षारं कटुकाम्लत्वात् | 149
श्वेतं सुकाचं | 173 | सक्षाराः सकषायाश्च | 156
श्वेतसूरणको | 61 | सक्षीरा बृंहणा | 24
श्वेताक्षिसी | 66 | स गर्गरो गर्गरनाद | 173
श्वेतवल्ली |
४०
श्लो० | पृष्ठ | श्लोक• | पृष्ठम्•
संग्राही दुर्जरो. | 89 | समिताया | • 44
संग्राही शीत • | 9• | समितायामूर्ध्वे | • 48
संग्राही शीतलः | 75 | समितायास्तृतीयांश | "
सङ्गतर्जति • | 142 | समिता वर्तिकाः | 30
स चाक्षारेण | | समिता बेसने | • 45
सच्छूर्णं निक्षिपेत् | • 51 | समिता शर्करा | 42
सेठी वतिकाञ्च | • 65 | समीराकिमि | 116
स तु प्रसवणश्चापि | 184 | समेन सर्पिषा | 121
सत्येन तेन | 218 | सम्यक् पाके | 48
सदा पथ्या | .141 | सरं कोशातकीजं | 154
सद्यो भुक्तवता | 228 | सरं प्लीहाश्र | 66
सद्योमांसं नवं | 21 | सरं वातहरं | 100
सद्यो रुचिकरं | 122 | सरस्स्वादुः | 143
सद्यः प्रियांलं | 209 | सरयूसलिलं | 182
सद्यः शुकविशुद्धिदं | 88 | सरस्वतीजलं | 181
सद्यः शुक्रकरं | 125 | सं रुच्यो मधुरो | 174
सन्तापं शमयन्ति | 184 | सगे विदाही | 15
सन्तोषमूर्च्छा | 79 | सर्पिः पलं | 140
सन्धानकारी | 7 | सर्पिः स्निग्धतर | 201
सपानसार्फाश्च | 213 | सर्पिर्माहिषं | 149
समानामपि | 101 | सर्पिरेव यव | 206
स भवति मतिपूर्णः | 190 | सर्पिषि प्रचुरे | 43
सभायां विदुषां | 219 | सर्वकुष्ठप्रशमनी | 12
स भोक्ता वासरे यः | 222 | सर्वग्रन्थिविनाशाय | 15
समभागां सितां | 48 | सर्वथा दोषजित् | 18
समया सितया | 50 | सर्वदा गुणकृत् | 1
समयोगेष्वपि | 202 | सर्वदोषहरं | 7
समवायिनि हेतौ | 25 | | 192
समस्थलकट्या | 193 | | 178
समान्निरपि | 132 | सर्वप्रयोगे | 100
समितां मर्दयेत् | 42 | सर्वरोगप्रशमनी | 142
समितां सर्पिषा | 34 | सर्वव्याधिहरं | 153
समितामोदका | 48 | " | 86
समिताभ्यां | " | सर्वानुपानानुवरं | 226
समिताया | 45 | सर्वामयघ्नं | 20