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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

भाव के लक्षण (अनुभाव) [ १२५

नृत्य में भाग लेता हुआ पाया जाता है; परन्तु उसके हृदय की धारणा यही
रहती है कि मैं परमब्रह्म से एक हो गया हूँ। यह अद्वैत धारणा शुद्धभक्ति
से बिल्कुल भिन्न है। जिसके भीतर विधि-साधन किए बिना ही अकस्मात्
भाव दिखाई देने लगता है, उसने पूर्वजन्म में भक्ति का साधन किया था,
ऐसा समझना चाहिए। किसी विघ्नवश, प्रायः भक्त-अपराध के कारण
वह कुछकाल के लिए प्रतिहत-शक्ति हो गया होगा। अब फिर अवसर
आने पर प्रकट हो गया है। निष्कर्ष यह है कि शुद्धभक्तों के संग से ही
भक्तिपथ पर उत्तरोत्तर अग्रसर हुआ जा सकता है।
लोकोत्तर चमत्कारकारी और सब शक्तियों को प्रदान करने वाले
भाव की प्राप्ति श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपा से ही होती है। जिस पुरुष में
भाव का उदय हो गया है और जो विषयों से पूर्णतः विरक्त हो गया है, उसमें
यदि भक्ति के आदर्श के विरुद्ध कोई विगुणता पाई जाय तो भी उससे द्वेष
न करे। भगवद्गीता में प्रमाण है कि जिसकी भगवान् में अनन्य श्रद्धा-
भक्ति है, वह यदि कभी अकस्मात् शुद्धभक्ति के लक्षणों से गिर भी जाय,
तो भी उसे शुद्ध ही समझना चाहिए। भक्ति, भगवान् और गुरु में अनन्य
श्रद्धालु पुरुष भक्ति की क्रियाओं में उच्च स्थान पाता है।
'नृसिंहपुराण' का वाक्य है "जो मन, वाणी और शरीर से
अनन्य भाव के साथ भगवान् की सेवा के परायण है, वह यदि बाह्य रूप से
मलिन क्रियाओं में प्रवृत्त दिखाई दे, तो भी उसकी बलवती भक्ति के प्रभाव
से ऐसी दूषित क्रियायें अति शीघ्र समाप्त हो जायेंगी।" पूर्ण चन्द्र पर कुछ
काले धब्बे दिखाई देते हैं, फिर भी पूर्ण चन्द्रमा की ज्योत्स्ना प्रतिहत नहीं
होती। इसी प्रकार, भक्ति के भण्डार के सामने छोटी सी भूल भूल नहीं
समझी जाती। कृष्णरति दिव्य आनन्दरूपा और आह्लादिनी है। अनन्त
दिव्य आह्लाद के बीच छोटे प्राकृत दोष का कुछ भी प्रभाव नहीं होता।

अध्याय १६
प्रेमभक्ति
जब अपने विशेष सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की प्रीति का भाव अतिशय तीव्र
हो जाता है तो उसे शुद्ध प्रेम कहते हैं। प्रारम्भ में भक्त गुरु-आज्ञा के अनुसार
विधिभक्ति में तत्पर रहता है। फिर इस साधन के द्वारा सम्पूर्ण प्राकृत विकारों
से पूर्ण शुद्ध हो जाने पर भक्ति में रुचि और आसक्ति का उदय होता है।
यही रुचि और आसक्ति शनैः-शनैः तीव्र होकर कालान्तर में 'प्रेम' का रूप
धरती है। 'प्रेम' शब्द का प्रयोग वास्तव में केवल भगवान् के सम्बन्ध में
ही हो सकता है प्राकृत-जगत् में तो प्रेम का प्रश्न ही नहीं बनता । वहाँ
जिसे भ्रमपूर्वक प्रेम समझा जाता है वह केवल काम है। प्रेम और काम में
स्वर्ण और लोहे का सा भेद है। 'नारदपंचरात्र' में स्पष्ट उल्लेख है कि
जब काम और ममता पूर्ण रूप से भगवान् में होते हैं, उस भक्ति को ही
भीष्म, प्रह्लाद, उद्धव और नारद आदि आचार्यों ने प्रेम कहा है।
भीष्म जैसे महाभागवतों ने अन्य सभी व्यक्तियों में ममता त्याग
देने को भगवत्प्रेम बताया है। उनके अनुसार, अन्य सब से सम्बन्ध-विच्छेद
करके केवल एक ही पुरुष (भगवान्) में अपने सम्पूर्ण ममत्व को स्थापित
कर देना प्रेम है। वह प्रेम भाव से उत्पन्न और भगवान् की अहैतुकी
कृपा से उत्पन्न, ऐसे दो प्रकार का होता है।
भावोत्थ
सद्गुरु के मार्गदर्शन में शास्त्रों में वर्णित विधिभक्ति करने मात्र से
भावोत्थ प्रेम हो जाता है। विधिभक्ति से उत्पन्न भाव से हुई प्रेमभक्ति
का उदाहरण श्रीमद्भागवत (११.२.४०) में इस प्रकार है, “विधिभक्ति
करते-करते भक्त अपनी स्वाभाविक कृष्णभावना को प्राप्त हो जाता है।
नामकीर्तन का अनुरागी और द्रवीभूत चित्त होकर वह कभी हँसता है,
कभी रोने लगता है, कभी चिल्लाता है, कभी गाता है और कभी लोक-
लज्जा के बिना उन्मत्त की भाँति नाच उठता है।”

प्रेमभक्ति [ १२७
पद्मपुराण में रागानुगाभक्ति से उत्पन्न भाव द्वारा हुए प्रेम का
दृष्टान्त है। चन्द्रकांति नामक सुमुखी ने श्रीकृष्ण को पतिरूप में पाने
के लिए कठोरता से ब्रह्मचर्यव्रत रखा। वह निरन्तर उन्हीं की दिव्य मूर्ति
के ध्यान और कीर्तन में तन्मय रहती। श्रीकृष्ण से भिन्न किसी अन्य को
पतिरूप में वरण न करने का उसका दृढ़ निश्चय था।
भगवान् की अशेष-विशेष कृपा से उत्पन्न प्रेम
जब कोई प्रेमभाव सहित निरन्तर भगवान् के संग में रहता है तो यह
समझना चाहिए कि अपनी अहैतुकी विलक्षण कृपा से प्रेरित होकर भगवान् ने
स्वयं उसे इस अवस्था का दान किया है। ऐसी विलक्षण कृपा का उदाहरण
श्रीमद्भागवत (११.१२.७) में है। भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं,
“वृन्दावन में गोपियों ने मेरी प्राप्ति के लिए न वेदों का स्वाध्याय किया,
न तीर्थाटन किया, न किसी विधि-विधान अथवा तप का आचरण किया।
केवल मेरे सत्संग से ही उन्हें भक्ति की परम संसिद्धि प्राप्त हो गयी।”
पद्मपुराण में चन्द्रकान्ति और श्रीमद्भागवत में गोपियों के उदाहरण
से प्रतीत होता है कि जो भक्त अपनी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना
नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करता है और प्रेमभाव से उनकी कीर्ति
का गान करता है, वह भगवान् श्रीकृष्ण की अति कृपा के फलस्वरूप
अनन्य भक्ति की परम संसिद्धि को प्राप्त हो जायगा। यह स्वयं श्रीमद्-
भागवत से प्रमाणित है, “जो भगवान् हरि को उपासता, भजता और प्रेम
करता है, वह तप, त्याग आदि स्वरूप-साक्षात्कार के सभी साधनों को कर
चुका है। दूसरी ओर, यदि सब प्रकार के तप, त्याग और योग करने पर
भी हृदय में हरि के लिए ऐसा प्रेम नहीं होता तो सारा साधन समय का
अपव्यय मात्र है। जो निरन्तर बाहर-भीतर श्रीकृष्ण को देखता है, उसने
स्वरूप-साक्षात्कार के सब तप-त्याग का उल्लंघन कर लिया है और यदि
सब प्रकार का तप-त्याग करने से बाद भी श्रीकृष्ण का भीतर-बाहर दर्शन
न हो तो सब साधन निष्फल है।”
श्रीकृष्ण की अति कृपा से उदित प्रेम दो प्रकार का होता है—
१. भगवान् के माहात्म्य ज्ञान से युक्त तथा २. किसी बाह्य हेतु के बिना
श्रीकृष्ण में स्वतः अनुरक्त हो जाना। ‘नारदपंचरात्र’ में कहा है कि यदि
भगवान् के माहात्म्य-ज्ञान के कारण भगवान् में अतिशय स्नेह और अचल
प्रेम हो जाय तो चार प्रकार की वैष्णव मुक्तियों (सालोक्य, सामीप्य,
सारूप्य और सार्ष्टि) की प्राप्ति निश्चित है। वैष्णव मुक्ति उस मायावादी

१२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
मुक्ति से सर्वथा भिन्न है, जिसमें जीव भगवान् की ब्रह्मज्योति में लीन हो
जाता है।
'नारदपंचरात्र' में शुद्ध अनन्य भक्ति को स्वार्थवासना से शून्य कहा
गया है। भक्त का भगवान् के विषय में अन्य अभिप्राय से रहित निरन्तर
प्रेममयी मनोवृत्ति बनाए रखना ही भगवान् को वश में करने वाली भक्ति
है। अर्थात्, जो निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के रूप का चिन्तन करता है,
वह शुद्ध वैष्णव है।
महिमाज्ञानयुक्त प्रभुप्रसाद प्रायः विधिमार्ग का अनुसरण करने
वालो को होता है और रागानुगाभक्ति के अनुगामियों को प्रायः माहात्म्य
ज्ञान रहित हेतुरहित भगवत्प्रसाद प्राप्त होता है। विधिभक्ति के द्वारा
भगवत्कृपा को प्राप्त हुआ भक्त भगवान् की असमोर्ध्व महिमा, दिव्य रूप-
माधुरी और रागानुगाभक्ति की ओर भी आकृष्ट हो सकता है। अर्थात्,
विधिभक्ति के आचरण से वह भगवान् की दिव्य रूपमाधुरी का पूर्ण रूप से
आस्वादन करने के योग्य हो जाता है। उपरोक्त दोनों ही प्रकार की
उत्कृष्ट अवस्थायों की प्राप्ति केवल भक्त पर भगवान् की अति कृपा से
सम्भव है।
शुद्धभक्तों का सत्संग
यद्यपि यहाँ तक प्रेम-प्राप्ति की नाना पद्धतियों का उल्लेख हो चुका
है, श्रीरूप गोस्वामी अब इस दिव्य अवस्था को पाने की सामान्य प्रक्रिया
का वर्णन करते हैं। प्रेमभक्ति का प्रारम्भ मूल रूप से श्रद्धा है। शुद्धभक्तों
के बहुत से संघ और सत्संग हैं। यदि कोई लेशमात्र श्रद्धा के साथ इन संघों
का संग करने लगे तो शुद्धभक्ति के मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होगा।
शुद्धभक्त का प्रभाव इतना अतिशय होता है कि यदि कोई अल्प
श्रद्धा से भी उसका संग करने आए तो भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, आदि
प्रामाणिक शास्त्रों से भगवत्कथा सुनने को मिलेगी। इस प्रकार अन्तर्यामी
भगवान् की कृपा से उपरोक्त शास्त्रों में उसकी श्रद्धा दृढ़ होती जायगी।
शुद्धभक्तों के सत्संग की यह पहली अवस्था है। फिर अधिक उन्नत और
परिपक्व हो जाने पर शुद्धभक्त के आश्रय में विधि भक्ति का आचरण
करने के लिए वह स्वतः आत्मसमर्पण करके उन्हें गुरु बना लेता है। इसके
बाद, तीसरी अवस्था में गुरुदेव के मार्गदर्शन में वह विधिभक्ति का आचरण
करता है और परिणामस्वरूप सम्पूर्ण अनर्थों से मुक्त हो जाता है। अनर्थ-
निवृत्ति होने पर उसमें निष्ठा उत्पन्न होती है और फिर क्रमशः भक्ति में

प्रेमभक्ति [ १२६
रुचि, आसक्ति, भाव का तथा अन्त में प्रेम का उदय होता है। शुद्ध
भगवत्प्रेम के उद्बोधन की ये भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं।
जिस परम सौभाग्यशाली के चित्त में यह अपूर्व प्रेमरूप दिनमणि
उदित होता है, उसकी मुद्रा को भलीभाँति समझने में विद्वान् भी असफल
रहते हैं। इसीलिए भगवान् शिव ने 'नारदपंचरात्र' में पार्वती से कहा है—
“हे महेश्वरी ! भगवान् हरि के प्रेम में मत्त होकर परमानन्द में निमग्न
हुए पुरुष को शरीर और मन के सुख-दुःख को कुछ भी अनुभव नहीं
होता।"
स्नेह आदि प्रेम के व्यवहार प्रेमरूप मूल वृक्ष के ही शाखारूप
विलास हैं। इनका प्रकाश भी नाना भाँति से होता है; अतः इन भेदों का
विशद विवेचन यहाँ नहीं किया गया। इनका वर्णन श्रील सनातन
गोस्वामी ने भागवतामृत में किया है। यद्यपि स्नेह आदि प्रेम के विलासों
का विषय अतिशय गूढ़ है, तथापि सनातन गोस्वामी ने इन्हें भली प्रकार से
स्पष्ट कर दिया है।
इस प्रकार भक्तिरसामृतसिन्धु के पूर्व विभाग का समापन करते
हुए श्रील रूप गोस्वामी अपनी रचना को भक्तिसिद्धान्त की माधुरी के
प्रतिष्ठाता सनातन गोस्वामी, तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी श्रीरघुनाथ भट्ट
गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के दिव्य आस्वाद में समर्पित करते
हैं। इस वाक्य से प्रतीत होता है कि महान् आचार्य श्रील जीव गोस्वामी
भक्तिरसामृत सिन्धु के रचनाकाल तक प्रसिद्ध नहीं हुए थे।
इति भक्तिरसामृतसिन्धौ रसोपयोगिस्थायिभावोपपादनो
नाम पूर्वो विभागः ॥१॥
इति भक्तिवेदान्तभाष्ये पूर्वो विभागः ॥१॥

अथ दक्षिणो विभागः
सामान्य भगवद्भक्तिरस

अध्याय २०
रस
भक्तिरसामृतसिन्धु के इस द्वितीय विभाग के प्रारम्भ में ग्रन्थकार
'श्रीसनातन' की सादर वन्दना करते हैं। इससे उन्होंने अपने आराध्यदेव
श्रीकृष्ण तथा अपने अग्रज और गुरु सनातन गोस्वामी, दोनों का स्मरण
किया है। उन्होंने श्रीकृष्ण को 'सनातन' कहकर उनकी वन्दना की है,
क्योंकि वे स्वरूपतः परम सौन्दर्य मूर्ति हैं और अघासुर का नाश करने वाले
हैं। इस पद से वे सनातन गोस्वामी का भी स्मरण करते हैं, जो रूप
गोस्वामी के अतिशय प्रीतिपात्र हैं और उन (श्रील रूप) के द्वारा सदा सेवित
हैं एवं जो सब प्रकार के पापकर्मों का अन्त करते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु
के इस दक्षिण विभाग में रचयिता महोदय भगवद्भक्तिरस के सामान्य
लक्षणों का निरूपण करना चाहते हैं।
भक्तिरसामृतसिन्धु के इस विभाग में पाँच लहरियाँ हैं : १. विभाव-
लहरी, २. अनुभाव लहरी, ३. सात्त्विकभाव लहरी, ४. व्यभिचारिभाव
लहरी तथा ५. स्थायिभाव लहरी।
भगवान् से प्रेम के आदान-प्रदान में जो दिव्य आस्वादन होता है,
उसे रस कहते हैं। विविध प्रकार के रसों का मिलन होने पर दिव्य आनन्द
की परम अवधि तक भक्तिरस का आस्वादन होता है। यद्यपि ऐसी स्थिति
हमारे अनुभव से सर्वथा परे है, तथापि श्रील रूप गोस्वामी की अनुगति
करते हुए इस प्रकरण में उसका यथाशक्ति वर्णन किया जायगा।
अपनी क्रियाओं में किसी प्रकार के रस का अनुभव किए बिना
कोई भी उन्हें नहीं कर सकता। इसी प्रकार कृष्णभावना और भक्तियोग
के दिव्य जीवन में भी कोई रस-विशेष अवश्य है। सामान्यतः इस रस का
अनुभव मन्दिर में श्रवण, कीर्तन और अर्चन करने तथा भगवत्सेवा के
उन्मुख रहने से होता है। अतः जब कोई परमानन्द में निमग्न हो जाता
जाता है तो समझना चाहिए कि वह रस का आस्वादन कर रहा है।

१३२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अधिक स्पष्टतः, भक्तियोग के आचरण से उत्पन्न होने वाली आनन्द की
विविध अनुभूतियों को 'भक्तिरस' की संज्ञा दी जा सकती है।
भक्तियोग के रस का यह आस्वादन सब कोटि के मनुष्यों को नहीं हो
सकता, क्योंकि इस मधुर प्रेममय वृत्ति की उद्भावना पूर्वजन्म के संस्कार से
अथवा शुद्धभक्तों के सत्संग से ही होती है। पूर्ववर्णन के अनुसार, शुद्ध-
भक्तों के सत्संग से ही भक्तियोग में श्रद्धा का श्रीगणेश होता है। किसी
शुद्धभक्त के आश्रय में इस श्रद्धा को बढ़ाने पर या पूर्वजन्म के भक्ति-संस्कारों
के कारण ही वास्तव में भक्तिरस का आस्वादन होता है। दूसरे शब्दों में,
इस परमानन्द की उपलब्धि साधारण जनों को नहीं हो सकती; वे दुर्लभ
भाग्यवाले ही इसका आस्वादन कर पाते हैं जो भक्तों के संगी हों अथवा
पूर्वजन्म से भक्तियोग का अभ्यास करते आ रहे हों।
भक्तियोग की शनैः-शनैः प्राप्ति के पथ का वर्णन श्रीमद्भागवत,
प्रथम स्कन्ध में है, “इस पथ का आरम्भ उन भक्तों के संग में कृष्णकथा
सुनने से होता है, जो स्वयं सत्संग के द्वारा हृदय की निर्मलता को प्राप्त हो
गए हों। दिव्य भगवच्चरित की कथा का श्रोता निरन्तर परमानन्द में
निमग्न रहता है।” भगवद्गीता में भी उल्लेख है कि वास्तव में ब्रह्मभूत हुए
पुरुष का पहला लक्षण यह है कि वह सदा प्रसन्न रहता है। इस आनन्दमय
जीवन की उपलब्धि भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का श्रवण करने से
होती है अथवा उन पुरुषों का सत्संग करने से होती है, जो कृष्णभावना
के दिव्य जीवन में बड़ी रुचि रखते हैं, विशेष रूप से वे जो श्रीकृष्ण
(गोविन्द) के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा के परायण रहकर उनकी कृपा
प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्प हैं। इस भाव से उत्साहित होकर जो सदा
भगवान् की प्रसन्नता का विधान करनेवाली विधिभक्ति के परायण रहता
है, उसमें 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' नामक दो प्रकार के विभाव का उदय
होता है। इस प्रकार वह परमानन्द में निमज्जित हो जाता है।
इस प्रेम-विभाव के सात हेतु हैं, जैसे स्वयं श्रीकृष्ण, कृष्णभक्त, कृष्ण
का मुरलीनाद इत्यादि। इनका कार्य कभी स्मित होता है तो कभी
स्तब्धता।
भाव में शरीर पर आठ सात्त्विक लक्षण प्रकट होते हैं। वे सब
पूर्वोक्त पाँच प्रकार के भाव-भेदों के मिश्रण से ही सम्भव होते हैं। इन
पाँच प्रकार के भावों के किसी-न-किसी मिश्रण के बिना रसास्वादन नहीं
हो सकता। रस के आस्वादन के जो कारण हैं, वे विभाव कहलाते
विभाव के दो भेद हैं—आलम्बन और उद्दीपन। 'अग्निपुराण' में विभाव

रस [ १३३
का वर्णन इस प्रकार है—"रति आदि की जिससे उत्पत्ति होती है, वह
विभाव-आलम्बन और उद्दीपन—ऐसे दो प्रकार का होता है। अर्थात्, विभाव
के दो भेद हैं। कृष्ण और उनके भक्त भक्तिरस के आलम्बन विभाव हैं।
श्रीकृष्ण भक्ति के विषय-आलम्बन हैं और उनका शुद्धभक्त आश्रय-
आलम्बन है। किसी वस्तु को देखकर होने वाले कृष्णस्मरण से उत्पन्न
विभाव उद्दीपन कहा जाता है।"
भगवान् श्रीकृष्ण, जो अचिन्त्य शक्तियों और ज्ञान, आनन्द, आदि
सम्पूर्ण महागुणों के नित्य निधान हैं, वे ही भक्तिरस के आलम्बन कारण
हैं। अपने अन्य रूपों और सब अवतारों से वे भक्तिरस के उद्दीपन भी बन
जाते हैं। श्रीमद्भागवत में ब्रह्मविमोहनलीला के संदर्भ में एक वाक्य है
जिससे भक्तिरस के इस उद्दीपनरूप का स्पष्टीकरण होता है। जब ब्रह्मा
को मोहित करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं सब गोपबालकों, गायों
और गोवत्सों का रूप धारण कर लिया तो श्रीकृष्ण के अग्रज श्रीबलदेव (जो
श्रीकृष्ण के स्वयंप्रकाश हैं) विस्मित होकर कहने लगे—"अहो ! यह
कैसा आश्चर्य है कि इन सब गोपबालकों, गोवत्सों और गायों के प्रति मेरा
कृष्णप्रेम उमड़ रहा है।" इसका निश्चय न कर सकने के कारण बलदेव
विस्मय से स्तब्ध हो गए। यह एक उदाहरण है, जब श्रीकृष्ण उद्दीपन पक्ष
से भक्तिरस के आश्रय-आलम्बन और विषय-आलम्बन दोनों बन जाते हैं।

अध्याय २१
श्रीकृष्ण के दिव्य गुण
श्रीकृष्ण स्वरूप आवृत और प्रकट, दो प्रकार का है। जब श्रीकृष्ण अन्य
वेष आदि में छिपे हैं तो उनका स्वरूप आवृत कहलाता है। श्रीमद्भागवत
की द्वारकालीला में उनके आवृत स्वरूप का दृष्टान्त है। कभी-कभी श्रीकृष्ण
स्त्री वेष को धारण करके क्रीड़ा करते थे। उनके इस रूप को देखकर उद्धव
ने कहा, "अहो ! कैसा आश्चर्य है कि यह स्त्री ठीक श्रीकृष्ण के समान ही
मेरे भक्तिरस को आकर्षित कर रही है। अच्छा समझ गया, कौतुक के
लिए श्रीकृष्ण ने ही स्त्रीरूप धारण कर रखा है।"
श्रीकृष्ण के प्रकट स्वरूप को देखकर एक भक्त उनकी रूपमाधुरी
की स्तुति करता है, "भगवान् श्रीकृष्ण का स्वरूप कितना अतिशय मधुर
है। उनकी शंख-सी ग्रीवा, कमल का मानमर्दन करने वाली नेत्र-लालिमा,
श्यामतमाल शरीर, छत्रयुक्त शिर—यह सब बस देखते ही बनता है। उनके
वक्षःस्थल पर श्रीवत्स हैं और हाथों में शंख-चक्र धारण किए हुए हैं। इस
प्रकार सुन्दर रूप में प्रकट श्रीमाधव अपने दिव्य गुणों के दर्शनों से मुझे
दिव्य आनन्द प्रदान कर रहे हैं।"
श्रील रूप गोस्वामी ने नाना शास्त्रों के आधार पर श्रीकृष्ण के
निम्नांकित दिव्य गुणों का उल्लेख किया है—१. सुन्दर अंग वाले, २. सम्पूर्ण
शुभ लक्षणों से युक्त, ३. अतिशय रुचिर, ४. तेजोमय, ५. बलवान् ६. नित्य
कैशौर्यमय, ७. विविध और अद्भुत भाषाओं के ज्ञाता, ८. सत्यवादी,
६. प्रियभाषी, १०. वावदूक (सब भाषाओं को बोलने में दक्ष), ११. परम
पण्डित, १२. बुद्धिमान्, १३. अपूर्व प्रतिभाशाली, १४. विदग्ध (कलाओं में
पारंगत) १५. चतुर, १६. परम दक्ष, १७. कृतज्ञ, १८. अत्यन्त दृढ़ व्रतधारी,
१६. देश, काल और पात्र को अच्छी प्रकार से जानने वाले, २०. शास्त्रों
को देखने-कहने वाले, २१. पवित्र, २२. आत्मसंयमी, २३. स्थिर रहने वाले,
२४. सहनशील (जितेन्द्रिय), २५. क्षमाशील, २६. गम्भीर, २७. धैर्यवान्,
२८. समदृष्टि वाले, २६. उदार, ३०. धार्मिक, ३१. शूरवीर, ३२. करुण,

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३५
३३. सम्मान करने वाले, ३४. विनीत, ३५. उदार, ३६. लज्जावान्,
३७. शरणागत जीवों के रक्षक, ३८. सुखी, ३६. भक्तों के हितैषी, ४०. प्रेम
के वशीभूत, ४१. सर्वमंगलमय, ४२. परम प्रतापी, ४३. परम यशस्वी,
४४. लोकप्रिय, ४५. भक्तवत्सल; ४६. सब स्त्रियों के चितचोर, ४७. सब
के आराध्य, ४८. सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त, ४६. वरेण्य (सम्मान्य) तथा
५०. परम ईश्वर । भगवान् श्रीकृष्ण में ये सभी पचास गुण समुद्र की
गाहता के समान पूर्ण रूप में विराजते हैं । भाव यह है कि उनके गुणों की
अवधि-परिधि अचिन्त्य है ।
जीव भगवान् के भिन्न-अंश हैं, अतः यदि वे भगवान् के शुद्धभक्त
बन जायें तो उनमें भी ये गुण बिन्दुरूप में आ सकते हैं । भाव यह है कि
भक्तों में ये गुण अत्यन्त अल्प मात्रा में रह सकते हैं, जबकि पुरुषोत्तम
श्रीकृष्ण में ये सब परिपूर्ण रूप से विराजते हैं ।
इनके अतिरिक्त, कतिपय अन्य दिव्य गुण भी हैं जिनका वर्णन
पद्मपुराण में शिवजी ने पार्वती से किया है। इनका विवरण पृथ्वी और
धर्म के संवाद-प्रसंग में श्रीमद्भागवत भी है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है,
“महापुरुष बनने के अभिलाषियों को सदा निम्नलिखित गुणों से विभूषित
रहना चाहिए—सत्य, शौच, दया, सहनशीलता, त्याग, सन्तोष, सरलता
इन्द्रियसंयम, मन का निग्रह, तप, समता, तितिक्षा, शान्ति, वैराग्य, विद्या,
ज्ञान, ऐश्वर्य, शूरता, तेज, बल, स्मृति, मृदुता, करुणा, दक्षता, शील,
दृढ़ता, स्वतन्त्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य, कोमलता, बोलने की क्षमता,
ऐश्वर्य, सम्पूर्ण ज्ञान में पूर्णता, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिक्य, यश, कीर्ति
दूसरों का सम्मान, अहंकारहीनता । जिन्हें महत्त्व की अभिलाषा है, वे इन
में से किसी भी गुणों के बिना नहीं हो सकते; अतएव यह निश्चित है कि
ये गुण परम-आत्मा श्रीकृष्ण में अवश्य रहते हैं ।
उपरोक्त पचास गुणों के अतिरिक्त, भगवान् श्रीकृष्ण में पाँच
अतिरिक्त गुण हैं, जो एक अंश में ब्रह्मा और शिव में भी प्रकाशित होते
हैं ५१. सदा एकस्वरूप; ५२. सर्वज्ञ; ५३. नित्यनूतन; ५४. सच्चिदानन्द सांद्र अंग
तथा ५५. समस्त सिद्धियों द्वारा सेवित ।
श्रीकृष्ण के पाँच गुण और भी हैं, जो नारायण विग्रह में प्रकाशित
रहते हैं—५६. अचिन्त्य महाशक्ति से युक्त; ५७. जिनके विग्रह से कोटि-
कोटि ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं : ५८. सब अवतारों के स्रोत; ५६. अपने द्वारा
मारे गए शत्रुओं को मुक्ति के दाता; ६०. आत्मारामों को अपनी ओर
आकर्षित करने वाले ।

१३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त श्रीकृष्ण में चार ऐसे गुण भी हैं
जो देवों-जीवों में तो क्या, स्वयं नारायण में भी नहीं हैं। ये हैं— ६१. सब
प्रकार की अद्भुत और चमत्कारमयी लीलाओं (विशेषतः बाललीला) के
सागर; ६२. अतुल मधुर प्रेममण्डित प्रिय भक्तों से विभूषित; ६३. अपनी
मुरली के कलकूजन से त्रिभुवनगत प्राणियों के चित्त को हरने वाले;
६४. जिससे अधिक अथवा जिसके तुल्य कोई रूप नहीं है, ऐसी रूपश्री से
सम्पूर्ण चराचर जगत् को विस्मित करनेवाले—ये चार गुण (लीलामाधुरी,
प्रेममाधुरी, वंशीमाधुरी तथा रूपमाधुरी) विशेषतः गोविन्द में विलक्षण
रूप से पाये जाते हैं।
पूर्वोक्त गुणों के साथ इन चार असाधारण गुणों की गणना करने
पर श्रीकृष्ण के कुल गुण चौंसठ बनते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने श्री-
परमेश्वर के स्वरूप में इन सब गुणों को सिद्ध करने हेतु नाना शास्त्रप्रमाण
प्रस्तुत किए हैं।
१. सुरम्यांग
भगवान् के विग्रह के विविध अंगों की प्राकृत वस्तुओं में कोई उपमा
नहीं है। भगवत्-रूप के उत्कर्ष को समझने में असमर्थ साधारण लोगों
के बोध के लिए ही उन्हें लौकिक उपमा दी जाती है। कहा जाता है कि
श्रीकृष्ण का मुखमण्डल चन्द्रमा के समान है; जंघायें गज जैसी बलवती हैं;
भुजायें स्तम्भ जैसी हैं; दोनों कर कमलदल के समान विकसित हैं; वक्षः
स्थल कपाट जैसा है; नितम्ब एक दूसरे से सटे हुए हैं तथा शरीर का मध्य-
भाग पतला है।
२. सब शुभ लक्षणों से युक्त
शरीर के नाना अंगों में पाए जाने वाले सभी मंगल-लक्षण चिह्न
भगवान् के विग्रह में हैं। इस सन्दर्भ में, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में प्रकट
शुभ लक्षणों के सम्बन्ध में नन्द महाराजा के एक मित्र ने कहा है, "हे सखे,
गोपेन्द्र ! तुम्हारा बालक ३२ शुभ लक्षणों से युक्त है। ऐसा बालक गोपों
में कहाँ हो सकता है ?" भगवान् श्रीकृष्ण जब भी राम आदि के रूप में
अवतीर्ण होते हैं, प्रायः क्षत्रियकुल का वरण करते हैं और कभी-कभी
ब्राह्मणकुल में भी प्रकट होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण ने नन्दमहाराज के पुत्ररूप
में लीला की, जो वैश्य थे। वैश्य जाति का कार्य कृषि, गोरक्षा और
वाणिज्य है। अतः उनके ब्राह्मणकुल के मित्रों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३७
ऐसा महापुरुष बालक वैश्य-परिवार में कैसे हो सकता है । उन्होंने नन्दजी
से बालक के शरीर पर विद्यमान सभी शुभ लक्षणों का उल्लेख किया ।
वे बोले, "इस बालक के नेत्रप्रान्त, पाद, करतल, तालू, अधरोष्ठ,
जिह्वा और नख-इन सात अंगों में मंगलसूचक रक्तता है । इसके वक्षःस्थल,
कटि और ललाट, इन तीनों अंगों में विस्तार पाया जाता है । ग्रीवा, जंघा
और लिंग में लघुता है, वाणी, बुद्धि और नाभि में गम्भीरता है, नासिका,
स्कन्ध, कर्ण, ललाट, नख और कटि में तुंगता है; नासिका, भुजा, नेत्र,
हनु, जंघाओं में लम्बाई है तथा त्वचा, केश, अंगुलि, दन्त और अंगुलिपर्व
में सूक्ष्मता पाई जाती है । इन सम्पूर्ण लक्षणों का प्रकाश केवल महापुरुषों
में होता है ।"
हाथ आदि में रेखाओं से बने हुए चक्रादि चिह्न भी मंगल लक्षण
हैं । एक वृद्धा गोपी नन्दजी से कहती है - "हे गोपेश ! अपने पुत्र के करों
में स्पष्ट रेखाओं से बने हुए कमलों और चक्रों को तथा पदपल्लवों में ध्वज,
वज्र, मीन, कुश, और कमल के मंगलमय चिह्नों को देखिए ।"
३. रुचिर
नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले सौन्दर्य को रुचिर कहते हैं ।
श्रीकृष्ण का स्वरूप अतिशय रुचिर है । श्रीमद्भागवत (३.२.१३) में उल्लेख
है, "भगवान् श्रीकृष्ण अपने नेत्रानन्ददायी रूप में महाराज युधिष्ठिर के
राजसूय यज्ञ में पधारे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माण्ड के सारे महापुरुषों ने उन्हें
देखकर समझा कि श्रीकृष्ण के इस विग्रह की रचना में विधाता की सारी
शिल्प कुशलता समाप्त हो गई है ।"
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का विग्रह—मुख, दो नेत्र, दो हाथ, नाभि
तथा दो पैर—इन आठ कमलों से युक्त है । इन में से किसी एक अंग-कमल
पर गोपीजन अथवा व्रजवासियों की भ्रमरपंक्ति एक बार पड़ने पर फिर
द्युतिमधु से पंकिल उस नीलकमल (कृष्णा) से उठ नहीं पाती थी ।
४. तेजोमय
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत् में व्याप्त तेज भगवान् श्रीकृष्ण की ही किरण
राशि है । श्रीकृष्ण का परमधाम ब्रह्मज्योति विकीर्ण करता रहता है, जो
उनके विग्रह से निःसृत है ।
श्रीहरि के वक्षःस्थल पर स्थित सूर्य की कान्ति का तिरस्कार करने
वाली कौस्तुभ मणि की प्रभा भी भगवान् के श्रीविग्रह की दीप्ति के सामने
आकाश में तारे के समान ही मन्द-मन्द स्फुरित होती है । अतः श्रीकृष्ण का

१३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
दिव्य प्रभाव इतना अतिशय है कि सब को जीत लेता है। जब श्रीकृष्ण
अपने शत्रु कंस के यज्ञ में गए तो वहाँ के मल्ल कोमल अंग वाले उन कृष्ण
को देखते हुए भी उनके साथ युद्ध करने के विचार से भयभीत और संत्रस्त
हो उठे।
५. बलवान्
असाधारण पौरुष वाला बलीयान् कहलाता है। श्रीकृष्ण द्वारा
अरिष्टासुर का वध करने पर कुछ गोपियाँ कहने लगीं, "हे सखि ! देखो
कृष्ण ने पर्वत से भी भयंकर अरिष्टासुर को रुई के पिण्ड के समान
उड़ा कर मार डाला।" एक अन्य पद्य है, "हे कृष्णभक्तो ! कमलनयन
श्रीकृष्ण का वह वाम भुजदण्ड तुम्हारी सब भयों से रक्षा करे, जिसने
गोवर्धन पर्वत को खेल-खेल में गेंद की भाँति उठा लिया था।"
६. नित्य किशोर
श्रीकृष्ण शैशव, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, आदि सभी आयु-वर्गों में
सुन्दर और मधुर हैं। परन्तु इन सब में भी कैशोर ही अखिल रसराज है
और इसमें भक्ति के नित्य नाना विलास होते हैं। किशोरावस्था में
श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चिन्मय गुणों से परिपूर्ण लीलारस-निरत रहते हैं। अतः
भक्तों ने उनके पूर्व-कैशोर को प्रेम में सर्वाकर्षक माना है।
श्रीकृष्ण की इस वय का वर्णन इस प्रकार है, "श्रीकृष्ण के तारुण्य
का बल उनकी मधुर मुसकराहट से मिलकर पूर्ण चन्द्र के मद को भी
विमर्दित करने वाला हो गया। वे कामदेव को भी विनिन्दित करनेवाले
सौन्दर्य-लावण्य के श्रृंगार से विभूषित रहते और निरन्तर गोपियों के मन
को उन्मत्त करते हुए प्रेमामृत का पान करा रहे थे।"
७. विविध-अद्भुत भाषाविद्
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष नाना देशों की भाषाओं,
विशेषतः देवभाषा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं को तथा पशुओं तक
की बोली जानता हो, वह अद्भुत भाषाविद् कहा जाता है। इस वाक्य
से इंगित होता है कि श्रीकृष्ण पशुओं की भाषाओं को भी बोल-समझ
सकते हैं। श्रीकृष्ण के लीलाविहार को देखकर वृन्दावन की एक वृद्धा
गोपी आश्चर्य व्यक्त करती हुई बोली, "अहो ! व्रजगोपियों के हृदयवल्लभ
श्रीकृष्ण गोपियों से भलीभाँति व्रजभाषा में बोलते हैं, देवताओं से संस्कृत
में वार्तालाप करते हैं, यहाँ तक कि पशुओं की भाषा में गाय-भैंस से भी

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३६
बोल सकते हैं। इसी प्रकार काश्मीरी में, शुक आदि विहंगों की भाषा में
और प्राकृत में भी कृष्ण बड़े ही वाचाल हैं।" उसने गोपियों से विस्मय
व्यक्त किया कि इतनी भाषाओं को बोलने में श्रीकृष्ण इतने दक्ष कैसे
हो गए।
८. सत्यवाक्
जिस पुरुष का वचन कभी झूठा सिद्ध न हो, वह सत्यवाक् कहा जाता
है। कृष्ण ने एक बार पाण्डवों की माता को वचन दिया था कि वे उसके
पाँचों पुत्रों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि से जीवित लौटा लायेंगे। युद्ध के अन्त
में पाँचों पाण्डवों के घर वापस आ जाने पर कुन्ती ने अपने वचन को
सत्य करने के लिए श्रीकृष्ण की स्तुति की। वह बोली, "सूर्य भले ही
शीतल हो जाय और चन्द्रमा भले ही उष्ण हो जाय पर फिर भी हे मुरारि !
आपका वचन असत्य नहीं हो सकता।" इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण भीम-
अर्जुन के साथ जरासन्ध से युद्ध करने गये तो उन्होंने उसे स्पष्ट कह दिया
कि दो पाण्डवों सहित छद्मवेष में वहाँ उपस्थित हुए वे स्वयं सनातन
पुरुषोत्तम कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण तथा भीम-अर्जुन क्षत्रिय थे। जरासन्ध भी
क्षत्रिय था और इसलिए ब्राह्मणों को उदारता से दान देता था। अतः
जरासन्ध के वध की योजना बनाकर श्रीकृष्ण भीम-अर्जुन के साथ ब्राह्मण
वेष में उसके पास गए। उदारदानी जरासन्ध ने उनसे अपना अभीष्ट
माँगने को कहा तो उन्होंने उससे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। उसी
समय श्रीकृष्ण ने घोषित किया कि ब्राह्मण-वेष में वे उसके सदा के शत्रु ही
आए हैं।
६. प्रियभाषी
जो अपने शत्रु को भी प्रिय वचनों से शान्त कर सकता है, वह
पुरुष प्रियभाषी है। श्रीकृष्ण तो प्रियभाषण की अवधि ही हैं। यमुना
जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके उन्होंने कहा- "हे नागराज !
यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें।
देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी
उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर
रहा हूँ।"
कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया
था। उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः बालकृष्ण

१४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
ने जल में प्रवेश किया और कालिय का शासन करके उसे वहाँ से अन्यत्र
चले जाने का आदेश दिया ।
इस अवसर पर श्रीकृष्ण ने गोधन को देवों के लिए भी आराध्य
कहा और साथ में गोरक्षा का आदर्श भी स्थापित किया । कम से कम
कृष्णभावनाभावित पुरुषों को तो उनकी अनुगति में गोधन की सब प्रकार
से रक्षा करनी चाहिए । गायें देवों की ही आराध्य नहीं हैं, स्वयं श्रीकृष्ण
ने गोपाष्टमी, गोवर्धनपूजा आदि अवसरों पर गोपूजन किया है ।
१०. वावदूक
कानों को प्रिय लगने वाले और विनय आदि वाणी के सम्पूर्ण गुणों
से युक्त वचन कहने वाला वावदूक अर्थात् बोलने में निपुण कहलाता है ।
श्रीकृष्ण की श्रुतिप्रिय विनीत वाणी का उदाहरण श्रीमद्भागवत में है ।
जब श्रीकृष्ण ने नन्द बाबा से वर्षा के देवता इन्द्र का यज्ञ न करने का
विनम्र निवेदन किया तो एक गोपगृहिणी मुग्ध हो उठी । बाद में कहने
लगी, "हे सखी ! जो सरस और कोमल पदावली से युक्त होने के कारण
मनोहर है और जिसके एक-एक अक्षर से अक्षय अमृतधारा झरती है, सब
लोगों के कानों के लिए रसायन जैसी श्रीकृष्ण की वाणी ने किस का मन
नही हर लिया ?"
श्रीकृष्ण की वाणी ब्रह्माण्डभर के सारे वाग्गुणों से विभूषित है; इस
के प्रमाण में उद्धव का यह वाक्य है—"शत्रुओं के हृदय को भी तत्काल बदल
देने वाली, संसार के सारे संशय-दुःखों का अन्त करने वाली तथा मात्रा में
अल्प होने पर विविध अर्थ वाली श्रीकृष्ण की वाणी मेरे हृदय को अतिशय
प्रिय है ।"
११. सुपण्डित
विद्वान् और नीतिज्ञ पुरुष को सुपण्डित कहा जाता है । अखिल
विद्याओं का ज्ञाता विद्वान् कहलाता है और यथोचित कार्य करने वाला
नीतिज्ञ है । इन दोनों गुणों के समुच्चय का नाम सुपाण्डित्य है ।
श्रीकृष्ण के सान्दीपनि मुनि से शिक्षा ग्रहण करने का वर्णन नारद
जी ने इस प्रकार किया है, "ब्रह्मादिक उन मेघों के समान हैं, जो कृष्णरूप
महासागर के जल से बने हैं । सागर से जैसे मेघ को जल मिलता
है, वैसे सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण से वैदिक ज्ञान पाया । ब्रह्मा द्वारा
जगत् में प्रवर्तित वही वैदिक ज्ञान फिर सान्दीपनि मुनि रूप शैल में रहा ।
सान्दीपनि का श्रीकृष्ण को उपदेश करना पर्वत से उस नदीरूप में जल

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४१
प्रवाहित होने जैसा है, जो वापस जाकर सागररूपी श्रीकृष्ण को प्राप्त हो
जाय।" भाव यह है कि वास्तव में श्रीकृष्ण को कोई उपदेश नहीं कर
सकता, जैसे सागर को प्राप्त होने वाली सारी जलराशि का मूल स्रोत सागर
स्वयं है। देखने में प्रतीत होता है कि नदियाँ सागर को जल से भर रही हैं।
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा में वैदिक ज्ञान का संचार किया और ब्रह्मा से आगे शिष्य-
परम्परा के द्वारा इस ज्ञान का प्रसारण हुआ। इसलिए सान्दीपनि मुनि के
विद्या-उपदेश को उस नदी की उपमा दी गई है जो वापस जाकर कृष्णरूपी
मूल सागर में मिल जाती है।
सिद्धचारण श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए कहते हैं, "हे गोविन्द !
विद्या के चौदह गुणों से अलंकृत, जिसकी बुद्धि चारों वेदों में व्यापिनी है,
जो मनु आदि की स्मृतियों से सदा युक्त हैं, जो शिक्षा, कल्प, व्याकरण,
निरुक्त, छन्द और ज्योतिष - वेद के इन छः अंगरूप परिधान से विभूषित
है, पुराण जिसके सुहृद हैं, ऐसी मीमांसा से मण्डित सरस्वती को गुरुकुल में
आप का संग सुलभ हो गया है। अब यह आपकी सेवा में संलग्न है।"
भगवान् श्रीकृष्ण को किसी विद्या का अभाव नहीं है, वे तो केवल
विद्यादेवी सरस्वती को अपनी सेवा का अवसर प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण
पूर्णकाम हैं; अतः यद्यपि उनके असंख्य भक्त हैं, फिर भी उन्हें किसी भी
जीव की सेवा अपेक्षित नहीं है। यह उनकी अहैतुकी करुणा और कृपा ही
है कि वे सब को अपनी सेवा करने का अवसर देते हैं, मानो उन्हें अपने
भक्तों से अपनी सेवा कराने की आवश्यकता हो।
उनकी नीतिज्ञता के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में कहा है, "तस्करों
के लिए मृत्यु के समान, पुण्यात्मा पुरुषों के लिए आनन्ददायी वसन्त वायु
के समान, रमणियों में परम मनोहर कामदेव के समान, बन्धु-बान्धवों के
लिए आह्लादकारी पूर्ण चन्द्र के समान, दीनों में कल्याण के कल्पवृक्ष के
समान, शत्रुओं के लिए भगवान् शिव के मुख की कालाग्नि के समान,
व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण मथुरा पुरी का शासन कर रहे हैं।" अस्तु, नाना
प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने में श्रीकृष्ण पूरे नीतिज्ञ हैं। जब
उन्हें चोरों के लिए कालरूप कहा जाता है तो इसका अर्थ नहीं कि वे
नीतिरहित अथवा निर्दयी हैं। वे तब भी कृपामय ही हैं क्योंकि अपराधियों
को मृत्यु-दण्ड देना सब प्रकार से नीतिसंगत है। भगवद्गीता में भी
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो उनसे जैसा व्यवहार करता है, वे भी उसके साथ
वैसा ही करते हैं। उनका व्यवहार भक्तों और अभक्तों के साथ भिन्न-
भिन्न होता है, परन्तु ये दोनों बराबर मंगलमय हैं। श्रीकृष्ण मंगलायतन

१४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं, इसलिए सब के साथ उनके व्यवहार में भी मंगल ही मंगल है।
१२. बुद्धिमान्
तीक्ष्ण स्मृति और सूक्ष्म बुद्धि वाले को बुद्धिमान् कहा जाता है।
श्रीकृष्ण की स्मृति की तीक्ष्णता के विषय में कथन है कि अवन्तीपुर में
स्थित सान्दीपनि मुनि के आश्रम में अध्ययन करते हुए श्रीकृष्ण गुरु से
एक बार जो शिक्षा सुन लेते थे, तत्काल उस विषय में पूर्ण निष्णात् हो
जाते थे। वास्तव में तो सान्दीपनि के गुरुकुल में जाकर वे जगत् के सामने
यह आदर्श रखना चाहते थे कि चाहे कोई कितना भी महान् अथवा दक्ष
क्यों न हो, पर विद्या के लिए किसी बड़े के पास अवश्य जाना पड़ेगा।
महान् से महान् व्यक्ति के लिए भी गुरुशरण में जाना अनिवार्य है।
श्रीकृष्ण की सूक्ष्म बुद्धि तब प्रकट हुई जब वे मथुरापुरी पर आक्रमण-
कारी म्लेच्छराज से युद्ध कर रहे थे। वैदिक विधान है कि क्षत्रिय राजाओं
को म्लेच्छों को मारने के लिए भी स्पर्श नहीं करना चाहिए। अतः जब
उस म्लेच्छराज ने मथुरा को घेर लिया तो श्रीकृष्ण ने उसे अपने हाथों
मारना अच्छा नहीं समझा। पर उसे मारना भी अवश्य है; इसलिए अपनी
सूक्ष्म बुद्धि का परिचय देते हुए श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि से भागने का निश्चय
किया, जिससे यवनराज उनका पीछा करे। तब वे उसे उस कन्दरा में ले
गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था। मुचुकुन्द को शिवजी से यह वर था कि
निद्राभग्न होने पर उसकी दृष्टि जिस पर पड़ जायगी, वह तत्क्षण भस्म
हो जायगा। अतः श्रीकृष्ण बुद्धिमानी से म्लेच्छराज को उस कन्दरा में
ले गए जहाँ मुचुकुन्द निद्रामग्न था और इस प्रकार उसे भस्म करा दिया।
१३. प्रतिभाशाली
जो तुरन्त नए-नए तर्कों से किसी भी विपक्ष का प्रतिकार करने में
कुशल हो, उसे प्रतिभाशाली कहते हैं। इस सन्दर्भ में पद्यावली में श्रीराधा-
कृष्ण का यह संवाद है। एक दिन प्रातः जब श्रीकृष्ण राधारानी के पास
गए तो वे पूछने लगीं- "हे केशव ! आजकल तुम्हारा वास कहाँ है?"
संस्कृत में 'वास' शब्द के तीन अर्थ हैं-निवास, सुगन्ध तथा वस्त्र।
श्रीराधारानी का अभिप्राय था, "हे कृष्ण ! तुम्हारा वस्त्र कहाँ
है ?" परन्तु श्रीकृष्ण ने उसे निवास मानकर उत्तर दिया- "हे प्रिये !
इस क्षण मेरा वास तुम्हारे चंचल नेत्रों में है।"
इस पर राधारानी ने कहा- "अरे शठ ! मैं निवास-स्थान को नहीं,
तुम्हारे वास (वस्त्र) को पूछ रही हूँ।"

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४३
अब श्रीकृष्ण 'वास' का अर्थ सुगंध समझकर बोले—"हे सुभगे !
तुम्हारे अंगों के संसर्ग से मुझे यह सुवास प्राप्त हुआ है।"
श्रीमती राधारानी ने श्रीकृष्ण से फिर पूछा—"हे धूर्त ! तुमने रात्रि
कहाँ बितायी ?" (यामिन्यामुषितः यामिन्याम् = रात्रि; उषितः = व्यतीत
की)। परन्तु श्रीकृष्ण ने उस 'यामिन्यामुषितः' का प्रकारान्तर से 'यामिन्या
मुषितः' पदच्छेद किया, जिसका अर्थ यह हो गया कि रात्रि ने उनका हरण
किया। वे कहने लगे—"हे राधे ! भला क्या रात्रि भी चोरी करती है ?"
इस प्रकार राधारानी के सब प्रश्नों का छलपूर्वक उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण
इस परमप्रिया गोपी को आनन्दित कर रहे थे।
१४. विदग्ध
कला तथा विलास में अतिशय कुशल को विदग्ध कहा जाता है।
यह विशेष गुण श्रीकृष्ण के स्वरूप में प्रकाशित है, राधारानी कहती हैं,
"हे सखि ! कृष्ण कभी गीत रचते हैं, कभी विनोद करते हैं, कभी वंशी
बजाते हैं, कभी नाचते हैं, मालायें गूंथते हैं और कभी ऐसा मधुर श्रृंगार
करते हैं मानो उन्होंने द्यूत में सब खिलाड़ियों को जीत लिया हो। इस
प्रकार परमोच्च कला का विलास करते हुए श्रीहरि अद्भुत क्रीड़ा कर
रहे हैं।"
१५. चतुर
एक साथ अनेक कार्य करने की सामर्थ्य वाले को चतुर कहते हैं।
एक गोपी कहती है, "हे सखियो ! कृष्ण की चातुरी भरी क्रियाओं को तो
देखो। वे नाना गोपगीतों की रचना करके गोधन को आह्लादित कर रहे
हैं तथा नेत्रप्रान्तों के संचालन से गोपियों को प्रसन्न और अरिष्ट आदि
असुरों को भयभीत कर रहे हैं। इस प्रकार नाना जीवों के साथ नाना
प्रकार से वे पूरा आनन्द उठा रहे हैं।"
१६. दक्ष
कठिन कार्य को भी सरलता से तत्काल कर देने वाला दक्ष है।
श्रीकृष्ण की दक्षता के सम्बन्ध में शुकदेवजी श्रीमद्भागवत में परीक्षित से
कहते हैं, "हे कुरुश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने सब योद्धाओं के नाना अस्त्रों को खण्ड-
खण्ड कर दिया।" प्राचीन काल में जब धनुष-बाण से युद्ध होते थे, एक
दल बाण चलाता और विपक्ष अन्य बाण से उसका प्रतिकार करके परास्त
करता। उदाहरण के लिए, यदि एक दल आकाश से जल की वर्षा करने

१४४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
वाले पर्जन्य-अस्त्र का प्रयोग करता तो दूसरे दल को ऐसा अस्त्र चलाना
पड़ता, जिससे जल तत्काल मेघों में परिणत हो जाता । अतएव उपरोक्त
वाक्य से प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण शत्रु के बाणों का प्रतिकार करने में
बड़े ही दक्ष हैं। इसी प्रकार रासलीला में जब प्रत्येक गोपी ने उनसे अपने
ही साथ नृत्य करने की प्रार्थना की तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियों थीं,
उतने ही रूप धारण कर लिये । परिणामतः प्रत्येक गोपी ने उन्हें अपने
साथ नाचते पाया ।
१७. कृतज्ञ
जो मित्र के उपकार को मानता है और उसकी सेवा को कभी नहीं
भूलता, उसे कृतज्ञ कहते हैं। महाभारत में श्रीकृष्ण का उद्गार है,
चीरहरण के समय द्रौपदी ने जो दूर होने पर भी मुझे, 'हे गोविन्द !'
कहकर पुकारा था, उसका यह ऋण मेरे हृदय से उतर नहीं सकता, निरन्तर
बढ़ता ही जाता है ।" श्रीकृष्ण का यह वचन इस बात का प्रमाण है कि केवल
'हे कृष्ण । हे गोविन्द !', ऐसा कहने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है।
महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे भी श्रीभगवान् और उनकी शक्ति का सम्बोधन है।
जब एक बार पुकारने से भी भगवान् चिरऋणी हो जाते हैं तो जो नित्य-
निरन्तर भगवान् और उनकी शक्ति का नाम लेता रहता है, उसके वे
कितने ऋणी हो जाते हैं—इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती ।
भगवान् उस भक्त को कभी नहीं भूल सकते। श्लोक से स्पष्ट है कि
भगवान् को पुकारने वाला तत्काल भगवान् के ध्यान को आकर्षित कर
लेता है; वे उसके सदा के ऋणी बन जाते हैं।
श्रीकृष्ण की कृतज्ञता का एक अन्य उदाहरण जाम्बवान् से उनके
व्यवहार में दृष्टिगोचर होता है। जब वे रामरूप में प्रकट हुए थे तो
ऋषराज जाम्बवान् ने उनकी बड़ी ही श्रद्धापूर्वक सेवा की थी। अतः फिर
जब वे कृष्णरूप में प्रकट हुए तो उन्होंने जाम्बवान् की कन्या का पाणिग्रहण
कर उसका गुरुजनों के सदृश सम्मान किया। साधुजन अपने प्रति किए
अल्प उपकार को भी कभी नहीं भूलते; फिर साधुओं की कोटि के मुकुट-
मणि श्रीकृष्ण का तो कहना ही क्या है, अर्थात् वे अपने सेवक को कैसे भुला
सकते हैं ।
१८. सुदृढ़व्रत
जिसके नियम और प्रतिज्ञा, दोनों सदा सत्य रहें, वह सुदृढ़व्रत है ।