भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
इन साठ दिव्य गुणों के अतिरिक्त श्रीकृष्ण में चार ऐसे गुण भी हैं
जो देवों-जीवों में तो क्या, स्वयं नारायण में भी नहीं हैं। ये हैं— ६१. सब
प्रकार की अद्भुत और चमत्कारमयी लीलाओं (विशेषतः बाललीला) के
सागर; ६२. अतुल मधुर प्रेममण्डित प्रिय भक्तों से विभूषित; ६३. अपनी
मुरली के कलकूजन से त्रिभुवनगत प्राणियों के चित्त को हरने वाले;
६४. जिससे अधिक अथवा जिसके तुल्य कोई रूप नहीं है, ऐसी रूपश्री से
सम्पूर्ण चराचर जगत् को विस्मित करनेवाले—ये चार गुण (लीलामाधुरी,
प्रेममाधुरी, वंशीमाधुरी तथा रूपमाधुरी) विशेषतः गोविन्द में विलक्षण
रूप से पाये जाते हैं।
पूर्वोक्त गुणों के साथ इन चार असाधारण गुणों की गणना करने
पर श्रीकृष्ण के कुल गुण चौंसठ बनते हैं। श्रील रूप गोस्वामी ने श्री-
परमेश्वर के स्वरूप में इन सब गुणों को सिद्ध करने हेतु नाना शास्त्रप्रमाण
प्रस्तुत किए हैं।
१. सुरम्यांग
भगवान् के विग्रह के विविध अंगों की प्राकृत वस्तुओं में कोई उपमा
नहीं है। भगवत्-रूप के उत्कर्ष को समझने में असमर्थ साधारण लोगों
के बोध के लिए ही उन्हें लौकिक उपमा दी जाती है। कहा जाता है कि
श्रीकृष्ण का मुखमण्डल चन्द्रमा के समान है; जंघायें गज जैसी बलवती हैं;
भुजायें स्तम्भ जैसी हैं; दोनों कर कमलदल के समान विकसित हैं; वक्षः
स्थल कपाट जैसा है; नितम्ब एक दूसरे से सटे हुए हैं तथा शरीर का मध्य-
भाग पतला है।
२. सब शुभ लक्षणों से युक्त
शरीर के नाना अंगों में पाए जाने वाले सभी मंगल-लक्षण चिह्न
भगवान् के विग्रह में हैं। इस सन्दर्भ में, भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में प्रकट
शुभ लक्षणों के सम्बन्ध में नन्द महाराजा के एक मित्र ने कहा है, "हे सखे,
गोपेन्द्र ! तुम्हारा बालक ३२ शुभ लक्षणों से युक्त है। ऐसा बालक गोपों
में कहाँ हो सकता है ?" भगवान् श्रीकृष्ण जब भी राम आदि के रूप में
अवतीर्ण होते हैं, प्रायः क्षत्रियकुल का वरण करते हैं और कभी-कभी
ब्राह्मणकुल में भी प्रकट होते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण ने नन्दमहाराज के पुत्ररूप
में लीला की, जो वैश्य थे। वैश्य जाति का कार्य कृषि, गोरक्षा और
वाणिज्य है। अतः उनके ब्राह्मणकुल के मित्रों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि