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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 380 में से

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पृष्ठ 164

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३७
ऐसा महापुरुष बालक वैश्य-परिवार में कैसे हो सकता है । उन्होंने नन्दजी
से बालक के शरीर पर विद्यमान सभी शुभ लक्षणों का उल्लेख किया ।
वे बोले, "इस बालक के नेत्रप्रान्त, पाद, करतल, तालू, अधरोष्ठ,
जिह्वा और नख-इन सात अंगों में मंगलसूचक रक्तता है । इसके वक्षःस्थल,
कटि और ललाट, इन तीनों अंगों में विस्तार पाया जाता है । ग्रीवा, जंघा
और लिंग में लघुता है, वाणी, बुद्धि और नाभि में गम्भीरता है, नासिका,
स्कन्ध, कर्ण, ललाट, नख और कटि में तुंगता है; नासिका, भुजा, नेत्र,
हनु, जंघाओं में लम्बाई है तथा त्वचा, केश, अंगुलि, दन्त और अंगुलिपर्व
में सूक्ष्मता पाई जाती है । इन सम्पूर्ण लक्षणों का प्रकाश केवल महापुरुषों
में होता है ।"
हाथ आदि में रेखाओं से बने हुए चक्रादि चिह्न भी मंगल लक्षण
हैं । एक वृद्धा गोपी नन्दजी से कहती है - "हे गोपेश ! अपने पुत्र के करों
में स्पष्ट रेखाओं से बने हुए कमलों और चक्रों को तथा पदपल्लवों में ध्वज,
वज्र, मीन, कुश, और कमल के मंगलमय चिह्नों को देखिए ।"
३. रुचिर
नेत्रों को आनन्द प्रदान करने वाले सौन्दर्य को रुचिर कहते हैं ।
श्रीकृष्ण का स्वरूप अतिशय रुचिर है । श्रीमद्भागवत (३.२.१३) में उल्लेख
है, "भगवान् श्रीकृष्ण अपने नेत्रानन्ददायी रूप में महाराज युधिष्ठिर के
राजसूय यज्ञ में पधारे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माण्ड के सारे महापुरुषों ने उन्हें
देखकर समझा कि श्रीकृष्ण के इस विग्रह की रचना में विधाता की सारी
शिल्प कुशलता समाप्त हो गई है ।"
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण का विग्रह—मुख, दो नेत्र, दो हाथ, नाभि
तथा दो पैर—इन आठ कमलों से युक्त है । इन में से किसी एक अंग-कमल
पर गोपीजन अथवा व्रजवासियों की भ्रमरपंक्ति एक बार पड़ने पर फिर
द्युतिमधु से पंकिल उस नीलकमल (कृष्णा) से उठ नहीं पाती थी ।
४. तेजोमय
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत् में व्याप्त तेज भगवान् श्रीकृष्ण की ही किरण
राशि है । श्रीकृष्ण का परमधाम ब्रह्मज्योति विकीर्ण करता रहता है, जो
उनके विग्रह से निःसृत है ।
श्रीहरि के वक्षःस्थल पर स्थित सूर्य की कान्ति का तिरस्कार करने
वाली कौस्तुभ मणि की प्रभा भी भगवान् के श्रीविग्रह की दीप्ति के सामने
आकाश में तारे के समान ही मन्द-मन्द स्फुरित होती है । अतः श्रीकृष्ण का