भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
दिव्य प्रभाव इतना अतिशय है कि सब को जीत लेता है। जब श्रीकृष्ण
अपने शत्रु कंस के यज्ञ में गए तो वहाँ के मल्ल कोमल अंग वाले उन कृष्ण
को देखते हुए भी उनके साथ युद्ध करने के विचार से भयभीत और संत्रस्त
हो उठे।
५. बलवान्
असाधारण पौरुष वाला बलीयान् कहलाता है। श्रीकृष्ण द्वारा
अरिष्टासुर का वध करने पर कुछ गोपियाँ कहने लगीं, "हे सखि ! देखो
कृष्ण ने पर्वत से भी भयंकर अरिष्टासुर को रुई के पिण्ड के समान
उड़ा कर मार डाला।" एक अन्य पद्य है, "हे कृष्णभक्तो ! कमलनयन
श्रीकृष्ण का वह वाम भुजदण्ड तुम्हारी सब भयों से रक्षा करे, जिसने
गोवर्धन पर्वत को खेल-खेल में गेंद की भाँति उठा लिया था।"
६. नित्य किशोर
श्रीकृष्ण शैशव, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, आदि सभी आयु-वर्गों में
सुन्दर और मधुर हैं। परन्तु इन सब में भी कैशोर ही अखिल रसराज है
और इसमें भक्ति के नित्य नाना विलास होते हैं। किशोरावस्था में
श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चिन्मय गुणों से परिपूर्ण लीलारस-निरत रहते हैं। अतः
भक्तों ने उनके पूर्व-कैशोर को प्रेम में सर्वाकर्षक माना है।
श्रीकृष्ण की इस वय का वर्णन इस प्रकार है, "श्रीकृष्ण के तारुण्य
का बल उनकी मधुर मुसकराहट से मिलकर पूर्ण चन्द्र के मद को भी
विमर्दित करने वाला हो गया। वे कामदेव को भी विनिन्दित करनेवाले
सौन्दर्य-लावण्य के श्रृंगार से विभूषित रहते और निरन्तर गोपियों के मन
को उन्मत्त करते हुए प्रेमामृत का पान करा रहे थे।"
७. विविध-अद्भुत भाषाविद्
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष नाना देशों की भाषाओं,
विशेषतः देवभाषा संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं को तथा पशुओं तक
की बोली जानता हो, वह अद्भुत भाषाविद् कहा जाता है। इस वाक्य
से इंगित होता है कि श्रीकृष्ण पशुओं की भाषाओं को भी बोल-समझ
सकते हैं। श्रीकृष्ण के लीलाविहार को देखकर वृन्दावन की एक वृद्धा
गोपी आश्चर्य व्यक्त करती हुई बोली, "अहो ! व्रजगोपियों के हृदयवल्लभ
श्रीकृष्ण गोपियों से भलीभाँति व्रजभाषा में बोलते हैं, देवताओं से संस्कृत
में वार्तालाप करते हैं, यहाँ तक कि पशुओं की भाषा में गाय-भैंस से भी