भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १३६
बोल सकते हैं। इसी प्रकार काश्मीरी में, शुक आदि विहंगों की भाषा में
और प्राकृत में भी कृष्ण बड़े ही वाचाल हैं।" उसने गोपियों से विस्मय
व्यक्त किया कि इतनी भाषाओं को बोलने में श्रीकृष्ण इतने दक्ष कैसे
हो गए।
८. सत्यवाक्
जिस पुरुष का वचन कभी झूठा सिद्ध न हो, वह सत्यवाक् कहा जाता
है। कृष्ण ने एक बार पाण्डवों की माता को वचन दिया था कि वे उसके
पाँचों पुत्रों को कुरुक्षेत्र की रणभूमि से जीवित लौटा लायेंगे। युद्ध के अन्त
में पाँचों पाण्डवों के घर वापस आ जाने पर कुन्ती ने अपने वचन को
सत्य करने के लिए श्रीकृष्ण की स्तुति की। वह बोली, "सूर्य भले ही
शीतल हो जाय और चन्द्रमा भले ही उष्ण हो जाय पर फिर भी हे मुरारि !
आपका वचन असत्य नहीं हो सकता।" इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण भीम-
अर्जुन के साथ जरासन्ध से युद्ध करने गये तो उन्होंने उसे स्पष्ट कह दिया
कि दो पाण्डवों सहित छद्मवेष में वहाँ उपस्थित हुए वे स्वयं सनातन
पुरुषोत्तम कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण तथा भीम-अर्जुन क्षत्रिय थे। जरासन्ध भी
क्षत्रिय था और इसलिए ब्राह्मणों को उदारता से दान देता था। अतः
जरासन्ध के वध की योजना बनाकर श्रीकृष्ण भीम-अर्जुन के साथ ब्राह्मण
वेष में उसके पास गए। उदारदानी जरासन्ध ने उनसे अपना अभीष्ट
माँगने को कहा तो उन्होंने उससे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की। उसी
समय श्रीकृष्ण ने घोषित किया कि ब्राह्मण-वेष में वे उसके सदा के शत्रु ही
आए हैं।
६. प्रियभाषी
जो अपने शत्रु को भी प्रिय वचनों से शान्त कर सकता है, वह
पुरुष प्रियभाषी है। श्रीकृष्ण तो प्रियभाषण की अवधि ही हैं। यमुना
जल में कालिय नाग का मान-मर्दन करके उन्होंने कहा- "हे नागराज !
यद्यपि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है, फिर भी मुझमें दोष-दृष्टि न करें।
देवताओं के लिए भी आराध्य गोधन की रक्षा मेरा कर्तव्य है। आपकी
उपस्थिति से गायों की रक्षा के लिए ही मैं आपको यहाँ से निष्कासित कर
रहा हूँ।"
कालिय के निवास के कारण यमुनाजल विष से दूषित हो गया
था। उसे पीकर कितनी ही गायें कालकवलित हो गई थीं। अतः बालकृष्ण