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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४५
श्रीकृष्ण के सत्यप्रतिज्ञ होने का उदाहरण हरिवंश में है। इसका सम्बन्ध
श्रीकृष्ण और इन्द्र के उस युद्ध से है, जब श्रीकृष्ण ने नन्दनकानन से
बलपूर्वक पारिजात का हरण किया था। एक समय सत्यभामा ने पारिजात
के पुष्पों की इच्छा की तो श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वे उसे अवश्य
लायेंगे। परन्तु इन्द्र ने पारिजात को देना स्वीकार नहीं किया। इस
पर घोर युद्ध हुआ। पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण एक ओर थे और दूसरी
ओर सारे देवता थे। अन्त में श्रीकृष्ण उन सब को हरा कर पारिजात
को ले गए तथा रानी सत्यभामा को भेंट किया। इसी घटना के सम्बन्ध
में श्रीकृष्ण नारदजी से कहते हैं, “हे देवर्षि नारदजी ! तुम सब भक्तों में
और अभक्तों में यह घोषणा कर दो कि पारिजात-हरण में सब देवताओं
ने मुझे हराने का प्रयत्न किया, परन्तु अपनी रानी को दिए मेरे वचन
को कोई भी असत्य नहीं कर सका। वास्तव में मेरी प्रतिज्ञा को मिथ्या
करने में न गन्धर्व समर्थ हो सकते हैं, न राक्षस, न यक्ष, न असुर और न
पन्नग ही समर्थ हो सकते हैं।”
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण की यह प्रतिज्ञा भी है कि उनके भक्त का
कभी नाश नहीं होता। अतः निरन्तर भगवत्सेवा में लगे सच्चे भक्त को
दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा को कदापि भंग नहीं
करेंगे। चाहे जो हो, वे सदा अपने भक्त की रक्षा करेंगे।
सत्यभामा को पारिजात भेंट कर, द्रौपदी की लाज बचाकर तथा
अर्जुन की सब शत्रुओं से रक्षा करके श्रीकृष्ण ने इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण
दिए हैं कि वे सत्यप्रतिज्ञ हैं।
गोवर्धनलीला में परास्त हो जाने पर इन्द्र ने भी भगवान् की इस
प्रतिज्ञा को सत्य स्वीकार किया है कि उनके भक्त का कदापि नाश नहीं
होता। जब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र की उपासना से रोका तो
इन्द्र क्रुद्ध होकर वृन्दावन को मूसलाधार वर्षा से प्लावित करने लगा।
परन्तु गोवर्धन पर्वत को छत्र के समान हाथ में उठाकर श्रीकृष्ण ने वृन्दा-
वन के सारे वासियों और पशुओं को बचा लिया। इस घटना के बाद
इन्द्र उनकी शरण में आकर नाना प्रकार से स्तुति करने लगा। उसने कहा,
“गोवर्धन पर्वत को धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा करके आपने अपनी
इस प्रतिज्ञा को सत्य किया है कि मेरे भक्तों का कभी नाश नहीं होता।
१६. देशकालसुपात्रज्ञ
श्रीकृष्ण देश, काल, सामग्री और पात्र के अनुसार लोगों से व्यवहार

१४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
करने में अतिशय कुशल हैं। वे देश, काल और पात्र से किस प्रकार पूर्ण
लाभ लेते, इसका एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में उद्धव से गोपियों के
सम्बन्ध में कहा गया स्वयं उनका एक वाक्य है, “हे सखे ! आज की
शारदीय पूर्णिमा की रात्रि जैसा उत्तम समय नहीं हो सकता; त्रिभुवन में
वृन्दावन से बढ़कर कोई स्थान नहीं मिल सकता तथा गोपियां अप्रतिम
सुन्दरी हैं। इसलिए हे उद्धव ! मेरा मन रासोत्सव के लिए बारम्बार
उत्कण्ठित हो रहा है।”
२०. शास्त्रचक्षु
जो शास्त्र के अनुसार ही सब कर्म करता है, वह शास्त्रचक्षु है,
—जो प्रामाणिक शास्त्रों की दृष्टि से देखे। वास्तव में किसी भी ज्ञानी
तथा अनुभवी व्यक्ति को सम्पूर्ण तत्त्व इन्हीं ग्रन्थों की दृष्टि से देखना
चाहिए। उदाहरण के लिए, साधारण नेत्रों से देखने पर सूर्यमण्डल केवल
एक छोटा सा देदीप्यमान् पिण्ड प्रतीत होता है; परन्तु प्रामाणिक वैज्ञानिक
पुस्तकों की दृष्टि से ज्ञात होता है कि सूर्य इस पृथ्वी से अनेक गुणा बड़ा और
शक्तिशाली है। अतः चर्म-चक्षुओं से देखना यथार्थ देखना नहीं है। प्रामाणिक
पुस्तक अथवा प्रामाणिक शिक्षक के माध्यम से देखना ही यथार्थ देखना है।
इसलिए यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं और भूत, वर्तमान् और भविष्य
को पूर्ण रूप से जानते हैं, फिर भी लोकशिक्षा के हेतु वे सदा शास्त्र का
आश्रय लेते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जो कुछ कहा है, वह अधिकारी
के रूप में कहा है। फिर भी उन्होंने वेदान्तसूत्र का प्रमाण दिया।
श्रीमद्भागवत में किसी का परिहास है कि कंस के शत्रु श्रीकृष्ण को
शास्त्रचक्षु कहा जाता है। परन्तु अपनी प्रामाणिकता को स्थापित करने के
लिए वे गोपियों को ही देख रहे हैं, जिससे उन गोपियों को उन्माद हो
चला है।
२१. शुचि
शुचिता दो प्रकार की होती है। एक अपनी शुचिता से दूसरों
के पाप का नाश करके उन्हें शुद्ध बना देना और दूसरा प्रकार स्वयं
पापों से रहित होना। इनमें से किसी भी कोटि का शुचि व्यक्ति
पावन कहा जाता है। श्रीकृष्ण में ये दोनों गुण हैं। वे सारे पापात्मा बद्ध
जीवों का उद्धार कर सकते हैं और साथ ही स्वयं कभी कोई पापकर्म नहीं
करते ।

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४७
इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र को परिवार की आसक्ति से निवृत्त करने
के लिए प्रयत्न करते हुए विदुर का वाक्य है, "हे अग्रज ! ऋषि-मुनि उत्तम
श्लोकों में जिनकी धवल कीर्ति का गान करते हैं, उन पावनों के भी
पावन भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अपने मन को एकाग्र करो।
निःसन्देह शिव, ब्रह्मा, आदि बहुत से देवता हैं, परन्तु उनकी पावनता नित्य
श्रीकृष्ण की कृपा पर ही निर्भर है।" विदुर ने धृतराष्ट्र को परामर्श दिया
कि वह एकाग्रचित्त से केवल श्रीकृष्ण की आराधना करे। यदि कोई पावन
कृष्णनाम का जप करे तो यह नामरूपी देदीप्यमान् सूर्य हृदय में उदित
होकर तत्काल सम्पूर्ण पापरूप अंधकार को दूर कर देगा। अतः विदुर ने
धृतराष्ट्र से निरन्तर कृष्ण का ही चिन्तन करने को कहा, जिससे पापपुंज
तत्क्षण भस्म हो जाये। भगवद्गीता में अर्जुन भी श्रीकृष्ण को परं ब्रह्म परं
धाम पवित्रम्—परम पवित्र कहता है। श्रीकृष्ण की परम पावनता के और
भी अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं।
२२. वशी
जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है, उसे वशी, अर्थात् जिते-
न्द्रिय कहा जाता है। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण की सभी
१६००० स्त्रियाँ इतनी अनिन्द्य सुन्दरी थीं कि उनके उद्दाम भाव, मनोहर
हास और लज्जा को देखकर शिव आदि देवों का मन भी मोहित हो जाता
था। परन्तु अपने इस कमनीय हाव-भाव से भी वे श्रीकृष्ण के चित्त को
तनिक भी विचलित नहीं कर सकीं।" श्रीकृष्ण की १६००० स्त्रियों में से
प्रत्येक यही समझती थी कि वे उसकी कमनीयता पर मुग्ध हैं; पर वास्तव
में ऐसा न था। अतः श्रीकृष्ण सर्वोत्तम जितेन्द्रिय हैं और यह भगवद्गीता
में भी स्वीकृत है; वहाँ उन्हें हृषिकेश—इन्द्रियों का स्वामी कहा गया है।
२३. स्थिर
जो अभीष्ट फल की प्राप्ति होने तक निरन्तर कार्यशील रहता है,
वह स्थिर है। स्यमन्तमणि को खोजते समय श्रीकृष्ण न तो वन में घुसने
से घबराए और न ऋक्षराज जाम्बवान् के स्थान में घुसने के भय से उन्हें
चिन्ता हुई। वरन् स्थिरतापूर्वक मणि को प्राप्त करके की द्वारका
को लौटे।
२४. दान्त
जो पुरुष उचित होने पर दुःसह कष्ट को भी सहन कर लेता है, वह
दान्त है।

१४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
जिस समय श्रीकृष्ण गुरुकुल में निवास कर रहे थे, तो कोमलांग
होते हुए उन्होंने गुरुसेवा में होने वाले क्लेश को सहर्ष सहन किया । शिष्य
का कर्तव्य है कि कष्टों को गिने बिना निश्छल भाव के साथ सब प्रकार से
गुरु की सेवा करे । गुरुकुल में रहते हुए शिष्य को द्वार-द्वार से भिक्षा करके
गुरु को समर्पित करनी होती है । प्रसाद ग्रहण के समय गुरु एक-एक शिष्य
को पुकारते हैं । यदि किसी कारणवश वे किसी शिष्य को प्रसाद के लिए
बुलाना भूल जायें तो शास्त्रों में विधान है कि अपने-आप भोजन करने के
स्थान पर उस दिन उपवास ही करना चाहिए । ऐसे बहुत से विधान हैं ।
श्रीकृष्ण कभी-कभी वन में ईंधन लाने भी जाते थे ।
२५. क्षमाशील
जो अपने विरोधी के सब अपराधों को सहन करता है, वह क्षमा-
शील कहलाता है ।
भगवान् श्रीकृष्ण की क्षमा का वर्णन महाभारत में है, जब उन्होंने
शिशुपाल का वध किया था । शिशुपाल चेदि का राजा था । श्रीकृष्ण
का मौसेरा भाई होते हुए भी वह उनसे सदा द्वेष करता रहता । जब भी वे
मिलते, शिशुपाल श्रीकृष्ण का अपमान करता और यथाशक्ति अपशब्द
कहता । महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी उसने ऐसा ही किया;
परन्तु श्रीकृष्ण ने उपेक्षापूर्वक उसे कोई उत्तर नहीं दिया । वहाँ उपस्थित
कुछ लोग शिशुपाल का वध करने को उद्यत हुए तो भी श्रीकृष्ण ने
उनका भी निषेध कर दिया । वे स्वभाव से ही क्षमाशील थे । प्रसिद्ध है कि
सिंह मेघ की गर्जना को सुनकर हुंकार करता है, मूर्ख शृंगालों के शब्द को
सुनकर नहीं ।
श्रीयामुनाचार्य श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता की स्तुति करते हुए कहते
हैं, "हे रघुवर ! शरणागत समझ कर आप जानकी के चरण में चोंच मारने
वाले उस काक के प्रति भी दयालु बन गए ।" एक समय देवराज इन्द्र ने काक
रूप में भगवान् राम की अर्धांगिनी जानकी के चरण में घाव कर दिया ।
जगन्माता सीता के इस अपमान को देखकर श्रीराम तत्काल उस उद्धत
काक का वध करने को उद्यत हो गए । परन्तु वह त्राहि-त्राहि करता हुआ
उनके चरणों में गिर पड़ा; अतः भगवान् ने उसे क्षमादान दिया । श्रीयामुना-
चार्य आगे कहते हैं कि श्रीकृष्ण की क्षमाशीलता भगवान् राम से भी
विशेष है । शिशुपाल तीन जन्मों से लगातार उनका अपमान कर रहा
था; फिर भी श्रीकृष्ण इतने क्षमाशील हैं कि उन्हें शिशुपाल को सायुज्य

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४६
मुक्ति प्रदान की। इससे सिद्ध हो जाता है कि भगवान् की ब्रह्मज्योति में
लीन होना, जो अद्वैतवादियों का लक्ष्य है, बहुत कठिन कार्य नहीं है।
शिशुपाल जैसे लोग, जो जन्म-जन्म में श्रीकृष्ण का अपराध करते हैं, उन्हें
तक यह मुक्ति मिल सकती है।
२६. गम्भीर
जो पुरुष अपने मनोभाव को सब से प्रकट नहीं करता, अथवा जिसके
मन का आशय जानना बड़ा कठिन हो, वह गम्भीर कहा जाता है। जब
ब्रह्मा से भगवान् श्रीकृष्ण का अपराध बन बैठा तो उसने क्षमा-याचना की।
परन्तु उत्तम स्तुति करने पर भी वह यह नहीं समझ सका कि श्रीकृष्ण
तुष्ट हो गए या अब भी रुष्ट हैं। भाव यह है कि श्रीकृष्ण ने गम्भीरता
का परिचय देते हुए ब्रह्मस्तुति पर ध्यान नहीं दिया। गम्भीरता का एक
अन्य उदाहरण राधारानी से श्रीकृष्ण के प्रेमविलास में है। श्रीकृष्ण राधा
से अपने प्रेम के विषय में इतने गम्भीर रहते कि उनके अग्रज और
चिरसंगी बलरामजी तक उनके मन के भाव को नहीं जान पाते।
२७. धृतिमान्
जिसकी सब इच्छायें पूर्ण हो चुकी हैं, इसलिए जो आत्मा में ही
सन्तुष्ट रहता है और क्षोभ का महान् कारण होने पर भी शान्त बना रहता
है, वह धृतिमान् है।
श्रीकृष्ण की पूर्णस्पृहत्व का एक उदाहरण वह घटना है जब वे
अर्जुन-भीम के साथ मगधराज जरासन्ध को चुनौति देने गए और श्रीकृष्ण
ने जरासन्ध-वध का पूर्ण श्रेय भीम को दिया। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण
यश की इच्छा कभी नहीं करते, यद्यपि वास्तव में उन सा यशोमय दूसरा
कोई नहीं हो सकता।
क्षोभ का कारण होने पर भी शान्त रहने का गुण तब प्रकट हुआ
जब शिशुपाल उन्हें अपशब्द कह रहा था। इस पर वहाँ विद्यमान सभी
राजा और ब्राह्मण क्षुब्ध हो कर तत्काल उत्तम स्तुतियों से श्रीकृष्ण को
प्रसन्न करने लगे। परन्तु उन सब को श्रीकृष्ण में कुछ भी क्षोभ दृष्टिगोचर
नहीं हुआ।
२८. समता
जो राग-द्वेष से मुक्त हो उसे सम कहते हैं।
श्रीकृष्ण की समता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१०.१६.३३) में

१५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
कालियदमन-लीला में है। जिस समय भगवान् श्रीकृष्ण कालिय को दण्डित
कर रहे थे, तब उसकी स्त्रियाँ भगवान् के आगे कर यह विनती करने
लगीं, "हे नाथ ! हमारे इस पापात्मा पति कालिय नाग को आपने जो दण्ड
दिया है वह सर्वथा योग्य ही है, क्योंकि सब प्रकार के आसुरी जीवों का
निग्रह करने के लिए आपका अवतार हुआ है। हम जानती हैं कि आप
अपने शत्रुओं और पुत्रों को समान समझते हैं। इसलिए हे प्रभो ! आपने
इस अधम का दमन इसके कल्याण के लिए ही किया है।"
एक अन्य स्तुति में कहा है, "हे कृष्ण ! हे यदुवर ! आप इतने
समद्रष्टा हैं कि यदि शत्रु योग्य हो तो उसका भी सम्मान करते हैं और
पुत्र भी दुष्ट है तो उसके लिए भी दण्ड का विधान करते हैं। यही आपका
कार्य है क्योंकि आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के रचयिता हैं। आप सब प्रकार के
पक्षपात से रहित हैं। यदि किसी को आपकी कोई चेष्टा विषम प्रतीत हो
तो निश्चित रूप से यह केवल उसका भ्रम है।"
२६. वदान्य
दानवीर पुरुष, जो उदारता से दान देता है, वह वदान्य
कहलाता है।
जब श्रीकृष्ण द्वारका में राज्य कर रहे थे, तब उनकी उदारता
तथा दानवीरता की कोई अवधि न थी। वस्तुतः उनकी उदारता इस
सीमा पर थी कि चिन्तामणि, सुरभि तथा कल्पवृक्षों आदि ऐश्वर्यों से युक्त
वैकुण्ठ-जगत् का भी द्वारका में अतिक्रमण हो गया। श्रीकृष्ण के गोलोक-
वृन्दावन नामक दिव्य धाम में सुरभि नामक गायें अपरिमित मात्रा में
दुग्धामृत प्रदान करती हैं। वहाँ ऐसे असंख्य कल्पतरु हैं जिनसे सब प्रकार
के फल यथेष्ट संख्या में प्राप्त किए जा सकते हैं। भूमि उस चिन्तामणि से
रचित है, जिसके संसर्ग से लोहा भी स्वर्ण बन जाता है। भाव यह है कि
श्रीकृष्ण के दिव्य धाम में सब कुछ अद्भुत ऐश्वर्यमय है। फिर भी जब
श्रीकृष्ण द्वारका में विराजमान थे तो उनकी उदारता गोलोक-वृन्दावन के
ऐश्वर्य से कहीं बढ़-चढ़ कर थी। श्रीकृष्ण जहाँ भी रहते हैं, गोलोक-
वृन्दावन का अनन्त ऐश्वर्य स्वतः रहता है।
यह भी उल्लेख है कि द्वारका में श्रीकृष्ण १६१०८ रूपों में प्रत्येक
महिषी के साथ अलग महल में रहते थे। वे अपनी रानियों के साथ उन
महलों में सुख से रहते ही नहीं थे, अपितु प्रत्येत महल से नित्य नियम से
सुन्दर वस्त्र और अलंकारों से युक्त १३०५४ गौओं का दान भी करते थे

श्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १५१
इस प्रकार वे प्रतिदिन कुल १६१०८ × १३०५४ गौओं का दान करते थे।
इतने विशाल गोधन के दान के मूल्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती;
परन्तु द्वारका पर राज्य करते हुए श्रीकृष्ण का तो यह साधारण दैनिक
कार्य था।
३०. धार्मिक
जो स्वयं शास्त्र-विहित धर्म का आचरण करता है और दूसरों को
भी उसकी शिक्षा देता है, वह धार्मिक है। केवल किसी मत में विश्वास
होना धार्मिकता का द्योतक नहीं है। यह आवश्यक है कि स्वयं धर्म का
आचरण करे और अपने निजी उदाहरण से दूसरों को भी शिक्षित करे।
ऐसा व्यक्ति ही यथार्थ में धार्मिक है।
इस धराधाम पर श्रीकृष्ण की उपस्थिति के काल में यहाँ अधर्म का
नाम भी नहीं था। इस सन्दर्भ में नारदजी ने एक बार श्रीकृष्ण से परिहास
में कहा था, “हे गोपेन्द्र ! आपके बैलरूपी धर्म के चारों चरण इस प्रकार
बढ़े कि उसने अधर्म रूप सारी जात-पात को खा डाला।” भाव यह है कि
श्रीकृष्ण की कृपा से धर्म का इस अच्छी प्रकार से रक्षण होता था, जिससे
अधर्म देखने को भी दुर्लभ हो गया।”
प्रसिद्ध है कि श्रीकृष्ण निरन्तर नाना यज्ञों में देवताओं का आह्वान
करते रहते थे, जिससे वे देवता अपनी स्त्रियों से सदा दूर रहते। अतः
पतियों के वियोग से संतप्त उनकी स्त्रियाँ कलियुग में प्रकट होने वाले
भगवान् श्रीकृष्ण के नौवें अवतार बुद्धदेव के लिए प्रार्थना करने लगीं।
भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार से प्रसन्न होने के स्थान पर वे बुद्धदेव से
अवतीर्ण होने की याचना करने लगीं, क्योंकि पशु-हिंसा रोकने के लिए
बुद्धदेव वैदिक यज्ञों का निषेध कर देते हैं। देवांगनाओं ने विचार किया
कि यदि बुद्धदेव का अवतार हो गया तो यज्ञ बन्द हो जायेंगे, जिससे उनका
अपने पतियों से विछोह नहीं होगा।
कभी-कभी जिज्ञासा होती है कि आजकल देवगण स्वर्ग से पृथ्वी पर
क्यों नहीं आते ? इसका सीधा सा उत्तर यह है कि जब से भगवान् बुद्ध
ने प्रकट होकर पशु-हिंसा रोकने के लिए यज्ञानुष्ठान का निषेध किया है,
तब से यज्ञ-विधि का लोप सा हो गया है। अतः अब देवता यहाँ नहीं
आते।

अध्याय २२
श्रीकृष्ण के गुण (२)
३१. शूर
जो युद्ध करने में उत्साही और नाना अस्त्रों के प्रयोग में दक्ष हो
उसे शूर कहा गया है।
श्रीकृष्ण की शूरवीरता के सम्बन्ध में एक वाक्य है, "हे रिपुनाशन !
सरोवर में नहाता गजराज जैसे सूंड के वेग से जल में सभी कमलों का
उच्छेद कर देता है, वैसे ही गजतुण्ड-तुल्य अपनी भुजाओं के उत्तोलन से
आपने कितने ही शत्रु रूपी कमलों का मर्दन कर दिया है।"
श्रीकृष्ण की अस्त्र-प्रयोग-दक्षता के विषय में यह उल्लेखनीय है कि
जब जरासन्ध ने १६,००० अक्षौहिणी सेना के साथ श्रीकृष्ण के दल पर
आक्रमण किया तो वह उनके एक भी सैनिक को आहत नहीं कर सका।
यह श्रीकृष्ण की दक्ष युद्धशिक्षा के कारण हुआ, जो युद्धकला के इतिहास में
अद्वितीय है।
३२. करुण
जिसके लिए दूसरे का दुःख असह्य हो, वह करुण है।
श्रीकृष्ण का कारुण्य उस समय प्रकट हुआ जब उन्होंने मगधेन्द्र के
बन्दी राजाओं का मोचन किया। अपनी मरण-शय्या पर श्रीकृष्ण की
स्तुति करते हुए भीष्मपितामह ने कहा कि वे उस सूर्य के समान हैं जो
अज्ञानरूप अन्धकार को हरता है। मगधेन्द्र ने अपने बन्दी राजाओं को
अंधकारमय कक्षों में डाल रखा था। श्रीकृष्ण के वहाँ प्रकट होते ही
अंधकार तत्काल दूर हो गया, मानो सूर्य उदित हो गया हो। भाव यह है
कि मगधेन्द्र ने जितने भी राजा बन्दी बनाए थे, वे सब श्रीकृष्ण के वहाँ
आते ही मुक्त हो गए। राजाओं पर अपनी अहैतुकी करुणा से अभिभूत
होकर ही श्रीकृष्ण ने ऐसा किया।

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५३
श्रीकृष्ण की करुणा तब भी अभिव्यंजित हुई थी जब पितामह
भीष्म बाणविद्ध अवस्था में पड़े थे । इस अवस्था में भीष्म श्रीकृष्ण के
दर्शनार्थ अत्यन्त आतुर हो उठे, अतः श्रीकृष्ण को आना पड़ा । भीष्म की
दयनीय अवस्था का अवलोकन करके श्रीकृष्ण अश्रुविमोचन करते हुए
शोक करने लगे । वे आँसु ही नहीं बरसा रहे थे, बल्कि करुणा की बाढ़ में
अपनी सुध-बुध भी भूल गए । इसीलिए सीधे श्रीकृष्ण को प्रणाम न करके
भक्तजन उनकी करुणा को नमस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति बड़ी
कठिन है, क्योंकि वे परात्पर भगवान् हैं। परन्तु भक्त सदा राधारानी से
प्रार्थना करते हैं, क्योंकि वे उनकी करुणा की मूर्तरूपा है।
३३. मान्यमानकृत
गुरु, ब्राह्मण तथा वृद्धों का पर्याप्त सम्मान करने वाला मान्यमानकृत
कहलाता है ।
जब पूज्यजन श्रीकृष्ण के समक्ष एकत्र होते तो श्रीकृष्ण क्रम से
गुरुदेव, पिता और अग्रज बलरामजी को नमस्कार करते थे । इस प्रकार
कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण व्यवहार में प्रसन्न और निर्मलहृदय थे ।
३४. विनयी
जिसमें औद्धत्य तथा अभिमान का अभाव हो वह विनयी है ।
श्रीकृष्ण का विनयी स्वभाव तब प्रकट हुआ जब वे युधिष्ठिर के
राजसूय यज्ञ में पधारे । महाराज युधिष्ठिर जानते थे कि श्रीकृष्ण स्वयं
भगवान् हैं, इसलिए उनकी अगवानी के लिए वे रथ से उतर रहे थे ।
परन्तु इससे पहले कि वे उतर पायें भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं अपने रथ से
उतर पड़े और आगे दौड़ कर युधिष्ठिर का चरणस्पर्श किया । यद्यपि
श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं, फिर भी अपने व्यवहार में वे सदाचार का
पालन करना कभी नहीं भूलते ।
३५. दक्षिण
सुशील स्वभाव के कारण जिसका व्यवहार बड़ा मृदु और कोमल
हो उसे दक्षिण कहा जाता है ।
स्यमन्तकमणि हरण के प्रसंग में उद्धव के एक वाक्य से प्रमाणित
होता है कि श्रीकृष्ण बड़े ही दयामय और कृपालु हैं। वे सेवक के महान्
अपराध पर भी ध्यान नहीं देते, बस भक्त की सेवा देखते हैं।

१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
३६. ह्रीमान्
जो पुरुष कभी-कभी शील-संकोच व्यक्त करता है, उसे ह्रीमान्
कहते हैं।
जैसा 'ललितमाधव' में वर्णन है, अपनी कनिष्ठ अंगुली पर
गोवर्धन धारण करते समय श्रीकृष्ण में लज्जाभाव प्रकट हुआ था। सारी
गोपियाँ श्रीकृष्ण के इस अद्भुत कृत्य को निहार रही थीं और वे भी
गोपियों को देखकर मुस्करा रहे थे। जब उनकी दृष्टि गोपियों के वक्षः-
स्थल पर गई तो हाथ के कंपन से गोवर्धन तनिक-सा हिल गया जिससे
उसके नीचे खड़े सब गोपवृन्द कुछ भयभीत से हो गए। गोपों के इस भय
को देखकर बलराम जी हँस पड़े। परन्तु श्रीकृष्ण समझे कि बलराम ने
गोपियों के वक्षःस्थल को देखने में उनके मनोभाव को जान लिया है,
इसलिए लज्जित होकर उन्होंने तुरन्त सिर झुका लिया।
३७ शरणागत-पालक
श्रीकृष्ण सब शरणागत जीवों के रक्षक हैं।
श्रीकृष्ण का एक शत्रु तो इस विचार से ही मुग्ध हो उठा कि यदि
वह केवल श्रीकृष्ण के शरणागत हो जाय तो वे सब प्रकार से उसकी रक्षा
करेंगे। श्रीकृष्ण उस चन्द्रमा के समान हैं जो चाण्डाल और अस्पृश्यों के
घरों पर भी अपनी शीतल चन्द्रिका का वितरण करने में संकोच नहीं
करता।
३८. सुखी
निरन्तर प्रसन्न रहते हुए दुःख की गन्ध तक से सदा दूर रहने वाला
सुखी कहलाता है।
जहाँ तक श्रीकृष्ण द्वारा सुख के भोग का सम्बन्ध है, शास्त्रों में
उल्लेख है कि श्रीकृष्ण एवं उनकी महिषियों के श्रीअंग जिन अलंकारों से
से विभूषित रहते थे, स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर के लिए उनका मनोरथ
करना भी असम्भव है। श्रीकृष्ण के राजद्वार पर निरन्तर जो नृत्य चलता
था, स्वर्ग के देवता उसकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते। स्वर्ग में
इन्द्र सदा अप्सराओं के नृत्य को देखने में डूबे रहते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण के
द्वार पर अभिनीत नृत्य का सौन्दर्य इन्द्र के अनुमान से परे का था। गौरी से
भी अधिक सुन्दर और चन्द्रकलाओं से पूर्ण सुन्दरियों का निरन्तर श्रीकृष्ण
के पास अन्तःपुर में निवास था। अतः श्रीकृष्ण से बढ़कर भोगी और कौन

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५५
हो सकता है। भोग की तीन वस्तुएँ हैं—सुन्दर स्त्रियाँ, अलंकार एवं धन।
ये सभी श्रीकृष्ण के महलों में विद्यमान थीं, जिससे शिव, कुबेर, इन्द्र, आदि
की कल्पना तक परास्त हो जाती थी।
लेशमात्र दुःख भी कभी श्रीकृष्ण का स्पर्श नहीं कर सकता। एक
बार कुछ गोपियों ने याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाकर कहा
था, "हे ब्राह्मणपत्नियो ! तुम यह जान लो कि श्रीकृष्ण को दुःख की गन्ध
भी नहीं छू सकती। उन्हें न हानि की, न ग्लानि की, न अपयश की और
न भय, उद्वेग या उत्पात की कोई चिन्ता है। वे तो बस व्रजांगनाओं से
घिरे हुए उनके साथ रासरस का दिन-रात उपभोग करते रहते हैं।
३६. भक्तसुहृद
भक्तिभाव से तुलसी का एक पत्ता अथवा अंजलि भर जल को
अपर्ण करने से भी भक्तवत्सल भगवान् अपने आत्मा को भक्तों के हाथ
बेच देते हैं।
श्रीकृष्ण भक्तसुहृद हैं, यह भीष्म के साथ उनके युद्ध में भलीभाँति
प्रकट हुआ है। जिस समय भीष्म बाणों की शय्या पर मरणासन्न अवस्था
में पड़े थे, तो श्रीकृष्ण भी वहाँ उनके आगे उपस्थित थे। भीष्म को युद्ध का
वह दृश्य स्मरण हो आया जब श्रीकृष्ण ने उन पर कृपा की थी। श्रीकृष्ण
की प्रतिज्ञा थी कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में किसी भी दल की ओर से अस्त्र
को हाथ भी नहीं लगायेंगे, पूर्ण रूप से तटस्थ रहेंगे। अर्जुन के सारथि होते
हुए भी उनका प्रण था कि वे किसी अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से उसकी सहायता
नहीं करेंगे। परन्तु श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को भंग कराने के लिए भीष्म
ने एक दिन अर्जुन के विरुद्ध ऐसा अतुल पराक्रम प्रकट किया कि श्रीकृष्ण
अपने रथ से उतरने को बाध्य हो गए। एक खण्डित रथ के पहिए को
उठा कर पितामह की ओर दौड़े, मानो कोई सिंह गजराज को मारने
के लिए जा रहा हो। मरण-शय्या पर इस मार्मिक दृश्य को स्मरण करके
भीष्मदेव ने अपने भक्त अर्जुन के प्रति वात्सल्यवश अपनी प्रतिज्ञा भंग
करने में भी संकोच न करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का जय-जयकार
किया।
४०. प्रेमवश्य
श्रीकृष्ण भक्त के प्रेमभाव से वशीभूत हो जाते हैं। इसमें प्रेम ही
प्रधान है, सेवा का प्रकार नहीं। वैसे तो कोई भी श्रीकृष्ण की पूर्ण सेवा

१५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
नहीं कर सकता। वे अपने में सब प्रकार से पूर्ण एवं तृप्त हैं; अतः भक्त
से किसी प्रकार की सेवा की उन्हें अपेक्षा नहीं है। श्रीकृष्ण के लिए भक्त
का प्रेम और स्नेह ही उन्हें वशीभूत करता है। श्रीकृष्ण की इस प्रेम-
वश्यता का एक सुन्दर उदाहरण तब अभिव्यक्त हुआ जब सुदामा विप्र
उनके महल में आया। पूर्व में वह श्रीकृष्ण का सहपाठी रह चुका था;
अब दरिद्रता-निवारण के लिए स्त्री की प्रेरणा से श्रीकृष्ण के पास आया
था। श्रीकृष्ण ने उसका हार्दिक सत्कार किया और स्त्रियों सहित ब्राह्मण
समझ कर उसका पद-प्रक्षालन किया। मित्र से मिलते हुए श्रीकृष्ण
उसके साथ शैशव के प्रेमविहारों की स्मृति से प्रेमाश्रु बहाने लगे।
श्रीकृष्ण की प्रेमवश्यता का एक अन्य उदाहरण श्रीमद्भागवत
(१०.६.१८) में है। शुकदेव गोस्वामी परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् !
अपने को पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ती माता यशोदा को पसीने से तर
और बहुत श्रान्त हुआ जानकर श्रीकृष्ण स्वयं बँध गए।" बालकृष्ण अपने
चपल क्रीड़ा से माता को बहुत तंग करते, इसलिए माता उन्हें बाँधना चाहती
थीं। वे घर में से रस्सी ले आईं और उन्हें बाँधने लगीं। परन्तु रस्सी में
गाँठ नहीं लग सकी। उन्होंने रस्सी कितनी भी बढ़ायी, पर वह छोटी ही
रही। इससे उन्हें बहुत अधिक परिश्रम हुआ और शरीर से स्वेद-स्राव हो
चला। उस समय श्रीकृष्ण स्वयं माता के बन्धन में आ गए। भाव यह है
कि श्रीकृष्ण को प्रेम से ही बाँधा जा सकता है। भक्त उन्हें प्रेम करते हैं,
इसलिए वे उनके प्रेमवश्य हैं।
४१. सर्वशुभंकर
जो सदा सब का हितकारी हो, उसे सर्वशुभंकर कहते हैं।
इस धराधाम से श्रीकृष्ण के अप्रकट हो जाने पर उद्धव उनकी
लीलाओं का स्मरण करके कहने लगा, "अपने अद्भुत लीला-चरित से सब
मुनियों को कृतार्थ किया, क्रूर राजवंशों की सारी आसुरी क्रियाओं को
समाप्त किया, पुण्यात्माओं को बचाया और युद्ध में सभी क्रूरकर्मी पुरुषों को
मार डाला। अतः वे सभी के लिए कल्याणकारी हैं।"
४२. प्रतापी
शत्रुओं को संकट में डालने वाला प्रतापी कहलाता है।
जिस समय श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब जैसे प्रतापी
सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार को कन्दराओं की शरण में खदेड़ देता है, वैसे ही उनके
शत्रुरूप उलूक उनकी दृष्टि से दूर जा छिपे।

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५७
४३. कीर्तिमान्
निर्मल चरित के कारण प्रसिद्ध पुरुष कीर्तिमान् कहलाता है ।
श्रीकृष्ण के यश का प्रसारण उस चन्द्रकौमुदी के समान है जो
कालिमा को भी शुभ्र ज्योत्स्ना में बदल देती है । अर्थात्, यदि कृष्णभावना
का सम्पूर्ण जगत् में प्रसार किया जाय तो भवरोग का उद्वेग और
अन्धकार शुद्धता, शान्ति और समृद्धि की शुभ्र ज्योत्स्ना में परिणत हो
जायगा ।
देवर्षि नारद के वीणा पर श्रीकृष्ण की कीर्ति का गान करने पर
शिवजी का कण्ठ नीला न रहा । यह देखकर परपुरुष की आशंका से गौरी
ने शिवजी को त्याग दिया; नीलाम्बरधारी बलराम जी ने अपने वस्त्र को
श्वेत देखकर फेंक दिया; तथा यमुनाजल को दूध हुआ देखकर गोपियाँ
उससे मक्खन का मन्थन करने लगीं। भाव यह है कि कृष्णभावना के प्रसार
से सब कुछ शुद्ध और शुभ्र हो जाता है।
४४. रक्तलोक
जो पुरुष सम्पूर्ण लोक का प्रीतिभाजन हो, उसे रक्तलोक कहते हैं ।
श्रीकृष्ण की लोकप्रियता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.११.६)
में है जब वे हस्तिनापुर से घर लौटे थे । कुरुक्षेत्र के युद्ध में द्वारका से
उनकी अनुपस्थिति के कारण सारे द्वारकावासी बहुत हतप्रभ हो गए थे ।
फिर जब वे लौटे तो सारे निवासियों ने बड़े ही हर्षोल्लास सहित उनका
अभिवादन किया और कहा, "हे नाथ ! जब आप यहाँ से चले जाते हैं तो
आपके बिना एक-एक क्षण रात्रि के समान अंधकारमय, करोड़ों वर्ष के जैसा
हो जाता है । हमारे लिए आपका विरह असह्य है ।" इस वाक्य से पता
चलता है कि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देश में कितने लोकप्रिय थे ।
ऐसी ही घटना तब घटी जब श्रीकृष्ण उस यज्ञमण्डप में आए, जिसका
आयोजन राजा कंस ने अपने ही मरण के लिए किया था । श्रीकृष्ण को
पधारते देखकर सारे ऋषिवृन्द जयजयकार करने लगे । श्रीकृष्ण कुमारा-
वस्था में थे, अतः सब ऋषियों ने सादर आशीर्वाद दिया । वहाँ आए
देवताओं ने भी श्रीकृष्ण का स्तवन किया तथा चारों ओर से नगर की
नारियों की हर्षध्वनि होने लगी । भाव यह है कि उस स्थान में ऐसा कोई
नहीं था, श्रीकृष्ण जिसके अनुराग के पात्र न हों ।
४५. साधुसमाश्रय
यद्यपि श्रीकृष्ण परात्पर भगवान् के रूप में किसी से पक्षपात नहीं

१५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
करते, तथापि भगवद्गीता के अनुसार जो श्रद्धा-प्रेम से उनके नाम का भजन
करता है, उस भक्त के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहता है। श्रीकृष्ण
के जगत् में अवतरण-काल में एक भक्त ने वह उद्गार प्रकट किया था,
"हे पुरुषोत्तम ! यदि आप जगत् के कल्याण के लिए अवतरण न करते तो
असुरों की भयंकर क्रियाओं के कारण न जाने सज्जनों की क्या दशा होती।"
अपने आविर्भाव के प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण सब प्रकार के आसुरी जीवों के
परम वैरी थे, यद्यपि असुरों से उनके द्वेष और भक्तों से प्रेम में भेद नहीं
है, क्योंकि श्रीकृष्ण के हाथ से मरा कोई भी असुर तत्काल मुक्तिलाभ
कर लेता है।
४६. नारीगणमनोहारी
जिस पुरुष में विशेष गुण हों, वह सुन्दरियों के समूह को मोहित
करने वाला होता है।
द्वारका की महिषियों के सम्बन्ध में एक भक्त ने कहा, "साक्षात्
भगवान् की सेवापरायणा द्वारका की महिषियों की महिमा का क्या कहना।
भगवान् की महिमा इतनी अगाध है कि नारद आदि सब ऋषिवृन्द उनके
नाम-कीर्तन से ही दिव्य रस का आस्वादन कर सकते हैं; फिर उन महिषियों
का क्या कहना जो निरन्तर उनका दर्शन और सेवन करती थीं?" द्वारका
में श्रीकृष्ण की १६१०८ महिषियाँ थीं। ये सभी श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट
रहती थीं, ठीक उसी प्रकार जैसे लोहा चुम्बक की ओर। एक भक्त का
उद्गार है, "हे कृष्ण ! आप चुम्बक हैं और व्रजांगनायें लोहे जैसी हैं।
आप जहाँ भी जाते हैं, वे आपके पीछे-पीछे दौड़ती हैं।"
४७. सर्व आराध्य
जो सब देव-मनुष्यों के लिए सबसे पहले पूजा के योग्य हो, उसे
सर्वाराध्य कहते हैं।
श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि सब जीवों के ही नहीं, वरन् बलराम,
शेष जैसे विष्णुरूपों के भी आराध्य हैं। बलदेव श्रीकृष्ण के स्वयं प्रकाश हैं,
परन्तु वे भी उन्हें आराध्य मानते हैं। जब श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के राजसूय
में पधारे तो वे ऋषि, देव, सहित सारे सभासदों के आकर्षण के केन्द्र बन
गए और सभी ने उनका अग्रपूजन किया।
४८. समृद्धिमन्
श्रीकृष्ण वीर्य, श्री, यश, रूप, ज्ञान और वैराग्य—सभी ऐश्वर्यों में

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५६
पूर्ण हैं। उनके द्वारका-निवास के समय यदुवंश में ५६ करोड़ सदस्य थे ।
ये सभी श्रीकृष्ण के विश्वासपात्र और आज्ञानुचर थे। नगर में नौ लाख
प्रासाद थे जिनके सारे निवासी श्रीकृष्ण को प्राणाराध्य समझते थे ।
श्रीकृष्ण के इस ऐश्वर्य को देखकर किसे आश्चर्य नहीं होगा । विल्वमंगल
ठाकुर ने कृष्णकर्णामृत के एक श्लोक में यही उद्गार अभिव्यक्त किया
है, "हे कृष्ण ! तुम्हारे वृन्दावन के ऐश्वर्य का क्या कहना । व्रजांगनाओं
के चरणों के भूषण चिन्तामणि से भी बढ़कर हैं और उन्होंने पारिजात के
पुष्पों का श्रृंगार धारण कर रखा है। गायें बिलकुल गोलोक धाम की
सुरभि गायों जैसी हैं। अहो ! आपके ऐश्वर्य-सागर को कौन माप
सकता है ।"
४६. वरीयान्
जो सम्पूर्ण मान्य पुरुषों में प्रधान हो उसे वरीयान् कहते हैं।
जिस समय श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तो शिव, ब्रह्मा,
इन्द्र, आदि सब देवता उनके दर्शन के लिए आते थे। एक दिन प्रतिहारी
कहने लगा, "हे ब्रह्माजी—शिवजी ! कुछ देर सामने बैठकर प्रतीक्षा करें;
हे देवराज ! चाटुकारी करना व्यर्थ है, चुपचाप बैठो; हे वरुण ! तुम भागो
यहाँ से । ये सब देवता द्वार पर कोलाहल क्यों कर रहे हैं? अभी
द्वारकानाथ को मिलने का अवकाश नहीं है ।"
५०. परमईश्वर
जो स्वतन्त्र हो तथा जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न कर सके,
उसे ईश्वर कहते हैं ।
श्रीकृष्ण की पूर्ण स्वतन्त्रता और ईश्वरत्व के सम्बन्ध में श्रीमद्-
भागवत कहती है कि यद्यपि कालिय महान् अपराधी था; फिर भी श्रीकृष्ण
ने उसे अपना चरणचिन्ह प्रसाद रूप में प्रदान किया, जबकि नाना प्रकार से
स्तुति करने पर भी ब्रह्मा की ओर देखा तक नहीं ।
श्रीकृष्ण का यह विचित्र व्यवहार सर्वथा योग्य ही है क्योंकि सम्पूर्ण
वैदिक शास्त्रों में उन्हें पूर्ण स्वतन्त्र कहा गया है। श्रीमद्भागवत के आदि
में आए 'स्वराट्' शब्द का भी यही तात्पर्य है। परम् ब्रह्म की स्थिति ऐसी
ही है । परतत्त्व चैतन्य ही नहीं है, पूर्ण स्वतन्त्र भी है ।
जहाँ तक सबके लिए श्रीकृष्ण की आज्ञा की दुर्लंघ्यता है, उसके
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.२.२१) में उद्धवजी विदुर से कहते हैं, "भगवान्

१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्ण त्रिगुणमयी माया के अधीश्वर हैं। वे सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भोक्ता हैं,
इसलिए उनके समान अथवा उनसे अधिक कोई नहीं हो सकता।" सारे
लोकपाल आकर उन्हें भेंट चढ़ाते थे और अपने मुकुटों से भगवान् के
चरणपीठ की वन्दना करते थे। एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! ब्रह्मा को
सृष्टि की आज्ञा देकर और शिव को संहार की आज्ञा करके आप ही सृष्टि-
संहार कर रहे हैं। आप केवल अपनी आज्ञा और अंशरूप विष्णु के द्वारा
सृष्टि का पालन करते हैं। हे कंसारि ! दिशा-दिशा में खड़े सारे ब्रह्मा,
शिव आदि आपके वशवर्ती हैं।
५१. सदास्वरूपसम्प्राप्त
श्रीकृष्ण का स्वरूप कभी नहीं बदलता, यहाँ तक कि प्राकृत-जगत्
में अवतरित होने पर भी उनका स्वरूप अविकृत रहता है। साधारण जीवों
का अप्राकृत स्वरूप ढक जाता है। वे नाना देह धारण करते हुए देहात्म-
बुद्धि के भेद से कर्म करते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण का शरीर कभी नहीं बदलता।
वे अपने आदि स्वरूप में ही प्रकट होते हैं; इसलिए प्रकृति के गुणों के अधीन
नहीं हैं। श्रीमद्भागवत (१.११.३८) के अनुसार परमेश्वर की यह विशेषता
है कि वह माया के गुणों से कभी प्रभावित नहीं होता। इसका प्रत्यक्ष
उदाहरण भगवान् के शरणागत भक्त हैं जो माया से परे हो जाते हैं।
माया से पार होना बड़ा कठिन है, परन्तु भगवान् के संरक्षण में स्थित
सन्तपुरुष माया से पार हो जाते हैं। फिर स्वयं भगवान् के सम्बन्ध में क्या
कहना है ? यद्यपि भगवान् कभी-कभी इस प्राकृत-जगत् में प्रकट होते हैं, पर
प्रकृति के गुण उनका स्पर्श नहीं कर सकते। वे शुद्ध सत्त्व में स्थित रहकर
पूर्ण स्वतन्त्रता से कार्य करते हैं। भगवान् का यह एक विशेष गुण है।
५२. सर्वज्ञ
जो सबके मनोभाव को और सम्पूर्ण देशकाल की घटनाओं को
जानता हो, उसे सर्वज्ञ कहते हैं ।
श्रीभगवान् की सर्वज्ञता का एक सुन्दर उदाहरण श्रीमद्भागवत
(१.१५.११) में है। इसका सम्बन्ध उस घटना से है जब दुर्वासा मुनि वन में
पाण्डवों के निवास पर गए थे। पूर्व योजना के अनुसार दुर्योधन ने वन में
पाडवों के पास दस हजार शिष्यों के साथ दुर्वासा को अतिथिरूप में भेजा।
दुर्योधन ने ऐसी व्यवस्था की जिससे दुर्वासा का दल उस समय पाण्डवों के
यहाँ पहुँचे, जब पाण्डव भोजन कर चुके हों। भोजन न मिलने पर दुर्वासा

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६१ ]
शाप देकर पाण्डवों का नाश कर दें, ऐसा दुर्योधन का अभिप्राय था। दुर्योधन
के इस कुचक्र को जानकर श्रीकृष्ण पाण्डवों के पास आए और कहने लगे कि
मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को दो। द्रौपदी उनके सामने खाली बर्तन ले
आई। परन्तु श्रीकृष्ण ने देखा कि उसमें साग का एक टुकड़ा शेष है। वे
तुरन्त उसे खा गए। दुर्वासा का दल उस समय नदी में स्नान कर रहा
था। द्रौपदी के अर्पण को खाने से श्रीकृष्ण की तृप्ति होते ही वे सब भी
तृप्त हो गए, उनकी भूख जाती रही। इसलिए फिर वे भोजन के लिए
युधिष्ठिर के स्थान पर नहीं लौटे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को
दुर्वासा की क्रोधाग्नि से बचाया। दुर्योधन ने उन्हें यह सोचकर पाण्डवों के
पास भेजा कि वे इतनी बड़ी संख्या का आतिथ्य नहीं कर सकेंगे और तब
दुर्वासा क्रुद्ध होकर पाण्डवों को शाप दे देंगे। परन्तु श्रीकृष्ण ने अपनी युक्ति
और सर्वज्ञता के गुण के कारण इस आपत्ति से उनका रक्षण कर लिया।
५३. नित्यनूतन
भक्तजन निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण और नामकीर्तन करते हैं, पर
फिर भी कभी तृप्त नहीं होते। उनकी इसमें कभी अरुचि नहीं होती; वे
नित्य नव-नव उत्साह के साथ भगवत्स्मरण और नामकीर्तन करते ही रहते
हैं। इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण नित्यनूतन हैं। श्रीकृष्ण ही नहीं,
उनका ज्ञान भी नित्यनूतन है। भगवद्गीता ५००० वर्ष पहले सुनाई गई
थी, परन्तु आज भी करोड़ों लोग बार-बार उसे पढ़ते हैं और हर बार उसमें
नया प्रकाश मिलता है। अतः श्रीकृष्ण एवं उनके नाम, यश, चिद्गुण और
उनसे सम्बन्धित सभी कुछ नित्यनूतन है।
द्वारका की सारी महिषियाँ लक्ष्मीदेवी थीं। श्रीमद्भागवत (१०.
११.३३) में कहा है कि लक्ष्मीदेवी बड़ी ही चंचला हैं, उन्हें कोई वश में नहीं
कर सकता। अतः किसी का भी भाग्य स्थिर नहीं रहता। परन्तु वही
लक्ष्मी देवी द्वारका में श्रीकृष्ण की सेवा को क्षणभर को भी नहीं छोड़ती
थीं। स्पष्टतः श्रीकृष्ण का आकर्षण नित्यनूतन है। लक्ष्मीदेवी भी उनका
संग नहीं छोड़ सकतीं।
श्रीकृष्ण के नित्यनूतन आकर्षण के सम्बन्ध में 'ललितमाधव' में
राधारानी का एक वाक्य है जिसमें श्रीकृष्ण को अपूर्व विश्वकर्मा कहा गया
है क्योंकि वे स्त्रियों के धर्म रूप पत्थरों को तोड़ने में दक्ष हैं। भाव यह है
कि पतिव्रता स्त्रियाँ चाहे सदा वैदिक विधान का आचरण करना चाहें, पर
श्रीकृष्ण अपनी माधुरीरूप हथौड़ी से उनके पातिव्रत्य रूप पत्थर को तोड़

१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
ही डालते हैं। श्रीकृष्ण की अधिकांश सखियों का विवाह हो चुका था;
परन्तु विवाह से पूर्व हुए श्रीकृष्ण के परिचय और उस श्रीअंग सौन्दर्य को
वे भुला न सकीं, जो विवाह के बाद भी उनके लिए मनोहारी था।
५४. सच्चिदानन्द विग्रह
श्रीकृष्ण का दिव्य शरीर सच्चिदानन्दमय है। सत् अर्थात् देशकाल
में सर्वव्यापी और चित् अर्थात् ज्ञानमय। श्रीकृष्ण को किसी से कुछ सीखना
नहीं है। वे स्वतन्त्र रूप से पूर्ण ज्ञानी हैं। आनन्द, अर्थात् अखिल रसराज।
निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहते हैं, जिसमें केवल सत् और
चित् हैं। परन्तु श्रीकृष्ण में प्राप्त ब्रह्मसुख के मुख्यांश से वे वंचित रह जाते
हैं। ब्रह्मज्योति में लीन होने के दिव्य सुख का अनुभव मोह, मिथ्या देहात्म-
बुद्धि, राग, द्वेष और विषयासक्ति के विकारों से मुक्त होने पर ही होता है।
ब्रह्मानुभूति के लिए यह प्रारम्भिक योग्यता है। भगवद्गीता में उल्लेख है
कि प्रसन्नावस्था में स्थित हो जाना चाहिए। इसका प्रारम्भ शोक-निवृत्ति
से होता है। ब्रह्मभूत पुरुष तो प्रसन्नावस्था के साधक ही हैं। उस प्रसन्नता
की प्राप्ति वास्तव में श्रीकृष्ण का संग होने पर ही होती है। कृष्णभावना
सर्वथा पूर्ण है, अतः निर्विशेष ब्रह्म से प्राप्त वाला सुख उसमें अन्तर्निहित
(समाविष्ट) है। जो निर्विशेषवादी हैं, वे भी श्रीकृष्ण के श्यामसुन्दर रूप
पर मोहित हो जाते हैं।
ब्रह्मसंहिता का प्रमाण है कि ब्रह्मज्योति श्रीकृष्ण की अंगकांति है,
अर्थात् केवल श्रीकृष्ण का शक्तिप्रकाश है। श्रीकृष्ण ब्रह्मज्योति के स्रोत
हैं, जैसा भगवद्गीता में वे स्वयं कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि
परतत्त्व की निर्विशेष विभूति अन्तिम नहीं है; श्रीकृष्ण ही परतत्त्व की
अवधि हैं।
वैष्णव सम्प्रदाय इसीलिए संसिद्धि के लिए ब्रह्मज्योति में कभी
लीन होना नहीं चाहते। वे श्रीकृष्ण को स्वरूप-साक्षात्कार का परम लक्ष्य
समझते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण परम् ब्रह्म और परमेश्वर कहलाते हैं।
श्रीयामुनाचार्य प्रार्थना करते हैं, "हे भगवन् ! यह जो ब्रह्माण्ड है और
इसके अन्तर्गत जो कुछ देशकाल और एक-दूसरे से दस-दस गुण महत्त्व
वाले प्राकृत तत्त्वों के दस आवरण, प्रकृति के तीनों गुण, गर्भोदकशायी
विष्णु, क्षीरोदकशायी विष्णु, महाविष्णु, और उनसे परे परव्योम, ब्रह्म-
ज्योति, तथा वैकुण्ठ-धाम हैं-ये सब के सब आप की शक्ति की विभूति-
मात्र हैं।

श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६३
५५. सर्वसिद्धिनिषेवित
सिद्धि के अनेक स्तर हैं। पूर्ण योगियों को प्राप्त सर्वोच्च प्राकृत
सिद्धियाँ आठ हैं—अणिमा, गरिमा इत्यादि । ये सब प्राकृत सिद्धियाँ तथा
सारी अप्राकृत सिद्धियाँ भी श्रीकृष्ण में पूर्ण रूप से रहती हैं।
५६. अचिन्त्य महाशक्ति
श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं, वे ब्रह्माण्ड ही में नहीं, सम्पूर्ण जीवों के हृदय
में ही नहीं, वरन् अणु-अणु में विद्यमान हैं। महारानी कुन्ती ने अपने स्तवन
में श्रीकृष्ण की इस चिन्तनातीत दिव्य शक्ति का उल्लेख किया है। कुन्ती
देवी से वार्तालाप करते-करते ही वे उत्तरा के गर्भ में प्रविष्ट हो गए, जो
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से आक्रान्त थी। श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि को
भी मोहित कर सकते हैं और सम्पूर्ण शरणागत भक्तों के अमंगलमय
प्रारब्ध को विध्वंस करने में भी समर्थ हैं। ये उनकी अचिन्त्य शक्तियों के
कुछ उदाहरण मात्र हैं।
अस्तु, श्रील रूप गोस्वामी भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए
कहते हैं, "सम्पूर्ण अपरा प्रकृति नराकृति श्रीकृष्ण की छायामात्र है।
उन्होंने असंख्य गौ, गौवत्स और गोपबालकों के रूप में अपना विस्तार किया
है और फिर उन सब में चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुए। उन्होंने
करोड़ों ब्रह्माओं को आत्मविद्या प्रदान की है, इसलिए वे ब्रह्माण्ड के अधी-
श्वरों के ही नहीं, वरन् चराचर जीवमात्र के आराध्य हैं। उन भगवान् को
मैं प्रणाम करता हूँ।"
जब श्रीकृष्ण इन्द्र को हरा कर स्वर्ग से पारिजात हरण करके ले
गए तो नारद जी उसके पास आकर उसे धिक्कारने लगे, "हे महेन्द्र !
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव आदि को हरा रखा है, फिर तुझ जैसे तुच्छ देवता
किस कोटि में हैं ?" नारदजी के इस परिहास से इन्द्र हँस पड़ा। उनके
वाक्य में यह पुष्टि है कि श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र को सर्वथा
मोहित कर दिया था। फिर और जीवों के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की शक्ति
का तो कहना ही क्या है ।
भक्त के पापफल को दूर करने में श्रीकृष्ण की शक्ति का विवरण
ब्रह्मसंहिता में है, "इन्द्र से लेकर इन्द्रगोप कीड़े तक जीवमात्र प्रारब्ध भोग
रहा है। परन्तु श्रीकृष्ण की कृपा से कृष्णभक्त इनसे छूट जाता है।" यह
उस समय सिद्ध हो गया जब श्रीकृष्ण अपने मृत गुरुपुत्र को वापस लाने
यमालय गए। गुरु ने उनसे गुरुदक्षिणा के रूप में उनके मृत पुत्र को लौटा
लाने को कहा था। अतः श्रीकृष्ण तुरन्त यमलोक को गए और यमराज को

१६४] भक्तिरसामृतसिन्धु
आज्ञा दी, "उस जीव के कर्म की ओर ध्यान न देकर उसे तुरन्त मुझे लौटा
दो।" इस घटना का तात्पर्य यह है कि प्रकृति के नियमानुसार यम द्वारा
दण्डनीय प्राणी भी कृष्णकृपा से पूर्णतः छूट सकता है।
श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का वर्णन शुकदेव गोस्वामी ने
श्रीमद्भागवत में इस प्रकार किया है, "जो अजन्मा होने पर भी नन्द
महाराज के पुत्र हैं, सर्वव्यापक होने पर भी यशोदा के अंक में खेलते हैं विभु
होते हुए यशोदा की प्रेम-रज्जु से बँध गए हैं, अनेकरूप होने पर भी जो
नन्द-यशोदा के आगे एकरूप में विचर रहे हैं, वे अनन्त अचिन्त्य शक्ति-
शाली श्रीकृष्ण मेरी बुद्धि को मुग्ध कर रहे हैं।" ब्रह्मसंहिता में भी उल्लेख
है कि यद्यपि अपने गोलोक वृन्दावन धाम में श्रीकृष्ण का नित्य-निवास है,
तथापि वे सर्वव्यापक हैं, यहाँ तक कि परमाणुओं में भी हैं।
५७. कोटिब्रह्माण्डविग्रह
श्रीमद्भागवत (१०.१४.११) में ब्रह्माजी कहते हैं, "महत्तत्त्व, अहं-
कार, मन, बुद्धि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी-इन प्राकृत तत्त्वों से यह
बृहत् अण्ड बना है। केवल एक ब्रह्माण्ड का रचयिता इस प्रकार का तुच्छ
शरीर वाला कहाँ और कहाँ मैं आप, जिनके रोमकूपों से प्रकाश में
परमाणुओं के समान असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं। आपके
महत्त्व के सामने मैं तो बिल्कुल नगण्य हूँ, अतः क्षमा करके मुझ पर कृपा
कीजिए।"
यदि कोई केवल एक ब्रह्माण्ड की भी जाँच करे तो उसमें असंख्य
लोक, निवास और देवलोक जैसी अद्भुत वस्तुयें पायगा। ब्रह्माण्ड का
पूर्ण विस्तार ५० करोड़ योजन है और वह अनेक अप्रमेय पाताल लोकों से
भी युक्त है। श्रीकृष्ण इस सब के उद्गम अवश्य हैं; परन्तु अपनी अचिन्त्य
शक्ति का विस्तार करते हुए वे सदा वृन्दावन में ही रहते हैं। ऐसे सर्व-
शक्तिमान् प्रभु की स्तुति में कौन समर्थ हो सकता है ?
५८. अवतारावलीबीज
गीतगोविन्द में जयदेव गोस्वामी ने गाया है, "भगवान् ने मत्स्यरूप
से वेदों का उद्धार किया है; कूर्मावतार में सम्पूर्ण जगत् का वहन किया
है; वराह अवतार में पृथ्वी को जल से निकाला है; नृसिंहरूप में हिरण्यक-
शिपु का वध किया है, वामन अवतार में बलि से छल किया है; परशुराम
के रूप में सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंश का नाश किया है; राम अवतार में सब असुरों