भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्ण के दिव्य गुण [ १४३
अब श्रीकृष्ण 'वास' का अर्थ सुगंध समझकर बोले—"हे सुभगे !
तुम्हारे अंगों के संसर्ग से मुझे यह सुवास प्राप्त हुआ है।"
श्रीमती राधारानी ने श्रीकृष्ण से फिर पूछा—"हे धूर्त ! तुमने रात्रि
कहाँ बितायी ?" (यामिन्यामुषितः यामिन्याम् = रात्रि; उषितः = व्यतीत
की)। परन्तु श्रीकृष्ण ने उस 'यामिन्यामुषितः' का प्रकारान्तर से 'यामिन्या
मुषितः' पदच्छेद किया, जिसका अर्थ यह हो गया कि रात्रि ने उनका हरण
किया। वे कहने लगे—"हे राधे ! भला क्या रात्रि भी चोरी करती है ?"
इस प्रकार राधारानी के सब प्रश्नों का छलपूर्वक उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण
इस परमप्रिया गोपी को आनन्दित कर रहे थे।
१४. विदग्ध
कला तथा विलास में अतिशय कुशल को विदग्ध कहा जाता है।
यह विशेष गुण श्रीकृष्ण के स्वरूप में प्रकाशित है, राधारानी कहती हैं,
"हे सखि ! कृष्ण कभी गीत रचते हैं, कभी विनोद करते हैं, कभी वंशी
बजाते हैं, कभी नाचते हैं, मालायें गूंथते हैं और कभी ऐसा मधुर श्रृंगार
करते हैं मानो उन्होंने द्यूत में सब खिलाड़ियों को जीत लिया हो। इस
प्रकार परमोच्च कला का विलास करते हुए श्रीहरि अद्भुत क्रीड़ा कर
रहे हैं।"
१५. चतुर
एक साथ अनेक कार्य करने की सामर्थ्य वाले को चतुर कहते हैं।
एक गोपी कहती है, "हे सखियो ! कृष्ण की चातुरी भरी क्रियाओं को तो
देखो। वे नाना गोपगीतों की रचना करके गोधन को आह्लादित कर रहे
हैं तथा नेत्रप्रान्तों के संचालन से गोपियों को प्रसन्न और अरिष्ट आदि
असुरों को भयभीत कर रहे हैं। इस प्रकार नाना जीवों के साथ नाना
प्रकार से वे पूरा आनन्द उठा रहे हैं।"
१६. दक्ष
कठिन कार्य को भी सरलता से तत्काल कर देने वाला दक्ष है।
श्रीकृष्ण की दक्षता के सम्बन्ध में शुकदेवजी श्रीमद्भागवत में परीक्षित से
कहते हैं, "हे कुरुश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने सब योद्धाओं के नाना अस्त्रों को खण्ड-
खण्ड कर दिया।" प्राचीन काल में जब धनुष-बाण से युद्ध होते थे, एक
दल बाण चलाता और विपक्ष अन्य बाण से उसका प्रतिकार करके परास्त
करता। उदाहरण के लिए, यदि एक दल आकाश से जल की वर्षा करने