भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
सिधारने वाले एक युवक के प्रति यह वाक्य कहना विस्मयजनक मालूम हुए बिना
न रहे, पर एक बात दरअसल ऐसी ही थी। यदि उन्हें अन्य प्रसिद्ध योद्धाओं की
तरह पूर्ण रूप से शिक्षण का अवसर मिला होता, यदि उन्हें भी अनुकूल स्थितियों
में रखकर पूर्ण रूप से शिक्षा दी जाती तो निश्चय ही वे संसार के किसी भी योद्धा
तथा सेनापति से कम न रहते।
मुझे बहुत दिनों तक उनकी मृत्यु का समाचार बताया न गया। मैं अन्धविश्वासी
नहीं हूँ। मैं अलौकिक बातों में विश्वास नहीं रखता। परन्तु सच कहता हूँ, मुझे उसी
दिन पता चल गया था कि मेरे प्यारे ट्रीसी अब इस संसार में नहीं रहे। वे मुझे अपने
पैताने खड़े मुस्कुराते हुए दिखायी दिये थे। उसी दिन सायंकाल मिक कोलिन्स मेरी
ख़बर लेने को आये। उत्सुकतावश मैंने पहला प्रश्न यही पूछा – ट्रीसी कहाँ हैं?
सजल नेत्रों को दूसरी ओर फेरकर छिपाने का प्रयत्न करते हुए रुँधे गले से वे इतना
ही कह पाये, कि ‘वे कहीं बहुत दूर गये हैं।’ दस दिन बाद मुझे ठीक समाचार
मिला। शिपस्ट्रीट बेरेक से श्री ट्रीसी का शव ट्रिप्रेरी ले जाया गया। वहाँ उनका जो
सत्कार हुआ, वह शायद किसी नरेश को भी नसीब न हुआ होगा। सोलोहैडबेग चर्च
से – जहाँ कि वे बाल्यावस्था में प्रार्थनाएँ किया करते थे-चलकर उनका शव
किल फीकल नगर से गुज़रा। शोकग्रस्त लोगों का यह जुलूस मीलों लम्बा था।
ट्रिप्रेरी का ऐसा कौन-सा व्यक्ति था जिसके हृदय में उस दिन देशभक्ति के भाव
हिण्डौले न ले रहे हों और जो उस दिन उस जुलूस के साथ शुष्क नेत्रों से गया
हो? वह समाचार उस समय प्रदेश के लिए बड़ा शोकजनक समाचार था। उनकी
क़ब्र आज तीर्थ बन गयी है।
अगले शुक्र के दिन मैं मेटर अस्पताल में ले जाया गया। यहाँ पर खूब
ख़ातिरदारी होने से शीघ्र ही आरोग्य लाभ करने लगा। एक दिन एकाएक क्या देखता
हूँ कि मकान घिर गया है। सैनिक लोग तलाशी लेने की तैयारी कर रहे हैं। एकदम
ऊपर वाली छत पर जाने के विचार से उधर जो लपका, तो ख़ाकी वर्दी वालों को
खड़ा पाया। मृत्यु निश्चय समझ लौटकर वहीं आ बैठा। दर्शकों के जमघट में जो
दृष्टि गयी तो मिक कोलिंज को खड़ा पाया। पता चला कि मेरे गिरफ़्तार होने पर
मुझे छुड़ाने के विचार से ही वे अपने दल सहित आये थे। पर सब स्थानों की
तलाशी लेकर, केवल मेरा ही कमरा छोड़कर पुलिस वाले क्यों लौट गये, मैं कभी
भी नहीं समझ पाया। वहाँ से डन लेघायर के घर पर ले जाया गया। वहाँ भी पुलिस
ने तलाशी ली, परन्तु मेरे कमरे की नहीं। इस रहस्य का भी कुछ पता न चला।
मैं हैरान रह गया।
21 नवम्बर 1920 का ख़ूनी रविवार मैं कभी न भूल सकूँगा। उस दिन प्रातः
ही नगरभर में सनसनी फैल गयी। नगरभर में 14 जासूस अपने अपने घरों में ही
मार डाले गये थे। हमारे और तो सभी व्यक्ति बच गये, परन्तु फ्रैंकटीलिंग पकड़े
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गये। उन्हें फाँसी का दण्ड सुना दिया गया। परन्तु आप वहीं से रफूचक्कर हो गये।
बाद में पेड़ीमोर को पकड़कर फाँसी पर लटका दिया गया। हालाँकि वे उस दिन
वहाँ थे ही नहीं। वे एक बड़े वीर सैनिक थे।
उस दिन सरकार ने प्रतिहिंसा के भाव से प्रेरित होकर दो बड़े भीषण और क्रूर
कार्य कर डाले। सायंकाल के समय पुलिस ने ‘कार्क पार्क’ को घेर लिया। उस
समय वहाँ 10,000 व्यक्ति फुटबाल का मैच देख रहे थे। उन पर पुलिस ने गोलियों
की वर्षा कर अपनी बर्बरता, क्षुद्रता तथा नृशंसता का परिचय देने में कुछ कसर
उठा न रखी। 17 व्यक्ति परलोक सिधार गये, 50 बुरी तरह घायल हुए।
दूसरा अत्यन्त वेदनाजनक समाचार था श्री पीडरक्लैंसी तथा डिक मैक की
हत्या का। उन्हें पकड़कर और यह दोष बताकर कि उन्होंने फ्रेंच पार्क के पहरेदारों
पर आक्रमण किया था, तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया। इस अभियोग के प्रत्युत्तर
में केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उन स्वेच्छा-सेवकों के बारे में –
जिन्होंने कि अपने रणचातुर्य से अंग्रेजों को नाकों चने चबवाये थे, बिना अन्य
साथियों को लिए फ्रेंच पार्क के प्रहरियों पर आक्रमण करने की बात कहना सर्वदा
हास्यास्पद है। जो भी हो, पुलिस उन वीरों से जली बैठी थी। अवसर पाते ही उसने
अपनी प्रतिहिंसा की भभकती हुई आग को शान्त करने के लिए उन पर मनमाने
अत्याचार कर उन्हें मार डाला।
बेचारे पीडर और डिक! दोनों कैसे साहसी वीर, कितने मृदुल, कितने कट्टर
देशभक्त और कैसे सुचतुर सेनापति थे! उन्हें श्री ट्रीसी की तरह दो-दो हाथ दिखाने
तक का सुअवसर न मिल सका! अफ़सोस!!
बारहवाँ परिच्छेद
ज़िला इंस्पेक्टर की हत्या और मेरा विवाह
मैं खूब स्वस्थ होकर टिप्रेरी लौट आया। इस समय युद्ध ने खूब ज़ोर पकड़ लिया
था। रणचण्डी का ताण्डव नृत्य हो रहा था। देशभर में खूब चहल-पहल थी।
आयरिश लोग बड़े हर्ष और चाव से अपने आदर्श के लिए, अपने देश के लिए,
अपनी मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग कर रहे थे। मानो आयरिश जाति स्वतन्त्रता देवी
के मन्दिर में निज रक्त मांस की भेंट से उस देवी को प्रसन्न करने का दृढ़ निश्चय
कर वहीं डट गयी थी।
अंग्रेज़ी न्यायालय एकदम ख़ाली हो गये थे। ‘मृत्युदण्ड’ घोषित किये रहने पर
भी प्रजातान्त्रिक न्यायालय खचाखच भरे रहते थे। देशवासियों का झुकाव प्रजातन्त्र
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की ओर था। अब परिस्थिति भी बहुत बदल चुकी थी। हमारे सैनिक रायफ़लें लेकर
खुल्लम-खुल्ला घूमने लगे। जहाँ-तहाँ लोग उनका ख़ूब स्वागत करते।
मैं काहिर और रोज़ग्रीन प्रदेश में चला गया। फिर मैंने अधिकतर युद्ध उसी देश
में किये। अप्रैल 1921 में समाचार मिला कि ब्रिटिश सेना का एक छोटा-सा दल
कुछ रक्षित वस्तुएँ लेकर, प्रति बुधवार प्रातःकाल क्लोधिन और काहिर के बीच
में से गुज़रता है, उन्हीं से युद्ध करने की ठानी। 22 अप्रैल का दिन नियत हुआ।
प्रातः 5 बजे से एक बजे तक प्रतीक्षा की, पर वे नहीं आये। मैं और कौनमौलोनी
वहाँ से लौट आये। परन्तु हमें लौटे कुछ अधिक देर नहीं हुई थी कि वे आ गये।
हमारे सैनिकों ने धावा बोल दिया। आत्मसमर्पण करने को कहा गया, परन्तु प्रत्युत्तर
में गोलियों की वर्षा की गयी। युद्ध हुआ। एक सिपाही मरा, दो घायल हुए और
तब उन्होंने आत्मसमर्पण किया। उनके शस्त्र छीन लिए गये। ‘रक्षित वस्तु’ विनष्ट
कर दी गयी और फिर उन्हें छोड़ दिया गया।
घटनास्थल से पुलिस की कई बड़ी भारी-भारी चौकियाँ इतनी निकट थीं कि
उन्होंने गोलियों का शब्द ज़रूर सुना होगा। इसी कारण सभी सैनिकों ने वहाँ से तुरन्त
लौट जाना ही उचित समझा। वे सैनिकों की तरह मार्चिंग करते हुए चले आ रहे
थे। एक मोड़ पर मुड़ने के समय एक मोटर पीछे से आयी और अन्तिम लाइन के
स्वेच्छा-सेवकों से टकरा गयी। मोटर वाले का नाम-धाम पूछने पर उत्तर मिला —
‘डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्टर पौटर! रायल आयरिश कान्स्टेबुलरी काहिर!!’ उसे क़ैद कर
लिया गया। कुछ दूर जाने पर हमारे सैनिकों पर फिर पुलिस ने आक्रमण कर दिया।
अब की शत्रुदल उनसे तिगुना था। तथापि यह वीर वीरतापूर्वक लड़ते हुए साफ़ बच
निकले। साथ ही वे अपने बन्दी को भी साथ ही ले गये। इस युद्ध की सफलता
का श्रेय श्री डिन्नी लेसी तथा श्री सिनेहाराम को ही दिया जा सकता है।
इन दिनों एक आयरिश स्वेच्छा-सेवक श्री ट्रेयनोर के. डबलिन जेल में बन्द
थे, उन्हें मृत्युदण्ड सुनाया जा चुका था। अंग्रेज़ों का प्रतिहिंसा का भाव उत्तरोत्तर
अत्यन्त निन्दनीय और भयंकर रूप पकड़ता जाता था। वे जिस किसी को पाते, मार
डालते। दूसरी तरफ़ हम सदैव उनके सिपाहियों आदि को साफ़ छोड़ देते। हममें
प्रतिहिंसा का भाव ज़रा भी नहीं था। परन्तु ट्रेयनोर के. निराश्रित, तरुण परिवार का
उनके अतिरिक्त और कोई भरण-पोषण करने वाला न था। उधर उन्हें फाँसी पर
लटकाने की तारीख़ 25 अप्रैल निश्चित हो चुकी थी।
हमने ट्रेयनोर को पौटर के बदले में माँगा और कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो हम
लोग पौटर को मार डालेंगे। पुलिस के हैडक्वार्टर्स से सूचना भेज दी गयी। उन लोगों
ने इस बात पर कुछ ध्यान न दिया और यथाशक्ति इसे छिपाने का ही प्रयत्न किया।
अन्त में श्री ट्रेयनोर फाँसी पर लटका ही दिये गये। हमारे सामने एक बड़ी समस्या
आ उपस्थित हुई। किंकर्त्तव्यविमूढ़ हुए खड़े रहे। करें तो क्या? छोड़ दें तो अच्छा
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नहीं। न छोड़ें तो अकारण ही उस बेचारे के प्राण जायें। इस बात पर बहुत वादविवाद
हुआ और अन्त में यही निश्चय हुआ कि हमें अपने कथन को पूरा करना ही होगा।
फलस्वरूप उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया। पौटर एक वीर सैनिक थे। उन्होंने खूब
उच्च शिक्षा पायी थी। वे बड़े दयालु, मृदुल स्वभाव तथा चतुर अफ़सर थे। उन्हें
अपने परिवार से पत्र व्यवहार करने का अवसर भी दिया गया था। अन्तिम समय
उन्होंने अपनी डायरी, एक अँगूठी और एक सोने की घड़ी अपनी पत्नी को दे देने
की प्रार्थना की। उनकी अन्तिम अभिलाषा पूरी की गयी। तदोपरान्त प्रतिहिंसा के
भाव से उत्तेजित होकर सरकार ने भी यों ही बहुत से घर तथा बाड़े जला दिये।
अब ज़रा हमारे विवाह की बात सुन लीजिये। 12 जून, 1921 के दिन जबकि
युद्ध ज़ोरों पर था, और जिससे एक मास बाद अंग्रेज़ सन्धि करने को बाध्य हुए
थे, बड़ी विचित्र तथा आश्चर्यजनक औपन्यासिक स्थिति में मेरा विवाह हो गया।
पाठक मेरे तथा ब्रिघिड मैलोन के प्रेम की बात भूले नहीं होंगे। सितम्बर, 1919
में ही हमारी पहली भेंट हुई थी। प्रथम मिलन में ही हम प्रेमपाश में बँध गये थे।
मेरे घायल होने पर उन्होंने कितनी तत्परता से मेरी सुश्रूषा की थी, वह मैं भूल
सकता हूँ? ड्रम-कोण्ड्रा युद्ध के बाद वे मेरी ख़बर लेने आईं। तभी एक बार मैंने
उनसे स्वस्थ होने पर विवाह करने की बात कह दी। मेरे साथ विवाह करने से
क्या-क्या विपत्तियाँ आ पड़ेंगी, कहाँ तक सुख और ऐश्वर्य से युक्त या रहित रहना
पड़ेगा, यह सब वे समझती थीं। तथापि मेरे इस प्रस्ताव को उन्होंने बड़े हर्ष और
चाव से स्वीकार कर लिया। सब तैयारी हो गयी, परन्तु गिरजा कहाँ मिले? श्री
माइकेल पार्सल को ही घर के लिए उपयुक्त स्थान समझा गया। वे बड़े देशभक्त
थे। वे तथा उनकी स्त्री दोनों जेल यात्रा भी कर चुके थे।
यह स्थान चारों ओर से छावनियों आदि से घिरा हुआ था। कहीं चार मील पर
अंग्रेज़ी पुलिस की सुदृढ़ बैरकें थीं, तो कहीं छह मील की दूरी पर। साथ ही हर
समय हमारी खोज में सैकड़ों सैनिक इधर-उधर ठोकरें खाते फिरते थे। तथापि हमारे
टिप्रेरी के सभी सैनिक वहाँ आ एकत्रित हुए। उन्होंने चारों ओर खूब अच्छी तरह
से मोर्चाबन्दी कर ली। यदि अंग्रेज़ी सेना उन दिनों उधर आ भटकती, तो उसका
वह स्वागत होता, जिसे वह कभी न भूल पाती। चारों ओर सड़कों पर वृक्ष काटकर
डाल दिये गये। सशस्त्र स्वेच्छा-सेवक पहरे पर खड़े हो गये। उस दिन सभी सैनिकों
में कितनी तत्परता तथा निर्भीकता, कितना हर्ष तथा चाव, कितना जोश और उत्तेजना
थी, यह आज नहीं कहा जा सकता!
विवाह से पहली रात को बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ा। एक कैम्प
में श्री हागन तथा श्री डिन्नी लेसी आदि मुख्य-मुख्य सैनिक अध्यक्षों के साथ सोना
पड़ा था। सोने तो उन्होंने दिया नहीं, अविवाहित होने पर भी मुझे विवाह सम्बन्धी
शिक्षा देना उन्होंने अपना कर्त्तव्य मान लिया था। उपदेश देने में कोई भी किसी के
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पीछे नहीं रहना चाहता था। खैर! विवाह हुआ, खूब आनन्दोत्सव रहा, दावतें उड़ीं।
लड़के-लड़कियों ने नाच किये। गाना हुआ और फिर ‘हनीमून’ (सुहागरात) के
लिए मैं डोनोहिल चला गया। प्रत्येक मित्र के यहाँ खूब स्वागत हुआ। वह
विवाह-वह ‘हनीमून’ रह-रह कर याद आता है! ओह! कितना आनन्द था! क्या
वह फिर कभी नहीं होगा। वह समय कितना सुन्दर, कितना आनन्दमय और कितना
महिमामय जान पड़ता है।
तेरहवाँ परिच्छेद
सिविल वार और मेरा सीनियर
रिपब्लिकन डिप्टी का चुनाव
जून 1921 के आरम्भ में एकाएक यह समाचार सुनकर कि अंग्रेजों से सन्धि की
जाने वाली है, हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। जुलाई से उसके अनुसार कार्य भी शुरू हो
जायेगा, यह सुनकर तो हम एकदम चकित हो उठे। जो लोग हमें सदैव कोसते रहते
थे, जिन्होंने कभी भी हमारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर नहीं लिया था; वे आज हमारे
प्रतिनिधि बनकर सन्धि की बातचीत करेंगे – कितने आश्चर्य की बात है? हम
खुश भी हुए क्योंकि हमारा गोला बारूद ख़त्म हो चुका था और कुछ व्यक्ति विदेशों
में इसका प्रबन्ध करने के लिए भेजे जा चुके थे।
सन्धि के अनुसार कार्य शुरू हो गया। युद्ध रुक गया। हम लोग नगरों में घुसे;
परन्तु अब की ज़रा शान के साथ! खूब स्वागत हुआ। बड़े हर्ष और चाव से हमारी
अभ्यर्थना की गयी। दो वर्ष पहले जो हमारी निन्दा करते थे, हमें घृणित समझते थे,
वे ही आज सबसे बढ़-चढ़कर हर्षोल्लास कर रहे थे। खैर, इसके बाद कुछ दिन
तक तो घुड़दौड़ादि में भाग्य निरीक्षण कर गुज़ारा करते रहे, क्योंकि अभी तक
अवैतनिक रूप से ही कार्य करते थे। फिर उत्तर की ओर जाना पड़ा। विचार था
कि युद्ध फिर शीघ्र ही शुरू होगा। परन्तु अब की ऐसा विचार हुआ कि दक्षिण का
भार कुछ हलका करने के लिए उत्तर में युवकों को शिक्षित किया जाये। इसीलिए
परेड, रिवाल्वर, बम आदि की शिक्षा देने की गरज से उधर जा निकला। सितम्बर
में वापिस डबलिन पहुँचा। यहाँ खूब स्वागत हुआ।
अभी सन्धि की अन्तिम बातचीत चल ही रही थी, अतः हमने ज़रूरी समझा
कि हमारे सैनिकों को अपने कार्य के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। उनकी तत्परता,
उत्सुकता तथा अधीरता देखकर आयरिश पार्लियामेण्ट के ये सदस्य स्वेच्छा सेवकों
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का साथ छोड़ने का साहस नहीं कर पायेंगे। 7 सितम्बर को सन्धि की शर्तें घोषित
कर दी गईं। मैं उसी दिन लौटकर डबलिन पहुँचा था। श्री सीनहागन, श्री
लियमलिंच आदि मुख्य योद्धाओं से मिला और गृहयुद्ध से बचने का एकमात्र उपाय,
शत्रु से फिर से भिड़ जाना ही उन्हें बताया। सभी ने सुना, परन्तु किसी ने इस पर
ध्यान न दिया। सभी लोगों का यह उपेक्षापूर्ण व्यवहार देखकर तथा सन्धि की शर्तों
को एकदम घृणित और असम्मानसूचक समझकर मैं आयरलैण्ड से कहीं दूर –
बहुत दूर जाने के लिए लालायित हो उठा। निश्चय किया, भारतवर्ष में जाऊँ। वह
देश भी हमारी तरह स्वतन्त्रता युद्ध में निमग्न है। शायद वहाँ दो हाथ दिखाने का
मौक़ा मिल जाये। परन्तु लन्दन स्थित भारतीय नेताओं ने हमें एकदम निराश कर
दिया। उन्होंने कहा, तुम लोगों ने अपने देश का सर्वनाश कर दिया। वे पराये लोग
तुम पर क्यों विश्वास करेंगे? फिर तो हम अमेरिका जाने की तैयारी करने लगे।
दिसम्बर के मध्य में श्री सीमस रोबिन्सन का विवाह हुआ। उसी के बाद
लन्दन की ओर चल दिया। चलते समय हृदय एकदम विदीर्ण हो उठा। आज हमारे
ही लोगों ने हमें संसार की नज़रों में गिरा दिया! वह क्या कहते होंगे? यही न कि
हमारी स्वतन्त्रता, हमारी आशा, जिसके लिए हमने इतना घोर रक्तपात किया था,
केवल आयरिश देश को विभिन्न भागों में विभाजित करा देना और एक विदेशी
सम्राट के प्रति भक्ति दिखाना था? छिः-छिः यह कैसी घृणित बात थी। इन्हीं
विचारों से विक्षिप्त होकर हम वहाँ से भाग जाना चाहते थे – वहाँ, जहाँ कि कोई
पहचान भी न पाये और हमारे मस्तिष्क की कालिमा लोगों के सामने प्रकट न हो
उठे। डबलिन छोड़ने के पूर्व मैंने अनेक प्रजातन्त्रवादी सैनिकों से, शत्रु से युद्ध छोड़ने
को कहा, उन्होंने मेरी यह बात न मानी। अगर उन्होंने मेरी सलाह मान ली होती
तो मैंने आयरलैण्ड कदापि नहीं छोड़ा होता। अन्त में मैंने यह भी कह दिया था कि
12 महीनों के दरम्यान अपने को गृहयुद्ध में निरत पायेंगे।
19 दिसम्बर को मैंने सीनमैक क्योन को एक खुली चिट्ठी लिखी थी। उसके
निम्नलिखित उद्धरण मेरे विचार को और भी स्पष्ट कर देंगे –
“महोदय! मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आनडायल में तथा इससे पहले
भी किसी स्थान पर आपने कहा था कि इस सन्धि के अनुसार आपकी
‘चिरवांछित’ स्वतन्त्रता आपको मिल गयी है तथा इसी के लिए आप आज तक
लड़ते रहे थे।
“परन्तु – मैं भी युद्ध में आपसे पीछे नहीं रहा हूँ। इसलिए यह कह देना चाहता
हूँ कि यदि हमें मालूम होता कि स्वतन्त्रता का यही आदर्श है तो सच कहता हूँ,
मैंने तथा मेरे साथियों ने बन्दूकों को छुआ तक न होता, न मैंने कभी किसी मृत
अथवा जीवित साथी को इसके लिए अग्रसर किया होता।
“आप स्मरण रखिये कि आज श्री मार्टिन सैबेज की बरसी का दिन है। क्या
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आप यह कल्पना करने का साहस करते हैं कि उस वीर ने एक ब्रिटिश गवर्नर
जनरल को मारने का प्रयत्न करते हुए केवल इसीलिए प्राण दे दिये कि उस गवर्नर
के स्थान पर कोई नया ब्रिटिश गवर्नर आ जाये।
“मैं अपने उन वीर सैनिकों की ओर संकेत करते हुए आपसे अनुरोध करूँगा
कि आप हमारे उसी 'अलेहदगी' तथा पूर्ण स्वतन्त्रता को ही अपना आदर्श
बनाये रहें।”
मैं और श्री हागन जिस किसी तरह बन पड़ा, पासपोर्ट लेकर अमेरिका चले
गये। वहाँ बहुत से परिचित अथवा अपरिचित मित्रों से भेंट हुई। शिकागो में अपने
भाई-बहन से भी मिला। खूब सैर की। सभी मित्रों ने खूब स्वागत किया। पर
सभी सुखी रहने पर भी आयरलैण्ड की चिन्ताजनक स्थिति से हर समय घबराये
रहते। नित्य नये झगड़ों के समाचार आते। मेरी 'गृहयुद्ध' सम्बन्धी भविष्यवाणी
ठीक होने लगी।
मार्च के शुरू में समाचार मिला, लिम्मर्क में मोर्चेबन्दी हो गयी। सन्धि के
समर्थक तथा विरोधी दो विभिन्न दलों में विभाजित हो गये हैं। मैं समझ गया कि
अब युद्ध किसी भी क्षण छिड़ सकता है। शीघ्र ही मुझे तार द्वारा बुलाया गया। मेरे
और हागन के सामने फिर वही धनाभाव तथा पासपोर्ट की असुविधा आ उपस्थित
हुई। कुछ मित्रों की सहायता से एक जहाज़ पर हम भरती हो गये। हमें कोयले
झोंकने का काम दिया गया। कुछ घण्टे कठिन परिश्रम भी किया, पर जहाज़ के
चलने में केवल एक घण्टा ही शेष था कि जहाज़ के किसी अधिकारी को सहसा
हागन पर सन्देह हो गया और गरीब पर नाम धाम, जाति, देश तथा इस काम का
पहले के अनुभव सम्बन्धी प्रश्नों की बौछार होने लगी। परिणामस्वरूप वह नीचे
उतार दिये गये। अब मैं क्या करूँ? इतने घण्टे का परिश्रम भी व्यर्थ गया और इस
समय उतरना भी असम्भव! श्री हागन को भी मैं ऐसी दशा में न छोड़ सकता था।
न जेब में पैसा, न किसी मित्र की आशा। अन्त में यही निश्चय किया कि उन्हें
छोड़कर मुझे नहीं जाना चाहिए। अब प्रश्न यह था कि जहाज़ से उतरूँ तो कैसे?
द्वार की ओर भागा! वहाँ एक अधिकारी महोदय खड़े थे – मिन्नत की कि किनारे
पर एक ज़रूरी कार्य है। अभी पाँच मिनट में आता हूँ। गरीब मज़दूर समझ वे दयार्द्र
हो उठे, मुझे उतर जाने दिया। इस प्रकार जहाज़ से उतर तो गया पर हमारी सारी
पूँजी वहीं रह गयी। हमने अपना सारा धन व्यय करके जो बन्दूकें खरीदी थीं, जहाज़
में ही रह गईं। पर मजबूरी थी। उसका तो कोई उपाय भी न था।
इसके बाद भी जहाज़ पाने के प्रयत्न में हमें कई बार निराश होना पड़ा। पर
अन्त में एक जहाज़ मिला और अप्रैल के आरम्भ में हम आयरलैण्ड पहुँचे। बन्दरगाह
में पहुँचते ही समाचार मिला कि मेरी श्रीमती अकेले ही नहीं बल्कि एक सुपुत्र
सहित घर में मेरी बड़ी प्रतीक्षा कर रही हैं।
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परिस्थिति बहुत ख़राब हो चुकी थी। प्रजातन्त्रवादी सेना दो विरोधी दलों में
विभाजित हो गयी। एक दल था, आयरिश प्रजातन्त्रवादी सेना का जो पूर्ण स्वतन्त्रता
के पक्ष में न था और दूसरा आयरिश फ़्री स्टेट दल था, जो सन्धि की स्वतन्त्रता
से ही सन्तुष्ट था। मोर्चेबन्दी हो गयी थी। मैंने इस गृहयुद्ध को रोकने का भरसक
प्रयत्न किया। सभी दलों के पास मारा-मारा फिरा। दोनों दलों में समझौता करने के
लिए कोशिशें की गईं। पर सब व्यर्थ हुईं। अन्त में चुनाव के सम्बन्ध में यह तय
हुआ कि यह दोनों दल एक-दूसरे का विरोध न कर, एक हों, सिनफिन दल के
नाम से चुनाव में भाग लें और चुनाव के बाद फिर से मन्त्रिमण्डल क़ायम करें।
यह समझौता दोनों दलों के प्रतिनिधि श्री एमन डी. वेलेरा तथा माईकेल कालिन्स
में हुआ था। माईकेल फ़्रीस्टेट के प्रतिनिधि थे। उनका व्यवहार बड़ा विचित्र था।
वे शीघ्रातिशीघ्र गृहयुद्ध प्रारम्भ करना चाहते थे और इन्हीं कारणों से यह समझौता
कुछ सफल न हुआ।
एक दिन एकाएक समाचार मिला कि फ़्रीस्टेट वालों ने अंग्रेज़ों की सहायता
से रिपब्लिकन (प्रजातन्त्रवादी) सेना कोर्ट से निकाल देने के लिए तोपें ला चढ़ायी
हैं। गृहयुद्ध का श्रीगणेश हो गया। मुझे भी रिपब्लिकन सेना का साथ देना पड़ा।
गृहयुद्ध का वेदनाजनक विवरण लिखने की इच्छा नहीं। इससे आयरलैण्ड को इतनी
अधिक हानि हुई, जितनी शायद अंग्रेज़ों के विरुद्ध वर्षों लड़ते रहने पर भी न हुई
थी। इस युद्ध में श्री लियमलिंच, श्री डिन्नी लेसी, श्री जैटी केली, श्री स्पर्की ग्रीन
आदि कितने ही वीरों के प्राण गये। इसी गृहयुद्ध में श्री रीयन, श्री पेड्डी, श्री
मेकडोनोह आदि कितने सुन्दर वीर रणचण्डी की सहचारियों डाकिनी पिशाचिनी
आदि को निज रक्त मांस से तृप्त करते हुए उसी युद्ध में संसार मंच से उठ गये।
वे आयरलैण्ड के वीर त्यागी, सच्चे और निस्स्वार्थ योद्धा थे। उन पर हमारा देश
जितना गर्व कर सके, थोड़ा है।
1923 के बसन्त में श्री लियमलिंच की मृत्यु हो जाने पर शार्टरफ़ोर्ड काउण्टी
में होने वाली सन्धि कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित होने के विचार से हम अपने कई मित्रों
के साथ चल दिये। हम मैलेरी पहुँचे। वहाँ पर जब हम खेतों से निकलकर एक
सड़क पार कर रहे थे, तीनों ओर से गोलियों की वर्षा होने लगी। भागते-भागते
पहाड़ी पर चढ़ जाना पड़ा। दो दिनों तक पहाड़ियों पर ही रहना पड़ा क्योंकि फ़्रीस्टेट
की सेना उस ज़िले को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए वहाँ एक बड़ी तादाद में पड़ी
थी। बाद में किसी प्रकार अरहलो की घाटी में मेरे छिपने लायक एक स्थान मिल
गया। यद्यपि भूख और नींद बहुत सता रही थी, फिर भी उसमें छिपकर सो गया।
उठ कर सेनाओं के चलने का शब्द सुनकर खन्दक में से सिर निकालकर देखा
तो फ़्रीस्टेट के सैनिक बन्दूकें तानकर घेरे खड़े थे। कोई चारा न था। आत्मसमर्पण
कर दिया।
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मैं भीरू नहीं, कायर नहीं, निर्जीव नहीं, तथापि उस दिन न जाने क्यों
रह-रहकर रो उठने को जी चाहने लगता था। जी में आता था बिलख-बिलखकर
ख़ूब रो लूँ, सिसक-सिसक उठूँ, शायद हृदय का भार कुछ हलका हो जाये।
कितनी बार बड़ी मुश्किल से ही झरते हुए आँसुओं को रोक पाया था। उस दिन
मेरी विचित्र हालत थी। पाँच वर्ष तक मैं इंग्लैण्ड की सेनाओं को नष्ट-भ्रष्ट करता
रहा। अपने देश तथा देशवासियों के लिए अपनी खुशी से अनेक तकलीफ़ें सहीं,
पर वही मैं, आज अपने ही देश में अपने ही देशवासियों के द्वारा क़ैदकर लिया
गया था।
गैल वाली में मेरा अभियोग चला और सज़ा पाकर लिमरिक जेल में रखा गया।
वहाँ से माउण्ड ज्वाय जेल में भेज दिया गया। वहाँ के दुर्व्यवहार के कारण मैंने
अनशन कर दिया और 12 दिनों के अनशन के बाद छोड़ दिया गया।
मेरे इस जेल जीवन के दिनों में ही टिप्रेरी निवासी लोगों ने मुझे अपना सीनियर
रिपब्लिकन डिप्टी चुन लिया था।
ISBN 978-81-87728-95-5
ISBN 818772895-7
9788187 728955
राहुल
फ़ाउण्डेशन
मूल्य रु. 350
बेहतर ज़िन्दगी का रास्ता
बेहतर किताबों से होकर जाता है!
जनचेतना
सम्पूर्ण सूचीपत्र
2018
हम हैं सपनों के हरकारे
हम हैं विचारों के डाकिये
आम लोगों के लिए
ज़रूरी हैं वे किताबें
जो उनकी ज़िन्दगी की घुटन
और मुक्ति के स्वप्नों तक
पहुँचाती हैं विचार
जैसे कि बारूद की ढेरी तक
आग की चिनगारी।
घर-घर तक चिनगारी छिटकाने वाला
तेज़ हवा का झोंका बन जाना होगा
ज़िन्दगी और आने वाले दिनों का सच
बतलाने वाली किताबों को
जन-जन तक पहुँचाना होगा।
दो दशक पहले प्रगतिशील, जनपक्षधर साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने की
मुहिम की एक छोटी-सी शुरुआत हुई, बड़े मंसूबे के साथ। एक छोटी-सी दुकान
और फुटपाथों पर, मुहल्लों में और दफ़्तरों के सामने छोटी-छोटी प्रदर्शनियाँ लगाने
वाले तथा साइकिलों पर, ठेलों पर, झोलों में भरकर घर-घर किताबें पहुँचाने वाले
समर्पित अवैतनिक वालण्टियरों की टीम – शुरुआत बस यहीं से हुई। आज यह
वैचारिक अभियान उत्तर भारत के दर्जनों शहरों और गाँवों तक फैल चुका है। एक
बड़े और एक छोटे प्रदर्शनी वाहन के माध्यम से जनचेतना हिन्दी और पंजाबी क्षेत्र
के सुदूर कोनों तक हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी साहित्य एवं कला-सामग्री के साथ
सपने और विचार लेकर जा रही है, जीवन-संघर्ष-सृजन-प्रगति का नारा लेकर जा
रही है।
हिन्दी क्षेत्र में यह अपने ढंग का एक अनूठा प्रयास है। एक भी वैतनिक स्टाफ़
के बिना, समर्पित वालण्टियरों और विभिन्न सहयोगी जनसंगठनों के कार्यकर्ताओं
के बूते पर यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ रहा है।
आइये, आप सभी इस मुहिम में हमारे सहयात्री बनिये।
सम्पूर्ण सूचीपत्र
परिकल्पना प्रकाशन
उपन्यास
- तरुणाई का तराना/याङ मो ...
- तीन टके का उपन्यास/बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ...
- माँ/मक्सिम गोर्की ...
- वे तीन/मक्सिम गोर्की 75.00
- मेरा बचपन/मक्सिम गोर्की ...
- जीवन की राहों पर/मक्सिम गोर्की ...
- मेरे विश्वविद्यालय/मक्सिम गोर्की ...
- फ़ोमा गोर्देयेव/मक्सिम गोर्की 55.00
- अभागा/मक्सिम गोर्की 40.00
- बेकरी का मालिक/मक्सिम गोर्की 25.00
- असली इन्सान/बोरिस पोलेवोई ...
- तरुण गार्ड/अलेक्सान्द्र फ़देयेव (दो खण्डों में) 160.00
- गोदान/प्रेमचन्द ...
- निर्मला/प्रेमचन्द ...
- पथ के दावेदार/शरत्चन्द्र ...
- चरित्रहीन/शरत्चन्द्र ...
- गृहदाह/शरत्चन्द्र 70.00
- शेषप्रश्न/शरत्चन्द्र ...
- इन्द्रधनुष/वान्दा वैसील्युस्का 65.00
- इकतालीसवाँ/बोरीस लब्रेन्योव 20.00
- दास्तान चलती है (एक नौजवान की
डायरी से)/अनातोली कुज़्नेत्सोव 70.00
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- वे सदा युवा रहेंगे/ग्रीगोरी बकलानोव 60.00
- मुर्दों को क्या लाज-शर्म/ग्रीगोरी बकलानोव 40.00
- बख़्तरबन्द रेल 14-69/व्सेवोलोद इवानोव 30.00
- अश्वसेना/इसाक बाबेल 40.00
- लाल झण्डे के नीचे/लाओ श 50.00
- रिक्शावाला/लाओ श 65.00
- चिरस्मरणीय (प्रसिद्ध कन्नड़ उपन्यास)/निरंजन 55.00
- एक तयशुदा मौत (एनजीओ की पृष्ठभूमि पर)/मोहित राय 30.00
- Mother/Maxim Gorky 250.00
- The Song of Youth/Yang Mo ...
कहानियाँ - श्रेष्ठ सोवियत कहानियाँ (3 खण्डों का सेट) 450.00
- वह शख़्स जिसने हैडलेबर्ग को भ्रष्ट कर दिया
(मार्क ट्वेन की दो कहानियाँ) 60.00
मक्सिम गोर्की - चुनी हुई कहानियाँ (खण्ड 1) ...
- चुनी हुई कहानियाँ (खण्ड 2) ...
- चुनी हुई कहानियाँ (खण्ड 3) ...
- हिम्मत न हारना मेरे बच्चो 10.00
- कामो : एक जाँबाज़ इन्क़लाबी मज़दूर की कहानी ...
अन्तोन चेख़व - चुनी हुई कहानियाँ (खण्ड 1) ...
- चुनी हुई कहानियाँ (खण्ड 2) ...
- दो अमर कहानियाँ/लू शून ...
- श्रेष्ठ कहानियाँ/प्रेमचन्द 80.00
- पाँच कहानियाँ/पुश्किन ...
- तीन कहानियाँ/गोगोल 30.00
- तूफ़ान/अलेक्सान्द्र सेराफ़ीमोविच 60.00
- वसन्त/सेर्गेई अन्तोनोव 60.00
- वसन्तागम/रओ शि 50.00
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- सूरज का खज़ाना/मिखाईल प्रीश्विन 40.00
- स्नेगोवेत्स का होटल/मत्वेई तेवेल्योव 35.00
- वसन्त के रेशम के कीड़े/माओ तुन 50.00
- क्रान्ति झंझा की अनुगूँजें (अक्टूबर क्रान्ति की कहानियाँ) 75.00
- चुनी हुई कहानियाँ/श्याओ हुङ 50.00
- समय के पंख/कोन्स्तान्तीन पाउस्तोव्स्की ...
- श्रेष्ठ रूसी कहानियाँ (संकलन) ...
- अनजान फूल/आन्द्रेई प्लातोनोव 40.00
- कुत्ते का दिल/मिख़ाईल बुल्गाकोव 70.00
- दोन की कहानियाँ/मिख़ाईल शोलोख़ोव 35.00
- अब इन्साफ़ होने वाला है ...
(भारत और पाकिस्तान की प्रगतिशील उर्दू कहानियों का प्रतिनिधि संकलन)
(ग्यारह नयी कहानियों सहित परिवर्द्धित संस्करण)/स. शकील सिद्दीक़ी - लाल कुरता/हरिशंकर श्रीवास्तव ...
- चम्पा और अन्य कहानियाँ/मदन मोहन 35.00
कविताएँ - जब मैं जड़ों के बीच रहता हूँ/पाब्लो नेरूदा 60.00
- आँखें दुनिया की तरफ़ देखती हैं/लैंग्सटन ह्यूज 60.00
- उम्मीद-ए-सहर की बात सुनो (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के संस्मरण और
चुनिन्दा शायरी, सम्पादकः शकील सिद्दीक़ी) 160.00 - माओ त्से-तुङ की कविताएँ (राजनीतिक पृष्ठभूमि सहित विस्तृत
टिप्पणियाँ एवं अनुवाद : सत्यव्रत) 20.00 - इकहत्तर कविताएँ और तीस छोटी कहानियाँ - बेर्टोल्ट ब्रेष्ट
(मूल जर्मन से अनुवाद : मोहन थपलियाल)
(ब्रेष्ट के दुर्लभ चित्रों और स्केचों से सज्जित) 150.00 - समर तो शेष है... (इप्टा के दौर से आज तक के
प्रतिनिधि क्रान्तिकारी समूहगीतों का संकलन) 65.00 - मध्यवर्ग का शोकगीत/हान्स मान्नुस एन्तसेन्सबर्गर 30.00
- जेल डायरी/हो ची मिन्ह 40.00
- ओस की बूँदें और लाल गुलाब/होसे मारिया सिसों 25.00
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- इन्तिफ़ादा : फ़लस्तीनी कविताएँ/स. रामकृष्ण पाण्डेय ...
- लहू है कि तब भी गाता है/पाश ...
- लोहू और इस्पात से फूटता गुलाब : फ़लस्तीनी कविताएँ (द्विभाषी संकलन)
A Rose Breaking Out of Steel and Blood (Palestinian Poems) 60.00 - पाठान्तर/विष्णु खरे 50.00
- लालटेन जलाना (चुनी हुई कविताएँ)/विष्णु खरे 60.00
- ईश्वर को मोक्ष/नीलाभ 60.00
- बहनें और अन्य कविताएँ/असद ज़ैदी 50.00
- सामान की तलाश/असद ज़ैदी 50.00
- कोहेकाफ़ पर संगीत-साधना/शशिप्रकाश 50.00
- पतझड़ का स्थापत्य/शशिप्रकाश 75.00
- सात भाइयों के बीच चम्पा/कात्यायनी (पेपरबैक) ...
(हार्डबाउंड) 125.00 - इस पौरुषपूर्ण समय में/कात्यायनी 60.00
- जादू नहीं कविता/कात्यायनी (पेपरबैक) ...
(हार्डबाउंड) 200.00 - फुटपाथ पर कुर्सी/कात्यायनी 80.00
- राख-अँधेरे की बारिश में/कात्यायनी 15.00
- यह मुखौटा किसका है/विमल कुमार 50.00
- यह जो वक्त है/कपिलेश भोज 60.00
- देश एक राग है/भगवत रावत ...
- बहुत नर्म चादर थी जल से बुनी/नरेश चन्द्रकर 60.00
- दिन भौंहें चढ़ाता है/मलय 120.00
- देखते न देखते/मलय 65.00
- असम्भव की आँच/मलय 100.00
- इच्छा की दूब/मलय 90.00
- इस ढलान पर/प्रमोद कुमार 90.00
- तो/शैलेय 75.00
नाटक - करवट/मक्सिम गोर्की 40.00
- दुश्मन/मक्सिम गोर्की 35.00
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- तलछट/मक्सिम गोर्की ...
- तीन बहनें (दो नाटक)/अन्तोन चेख़व 45.00
- चेरी की बग़िया (दो नाटक)/अ. चेख़व 45.00
- बलिदान जो व्यर्थ न गया/व्सेवोलोद विश्नेव्स्की 30.00
- क्रेमलिन की घण्टियाँ/निकोलाई पोगोदिन 30.00
संस्मरण - लेव तोल्स्तोय : शब्द-चित्र/मक्सिम गोर्की 20.00
स्त्री-विमर्श - दुर्ग द्वार पर दस्तक (स्त्री प्रश्न पर लेख)/कात्यायनी (पेपरबैक) 130.00
ज्वलन्त प्रश्न - कुछ जीवन्त कुछ ज्वलन्त/कात्यायनी 90.00
- षड्यन्त्ररत मृतात्माओं के बीच
(साम्प्रदायिकता पर लेख)/कात्यायनी 25.00 - इस रात्रि श्यामला बेला में (लेख और टिप्पणियाँ)/सत्यव्रत 30.00
व्यंग्य - कहें मनबहकी खरी-खरी/मनबहकी लाल 25.00
नौजवानों के लिए विशेष - जय जीवन! (लेख, भाषण और पत्र)/निकोलाई ओस्त्रोव्स्की 50.00
वैचारिकी - माओवादी अर्थशास्त्र और समाजवाद का भविष्य/रेमण्ड लोट्टा 25.00
साहित्य-विमर्श - उपन्यास और जनसमुदाय/रैल्फ़ फ़ॉक्स 75.00
- लेखनकला और रचनाकौशल/
गोर्की, फ़ेदिन, मयाकोव्स्की, अ. तोल्सतोय ... - दर्शन, साहित्य और आलोचना/
बेलिंस्की, हर्ज़न, चेर्नीशेव्स्की, दोब्रोल्युबोव 65.00 - सृजन-प्रक्रिया और शिल्प के बारे में/मक्सिम गोर्की 40.00
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- मार्क्सवाद और भाषाविज्ञान की समस्याएँ/स्तालिन 20.00
नयी पीढ़ी के निर्माण के लिए - एक पुस्तक माता-पिता के लिए/अन्तोन मकारेंको ...
- मेरा हृदय बच्चों के लिए/वसीली सुख़ोम्लीन्स्की ...
आह्वान पुस्तिका श्रृंखला - प्रेम, परम्परा और विद्रोह/कात्यायनी 50.00
सृजन परिप्रेक्ष्य पुस्तिका श्रृंखला - एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के
वैचारिक-सांस्कृतिक कार्यभार/कात्यायनी, सत्यम 25.00
दो महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ
दिशा सन्धान
मार्क्सवादी सैद्धान्तिक शोध और विमर्श का मंच
सम्पादकः कात्यायनी / सत्यम
एक प्रति : 100 रुपये, आजीवनः 5000 रुपये
वार्षिक ( 4 अंक ) : 400 रुपये ( 100 रु. रजि. बुकपोस्ट व्यय अतिरिक्त )
नान्दीपाठ
मीडिया, संस्कृति और समाज पर केन्द्रित
सम्पादकः कात्यायनी / सत्यम
एक प्रति : 40 रुपये आजीवनः 3000 रुपये
वार्षिक ( 4 अंक ) : 160 रुपये ( 100 रु. रजि. बुक पोस्ट व्यय अतिरिक्त )
सम्पादकीय कार्यालय :
69 ए-1, बाबा का पुरवा, पेपर मिल रोड, निशातगंज, लखनऊ-226006
फोन: 9936650658, 8853093555
वेबसाइट : http://dishasandhaan.in ईमेल: [email protected]
वेबसाइट : http://naandipath.in ईमेल: [email protected]
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राहुल फाउण्डेशन
नौजवानों के लिए विशेष
- नौजवानों से दो बातें/पीटर क्रोपोटकिन 15.00
- क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा/भगतसिंह 15.00
- मैं नास्तिक क्यों हूँ और ‘ड्रीमलैण्ड’ की भूमिका/भगतसिंह 15.00
- बम का दर्शन और अदालत में बयान/भगतसिंह 15.00
- जाति-धर्म के झगड़े छोड़ो, सही लड़ाई से नाता जोड़ो/भगतसिंह 15.00
- भगतसिंह ने कहा...(चुने हुए उद्धरण)/भगतसिंह 15.00
क्रान्तिकारियों के दस्तावेज़
- भगतसिंह और उनके साथियों के
सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़/स. सत्यम 350.00 - शहीदेआज़म की जेल नोटबुक/भगतसिंह 100.00
- विचारों की सान पर/भगतसिंह 50.00
क्रान्तिकारियों के विचारों और जीवन पर
- बहरों को सुनाने के लिए/एस. इरफ़ान हबीब
(भगतसिंह और उनके साथियों की विचारधारा और कार्यक्रम) ... - क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास/शिव वर्मा 15.00
- भगतसिंह और उनके साथियों की
विचारधारा और राजनीति/बिपन चन्द्र 20.00 - यश की धरोहर/
भगवानदास माहौर, शिव वर्मा, सदाशिवराव मलकापुरकर 50.00 - संस्मृतियाँ/शिव वर्मा 80.00
- शहीद सुखदेव : नौघरा से फाँसी तक/स. डॉ. हरदीप सिंह 40.00
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महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक संकलन
- उम्मीद एक ज़िन्दा शब्द है
('दायित्वबोध' के महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय लेखों का संकलन) 75.00 - एनजीओ : एक ख़तरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र 60.00
- डब्ल्यूएसएफ़ : साम्राज्यवाद का नया ट्रोजन हॉर्स 50.00
ज्वलन्त प्रश्न - 'जाति' प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफ़ी नहीं, अम्बेडकर भी
काफ़ी नहीं, मार्क्स ज़रूरी हैं / रंगनायकम्मा ... - जाति और वर्ग : एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण / रंगनायकम्मा 60.00
दायित्वबोध पुस्तिका श्रृंखला - अनश्वर हैं सर्वहारा संघर्षों की अग्निशिखाएँ/दीपायन बोस 10.00
- समाजवाद की समस्याएँ, पूँजीवादी पुनर्स्थापना और महान सर्वहारा
सांस्कृतिक क्रान्ति/शशिप्रकाश 30.00 - क्यों माओवाद?/शशिप्रकाश 20.00
- बुर्जुआ वर्ग के ऊपर सर्वतोमुखी अधिनायकत्व
लागू करने के बारे में/चाङ चुन-चियाओ 5.00 - भारतीय कृषि में पूँजीवादी विकास/सुखविन्दर 35.00
आह्वान पुस्तिका श्रृंखला - छात्र-नौजवान नयी शुरुआत कहाँ से करें? 15.00
- आरक्षण : पक्ष, विपक्ष और तीसरा पक्ष 15.00
- आतंकवाद के बारे में : विभ्रम और यथार्थ 15.00
- क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन 15.00
- भ्रष्टाचार और उसके समाधान का सवाल
सोचने के लिए कुछ मुद्दे 50.00
बिगुल पुस्तिका श्रृंखला - कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका ढाँचा/लेनिन 10.00
- मकड़ा और मक्खी/विल्हेल्म लीब्नेख़्त 5.00
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