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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव ख़त्म करने में सहायक साबित हो सकता
है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुख सहने
की तत्परता, उनकी बेख़ौफ़ बहादुरी और लहराती क़ुर्बानी दर्शाती है कि भारत का
भविष्य उनके हाथ में सुरक्षित है। एक अनुभूतिमय घड़ी में देशबन्धु दास ने कहा
था, “नौजवान भारतमाता की शान एवं आशाएँ हैं। आन्दोलन के पीछे उनकी प्रेरणा
है, उनकी कुर्बानी है और उनकी जीत है। आज़ादी की राह पर मशालें लेकर चलने
वाले ये ही हैं। मुक्ति की राह पर ये तीर्थयात्री हैं।”
भारतीय रिपब्लिक के नौजवानो, नहीं सिपाहियो, क़तारबद्ध हो जाओ। आराम
के साथ न खड़े रहो और न ही निरर्थक क़दमताल किये जाओ। लम्बी दरिद्रता को,
जो तुम्हें नाकारा कर रही है, सदा के लिए उतार फेंको। तुम्हारा बहुत ही नेक मिशन
है। देश के हर कोने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रान्ति के लिए,
जिसका आना निश्चित है, लोगों को तैयार करो। फ़र्ज़ के बिगुल की आवाज़ सुनो।
वैसे ही ख़ाली ज़िन्दगी न गँवाओ। बढ़ो, तुम्हारी ज़िन्दगी का हर पल इस तरह के
तरीक़े और तरतीब ढूँढ़ने में लगना चाहिए, कि कैसे अपनी पुरातन धरती की आँखों
में ज्वाला जागे और एक लम्बी अंगड़ाई लेकर वह जाग उठे। अंग्रेज़ साम्राज्य के
ख़िलाफ़ नवयुवकों के उर्वर हृदयों में एक उकसाहट और नफ़रत भर दो, ऐसे बीज
डालो जोकि उगें और बड़े वृक्ष बन जायें क्योंकि इन बीजों को तुम अपने गर्म ख़ून
के जल से सींचोगे। तब एक भयानक भूचाल आयेगा, जो बड़े धमाके से ग़लत
चीज़ों को नष्ट कर देगा और साम्राज्यवाद के महल को कुचलकर धूल में मिला
देगा और यह तबाही महान होगी।
तब, और सिर्फ़ तभी, एक भारतीय क़ौम जागेगी, जो अपने गुणों और शान से
इन्सानियत को हैरान कर देगी। तब चालाक और बलवान सदा से कमज़ोर लोगों
से हैरान रह जायेंगे। तभी व्यक्तिगत मुक्ति भी सुरक्षित होगी और मेहनतकश की
सरदारी और प्रभुसत्ता को सत्कारा जायेगा। हम ऐसी ही क्रान्ति के आने का सन्देश
दे रहे हैं। क्रान्ति अमर रहे!
— करतार सिंह*, अध्यक्ष
(1929) रिपब्लिकन प्रेस, अरहवन, भारत से प्रकाशित।
(*भगतसिंह का छद्म नाम)
442 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

बम का दर्शन

23 दिसम्बर, 1929 को क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ
वायसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गाँधीजी ने इस
घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख 'बम की पूजा' लिखा, जिसमें उन्होंने वायसराय को
देश का शुभचिन्तक और नवयुवकों को आज़ादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले
कहा। इसी के जवाब में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की ओर से
भगवतीचरण वोहरा ने 'बम का दर्शन' लेख लिखा, जिसका शीर्षक 'हिन्दुस्तान
सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र' रखा गया। भगतसिंह ने जेल में
इसे अन्तिम रूप दिया। 26 जनवरी, 1930 को इसे देशभर में बाँटा गया।
हाल ही की घटनाएँ! विशेष रूप से 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल
ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निन्दा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित
किया गया प्रस्ताव तथा ‘यंग इण्डिया' में गाँधीजी द्वारा लिखे गये लेखों से स्पष्ट
हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गाँधीजी से साँठ-गाँठ कर भारतीय
क्रान्तिकारियों के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है। जनता के बीच भाषणों
तथा पत्रों के माध्यम से क्रान्तिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है।
या तो यह जान-बूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय
में गलत प्रचार होता रहा और उन्हें गलत समझा जाता रहा; परन्तु क्रान्तिकारी अपने
सिद्धान्तों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं। बल्कि वे ऐसी
आलोचना का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे इसे इस बात का स्वर्णिम अवसर मानते
हैं कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगों को क्रान्तिकारियों के मूलभूत सिद्धान्तों तथा
उच्चादर्शों को, जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत हैं, समझाने का
अवसर मिलता है। आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने
का अवसर मिलेगा कि क्रान्तिकारी क्या हैं, और उनके विरुद्ध किये गये भ्रमात्मक
प्रचार से उत्पन्न होने वाली ग़लतफ़हमियों से उन्हें बचाया जा सकेगा।
पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें। हमारे विचार से इन
शब्दों का प्रयोग ही ग़लत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ
अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धान्तों का स्पष्ट बोध
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 443

नहीं हो पाता। हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल-प्रयोग, परन्तु
क्रान्तिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है; दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ
समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त। उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा
राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। अपनेआप को कष्ट देकर
आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का हृदय-परिवर्तन सम्भव
हो सकेगा।
एक क्रान्तिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह
उनकी माँग करता है, अपनी उस माँग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक
शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए
अत्यधिक कष्ट सहन करता है, इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए
प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल-प्रयोग भी
करता है। इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इन्हें हिंसा
के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना कोष में दिये इस शब्द
के अर्थ के साथ अन्याय होगा। सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह। उसकी
स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों? इसके
साथ-साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी क्यों न किया जाये? क्रान्तिकारी
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में
विश्वास करता है, परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल-प्रयोग
को निषिद्ध मानते हैं। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या
अहिंसा, बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपनी उद्देश्य-प्राप्ति के लिए शारीरिक
बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का?
क्रान्तिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतन्त्रता मिलेगी। वे
जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट
है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से
क्रान्तिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन
सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जायें। क्रान्ति पूँजीवाद, वर्गवाद
तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी। यह
राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म
होगा। क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मज़दूर तथा किसानों का
राज्य क़ायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्त्वों को समाप्त कर देगी जो देश
की राजनीतिक शक्ति को हथियाये बैठे हैं।
आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक गुलामी तथा धार्मिक रूढ़िवादी बन्धन
जकड़े हैं और उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है,
क्रान्तिकारी उसी में प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है। नवयुवक जैसे जैसे यह
444 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मनोविज्ञान आत्मसात करता जायेगा वैसे-वैसे राष्ट्र की गुलामी का चित्र उसके
सामने स्पष्ट होता जायेगा तथा उसकी देश को स्वतन्त्र करने की इच्छा प्रबल होती
जायेगी। और यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि युवक न्याय, क्रोध और
क्षोभ से ओतप्रोत हो अन्याय करने वालों की हत्या न प्रारम्भ कर देगा। इस प्रकार
देश में आतंकवाद का जन्म होता है। आतंकवाद सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं और क्रान्ति भी
आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं। यह तो क्रान्ति का एक आवश्यक और अवश्यम्भावी
अंग है। इस सिद्धान्त का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रान्ति का विश्लेषण कर
जाना जा सकता है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा करता है और पीड़ित
जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है। अस्थिर भावना
वाले लोगों को इससे हिम्मत बँधती है तथा उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है। इससे
दुनिया के सामने क्रान्ति के उद्देश्य का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है क्योंकि
यह किसी राष्ट्र की स्वतन्त्रता की उत्कट महत्त्वाकांक्षा का विश्वास दिलाने वाला
प्रमाण है। जैसे दूसरे देशों में होता आया है, वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रान्ति
का रूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रान्ति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक
तथा आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।
तो ये हैं क्रान्तिकारी के सिद्धान्त, जिनमें वह विश्वास करता है और जिन्हें देश
के लिए प्राप्त करना चाहता है। इस तथ्य की प्राप्ति के लिए वह गुप्त तथा खुले,
दोनों ही तरीकों से प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार एक शताब्दी से संसार में जनता
तथा शासक वर्ग में जो संघर्ष चला आ रहा है, वही अनुभव उसके लक्ष्य पर पहुँचने
का मार्गदर्शक है। क्रान्तिकारी जिन तरीक़ों में विश्वास करता है, वे कभी असफल
नहीं हुए।
इस बीच कांग्रेस क्या कर रही थी? उसने अपना ध्येय स्वराज्य से बदलकर
पूर्ण स्वतन्त्रता घोषित किया। इस घोषणा से कोई भी व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा
कि कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा न कर क्रान्तिकारियों के
विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी है। इस सम्बन्ध में कांग्रेस का पहला वार था उसका
वह प्रस्ताव जिसमें 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने के
प्रयत्न की निन्दा की गयी। इस प्रस्ताव का मसविदा गाँधीजी ने तैयार किया था
और उसे पारित कराने के लिए गाँधीजी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी। परिणाम
यह हुआ कि 1913 की सदस्य संख्या में वह केवल 31 मतों से पारित हो सका।
क्या इस अत्यल्प बहुमत में भी राजनीतिक ईमानदारी थी? इस सम्बन्ध में हम
सरलादेवी चौधरानी का मत ही यहाँ उद्धृत करें। वे तो जीवनभर कांग्रेस की भक्त
रही हैं। इस सम्बन्ध में प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा है – मैंने महात्मा गाँधी के
अनुयायियों के साथ इस विषय में जो बातचीत की, उससे मुझे मालूम हुआ कि
वे इस सम्बन्ध में अपने स्वतन्त्र विचार महात्मा जी के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा के
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 445

कारण प्रकट न कर सके, तथा इस प्रस्ताव के विरुद्ध मत देने में असमर्थ रहे,
जिसके प्रणेता महात्मा जी थे। जहाँ तक गाँधीजी की दलील का प्रश्न है, उस पर
हम बाद में विचार करेंगे। उन्होंने जो दलीलें दी हैं वे कमोबेश इस सम्बन्ध में कांग्रेस
में दिये गये भाषण का ही विस्तृत रूप हैं।
इस दुखद प्रस्ताव के विषय में एक बात मार्के की है जिसे हम अनदेखा नहीं
कर सकते, वह यह कि यह सर्वविदित है कि कांग्रेस अहिंसा का सिद्धान्त मानती
है और पिछले दस वर्षों से वह इसके समर्थन में प्रचार करती रही है। यह सब होने
पर भी प्रस्ताव के समर्थन में भाषणों में गाली-गलौच की गयी। उन्होंने
क्रान्तिकारियों को बुजदिल कहा और उनके कार्यों को घृणित। उनमें से एक वक्ता
ने धमकी देते हुए यहाँ तक कह डाला कि यदि वे (सदस्य) गाँधीजी का नेतृत्व
चाहते हैं तो उन्हें इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करना चाहिए। इतना सबकुछ
किये जाने पर भी यह प्रस्ताव बहुत थोड़े मतों से ही पारित हो सका। इससे यह
बात निःशंक प्रमाणित हो जाती है कि देश की जनता पर्याप्त संख्या में क्रान्तिकारियों
का समर्थन कर रही है। इस तरह से इसके लिए गाँधीजी हमारी बधाई के पात्र हैं
कि उन्होंने इस प्रश्न पर विवाद खड़ा किया और इस प्रकार संसार को दिखा दिया
कि कांग्रेस, जो अहिंसा का गढ़ माना जाता है, वह सम्पूर्ण नहीं तो एक हद तक
तो कांग्रेस से अधिक क्रान्तिकारियों के साथ है।
इस विषय में गाँधीजी ने जो विजय प्राप्त की वह एक प्रकार की हार ही के
बराबर थी और अब वे 'दि कल्ट ऑफ़ दि बम' लेख द्वारा क्रान्तिकारियों पर दूसरा
हमला कर बैठे हैं। इस सम्बन्ध में आगे कुछ कहने से पूर्व इस लेख पर हम अच्छी
तरह विचार करेंगे। इस लेख में उन्होंने तीन बातों का उल्लेख किया है। उनका
विश्वास, उनके विचार और उनका मत। हम उनके विश्वास के सम्बन्ध में
विश्लेषण नहीं करेंगे, क्योंकि विश्वास में तर्क के लिए स्थान नहीं है। गाँधीजी जिसे
हिंसा कहते हैं और जिसके विरुद्ध उन्होंने जो तर्कसंगत विचार प्रकट किये हैं, हम
उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करेंगे।
गाँधीजी सोचते हैं कि उनकी यह धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता
को हिंसा की भावना छू तक नहीं गयी है, और अहिंसा उनका राजनीतिक शस्त्र
बन गया है। हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है उस अनुभव के आधार
पर उनकी यह धारणा बनी है, परन्तु उन्हें अपनी इस यात्रा के इस अनुभव से इस
भ्रम में न पड़ना चाहिए। यह बात सही है कि (कांग्रेसी) नेता अपने दौरे वहीं तक
सीमित रखता है जहाँ तक डाकगाड़ी उसे आराम से पहुँचा सकती है, जबकि
गाँधीजी ने अपनी यात्रा का दायरा वहाँ तक बढ़ा दिया है जहाँ तक कि मोटरकार
द्वारा वे जा सकें। इस यात्रा में वे धनी व्यक्तियों के ही निवास-स्थानों पर रुके। इस
यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गयी उनकी
446 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

प्रशंसा, सभाओं में यदा-कदा अशिक्षित जनता को दिये जाने वाले दर्शनों में बीता,
जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं, परन्तु यही
बात इस दलील के विरुद्ध है कि वे आम जनता की विचारधारा को जानते हैं।
कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश
देकर नहीं समझ सकता। वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने
विभिन्न विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे। क्या गाँधीजी ने इन वर्षों
में आम जनता के सामाजिक जीवन में भी कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया?
क्या कभी उन्होंने किसी सन्ध्या को गाँव की किसी चौपाल के अलाव के पास
बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया? क्या किसी कारखाने के
मज़दूर के साथ एक भी शाम गुज़ारकर उसके विचार समझने की कोशिश की है?
पर हमने यह किया है और इसीलिए हम दावा करते हैं कि हम आम जनता को
जानते हैं। हम गाँधीजी को विश्वास दिलाते हैं कि साधारण भारतीय साधारण मानव
के समान ही अहिंसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत
कम समझता है। संसार का तो यही नियम है — तुम्हारा एक मित्र है, तुम उससे
स्नेह करते हो, कभी-कभी तो इतना अधिक कि तुम उसके लिए अपने प्राण भी
दे देते हो। तुम्हारा शत्रु है, तुम उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखते हो।
क्रान्तिकारियों का यह सिद्धान्त नितान्त सत्य, सरल और सीधा है और यह ध्रुव सत्य
आदम और हौवा के समय से चला आ रहा है तथा इसे समझने में कभी किसी
को कठिनाई नहीं हुई। हम यह बात स्वयं के अनुभव के आधार पर कह रहे हैं।
वह दिन दूर नहीं जब लोग क्रान्तिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए
हज़ारों की संख्या में जमा होंगे।
गाँधीजी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपनेआप को पीड़ा देने
की प्रणाली से उन्हें यह आशा है कि वे एक दिन विदेशी शासकों का
हृदय-परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायी बना लेंगे। अब उन्होंने
अपने सामाजिक जीवन की इस चमत्कार की ‘प्रेम संहिता’ के प्रचार के लिए
अपनेआप को समर्पित कर दिया है। वे अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर
रहे हैं, जैसाकि उनके कुछ अनुयायियों ने भी किया है। परन्तु क्या वे बता सकते
हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का हृदय-परिवर्तन कर वे उन्हें भारत का मित्र बनाने
में समर्थ हुए हैं? वे कितने ओडायररों, डायरों तथा रीडिंग और इरविन को भारत का
मित्र बना सके हैं? यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी इस विचारधारा से
कैसे सहमत हो सकता है कि वे इंग्लैण्ड को अहिंसा द्वारा समझा-बुझाकर इस बात
को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेंगे कि वह भारत को स्वतन्त्रता दे दे।
यदि वायसराय की गाड़ी के नीचे बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो
दो में से एक बात अवश्य हुई होती, या तो वायसराय अत्यधिक घायल हो जाते
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 447

या उनकी मृत्यु हो गयी होती। ऐसी स्थिति में वायसराय तथा राजनीतिक दलों के
नेताओं के बीच मन्त्रणा न हो पाती, यह प्रयत्न रुक जाता और उससे राष्ट्र का भला
ही होता। कलकत्ता कांग्रेस की चुनौती के बाद भी स्वशासन की भीख माँगने के
लिए वायसराय भवन के आसपास मंडराने वालों के ये घृणास्पद प्रयत्न विफल हो
जाते। यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सज़ा
पा जाता। 'मेरठ' तथा 'लाहौर षड्यन्त्र' और 'भुसावल काण्ड' का मुक़दमा चलाने
वाले केवल भारत के शत्रुओं को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं। साइमन कमीशन के
सामूहिक विरोध से देश में जो एकजुटता स्थापित हो गयी थी, गाँधी तथा नेहरू
की राजनीतिक 'बुद्धिमत्ता' के बाद ही इरविन उसे छिन्न-भिन्न करने में समर्थ हो
सका। आज कांग्रेस में भी आपस में फूट पड़ गयी है। हमारे इस दुर्भाग्य के लिए
वायसराय या उसके चाटुकारों के सिवा कौन ज़िम्मेदार हो सकता है! इस पर भी
हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो उसे भारत का मित्र कहते हैं।
देश में ऐसे भी लोग होंगे जिन्हें कांग्रेस के प्रति श्रद्धा नहीं, इससे वे कुछ
आशा भी नहीं करते। यदि गाँधीजी क्रान्तिकारियों को इस श्रेणी में गिनते हैं तो
वे उनके साथ अन्याय करते हैं। क्रान्तिकारी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं
कि कांग्रेस ने जन-जागृति का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उसने आम जनता में
स्वतन्त्रता की भावना जागृत की है, गोकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि जब
तक कांग्रेस में सेनगुप्ता जैसे 'अद्भुत प्रतिभाशाली' व्यक्तियों का, जो वायसराय
की ट्रेन उड़ाने में गुप्तचर विभाग का हाथ होने की बात करते हैं, तथा अंसारी
जैसे लोग, जो राजनीति कम जानते हैं और उचित तर्क की उपेक्षा कर बेतुकी
और तर्कहीन दलील देकर यह कहते हैं कि किसी राष्ट्र ने बम से स्वतन्त्रता नहीं
प्राप्त की – जब तक कांग्रेस के निर्णयों में इनके जैसे विचारों का प्राधान्य रहेगा,
तब तक देश उससे बहुत कम आशा कर सकता है। क्रान्तिकारी तो उस दिन की
प्रतीक्षा में हैं जब कांग्रेसी आन्दोलन से अहिंसा की यह सनक समाप्त हो जायेगी
और वह क्रान्तिकारियों के कन्धे से कन्धा मिलाकर पूर्ण स्वतन्त्रता के सामूहिक
लक्ष्य की ओर बढ़ेगी। इस वर्ष कांग्रेस ने इस सिद्धान्त (पूर्ण स्वतन्त्रता) को
स्वीकार कर लिया है, जिसका प्रतिपादन क्रान्तिकारी पिछले 25 वर्षों से करते
चले आ रहे हैं। हम आशा करें कि अगले वर्ष वह स्वतन्त्रता प्राप्ति के तरीक़ों
का भी समर्थन करेगी।
गाँधीजी यह प्रतिपादित करते हैं कि जब-जब हिंसा का प्रयोग हुआ है तब-तब
सैनिक ख़र्च बढ़ा है। यदि उनका मन्तव्य क्रान्तिकारियों की पिछली 25 वर्षों की
गतिविधियों से है तो हम उनके वक्तव्य को चुनौती देते हैं कि वे अपने इस कथन
को तथ्य और आँकड़ों से सिद्ध करें। बल्कि हम तो यह कहेंगे कि उनके अहिंसा
और सत्याग्रह के प्रयोगों का परिणाम, जिनकी तुलना स्वतन्त्रता-संग्राम से नहीं की
448 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जा सकती, नौकरशाही अर्थव्यवस्था पर हुआ है। आन्दोलनों का, फिर वे हिंसात्मक
हों या अहिंसात्मक, सफल हों या असफल, परिणाम तो भारत की अर्थव्यवस्था पर
होगा ही।
हमें समझ में नहीं आता कि देश में सरकार ने जो विभिन्न वैधानिक सुधार
किये, गाँधीजी उनमें हमें क्यों उलझाते हैं? उन्होंने मार्ले-मिण्टो रिफ़ार्म, मॉण्टेग्यू
रिफ़ार्म या ऐसे ही अन्य सुधारों की न तो कभी परवाह की और न ही उनके लिए
आन्दोलन किया। ब्रिटिश सरकार ने तो ये टुकड़े वैधानिक आन्दोलनकारियों के
सामने फेंके थे, जिससे उन्हें उचित मार्ग पर चलने से पथभ्रष्ट किया जा सके।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तो यह घूस दी थी, जिससे वे क्रान्तिकारियों को समूल नष्ट
करने की उनकी नीति के साथ सहयोग करें। गाँधीजी जैसाकि इन्हें सम्बोधित करते
हैं, कि भारत के लिए ये खिलौने जैसे हैं, उन लोगों को बहलाने-फुसलाने के लिए
जो समय-समय पर होमरूल, स्वशासन, ज़िम्मेदार सरकार, पूर्ण ज़िम्मेदार सरकार,
औपनिवेशिक स्वराज्य जैसे अनेक वैधानिक नाम जो गुलामी के हैं, माँग करते हैं।
क्रान्तिकारियों का लक्ष्य तो शासन-सुधार का नहीं है, वे तो स्वतन्त्रता का स्तर कभी
का ऊँचा कर चुके हैं और वे उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिना किसी
हिचकिचाहट के बलिदान कर रहे हैं। उनका दावा है कि उनके बलिदानों ने जनता
की विचारधारा में प्रचण्ड परिवर्तन किया है। उसके प्रयत्नों से वे देश को स्वतन्त्रता
के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ा ले गये हैं और यह बात उनसे राजनीतिक क्षेत्र में मतभेद
रखने वाले लोग भी स्वीकार करते हैं।
गाँधीजी का कथन है कि हिंसा से प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होकर स्वतन्त्रता
पाने का दिन स्थगित होता जाता है, तो हम इस विषय में अनेक ऐसे उदाहरण दे
सकते हैं, जिनमें जिन देशों ने हिंसा से काम लिया उनकी सामाजिक प्रगति होकर
उन्हें राजनीतिक स्वतन्त्रता हुई। हम रूस तथा तुर्की का ही उदाहरण लें। दोनों ने
हिंसा के उपायों से ही सशस्त्र क्रान्ति द्वारा सत्ता प्राप्त की। उसके बाद भी
सामाजिक सुधारों के कारण वहाँ की जनता ने बड़ी तीव्र गति से प्रगति की।
एकमात्र अफ़गानिस्तान के उदाहरण से राजनीतिक सूत्र सिद्ध नहीं किया जा सकता।
यह तो अपवाद-मात्र है।
गाँधीजी का विचार है कि 'असहयोग आन्दोलन के समय जो जन-जागृति हुई
है वह अहिंसा के उपदेश का ही परिणाम था'। परन्तु यह धारणा ग़लत है और यह
श्रेय अहिंसा को देना भी भूल है, क्योंकि जहाँ भी अत्यधिक जन-जागृति उत्पन्न
हुई वह सीधे मोर्चे की कार्रवाई से हुई। उदाहरणार्थ रूस में शक्तिशाली
जन-आन्दोलन से ही वहाँ किसान और मज़दूरों में जागृति उत्पन्न हुई। उन्हें तो किसी
ने अहिंसा का उपदेश नहीं दिया था, बल्कि हम तो यहाँ तक कहेंगे कि अहिंसा
तथा गाँधीजी की समझौता-नीति से ही उन शक्तियों में फूट पड़ गयी जो सामूहिक
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 449

मोर्चे के नारे से एक हो गयी थीं। यह प्रतिपादित किया जाता है कि राजनीतिक
अन्यायों का मुक़ाबला अहिंसा के शस्त्र से किया जा सकता है, पर इस विषय में
संक्षेप में तो यही कहा जा सकता है कि यह अनोखा विचार है, जिसका अभी प्रयोग
नहीं हुआ है।
दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के जो न्यायोचित अधिकार माँगे जाते थे उन्हें प्राप्त
करने में अहिंसा का शस्त्र असफल रहा। वह भारत को स्वराज्य दिलाने में भी
असफल रहा, जबकि राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वयंसेवकों की एक बड़ी सेना उसके
लिए प्रयत्न करती रही तथा उस पर लगभग सवा करोड़ रुपया भी ख़र्च किया गया।
हाल ही में बारदोली सत्याग्रह में इसकी असफलता सिद्ध हो चुकी है। इस अवसर
पर सत्याग्रह के नेता गाँधी और पटेल ने बारदोली के किसानों को जो कम से कम
अधिकार दिलाने का आश्वासन दिया था, उसे भी वे न दिला सके। इसके
अतिरिक्त अन्य किसी देशव्यापी आन्दोलन की बात हमें मालूम नहीं। अब तक इस
अहिंसा को एक ही आशीर्वाद मिला और वह था असफलता का। ऐसी स्थिति में
यह आश्चर्य नहीं कि देश ने फिर उनके प्रयोग से इन्कार कर दिया। वास्तव में
गाँधीजी जिस रूप में सत्याग्रह का प्रचार करते हैं, वह एक प्रकार का आन्दोलन
है, एक विरोध है जिसका स्वाभाविक परिणाम समझौते में होता है, जैसाकि प्रत्यक्ष
देखा गया है। इसलिए जितनी जल्दी हम समझ लें कि स्वतन्त्रता और गुलामी में
कोई समझौता नहीं हो सकता, उतना ही अच्छा है।
गाँधीजी सोचते हैं 'हम नये युग में प्रवेश कर रहे हैं।' परन्तु कांग्रेस विधान में
शब्दों का हेर-फेर मात्र कर, अर्थात् स्वराज्य को पूर्ण स्वतन्त्रता कह देने से नया
युग प्रारम्भ नहीं हो जाता। वह दिन वास्तव में एक महान दिवस होगा जब कांग्रेस
देशव्यापी आन्दोलन प्रारम्भ करने का निर्णय करेगी, जिसका आधार सर्वमान्य
क्रान्तिकारी सिद्धान्त होंगे। ऐसे समय तक स्वतन्त्रता का झण्डा फहराना हास्यास्पद
होगा। इस विषय में हम सरलादेवी चौधरानी के उन विचारों से सहमत हैं जो उन्होंने
एक समाचारपत्र संवाददाता को भेंट में व्यक्त किये। उन्होंने कहा : “31 दिसम्बर,
1929 की अर्धरात्रि के ठीक एक मिनट बाद स्वतन्त्रता का झण्डा फहराना एक
विचित्र घटना है। उस समय जी.ओ.सी., असिस्टेण्ट जी.ओ.सी. तथा अन्य लोग इस
बात को अच्छी तरह जानते थे कि स्वतन्त्रता का झण्डा फहराने का निर्णय आधी
रात तक अधर में लटका है, क्योंकि यदि वायसराय या सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट का
कांग्रेस को यह सन्देश आ जाता है कि भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य दे दिया
गया है, तो रात्रि को 11 बजकर 59 मिनट पर भी स्थिति में परिवर्तन हो सकता
था। इससे स्पष्ट है कि पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्ति का ध्येय नेताओं की हार्दिक इच्छा
नहीं थी, बल्कि एक बाल हठ के समान था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए
उचित तो यही होता कि वह पहले स्वतन्त्रता प्राप्त कर फिर उसकी घोषणा करती।”
450 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

यह सच है कि अब औपनिवेशिक स्वराज्य के बजाय कांग्रेस के वक्ता जनता के
सामने पूर्ण स्वतन्त्रता का ढोल पीटेंगे। वे अब जनता से कहेंगे कि जनता को उस
संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए जिसमें एक पक्ष तो मुक्केबाज़ी करेगा और
दूसरा उन्हें केवल सहता रहेगा, जब तक कि वह खूब पिटकर इतना हताश न हो
जाये कि फिर न उठ सके। क्या उसे संघर्ष कहा जा सकता है और क्या इससे देश
को स्वतन्त्रता मिल सकती है? किसी भी राष्ट्र के लिए सर्वोच्च लक्ष्य-प्राप्ति का
ध्येय सामने रखना अच्छा है, परन्तु साथ में यह भी आवश्यक है कि इस लक्ष्य
तक पहुँचने के लिए उन साधनों का उपयोग किया जाये जो योग्य हों और जो पहले
उपयोग में आ चुके हों, अन्यथा संसार के सम्मुख हमारे हास्यास्पद बनने का भय
बना रहेगा।
गाँधीजी ने सभी विचारशील लोगों से कहा कि वे लोग क्रान्तिकारियों से
सहयोग करना बन्द कर दें तथा उनके कार्यों की निन्दा करें, जिससे हमारे इस
प्रकार उपेक्षित देशभक्तों की हिंसात्मक कार्यों से जो हानि हुई, उसे समझ सकें।
लोगों को उपेक्षित तथा पुरानी दलीलों के समर्थक कह देना जितना आसान है,
उसी प्रकार उनकी निन्दा कर जनता से उनसे सहयोग न करने को कहना, जिससे
वे अलग-अलग हो अपना कार्यक्रम स्थगित करने के लिए बाध्य हो जायें, यह
सब करना विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए आसान होगा जोकि जनता के कुछ
प्रभावशाली व्यक्तियों का विश्वासपात्र हो। गाँधीजी ने जीवनभर जन-जीवन का
अनुभव किया है, पर यह बड़े दुख की बात है कि वे भी क्रान्तिकारियों का
मनोविज्ञान न तो समझते हैं और न समझना ही चाहते हैं। वह सिद्धान्त अमूल्य
है, जो प्रत्येक क्रान्तिकारी को प्रिय है। जो व्यक्ति क्रान्तिकारी बनता है, जब वह
अपना सिर हथेली पर रखकर किसी क्षण भी आत्मबलिदान के लिए तैयार रहता
है तो वह केवल खेल के लिए नहीं। वह यह त्याग और बलिदान इसलिए भी
नहीं करता कि जब जनता उसके साथ सहानुभूति दिखाने की स्थिति में हो तो
उसकी जय-जयकार करे। वह इस मार्ग का इसलिए अवलम्बन करता है कि
उसका सद्‌विवेक उसे इसकी प्रेरणा देता है, उसकी आत्मा उसे इसके लिए प्रेरित
करती है।
एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क
और तर्क में ही विश्वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा, चाहे
वह ऊँचे से ऊँचे स्तर से की गयी हो, उसे अपने निश्चित उद्देश्य-प्राप्ति से
वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या
उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा, निरी
मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्दोलनकारियों ने
घोर निन्दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फाँसी के तख्ते पर झूल गये।
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 451

यदि तुम चाहते हो कि क्रान्तिकारी अपनी गतिविधियों को स्थगित कर दें तो
उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित
किया जाये। यह एक, और केवल यही एक रास्ता है, और बाक़ी बातों के विषय
में किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए। क्रान्तिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने
से कदापि हार मानने वाला नहीं।
हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वे हमारे साथ गम्भीरतापूर्वक इस
युद्ध में शामिल हों। कोई भी व्यक्ति अहिंसा और ऐसे ही अजीबो-ग़रीब तरीक़ों से
मनोवैज्ञानिक प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतन्त्रता के साथ खिलवाड़ न करे। स्वतन्त्रता
राष्ट्र का प्राण है। हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जास्पद है, न जाने कब हममें यह
बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्त कर स्वतन्त्र हो सकें? हमारी
प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ, यदि हममें यह स्वाभिमान
न रहे कि हम विदेशी गुलामी, विदेशी झण्डे और बादशाह के सामने सिर झुकाने
से अपनेआप को न रोक सकें।
क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया? हमें
भिखारी बनाया तथा हमारा समस्त ख़ून चूस लिया? एक जाति और मानवता के
नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है। क्या जनता अब भी चाहती है
कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें? हम बदला
लेंगे, जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा। कायरों को पीठ
दिखाकर समझौता और शान्ति की आशा से चिपके रहने दीजिये। हम किसी से भी
दया की भिक्षा नहीं माँगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगे। हमारा युद्ध
विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा। इन्क़लाब ज़िन्दाबाद!
करतार सिंह*
अध्यक्ष
(26 जनवरी, 1930) हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
(*भगतसिंह का छद्म नाम)
452 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

भारतीय क्रान्ति का आदर्श
भगतसिंह क्रान्ति के वैचारिक प्रश्नों पर निरन्तर अध्ययन-मनन कर रहे थे। वह
बड़े व्यवस्थित ढंग से नोट्स लेते थे और अपने चिन्तन को तरतीब देने का काम
करते रहते थे। उनकी जेल नोटबुक इस बात का ठोस प्रमाण है। नीचे दिया गया
दस्तावेज़ भी इसका साक्ष्य है। यह एक टिप्पणी की शक्ल में है, जिसे अदालत में
पेश किया गया था। – स.

  1. भारतीय क्रान्ति का आदर्श
    (क) अंग्रेज़ी भारत में प्रकट और गुप्त क्रान्तियों का इतिहास
    (ख) रिपब्लिक का आदर्श
    (ग) 1914-15 का विद्रोह, स्वतन्त्रता, समानता एवं भ्रातृत्व का आदर्श
    (घ) भारतीय राजकुमार और क्रान्तिकारी ‘सरकार का परचा’।
    (‘सरकार’ एक बंगाली लेखक थे। – स.)
    (ङ) भारतीय मुसलमान राजाओं को तुर्की का सन्देश
    (च) बर्लिन कमेटी और जर्मन प्लाट
    (छ) 1919 का विद्रोह और दंगे
    (ज) असहयोग
    स्वराज्य बिना किसी स्पष्ट परिभाषा के
    (झ) असहयोग आन्दोलन की असफलता और क्रान्तिकारी दल
    (ञ) 1925 का घोषणापत्र
    (त) विचारधाराओं के अब के स्कूल –
  2. सरकार के स्कूल की विचारधारा (साम्प्रदायिक)
  3. बंगाल स्कूल की विचारधारा (राष्ट्रवादी)
  4. चन्द्रनगर आम विचारधारा का स्कूल – मोतीलाल
    (अध्यात्मवादी)
  5. उच्च विहार (समाजवादी) डॉ. भूपेन्द्रनाथ दत्त
  6. कम्युनिस्ट विचारधारा का स्कूल
    विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 453
  1. बूर्ज्वाजी
    नेहरू रिपोर्ट (मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट, जिसमें डोमिनियन स्टेटस की
    माँग की गयी थी। - स.)
  2. पी.बी. (शायद प्रोविंशियल बोर्ड की ओर संकेत है, जो
    क्रान्तिकारी दल की स्थापना के सिलसिले में एक और जगह आया
    है। - स.)
  3. ढंग
  4. आतंकवादी
  5. जनक्रान्तिकारी
  6. अहिंसक सिविल नाफ़रमानी
    अराजकतावाद
    समाजवाद
    साम्यवाद
    सिडनीकेनिज़्म
    कुल्किटीविज़्म
  7. भारतीय क्रान्ति का आदर्श
  8. क्रान्ति या दुनिया की क्रान्ति का आदर्श
  9. विवाह।
    454 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मैं नास्तिक क्यों हूँ?
(भगतसिंह ने जेल में यह लेख 5-6 अक्टूबर, 1930 को लिखा था। यह पहली
बार लाहौर से प्रकाशित अंग्रेज़ी पत्र 'द पीपुल' के 27 सितम्बर 1931 के अंक में
प्रकाशित हुआ था। इस महत्त्वपूर्ण लेख में भगतसिंह ने सृष्टि के विकास और गति
की भौतिकवादी समझ पेश करते हुए उसके पीछे किसी मानवेतर ईश्वरीय सत्ता के
अस्तित्व की परिकल्पना को अत्यन्त तार्किक ढंग से निराधार सिद्ध किया है।)
एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं अहम्मन्यता के कारण सर्वशक्तिमान,
सर्वव्यापी और सर्वज्ञ ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता हूँ? मैंने कल्पना
भी नहीं की थी कि मुझे कभी ऐसे सवाल का सामना करना पड़ेगा। लेकिन कुछ
मित्रों से हुई बातचीत में मुझे यह संकेत मिला कि मेरे कुछ दोस्त – अगर उन्हें
दोस्त मान कर उन पर मैं बहुत ज़्यादा अधिकार नहीं जता रहा हूँ तो – मेरे साथ
के अपने थोड़े से सम्पर्क से इस नतीजे पर पहुँचना चाहते हैं कि मैं ईश्वर के
अस्तित्व को नकार कर बड़ी ज़्यादती कर रहा हूँ और यह कि मुझमें कुछ
अहम्मन्यता है जिसने मुझे इस अविश्वास के लिए प्रेरित किया है।
बहरहाल, समस्या गम्भीर है। मैं ऐसी शेखी नहीं बघारता कि मैं इन मानवीय
कमज़ोरियों से एकदम ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, इससे ज़्यादा कुछ होने का दावा
कोई भी नहीं कर सकता। सो मुझमें भी यह कमज़ोरी है। सचमुच अहम्मन्यता मेरे
स्वभाव का एक अंग है। अपने साथियों के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ
तक कि मेरे मित्र श्री बी.के. दत्त भी कभी-कभी मुझे निरंकुश कहा करते थे। कई
अवसरों पर तानाशाह कह कर मेरी निन्दा की गयी। कुछ मित्रों को सचमुच यह
शिकायत है, और गम्भीर शिकायत है, कि मैं अनजाने ही अपने विचार दूसरों पर
थोपता हूँ और अपनी बातें ज़बरन मनवा लेता हूँ। मैं इन्कार नहीं करता कि एक
हद तक यह बात सच है। इसे अहम्मन्यता भी कहा जा सकता है। जितनी
अहम्मन्यता अन्य लोकप्रिय मतों के मुक़ाबले हमारे मत में है, उतनी मुझमें भी है।
मगर वह निजी नहीं है। हो सकता है, हमारे मत में यह केवल एक समुचित गर्व
हो और इसे अहम्मन्यता न माना जाता हो। अहम्मन्यता, अथवा और ज़्यादा
ठीक-ठीक कहें तो अहंकार, किसी को अपने ऊपर हो जाने वाले अनुचित गर्व का
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 455

नाम है। यहाँ मैं जिस सवाल पर चर्चा करना चाहता हूँ, वह यही है कि क्या मैं
नास्तिक इसलिए बन गया हूँ कि मुझे अपने ऊपर ऐसा अनुचित गर्व है? अथवा
इस विषय के सचेत अध्ययन और काफ़ी सोच-विचार के बाद मैंने ईश्वर में
विश्वास करना छोड़ा है? वैसे, मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि अहंकार और अहम्मन्यता
दो भिन्न चीजें हैं।
अव्वल तो मैं यह बात क़तई नहीं समझ सका कि अनुचित गर्व या मिथ्या
दम्भ किसी को आस्तिक बनने से कैसे रोक सकता है। वास्तव में मैं किसी महान
व्यक्ति की महानता से इन्कार कर सकता हूँ, बशर्ते कि वैसी योग्यता न होने पर
भी, अथवा महान होने के लिए वास्तव में आवश्यक या अनिवार्य गुण न होने पर
भी, मुझे किसी हद तक वैसी ही लोकप्रियता मिल जाये। यहाँ तक तो बात समझ
में आती है। मगर यह कैसे हो सकता है कि कोई आस्तिक निजी अहम्मन्यता के
कारण ईश्वर में विश्वास करना छोड़ दे? दो ही बातें हो सकती हैं : आदमी या
तो स्वयं को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या यह मानने लगे कि वह स्वयं ही
ईश्वर है। लेकिन इन दोनों ही स्थितियों में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता।
पहली स्थिति में वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व से इन्कार ही नहीं करता, दूसरी
स्थिति में भी वह एक ऐसी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करता है जो अदृश्य
रहकर प्रकृति की तमाम क्रियाओं को निर्देशित करती है। हमारे लिए इस बात का
कोई महत्त्व नहीं कि वह स्वयं को सर्वोच्च सत्ता समझता है अथवा किसी सर्वोच्च
सचेत सत्ता को स्वयं से अलग समझता है। मूल बात ज्यों की त्यों है। उसका
विश्वास ज्यों का त्यों है। वह किसी भी तरह से नास्तिक नहीं है।
बहरहाल, मेरी बात मान लीजिये। मैं न तो पहली श्रेणी में आता हूँ न दूसरी
में। मैं उस सर्वशक्तिमान परमात्मा के अस्तित्व से ही इन्कार करता हूँ। क्यों इन्कार
करता हूँ, इसकी चर्चा बाद में करूँगा। यहाँ मैं केवल यह स्पष्ट करना चाहता हूँ
कि नास्तिकता के सिद्धान्तों को अपनाने की दिशा में मुझे मेरी अहम्मन्यता ने प्रेरित
नहीं किया है। मैं न तो ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी हूँ न उसका अवतार, न स्वयं परमात्मा।
पक्की बात है कि अहम्मन्यता ने मुझे ऐसा सोचने के लिए प्रेरित नहीं किया है।
इस आरोप को मिथ्या सिद्ध करने के लिए मुझे तथ्यों की जाँच-पड़ताल करने की
इजाज़त दीजिये। मेरे इन दोस्तों के मुताबिक़ दिल्ली बमकाण्ड और लाहौर षड्यन्त्र
काण्ड के कारण चले मुक़दमों के दौरान मुझे जो आवश्यक लोकप्रियता मिल गयी
है, शायद उसी ने मुझमें मिथ्या दम्भ पैदा कर दिया है। ख़ैर, देख लेते हैं कि उनकी
बात सही है या नहीं।
मेरी नास्तिकता इतनी नयी चीज़ नहीं। मैंने तो ईश्वर को मानना तभी बन्द
कर दिया था जब मैं एक अज्ञात नौजवान था और मेरे उपर्युक्त मित्रों को मेरे
अस्तित्व का पता भी नहीं था। कम से कम कॉलेज का एक छात्र ऐसा अनुचित
456 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

गर्व नहीं पाल सकता जो उसे नास्तिक बना दे। हालाँकि कुछ प्रोफ़ेसर मुझे पसन्द
करते थे और कुछ नापसन्द, पर मैं कभी भी परिश्रमी या पढ़ाकू लड़का नहीं
रहा। अहम्मन्यता जैसी भावनाएँ पालने का मेरे लिए कोई मौक़ा नहीं था। मैं तो
बड़े शर्मीले स्वभाव का लड़का था और अपने भविष्य को लेकर कुछ
निराशावादी खयालों में खोया रहता था। और उन दिनों मैं पक्का नास्तिक नहीं
था। मेरे दादा, जिनके प्रभाव में मेरा पालन-पोषण हुआ, कट्टर आर्यसमाजी हैं।
आर्यसमाजी और चाहे कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा
पूरी करने के बाद मैं लाहौर के डी.ए.वी. स्कूल में दाखिल हुआ और वहाँ के
बोर्डिंग हाउस में पूरे एक साल तक रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थनाओं के
अलावा भी मैं घण्टों गायत्री मन्त्र जपता रहता था। उन दिनों मैं पूरा भगत था।
आगे चलकर मैं अपने पिता के साथ रहने लगा। जहाँ तक धार्मिक कट्टरता का
सवाल है, वे उदारतावादी हैं। उन्हीं के उपदेशों से मुझमें आज़ादी के उद्देश्य के
लिए अपना जीवन अर्पित कर देने की आकांक्षा उत्पन्न हुई। लेकिन वे नास्तिक
नहीं हैं। वे मुझे प्रतिदिन सन्ध्या उपासना करने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे।
इस ढंग से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में मैं नेशनल
कॉलेज में दाखिल हुआ। वहीं जाकर मैने उदारतावादी ढंग से सोचना और सारी
धार्मिक समस्याओं के बारे में, यहाँ तक कि ईश्वर के बारे में भी, बहस और
आलोचना करना शुरू किया। मगर ईश्वर में मेरा अब भी पक्का विश्वास था।
अब, मैं बिना कटे-छँटे दाढ़ी और केश रखने लगा था, मगर मैं सिख मत या
किसी अन्य धर्म के मिथकों और सिद्धान्तों में विश्वास कभी नहीं कर पाया।
फिर भी ईश्वर के अस्तित्व में मेरी पक्की आस्था थी।
आगे चलकर मैं क्रान्तिकारी दल में शामिल हुआ। सबसे पहले मैं जिन नेता
के सम्पर्क में आया, वे ईश्वर को मानते तो नहीं थे, लेकिन उसके अस्तित्व को
नकारने का साहस उनमें नहीं था। मैं ईश्वर के बारे में लगातार उनसे प्रश्न करता
जाता तो वे कह दिया करते थे, “जब तुम्हारा मन करे, प्रार्थना कर लिया करो।”
अब यह तो ऐसी नास्तिकता हुई कि नास्तिक बनने चले हैं और नास्तिक बनने की
हिम्मत आप में नहीं। मैं जिन दूसरे नेता के सम्पर्क में आया, वे आस्तिक थे। उनका
नाम बता ही दूँ – वे थे आदरणीय साथी शचीन्द्रनाथ सान्याल, जो कराची षड्यन्त्र
काण्ड के सिलसिले में आजीवन कालेपानी की सज़ा भुगत रहे हैं। उनकी प्रसिद्ध
और एकमात्र पुस्तक ‘बन्दी-जीवन’ में पहले पृष्ठ से ही ईश्वर की महिमा का
ज़बरदस्त गुणगान किया गया है। उस ख़ूबसूरत किताब के दूसरे भाग के अन्तिम
पृष्ठ पर अपने वेदान्तवाद के कारण उन्होंने ईश्वर को जो रहस्यवादी स्तुतियाँ गायी
हैं, वे उनके विचारों का बड़ा अजीबोगरीब हिस्सा हैं। 28 जनवरी, 1926 को जो
क्रान्तिकारी परचा पूरे भारत में बाँटा गया था, वह मुक़दमे के काग़ज़ात के अनुसार
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 457

उन्हीं के मानसिक श्रम का परिणाम था। अब यह तो होता ही है कि गुप्त कार्रवाई
में प्रमुख नेता अपने उन निजी विचारों को व्यक्त कर डालता है जो उसे निजी तौर
पर बहुत प्रिय होते हैं, और शेष कार्यकर्ताओं को मतभेदों के बावजूद उन विचारों
से मौन सहमति प्रकट करनी पड़ती है। उस पर्चे में एक पूरा पैराग्राफ़ सर्वशक्तिमान
ईश्वर की लीला और करनी की प्रशंसा से भरा हुआ था। वह सब रहस्यवाद है।
मैं कहना यह चाहता हूँ कि नास्तिकता का विचार क्रान्तिकारी दल में भी पैदा
नहीं हुआ था। काकोरी काण्ड के चारों विख्यात शहीदों ने अपना अन्तिम दिन
प्रार्थनाएँ करते हुए बिताया था। रामप्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्यसमाजी थे।
समाजवाद और साम्यवाद के अपने विस्तृत अध्ययन के बावजूद राजेन्द्र लाहिड़ी
उपनिषदों और गीता के श्लोकों का पाठ करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं सके
थे। उन लोगों में मैंने सिर्फ़ एक आदमी ऐसा देखा जो कभी प्रार्थना नहीं करता था
और कहा करता था कि "दर्शन मानवीय दुर्बलता या सीमित ज्ञान से पैदा होता है।"
वह भी आजीवन कालेपानी की सज़ा भुगत रहा है। लेकिन ईश्वर के अस्तित्व को
नकारने का साहस वह भी कभी नहीं जुटा सका।
तब तक मैं रूमानी आदर्शवादी क्रान्तिकारी ही था। तब तक हम केवल
अनुयायी थे, आगे चलकर पूरी ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर उठाने का समय आया।
अनिवार्यतः प्रतिक्रिया इतनी ज़बरदस्त थी कि कुछ समय तक तो दल का अस्तित्व
ही असम्भव लगता रहा। उत्साही साथी, नहीं-नहीं, नेता हमारा मज़ाक़ उड़ाने लगे।
कुछ समय तक मुझे ऐसा लगता रहा कि कहीं मैं भी अपने कार्यक्रम को व्यर्थ
न मानने लगूँ। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक मोड़ था। मेरे दिमाग़ के हर
कोने-अन्तरे से एक ही आवाज़ रह-रह कर उठती - "अध्ययन करो। स्वयं को
विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो!" "अपने
मत के समर्थन में तर्कों से लैस होने के लिए अध्ययन करो!"
मैंने अध्ययन करना शुरू किया, उससे मेरी पूर्ववर्ती आस्थाओं और मान्यताओं
में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। केवल हिंसात्मक उपायों में विश्वास रखने का
रूमानीपन, जो हमसे पहले के लोगों पर हावी था, दूर हो गया और उसका स्थान
गम्भीर विचारों ने ले लिया। रहस्यवाद और अन्धविश्वास के लिए अब कोई गुंजाइश
नहीं रही। यथार्थवाद हमारा मत बन गया। अब हमारी समझ में आया कि शक्ति
का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक होने पर ही उचित है और आम जनता के तमाम
आन्दोलनों के लिए अहिंसा की नीति अपरिहार्य है। यह तो हुई तरीक़ों की बात।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात थी उस आदर्श की स्पष्ट अवधारणा जिसके लिए हमें लड़ना
था। चूँकि उस समय सक्रियता के स्तर पर कोई ख़ास गतिविधियाँ नहीं थीं,
इसलिए विश्व-क्रान्ति के विभिन्न आदर्शों का अध्ययन करने के अवसर मुझे खूब
मिले। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, थोड़ा-सा साम्यवाद के जनक
458 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मार्क्स को पढ़ा, और अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति करने वाले लेनिन, त्रात्स्की
तथा अन्य लोगों को खूब पढ़ा। ये सब नास्तिक थे। बाकुनिन की पुस्तक 'ईश्वर
और राज्य' अधूरी-सी होने के बावजूद इस विषय का एक रोचक अध्ययन है। बाद
में निर्लम्ब स्वामी की पुस्तक 'सहज ज्ञान' मेरे पढ़ने में आयी। उसमें महज एक
रहस्यवादी नास्तिकता थी। अब यह विषय मेरे लिए सबसे ज़्यादा रोचक बन गया।
1926 के अन्त तक मैं इस बात का कायल हो गया कि सारी दुनिया को बनाने,
चलाने और नियन्त्रित करने वाली सर्वशक्तिमान परमसत्ता के अस्तित्व का सिद्धान्त
निराधार है। मैंने अपने अविश्वास के बारे में दूसरों को बता भी दिया था। मित्रों के
साथ मैं इस विषय पर बहस करने लगा। मैं घोषित रूप से नास्तिक बन चुका था।
मगर इसका मतलब क्या था, इसकी चर्चा नीचे की जा रही है।
मई 1927 में लाहौर में मेरी गिरफ़्तारी हुई। गिरफ़्तारी अचानक हुई। मुझे ज़रा
भी अन्देशा नहीं था कि पुलिस मेरी तलाश में है। अचानक एक बाग़ में से गुज़रते
हुए मैंने पाया कि मैं पुलिस द्वारा घेर लिया गया हूँ। मुझे खुद इस बात की हैरानी
है कि मैं उस समय एकदम शान्त रहा। न तो मुझे कोई घबराहट हुई, न मैंने किसी
उत्तेजना का अनुभव किया। मुझे हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन मुझे रेलवे
पुलिस की हवालात में ले जाया गया जहाँ मैंने पूरा एक महीना गुज़ारा।
पुलिस अफ़सरों से कई दिन की बातचीत के बाद मैंने अनुमान लगाया कि
उन्हें काकोरी दल से मेरे सम्बन्ध होने तथा क्रान्तिकारी आन्दोलन से सम्बन्धित मेरी
अन्य गतिविधियों के बारे में कुछ जानकारी है। उन्होंने मुझे बताया कि जिन दिनों
मुक़दमा चल रहा था, मैं लखनऊ गया था; कि मैंने अभियुक्तों से मिलकर उन्हें
छुड़ाने की योजना बनाई थी; कि उनकी अनुमति पाकर हम लोगों ने कुछ बम जमा
किये; कि जाँच के तौर पर उनमें से एक बम 1926 के दशहरे के दिन भीड़ में
फेंका गया था, फिर उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम
क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए एक बयान दे दो, इससे तुम्हें
जेल में नहीं डाला जायेगा। बल्कि अदालत में मुख़बिर बतौर पेश किये बिना ही
तुम्हें छोड़ दिया जायेगा। मैं उनके इस प्रस्ताव पर हँस दिया। उनकी सब बातें
वाहियात थीं। हमारे जैसे विचारों वाले लोग अपनी बेकसूर जनता पर बम नहीं फेंका
करते। एक दिन सी.आई.डी. के तत्कालीन वरिष्ठ अधीक्षक मिस्टर न्यूमैन मेरे पास
आये। और काफ़ी देर तक सहानुभूति जताने वाली बातें करने के बाद उन्होंने मुझे
यह ख़बर सुनायी – जो उनके हिसाब से अत्यन्त दुखद थी – कि वे लोग जैसा
बयान मुझसे चाहते हैं, मैंने नहीं दिया तो मजबूर होकर उन्हें मुझ पर काकोरी काण्ड
के सिलसिले में शासन के विरुद्ध लड़ाई छेड़ने के षड़यन्त्र और दशहरा बमकाण्ड
के सिलसिले में हुई क्रूर हत्याओं के लिए मुक़दमा चलाना पड़ेगा। फिर उन्होंने मुझे
बताया कि उनके पास मुझे सज़ा दिलाने और फाँसी चढ़ाने के लिए काफ़ी सबूत
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 459

'मैं नास्तिक क्यों हूँ', जेल की भूख-हड़ताल एवं बन्दियों के अधिकारों की लड़ाई

मौजूद हैं। उन दिनों मैं यह मानता था — हालाँकि मैं बिल्कुल निर्दोष था — कि
पुलिस चाहे तो ऐसा कर सकती है। उसी दिन कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे
सुबह-शाम दोनों समय नियम से प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया।
अब मैं ठहरा नास्तिक। मैंने अपने मन में यह फ़ैसला कर लेना चाहा कि मैं
सुख-शान्ति के दिनों में ही नास्तिक होने की शेखी बघारता हूँ या ऐसी कठिन
परिस्थितियों में भी अपने सिद्धान्तों पर अटल रह सकता हूँ। बहुत सोच-विचार के
बाद मैंने यह निश्चय किया कि मैं स्वयं को ईश्वर में विश्वास करने और उसकी
प्रार्थना करने के लिए तैयार नहीं कर सकता। और मैंने प्रार्थना नहीं की। एक बार
भी नहीं की। यह असली परीक्षा थी और मैं उसमें उत्तीर्ण हुआ। एक क्षण के लिए
भी मेरे मन में यह विचार नहीं आया कि कुछ अन्य चीज़ों की क़ीमत पर मैं अपनी
जान बचा लूँ। इस तरह मैं पक्का नास्तिक था और तब से आज तक हूँ। उस परीक्षा
में उत्तीर्ण होना कोई आसान काम नहीं था। आस्तिकता मुश्किलों को आसान कर
देती है, यहाँ तक कि उन्हें खुशगवार भी बना सकती है। आदमी ईश्वर में बड़ी
ज़बरदस्त राहत और दिलासा पा सकता है। उसके बिना आदमी को अपने ऊपर ही
भरोसा करना पड़ता है। और आँधियों-तूफ़ानों के बीच अपने पैरों पर खड़े रहना
बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की ऐसी घड़ियों में अहम्मन्यता अगर हो भी तो
कपूर की तरह उड़ जाती है और आदमी प्रचलित विश्वासों को ठुकराने की हिम्मत
नहीं कर पाता, अगर करता है तो हमें कहना पड़ेगा कि उसमें निरी अहम्मन्यता के
अलावा कोई और ताक़त है।
ठीक यही स्थिति आज है। सब लोग अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे
मुक़दमे का फ़ैसला क्या होना है। हफ़्तेभर में वह सुना भी दिया जायेगा। मेरे लिए
इस ख़याल के अलावा और क्या राहत हो सकती है कि मैं एक उद्देश्य के लिए
अपने प्राणों का बलिदान करने जा रहा हूँ? ईश्वर में विश्वास करने वाला हिन्दू
राजा बनकर पुनर्जन्म लेने की आशा कर सकता है, मुसलमान या ईसाई जन्नत में
मिलने वाले मज़े लूटने और अपनी मुसीबतों और कुर्बानियों के बदले इनाम
हासिल करने के सपने देख सकता है। मगर मैं किस चीज़ की उम्मीद करूँ? मैं
जानता हूँ कि जब मेरी गर्दन में फाँसी का फन्दा डालकर मेरे पैरों के नीचे से
तख़्ते खींचे जायेंगे, सबकुछ समाप्त हो जायेगा। वही मेरा अन्तिम क्षण होगा। मेरा,
अथवा आध्यात्मिक शब्दावली में कहूँ तो मेरी आत्मा का, सम्पूर्ण अन्त उसी क्षण
हो जायेगा। बाद के लिए कुछ नहीं रहेगा। अगर मुझमें इस दृष्टि से देखने का
साहस है तो एक छोटा-सा संघर्षमय जीवन ही, जिसका अन्त भी कोई शानदार
अन्त नहीं, अपनेआप में मेरा पुरस्कार होगा। बस और कुछ नहीं। किसी स्वार्थपूर्ण
इरादे के बिना, इहलोक या परलोक में कोई पुरस्कार पाने की इच्छा के बिना,
बिल्कुल अनासक्त भाव से मैंने अपना जीवन आज़ादी के उद्देश्य के लिए अर्पित
460 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

किया है, क्योंकि मैं ऐसा किये बिना रह नहीं सका।
जिस दिन ऐसी मानसिकता वाले बहुत से लोग हो जायेंगे जो मानव-सेवा और
पीड़ित मानवता की मुक्ति को हर चीज़ से ऊपर समझ कर उसके लिए अपनेआप
को अर्पित करेंगे, उसी दिन आज़ादी का युग शुरू होगा। जब वे राजा बनने के लिए
नहीं; इहलोक में, अगले जन्म या मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग में जाकर कोई अन्य
पुरस्कार पाने के लिए नहीं बल्कि मानवता की गर्दन पर रखा दासता का जुवा
उतार फेंकने के लिए और स्वतन्त्रता एवं शान्ति की स्थापना के लिए दमनकारियों,
शोषकों और अत्याचारियों को चुनौती देने की प्रेरणा ग्रहण करेंगे, तभी वे इस मार्ग
पर चल सकेंगे जो व्यक्तिगत रूप से उनके लिए भले ही ख़तरनाक हो लेकिन
उनकी महान आत्माओं के लिए एकमात्र गौरवपूर्ण मार्ग है।
इस महान उद्देश्य के लिए स्वयं को अर्पित करने में उन्हें जो गर्व होगा, क्या
उसे अहम्मन्यता कहा जा सकता है? उन पर ऐसा घृणित लांछन लगाने की हिम्मत
कौन कर सकता है? अगर कोई करता है तो मैं कहूँगा कि या तो वह मूर्ख है या
धूर्त। चलिए, हम उसे माफ़ किये देते हैं, क्योंकि वह हृदय की गहराई और आवेग
को, उसमें उठने वाली भावनाओं और उदात्त अनुभूतियों को समझ ही नहीं सकता।
उसका दिल मांस का बेजान लोथड़ा है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों का परदा
पड़ा हुआ है, इसलिए वे अच्छी तरह देख ही नहीं सकतीं।
आत्मनिर्भरता को अहम्मन्यता के रूप में व्याख्यायित कर लेने की गुंजाइश
हमेशा बनी रहती है। यह बड़ी दुखद और बुरी बात है, लेकिन इसके बारे में कुछ
किया नहीं जा सकता। आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिये,
किसी ऐसे नायक या महान व्यक्ति की आलोचना करके देखिये, जिसके बारे में
लोग यह मानते हों कि वह कभी कोई ग़लती कर ही नहीं सकता इसलिए उसकी
आलोचना की ही नहीं जा सकती, आप के तर्कों की ताक़त लोगों को मजबूर करेगी
कि वे अहंकारी कहकर आप का मज़ाक़ उड़ायें। इसका कारण मानसिक जड़ता
है। आलोचना और स्वतन्त्र चिन्तन क्रान्तिकारी के दो अनिवार्य गुण होते हैं। यह नहीं
कि महात्माजी महान हैं इसलिए किसी को उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए;
चूँकि वे पहुँचे हुए आदमी हैं इसलिए राजनीति, धर्म, अर्थशास्त्र या नीतिशास्त्र पर
वे जो कुछ कह देंगे वह सही ही होगा; आप सहमत हों या न हों पर आप को
कहना ज़रूर पड़ेगा कि यही सत्य है। यह मानसिकता प्रगति की ओर नहीं ले जाती।
साफ़ ज़ाहिर है कि यह प्रतिक्रियावादी मानसिकता है।
चूँकि हमारे पूर्वजों ने किसी परमसत्ता में – सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास
बना लिया था, इसलिए उस विश्वास को या उस परम सत्ता को चुनौती देने वालों
को अगर काफ़िर और ग़द्दार कहा जाना है; चूँकि उसके तर्क इतने वज़नी हैं कि
उनकी काट सम्भव नहीं और उसकी भावना इतनी प्रबल है कि सर्वशक्तिमान के
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 461