भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रशंसा, सभाओं में यदा-कदा अशिक्षित जनता को दिये जाने वाले दर्शनों में बीता,
जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं, परन्तु यही
बात इस दलील के विरुद्ध है कि वे आम जनता की विचारधारा को जानते हैं।
कोई व्यक्ति जनसाधारण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश
देकर नहीं समझ सकता। वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने
विभिन्न विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे। क्या गाँधीजी ने इन वर्षों
में आम जनता के सामाजिक जीवन में भी कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया?
क्या कभी उन्होंने किसी सन्ध्या को गाँव की किसी चौपाल के अलाव के पास
बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया? क्या किसी कारखाने के
मज़दूर के साथ एक भी शाम गुज़ारकर उसके विचार समझने की कोशिश की है?
पर हमने यह किया है और इसीलिए हम दावा करते हैं कि हम आम जनता को
जानते हैं। हम गाँधीजी को विश्वास दिलाते हैं कि साधारण भारतीय साधारण मानव
के समान ही अहिंसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत
कम समझता है। संसार का तो यही नियम है — तुम्हारा एक मित्र है, तुम उससे
स्नेह करते हो, कभी-कभी तो इतना अधिक कि तुम उसके लिए अपने प्राण भी
दे देते हो। तुम्हारा शत्रु है, तुम उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखते हो।
क्रान्तिकारियों का यह सिद्धान्त नितान्त सत्य, सरल और सीधा है और यह ध्रुव सत्य
आदम और हौवा के समय से चला आ रहा है तथा इसे समझने में कभी किसी
को कठिनाई नहीं हुई। हम यह बात स्वयं के अनुभव के आधार पर कह रहे हैं।
वह दिन दूर नहीं जब लोग क्रान्तिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए
हज़ारों की संख्या में जमा होंगे।
गाँधीजी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपनेआप को पीड़ा देने
की प्रणाली से उन्हें यह आशा है कि वे एक दिन विदेशी शासकों का
हृदय-परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायी बना लेंगे। अब उन्होंने
अपने सामाजिक जीवन की इस चमत्कार की ‘प्रेम संहिता’ के प्रचार के लिए
अपनेआप को समर्पित कर दिया है। वे अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर
रहे हैं, जैसाकि उनके कुछ अनुयायियों ने भी किया है। परन्तु क्या वे बता सकते
हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का हृदय-परिवर्तन कर वे उन्हें भारत का मित्र बनाने
में समर्थ हुए हैं? वे कितने ओडायररों, डायरों तथा रीडिंग और इरविन को भारत का
मित्र बना सके हैं? यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी इस विचारधारा से
कैसे सहमत हो सकता है कि वे इंग्लैण्ड को अहिंसा द्वारा समझा-बुझाकर इस बात
को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेंगे कि वह भारत को स्वतन्त्रता दे दे।
यदि वायसराय की गाड़ी के नीचे बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो
दो में से एक बात अवश्य हुई होती, या तो वायसराय अत्यधिक घायल हो जाते
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 447