भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकारण प्रकट न कर सके, तथा इस प्रस्ताव के विरुद्ध मत देने में असमर्थ रहे,
जिसके प्रणेता महात्मा जी थे। जहाँ तक गाँधीजी की दलील का प्रश्न है, उस पर
हम बाद में विचार करेंगे। उन्होंने जो दलीलें दी हैं वे कमोबेश इस सम्बन्ध में कांग्रेस
में दिये गये भाषण का ही विस्तृत रूप हैं।
इस दुखद प्रस्ताव के विषय में एक बात मार्के की है जिसे हम अनदेखा नहीं
कर सकते, वह यह कि यह सर्वविदित है कि कांग्रेस अहिंसा का सिद्धान्त मानती
है और पिछले दस वर्षों से वह इसके समर्थन में प्रचार करती रही है। यह सब होने
पर भी प्रस्ताव के समर्थन में भाषणों में गाली-गलौच की गयी। उन्होंने
क्रान्तिकारियों को बुजदिल कहा और उनके कार्यों को घृणित। उनमें से एक वक्ता
ने धमकी देते हुए यहाँ तक कह डाला कि यदि वे (सदस्य) गाँधीजी का नेतृत्व
चाहते हैं तो उन्हें इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करना चाहिए। इतना सबकुछ
किये जाने पर भी यह प्रस्ताव बहुत थोड़े मतों से ही पारित हो सका। इससे यह
बात निःशंक प्रमाणित हो जाती है कि देश की जनता पर्याप्त संख्या में क्रान्तिकारियों
का समर्थन कर रही है। इस तरह से इसके लिए गाँधीजी हमारी बधाई के पात्र हैं
कि उन्होंने इस प्रश्न पर विवाद खड़ा किया और इस प्रकार संसार को दिखा दिया
कि कांग्रेस, जो अहिंसा का गढ़ माना जाता है, वह सम्पूर्ण नहीं तो एक हद तक
तो कांग्रेस से अधिक क्रान्तिकारियों के साथ है।
इस विषय में गाँधीजी ने जो विजय प्राप्त की वह एक प्रकार की हार ही के
बराबर थी और अब वे 'दि कल्ट ऑफ़ दि बम' लेख द्वारा क्रान्तिकारियों पर दूसरा
हमला कर बैठे हैं। इस सम्बन्ध में आगे कुछ कहने से पूर्व इस लेख पर हम अच्छी
तरह विचार करेंगे। इस लेख में उन्होंने तीन बातों का उल्लेख किया है। उनका
विश्वास, उनके विचार और उनका मत। हम उनके विश्वास के सम्बन्ध में
विश्लेषण नहीं करेंगे, क्योंकि विश्वास में तर्क के लिए स्थान नहीं है। गाँधीजी जिसे
हिंसा कहते हैं और जिसके विरुद्ध उन्होंने जो तर्कसंगत विचार प्रकट किये हैं, हम
उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करेंगे।
गाँधीजी सोचते हैं कि उनकी यह धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता
को हिंसा की भावना छू तक नहीं गयी है, और अहिंसा उनका राजनीतिक शस्त्र
बन गया है। हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है उस अनुभव के आधार
पर उनकी यह धारणा बनी है, परन्तु उन्हें अपनी इस यात्रा के इस अनुभव से इस
भ्रम में न पड़ना चाहिए। यह बात सही है कि (कांग्रेसी) नेता अपने दौरे वहीं तक
सीमित रखता है जहाँ तक डाकगाड़ी उसे आराम से पहुँचा सकती है, जबकि
गाँधीजी ने अपनी यात्रा का दायरा वहाँ तक बढ़ा दिया है जहाँ तक कि मोटरकार
द्वारा वे जा सकें। इस यात्रा में वे धनी व्यक्तियों के ही निवास-स्थानों पर रुके। इस
यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गयी उनकी
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