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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 788 में से

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पृष्ठ 451

मनोविज्ञान आत्मसात करता जायेगा वैसे-वैसे राष्ट्र की गुलामी का चित्र उसके
सामने स्पष्ट होता जायेगा तथा उसकी देश को स्वतन्त्र करने की इच्छा प्रबल होती
जायेगी। और यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि युवक न्याय, क्रोध और
क्षोभ से ओतप्रोत हो अन्याय करने वालों की हत्या न प्रारम्भ कर देगा। इस प्रकार
देश में आतंकवाद का जन्म होता है। आतंकवाद सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं और क्रान्ति भी
आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं। यह तो क्रान्ति का एक आवश्यक और अवश्यम्भावी
अंग है। इस सिद्धान्त का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रान्ति का विश्लेषण कर
जाना जा सकता है। आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा करता है और पीड़ित
जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है। अस्थिर भावना
वाले लोगों को इससे हिम्मत बँधती है तथा उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है। इससे
दुनिया के सामने क्रान्ति के उद्देश्य का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है क्योंकि
यह किसी राष्ट्र की स्वतन्त्रता की उत्कट महत्त्वाकांक्षा का विश्वास दिलाने वाला
प्रमाण है। जैसे दूसरे देशों में होता आया है, वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रान्ति
का रूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रान्ति से ही देश को सामाजिक, राजनीतिक
तथा आर्थिक स्वतन्त्रता मिलेगी।
तो ये हैं क्रान्तिकारी के सिद्धान्त, जिनमें वह विश्वास करता है और जिन्हें देश
के लिए प्राप्त करना चाहता है। इस तथ्य की प्राप्ति के लिए वह गुप्त तथा खुले,
दोनों ही तरीकों से प्रयत्न कर रहा है। इस प्रकार एक शताब्दी से संसार में जनता
तथा शासक वर्ग में जो संघर्ष चला आ रहा है, वही अनुभव उसके लक्ष्य पर पहुँचने
का मार्गदर्शक है। क्रान्तिकारी जिन तरीक़ों में विश्वास करता है, वे कभी असफल
नहीं हुए।
इस बीच कांग्रेस क्या कर रही थी? उसने अपना ध्येय स्वराज्य से बदलकर
पूर्ण स्वतन्त्रता घोषित किया। इस घोषणा से कोई भी व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा
कि कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा न कर क्रान्तिकारियों के
विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी है। इस सम्बन्ध में कांग्रेस का पहला वार था उसका
वह प्रस्ताव जिसमें 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने के
प्रयत्न की निन्दा की गयी। इस प्रस्ताव का मसविदा गाँधीजी ने तैयार किया था
और उसे पारित कराने के लिए गाँधीजी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी। परिणाम
यह हुआ कि 1913 की सदस्य संख्या में वह केवल 31 मतों से पारित हो सका।
क्या इस अत्यल्प बहुमत में भी राजनीतिक ईमानदारी थी? इस सम्बन्ध में हम
सरलादेवी चौधरानी का मत ही यहाँ उद्धृत करें। वे तो जीवनभर कांग्रेस की भक्त
रही हैं। इस सम्बन्ध में प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा है – मैंने महात्मा गाँधी के
अनुयायियों के साथ इस विषय में जो बातचीत की, उससे मुझे मालूम हुआ कि
वे इस सम्बन्ध में अपने स्वतन्त्र विचार महात्मा जी के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा के
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 445