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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 788 में से

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पृष्ठ 457

यह सच है कि अब औपनिवेशिक स्वराज्य के बजाय कांग्रेस के वक्ता जनता के
सामने पूर्ण स्वतन्त्रता का ढोल पीटेंगे। वे अब जनता से कहेंगे कि जनता को उस
संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए जिसमें एक पक्ष तो मुक्केबाज़ी करेगा और
दूसरा उन्हें केवल सहता रहेगा, जब तक कि वह खूब पिटकर इतना हताश न हो
जाये कि फिर न उठ सके। क्या उसे संघर्ष कहा जा सकता है और क्या इससे देश
को स्वतन्त्रता मिल सकती है? किसी भी राष्ट्र के लिए सर्वोच्च लक्ष्य-प्राप्ति का
ध्येय सामने रखना अच्छा है, परन्तु साथ में यह भी आवश्यक है कि इस लक्ष्य
तक पहुँचने के लिए उन साधनों का उपयोग किया जाये जो योग्य हों और जो पहले
उपयोग में आ चुके हों, अन्यथा संसार के सम्मुख हमारे हास्यास्पद बनने का भय
बना रहेगा।
गाँधीजी ने सभी विचारशील लोगों से कहा कि वे लोग क्रान्तिकारियों से
सहयोग करना बन्द कर दें तथा उनके कार्यों की निन्दा करें, जिससे हमारे इस
प्रकार उपेक्षित देशभक्तों की हिंसात्मक कार्यों से जो हानि हुई, उसे समझ सकें।
लोगों को उपेक्षित तथा पुरानी दलीलों के समर्थक कह देना जितना आसान है,
उसी प्रकार उनकी निन्दा कर जनता से उनसे सहयोग न करने को कहना, जिससे
वे अलग-अलग हो अपना कार्यक्रम स्थगित करने के लिए बाध्य हो जायें, यह
सब करना विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए आसान होगा जोकि जनता के कुछ
प्रभावशाली व्यक्तियों का विश्वासपात्र हो। गाँधीजी ने जीवनभर जन-जीवन का
अनुभव किया है, पर यह बड़े दुख की बात है कि वे भी क्रान्तिकारियों का
मनोविज्ञान न तो समझते हैं और न समझना ही चाहते हैं। वह सिद्धान्त अमूल्य
है, जो प्रत्येक क्रान्तिकारी को प्रिय है। जो व्यक्ति क्रान्तिकारी बनता है, जब वह
अपना सिर हथेली पर रखकर किसी क्षण भी आत्मबलिदान के लिए तैयार रहता
है तो वह केवल खेल के लिए नहीं। वह यह त्याग और बलिदान इसलिए भी
नहीं करता कि जब जनता उसके साथ सहानुभूति दिखाने की स्थिति में हो तो
उसकी जय-जयकार करे। वह इस मार्ग का इसलिए अवलम्बन करता है कि
उसका सद्‌विवेक उसे इसकी प्रेरणा देता है, उसकी आत्मा उसे इसके लिए प्रेरित
करती है।
एक क्रान्तिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है। वह केवल तर्क
और तर्क में ही विश्वास करता है। किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा, चाहे
वह ऊँचे से ऊँचे स्तर से की गयी हो, उसे अपने निश्चित उद्देश्य-प्राप्ति से
वंचित नहीं कर सकती। यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या
उसके कार्य की प्रशंसा न की गयी तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा, निरी
मूर्खता है। अनेक क्रान्तिकारी, जिनके कार्यों की वैधानिक आन्दोलनकारियों ने
घोर निन्दा की, फिर भी वे उसकी परवाह न कर फाँसी के तख्ते पर झूल गये।
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 451