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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 51 में से

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पृष्ठ 47

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पुनः ज्ञान के लिए तीन श्लोकों से ब्रह्म का निरूपण
करते हैं-
यद्भासा भासतेऽर्कादिर्भास्यैर्यत्तु न भास्यते।
येन सर्वमिदं भाति तद्ब्रह्मेत्यवधारयेत् ।।६०।।
जिस प्रकाशस्वरूप के प्रकाश से सूर्यादि प्रकाशित होते हैं।
परन्तु प्रकाश्य सूर्यादि के द्वारा जो प्रकाशित नहीं होता। जिसके
द्वारा सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। वही ब्रह्म है, ऐसा निश्चय
कर लेना चाहिए। कठोपनिषद्-श्रुति कहती है “न तत्र सूर्यो भाति
न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः तमेव भान्तमनुभाति
सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।” (कठ. २/२/१५) (उस आत्मस्वरूप
ब्रह्म का प्रकाशन सर्वप्रकाशक सूर्य भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार
चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी उस का प्रकाश नहीं कर पाती। उस
चैतन्यज्योति आत्मा के प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होता
है। उसके प्रकाश से ही सब कुछ भासता है) ।।६०।।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी इसी तथ्य का कथन शब्दान्तर
से किया गया है। उसे कहते हैं-
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।।६१।।
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से बताते हैं कि मेरे उस तेजस्वरूप
परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर पाता है, न चन्द्रमा और न ही
अग्नि। जिस वैष्णव (व्यापक) पद को प्राप्त होकर प्राणी वापस
नहीं लौटते, वहीं मेरा परम धाम है ।।६१।।
पुनः अग्रिम श्लोक से उसी अर्थ को कहते हैं-
स्वयमन्तर्बहिर्व्याप्य भासयन्नखिलं जगत्।