आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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ब्रह्म प्रकाशते वह्निप्रतप्तायसपिण्डवत् ॥६२॥
सर्वस्वरूपभूत ब्रह्म सम्पूर्ण जगत् के भीतर-बाहर व्याप्त
होकर प्रकाशित करता हुआ स्वयं प्रकाशित हो रहा है। जैसे तपे हुए
लोह के गोले में स्थित अग्नि, गोले को सम्पूर्ण रूप से व्याप्त होकर
प्रकाशित करते हुए स्वयं भी प्रकाशित होती है, ठीक वैसे ही ॥६२॥
पुनः स्वरूपभूत ब्रह्म का कथन करते हैं-
जगद्विलक्षणं ब्रह्म ब्रह्मणोऽन्यन्न किञ्चन।
ब्रह्मान्यद्भाति चेन्मिथ्या यथा मरुमरीचिका ॥६३॥
ब्रह्म जगत् से विलक्षण है क्योंकि वह जगत् का अधिष्ठान
है। किन्तु अन्य सभी वस्तुएँ ब्रह्म में ही अध्यस्त होने से ब्रह्म से
भिन्न नहीं है। ब्रह्म से भिन्न यदि कुछ भी दिखाई पड़ता है, तो
उसे मरुमरीचिका के जल के समान मिथ्या ही जानना चाहिए
॥६३॥
पुनः उसी तथ्य का प्रतिपादन करते हैं-
दृश्यते श्रूयते यद्यद्ब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत्।
तत्त्वज्ञानाच्च तद्ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ॥६४॥
चक्षु से जो कुछ भी दिखाई पड़ता है, श्रोत्र से जो कुछ भी
सुनाई पड़ता है, मन से जो कुछ भी स्मरण किया जाता है, वाणी
से जो भी बोला जाता है, तात्त्विक दृष्टि से सब ब्रह्म ही है। श्रुतियों
में भी कहा गया है-
“न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥”
(मुण्डक. ३/१/८)