आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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यह आत्मा चक्षु, वाणी, अन्य इन्द्रियों, तप, कर्म आदि से
गृहीत नहीं होता। रागादि मल से रहित ज्ञान के प्रसाद से शुद्ध
अन्तःकरण वाला पुरुष ही ध्यान से उस निष्कल आत्मा का
साक्षात्कार कर पाता है ।।६४।।
शङ्का - यदि ब्रह्म सर्वगत है तो सभी को दिखाई क्यों
नहीं पड़ता? समाधान करते हैं-
सर्वगं सच्चिदात्मानं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते ।
अज्ञानचक्षुर्नैक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ।।६५।।
अज्ञान नेत्र से विशिष्ट पुरुष सर्व व्याप्त, सच्चिदानन्द
अद्वितीय ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं कर पाता। श्रुतियाँ कहती है,
"न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्।" -कोई भी इस आत्मा को चर्म-चक्षु
से नहीं देख सकता। "तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ।"- दृष्टादृष्ट विषयों से निष्काम
पुरुष ही मन आदि इन्द्रियों की प्रसन्नता से जब अपनी आत्मा की
महिमा को जान लेता है तो वह शोकरहित हो जाता है। अतः
श्रुतियों से सिद्ध होता है कि विवेकी पुरुष ही आत्मा का
साक्षात्कार कर सकता है। इसे दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। जैसे
कोई अन्धा व्यक्ति प्रकाशमान सूर्य को भी नहीं देख पाता। उसी
प्रकार अविवेकी पुरुष आत्मा को नहीं जान पाता ।।६५।।
एवं उपर्युक्त रीति से, अभ्यास से रहित अनुभव
संपन्न पुरुष को अनादिकालीन वासनाओं से अज्ञान संभव है।
उसका परिहार करने के लिये बार-बार श्रवणादि की आवृत्ति
करनी चाहिए। इसे बताते हैं-
श्रवणादिभिरुद्दीप्तो ज्ञानाग्निपरितापितः।