सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
िथिषे तिथौ'?
Let's check Anekarthasangraha (अनेकार्थ० ३.६२५):
In Hemachandra's Anekarthasangraha 3.625:
"प्रतिपद् विशिखा-तिथ्योः"?
No, in Anekarthasangraha, words with 3 syllables ending in d:
"प्रतिपत् तिथिविद्..."
Let's read what's printed:
'प्रतिपत्तित्थिये तिथौ' or 'प्रतिपत्तित्थिषे'?
Looks like: 'प्रतिपत्तित्थिये तिथौ' (अनेकार्थ० ३.६२५)।
Line 26: "३.६२५)। पालि-पटिपदा (प्रतिपद्, प्रतिपदा)।"
Line 27: "• ध्रुवाये = निश्चित रूप से । सं.-ध्रुवम् । (ध्रुवति स्थिरीभवतीति ।"
Line 28: "निर्दिष्टनम्।) । पालि-धुवं (ध्रुवम्)।"
Wait, "निर्दिष्टनम्"? Or "निश्चेष्टनम्"?
न, ि, र, ्, द, ि, ष, ्, ट, न, म, ् -> "निर्दिष्टनम्" or "निर्दिष्टम्"? Looks like "निर्दिष्टनम्" or "निश्चेष्टनम्".
Line 29: "• अनुपोसथं = उपवास के दिना
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१३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• अजके = बकरे। सं. -अजकः। पालि -अजो (अजः)।
• अस्सा = घोड़े। सं. -अश्वस्य। पालि -अस्सो (अश्वः)।
• लखने = दागना। सं. -लक्षणम्। (लक्ष्यते ज्ञायतऽनेनेति। विग्रहः।) लक्षणं
नामाभियोग्योः (अनेकार्थ० ३.८२०)। पालि -लक्खणं।
• अंतिक्याये = अंतराल में। सं. -अन्तरे। पालि -अन्तरे।
• पंचवीसंति = पच्चीस। सं. -पञ्चविंशतिः। 'विंशतिः द्वे दशती'।
• बंधनमोखानि = बंधन से रिहाई। सं. -बन्धनान्मोक्षाः। (बन्धनम्-
बध्यतेऽनेनेति। कारागारम्।) (मोक्षः -मोक्ष्यते दुःखमनेन। मुक्तिः।) 'मोक्षो
निःश्रेयसे वृत्तविवाहे मोचने मृतौ' (अनेकार्थ० २.५७३)। पालि -बन्धनं
(बन्धनम्) । मोक्खो (मोक्षः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - षष्ठ अभिलेख
• दुवाडसवसअभिसितेन = अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर।
सं. -द्वादशवर्षामिषिक्तेन। द्वादशन्-पुं. द्वौ च दश च द्वयधिका वा दशा
(द्वन्द्वः)। पालि -बारस (द्वादश)। वस्सो (वर्षः)। अभिसितो (अभिक्षितः)।
• लोकसा = लोगों का। सं. -लोकस्य। (लोकः -लोक्यतेऽसौ। भुवने जनपु
च। -शब्द०) पालि -लोकस्स।
• ते = जितने। सं. -येन।
• अपहटा = प्रह्लादा न करने वाला। सं. - अप्रहर्ता। पालि -पहारे (प्रहारः)।
• धंमवढि = धर्म में प्रवृत्त। सं. -धर्मवृद्धिः। (वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये,
सम्पत्तौ, सङ्के चा-शब्द०)।
• पापोवा = प्राप्त करे। सं. -प्राप्नुयात्। पालि -पप्पोति (प्राप्नोति)।
• पवेखामि = ध्यान देता हूँ। सं. -प्रत्यवेक्षे। पालि -पच्चवेक्खतीति
(प्रत्यवेक्षते)।
• पतिआसंनेसु = जो निकट हैं। सं. -प्रत्यासन्नेषु। (प्रत्यासन-
आसन्निकटस्थं -शब्द०)।
• अपकठेषु = जो दूर हैं। सं. -अपकृष्टेषु पालि -अपकट्ठिति (अपकर्षीति)।
• किम् = ऐसा क्या? सं. -किम्। 'किं प्रश्ने कुत्सितेऽपि च'
(अनेकार्थ०-१.७७५)। पालि -किं।
• आवहामि = प्राप्त कराता हूँ। सं. -आवहामि। पालि -आवहती
(आवहति)।
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स्तंभ अभिलेख - शब्द-
[वि]दहामि = विधान करता हूँ। सं. -विदधामि। पालि -विदहति
(विदधातीति)।
• हेमेवा = ऐसे ही। सं. -एवमेव। 'एवोपम्ये परिभवे ईषदर्थेऽवधारणे'
(अनेकार्थ० १.८१६)। पालि -एवमेव।
• सवनिकायेसु = सभी वर्गों का। सं. -सर्वनिकायेषु। 'सर्वं समस्तममूनं
कृत्स्नं सकलं समग्रम्' (अभिधान० ६.१४३३)। निकायः -समानधर्माणिगसह।
निकायः सङ्घसङ्घयोः' (अनेकार्थ० ३.१०८९)। 'स्थानिकायः पुञ्जराशी'
(अमर० २.५३८)। पालि -सब्बो (सर्वः)। निकायो (निकायः)।
• आतना = स्वयं। सं. -आत्मना। पालि -अत्तना।
• पचूपगमने = (लोगों तक) पहुँचना। सं. -प्रत्युपगमनम्।
• मोख्यमते = मुख्य बात। सं. -मुख्यतमम्। मुख्य -त्रि. मुखे आद्ये भवः
वरः। प्रथमकल्पे, श्रेष्ठे च। (शब्द०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१४८)। पालि -मोक्खो (मौख्यः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - सप्तम अभिलेख
• अतिकंतं अंतरं = अतीत काल में। सं. - अतिक्रान्तम् अन्तरम्।
[अति-पूजयाम्, उत्कर्षे, अतिक्रमणे, अतिशये च।' (शब्द०)] ['अन्तरं
स्यादवकाशोशे। मध्ये विहायर्ते त्वादयों विशेषेऽवसरेऽवधौ।' (अनेकार्थ०
३.१११४-१११५)]। पालि -अतिक्कन्तो (अतिक्रान्तः)। अन्तरं (अन्तरम्)।
• हुसु = हुए। सं. -अभूवन्।
• इच्छिसु = चाहते थे। सं. -ऐषिषुः।
• धंमवडिया वढेया = धर्म की वृद्धि के साथ बढ़ें। सं. -धर्मवृद्ध्या वर्धेत।
[वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये, सम्पत्तौ, समूहे चा' (शब्द०)] पालि - धम्मो
(धर्मः)। बढ़ि, वृद्धि (वृद्धिः)। वड्ढि (बढ़ती)। [इसी प्रकार के पालि में
कतिपय अन्य प्रयोग -सुखेन सुखितो होति। पमज्जन पमोज्जितं। अधिहितं
अधिष्ठानं। लाभ लभामि सब्वत्थ। उपसेयं उपवसिस्स। इत्यादि।]
• अनुरुपाया = अनुरूप। सं. - अनुरूपया। पालि - अनुरूषो (अनुरूपः)।
• एतं = इस विषय में। सं. - अत्र। पालि - एत्थ।
• हुया = हुआ (अर्थात्, लगा)। सं. -अभूत्।
• किन्तू = कैसे। सं. -केनस्वित्। पालि -केन'सु।
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[header] १३८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
▪ अनुपटीपजेया = (धर्म का) अनुसरण करें। सं. - अनुप्रतिपद्येत। पालि -
पटिपज्जति (प्रतिपद्यते)।
▪ कानि = किनको। सं. - कान्।
▪ अभ्युनमयेहं = अभ्युन्नत करूं। ऊंचा उठाऊं। सं. - अभ्युन्नमयेयम्।
▪ धंमसावनानि = धर्मोपदेश। सं. - धर्मश्रावणानि।
▪ सावयामि = सुनवाता हूं। सं. - श्रावयामि। पालि - सावेति, सुणापेति
(श्रावयति)। ['परियत्ति']
▪ धंमानुसथिनि = धर्मानुशासन। सं. - धर्मानुशिष्टीः। [अनुशिष्टिः - आदेश,
शिक्षा, आज्ञा, विचारपूर्वक कर्तव्याकर्तव्य का निरूपण। (संस्कृत०)।। पालि
- धम्मो (धर्मः)। अनुसिट्ठि (अनुशिट्ठिः)।
▪ अनुसासामि = सिखलाता हूं। सं. - अनुशास्मि। पालि - अनुसासति
(अनुशास्ति)। ['पटिपत्ति']
▪ सुतु = सुन कर। सं. - श्रुत्वा। पालि - सुत्वा।
▪ आनपयितंसि = आज्ञात हैं। सं. - आज्ञाताः।
▪ य....सा (=यथा पुलिसा)। सं. - य(था पु)रुषाः।
▪ पलिगोवदिसंति = प्रचार (प्रेरित) करेंगे। सं. - पर्यवगोदिष्यन्ति।
['परि-अव-✓वद्' से निष्पन्न]। पालि - ओवदति।
▪ पोथविसंति = प्रसार करेंगे। सं. - प्रवितारयिष्यन्ति। पालि -
वित्थारिस्सन्ति (विस्तारयिष्यन्ति)।
▪ अनुवेखमाने = देखते हुए। सं. - अनुवीक्षमाणेन।
▪ धंमथंभाणि = धर्मस्तंभ। सं. - धर्मस्तम्भाः। [स्तम्भः स्थूणायाम्
(शब्द०)]। पालि - थम्भो (स्तम्भः)।
▪ मगेसु = मार्गों पर। सं. - मार्गेषु। ['मार्गः मार्ग्यते संस्क्रियते पादेन, मृग्यते
गमनान्विष्यते इति वा' उणा०।]। पालि - मग्गो (मार्गः)।
▪ निगोहानि = वट-वृक्ष। सं. - न्यग्रोधाः। ['न्यग्रोधः - न्यक् रोहतीति' इति।'
वटवृक्षः। 'न्यग्रोधो वटपादपे' (अनेकार्थ० ३.९८५)]। पालि - निग्रोधो
(न्यग्रोधः)।
▪ रोपापितानि = लगवाये हैं। सं. - रोपिताः। [रोपित - वृक्षदर्शनार्थाय
कृताङ्कुरारोपणे। (शब्द०)। पालि - रोपितो (रोपितः)। रोपापेति (= to cause to
be planted or sown - Childers)
दायाँ पृष्ठ (Page 139)
[header] स्तंभ अभिलेख - शब्द-विवरण
▪ छायोपगानि = छाया देने वाले। सं. - छायोपगाः। ['छाया सूर्याप्रिया
कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः'। (अमर० ३.१३३२)]। पालि - छाया (छाया)।
उपगो (उपगः)।
▪ होसंति = होंगे। सं. - भविष्यन्ति। पालि - हेस्सति (भविष्यति)।
▪ अंबावडिक्या = आम के बाग। सं. - आम्रवाटिकाः। आम्रे रसालो माकन्दः
कामाङ्गः पिकबान्धवः। वनपूगो शवश्चूतः परपुष्टमहोत्सवः॥ मधूदूतो मधुफलः
सूफलो मदिरासखः। वसन्तपीडोऽसौ तु सहकारोऽतिसौरभः॥ (निघण्टु०
१.१२०-१२२)। 'वाटीपुष्पाह्वयान्त्येतो क्षुद्रारामः प्रसीदिका' (अभिधान०
४.११२३)। [वाटीशब्दः पुष्पवृक्षाश्यामन्येति।]। पालि - अम्बो (आम्रः)।
▪ अढकोसिक्यानि = आधे-आधे कोस पर (अवस्थित)। सं. -
अर्द्धक्रोशकानि। क्रोश - पुं. अष्टसहसहस्तमाने। मतान्तरे सहस्रद्वयमाने।
(शब्द०)। पालि - अद्धो, अड्ढो (अर्द्धः)। कोसो (क्रोशः)।
▪ उदुपानानि = कुएँ। सं.
(अनेकार्थ० ३.८२३)। पालि - ब्राह्मणे (ब्राह्मणः)।13.• आजीविकेसु = आजीविकों में। सं. - आजीविकेषु। पालि - आजीविको, अजीवको (आजीवकः, अजीवक्कः)।14.• निगिंथिसु = निर्ग्रन्थों में। सं.- निर्ग्रन्थेषु। निर्ग्रन्थः - निर्गतो ग्रन्थेभ्यः। क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्खे, निःकवचम्, Wait:मुनिसंघेorमुनिभेदे? Let's read character by character: क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्खे, निःकवचम्, Wait, look at: क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्ख, निःकवचम्, निर्गते गते वा' (शब्द०)। 'नग्नाटकोनिर्ग्रन्थककम्बलीश्यापथा नग्ने' (
? Let's zoom in: पि [यद] सि? No, पि [य] दसि- wait, between [य] and सि, is there a letter? It saysपि [य] दसि.Wait, no:पि [य] सि? No, Ashok's name is पियदसि. Wait, look at: प.......स = पि [य] दसि। सं. - प्रि [यद] श्शी।Wait, after 'पि', there is '[य] दसि' or '[य] सि'? It looks like[य] दसि. Wait, let's check: प.......स = पि [य] दसि? No, wait, look at line 14: देवानंपिय......वदसि = देवानंपिये [पि] यदसि। सं. - देवानांप्रियः [प्रि] यदर्शी।In line 4:• प.......स = पि [य] दसि। सं. - प्रि [यद] र्शी।Wait, look at[यद] र्शी: प्रि [यद] र्शीwith repha on 'शी'? No,प्रि [यद] श्शी- wait,प्रि [यद] र्शी? It has a repha on 'शी': प्रि [यद] र्शीorप्रि [यद] श
गुहा अभिलेख - शब्द-विवेचन
गुहा अभिलेख - बराबर गुहा
प्रथम अभिलेख
▪ निगोहकुभा = न्यग्रोध गुफा। सँ.-न्यग्रोधगुहा। (न्यग्रोधः -न्यक् रुणद्धि
इति। वटवृक्षः।) 'वटे वैश्रवणावासो न्यग्रोधो बहुपादध्रुवः।' (निघण्टु० ४१)
[वैश्रवण=कुबेर]। (गुहा - √ गुह् से) पर्वतादेर्गह्वरम्। बिलम्। पालि -निग्रोधो
(न्यग्रोधः)। गुहा (गुहा)।
▪ दिना = (दान में) दी गयी। सँ.-दत्ता। पालि -दिन्नो (दत्तः)।
▪ आजीविकेहि = आजीविकों को। सँ. -आजीविकेभ्यः। पालि -आजीवको
(आजीवकः)।
द्वितीय अभिलेख
▪ खलतिकपवतसि = खलतिक पर्वत पर। सँ.-खलतिकपर्वते। [खलतिक -
√ स्खल् से। पालि - खलति=to stumble (Childers)]। पब्बतो (पर्वतः)।
तृतीय अभिलेख
▪ एकुनवीसतिवसाभिसिते = अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर।
सँ.-एकोनविंशतिवर्षाभिषिक्तः। पालि -एकूनवीसं, एकूनवीसति
(एकोनविंशतिः)।
▪ जलघोसागमथात = वर्षा (से बचाव) के लिए। सँ.-जलघोषागमार्थतः।
'घोषः शब्दाभीरनिवासयोः' (त्रिकाण्ड० ३.९९१)। 'घोषः कांस्ये स्वने
गोपघोषकाभीरपल्लिषु' (अनेकार्थ० २.५६५) 'घोषः-घोषन्ति गावोऽत्र।
आभीरपल्ल्याम्। ध्वनौ, अम्बुदनादे च। (शब्द०)। 'आगमस्त्वागतौ शास्त्रे'
(अनेकार्थ० ३.१०६०)। (जलम्-जलति जीवयति लोकान्। जलति
आच्छादयति भूम्यादीनिति वा। पानीयम्।) (घोषः-घोषन्ति शब्दायन्ते गावो
यस्मिन्। ध्वनिः।)। पालि -जलं (जलम्)। घोसो (घोषः)। आगमो (आगमः)।
अत्थाय (अर्थाय)।
▪ सुपिये = अति सुंदर। सँ.-सुप्रिया। (प्रियः-प्रीणातीति। हृद्यः।)
▪ ख..... = ख [लतिकपवतसि]। सँ. -खलतिकपर्वते।