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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 80 में से

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पृष्ठ 80

गुहा अभिलेख - शब्द-विवेचन
गुहा अभिलेख - बराबर गुहा
प्रथम अभिलेख
▪ निगोहकुभा = न्यग्रोध गुफा। सँ.-न्यग्रोधगुहा। (न्यग्रोधः -न्यक् रुणद्धि
इति। वटवृक्षः।) 'वटे वैश्रवणावासो न्यग्रोधो बहुपादध्रुवः।' (निघण्टु० ४१)
[वैश्रवण=कुबेर]। (गुहा - √ गुह् से) पर्वतादेर्गह्वरम्। बिलम्। पालि -निग्रोधो
(न्यग्रोधः)। गुहा (गुहा)।
▪ दिना = (दान में) दी गयी। सँ.-दत्ता। पालि -दिन्नो (दत्तः)।
▪ आजीविकेहि = आजीविकों को। सँ. -आजीविकेभ्यः। पालि -आजीवको
(आजीवकः)।
द्वितीय अभिलेख
▪ खलतिकपवतसि = खलतिक पर्वत पर। सँ.-खलतिकपर्वते। [खलतिक -
√ स्खल् से। पालि - खलति=to stumble (Childers)]। पब्बतो (पर्वतः)।
तृतीय अभिलेख
▪ एकुनवीसतिवसाभिसिते = अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर।
सँ.-एकोनविंशतिवर्षाभिषिक्तः। पालि -एकूनवीसं, एकूनवीसति
(एकोनविंशतिः)।
▪ जलघोसागमथात = वर्षा (से बचाव) के लिए। सँ.-जलघोषागमार्थतः।
'घोषः शब्दाभीरनिवासयोः' (त्रिकाण्ड० ३.९९१)। 'घोषः कांस्ये स्वने
गोपघोषकाभीरपल्लिषु' (अनेकार्थ० २.५६५) 'घोषः-घोषन्ति गावोऽत्र।
आभीरपल्ल्याम्। ध्वनौ, अम्बुदनादे च। (शब्द०)। 'आगमस्त्वागतौ शास्त्रे'
(अनेकार्थ० ३.१०६०)। (जलम्-जलति जीवयति लोकान्। जलति
आच्छादयति भूम्यादीनिति वा। पानीयम्।) (घोषः-घोषन्ति शब्दायन्ते गावो
यस्मिन्। ध्वनिः।)। पालि -जलं (जलम्)। घोसो (घोषः)। आगमो (आगमः)।
अत्थाय (अर्थाय)।
▪ सुपिये = अति सुंदर। सँ.-सुप्रिया। (प्रियः-प्रीणातीति। हृद्यः।)
▪ ख..... = ख [लतिकपवतसि]। सँ. -खलतिकपर्वते।