ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
चौथा अध्याय ] ४८३
सुदास का महाभिषेक किया और उसने पृथ्वी भर में घूम कर
विजय पाई और अश्वमेध यज्ञ किया ।
इन्द्र के इसी राज्याभिषेक से अंगिरस् के पुत्र संवर्त
ने अविक्षित के पुत्र मरुत्तम का अभिषेक किया और यह
सारी पृथ्वी पर घूमा, उसे विजय किया और उसने अश्वमेध
यज्ञ किया ।
इसी के विषय में यह श्लोक गाया जाता है,—
मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे ।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वे देवाः सभासदः ॥
"मरुत लोग मरुत के घर में अन्न बांटने वाले रहे । इसकी
सब कामनायें पूरी हुईं और विश्वेदेव वहाँ मौजूद थे ।” (७)
२२—इसी इन्द्र के अभिषेक से अत्रि के लड़के उद्मय ने
अंग का अभिषेक किया । उससे अंग ने पृथ्वी की विजय की
और अश्वमेध यज्ञ किया । उस अलोपांग ( नहीं लोप हुआ
कोई अंग जिसका ) ने एक बार कहा था, "हे ब्राह्मण, मैं तुम्हे
दस हज़ार हाथी और दस हज़ार दासियाँ देता हूँ, अगर तू
मुझे अपने यज्ञ में बुलावे ।” इसके सम्बन्ध में पाँच नीचे के
श्लोक कहे जाते हैं :—
याभिर्गोभिरुदमयं प्रैयमेधा अयाजयन् ।
द्वे द्वे सहस्रे बद्धानामात्रेयो मध्यतो ददात् ॥१॥
अष्टाशीति सहस्राणि श्वेतान् वैरोचनो हयान् ।
प्रष्ठीं निश्चृत्य प्रायच्छद् यजमाने पुरोहिते ॥२॥
देशाद् देशात् समोळ्हानां सर्वासामाव्य दुहितॄणां ।
दशाददात् सहस्राण्यात्रेयो निष्ककंठ्यः ॥३॥
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४८४ [ आठवीं पञ्चिका
दशनाग सहस्राणि दत्वात्रेयो वचत्नवे ।
श्रान्तः परिकुटान् प्रैप्सद् दानेनांगस्य ब्राह्मणः ॥४॥
शतं तुभ्यं शतं तुभ्यमिति स्मैव प्रताम्यति ।
सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा प्राणान्तस्म प्रतिपद्यते ॥५॥
अर्थ—प्रियमैध के लड़कों ने उदमय को जिन-जिन गायों
को देने के लिये कहा, अत्रि के लड़के उदमय ने मध्यसवन में
दो-दो हज़ार बड्वा ( गायों के गल्ले ) दिये ॥१॥
विरोचन के पुत्र ने ८८ हज़ार सफ़ेद घोड़ों की रस्सियाँ खोल
दीं और यजमान पुरोहित को दान कर दिया ॥२॥
अत्रि के लड़के ने देश-देश से जमा की हुई दस हज़ार
लड़कियों को जिनकी गर्दन में आभूषण पड़े थे दान कर
दिया ॥३॥
वचत्नुक्र देश में अत्रि के लड़के ने दस हज़ार हाथी दिये।
थके हुए ब्राह्मण ने अंग के दान को लेने के लिये नौकरों को
कहा ॥४॥
“सौ तुझको,” “सौ तुझको” ऐसा कहता-कहता वह थक
गया। तब उसने कहा “हज़ार तुझको,” “हज़ार तुझको” और
फिर भी थक कर सांस लेने ठहर गया ( क्योंकि दान के लिये
बहुत बाक़ी था ) ॥५॥ (८)
२३—इन्द्र के इसी महाभिषेक से ममता के लड़के दीर्घतमा
ने दुष्यन्त के लड़के भरत का अभिषेक किया। इससे भरत ने
सब पृथ्वी की परिक्रमा की और अश्वमेध यज्ञ किया। इसके
विषय में यह श्लोक हैं :-
हिरण्येन परीवृतान्कृष्णान् शुक्लदतो मृगान् ।
मष्णारे भरतो ददाच्छतं बद्धानि सप्त च ॥१॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
चौथा अध्याय ] ४८५
भरतस्यैष दौष्यंतेरग्निः साचिगुणे चितः ।
यस्मिन्सहस्रं ब्राह्मणा बद्धशो गात्रि मेजिरे ॥२॥
अष्टासप्ततिं भरतो दौष्यंतिर्यमुना मनुः ।
गंगायां वृत्रघ्ने बदनात्पंचपंचाशतं हयान् ॥३॥
त्रयस्त्रिंशच्छतं राजाऽश्वान् अबधाय मेध्यान् ।
दौष्यंतिरत्यगाद्राज्ञो मायां मायावत्तरः ॥४॥
महाकर्म भरतस्य न पूर्वे नापरे जनाः ।
दिवं मर्त्य इव हस्ताभ्यां नोदापुः पंच मानवाः ॥५॥
अर्थ—भरत ने मष्णर देश में १०७ काले और सफ़ेद दांतों
वाले, सोने से आभूषित हाथी दिये ॥१॥
जब दुष्यंत के पुत्र भरत ने साचीगुण नामी नगर में
अग्नि स्थापित की तो हज़ारों गायों के गल्ले ब्राह्मणों को दान
किये ॥२॥
दुष्यन्त के बेटे भरत ने ७८ घोड़े यमुना के किनारे और
५५ गंगा के किनारे इन्द्र के लिये बाँधे ॥३॥
दुष्यन्त के बेटे । राजा भरत ने ३३०० मेध्य घोड़ों को बांधा
और अपनी प्रवल माया के द्वारा माया वाले शत्रु को पराजित
कर दिया ॥४॥
जैसे पाँच प्रकार के आदमियों में से कोई भी अपने हाथों से
आकाश नहीं छू सकता इसी प्रकार भरत के महाकर्म को न
कोई पा सका, न पा सकेगा ॥५॥
इसी इन्द्र के महाभिषेक का उपदेश बृहदुक्थ ऋषि ने
दुर्मुख पांचाल को किया । इसी से दुर्मुख ने राजा बन कर
पृथ्वी भर का पर्यटन किया और उसको जीत लिया ।
वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने जानंतपि के लड़के अत्य-
राति को इसका उपदेश किया । इससे अत्यराति ने इस विद्या
ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का
४८६ [ आठवीं पञ्चिका
को ग्रहण करके पृथ्वी भर का भ्रमण किया और उसे जीत कर
राजा हो गया ।
वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने राजा से कहा, “तू ने
समुद्र के तट तक सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली । अब तू मुझे भी
( दक्षिणा देकर ) बड़ा बना ।” अत्यराति ने उत्तर दिया, “हे
ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का
राजा होगा और मैं तेरा सेनापति होऊँगा ।”
सत्यहव्य के लड़के ने कहा, “यह देवक्षेत्र है । इसको
कोई नहीं जीत सकता । तूने मुझे धोखा दिया . इस लिये मैं
इसको तुझसे लिये लेता हूँ । जब अत्यराति से यह सब छीन
लिया गया और वह निःशुक्र हो गया तो शिन्य के पुत्र शुष्मिण
ने उसे मार डाला । इस लिये जो क्षत्रिय इस रहस्य को समझे
और जिसका अभिषेक हो जाय उसको चाहिये कि ब्राह्मण से
छल न करे । नहीं तो उसकी सम्पत्ति छिन जायगी और वह
मार डाला जायगा । (९)
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।
पाँचवाँ अध्याय
२४-अब पुरोहित के विषय में कहते हैं। देव उस राजा
का अन्न नहीं खाते जिसके पुरोहित न हो। इसलिये यज्ञ की
इच्छा करने वाला राजा पुरोहित को नियुक्त करे।
'देव मेरे अन्न को खावें' ऐसा सोचकर राजा पुरोहित को
नियुक्त करके स्वर्ग को ले जाने वाली अग्नियों को स्थापित करे।
पुरोहित उसका आहवनीय है। स्त्री गार्हपत्य है। पुत्र आन्वा-
हार्यपचन या दक्षिणाग्नि है। जो कुछ वह पुरोहित के लिये करता
है मानो आहवनीय में यज्ञ करता है। और जो स्त्री के लिये करता
है मानों गार्हपत्य अग्नि में यज्ञ करता है। और जो पुत्र के लिये
करता है मानों दक्षिणाग्नि में यज्ञ करता है। ये अग्नियाँ शांततनु
( विघ्न नाशक ) होकर पुरोहित से पूजी जाकर और यजमान
से प्रसन्न होकर उसको स्वर्गलोक में ले जाती हैं। और क्षत्र,
( ४८७ )
४८८ [ आठवाँ पञ्चिका
बल, राष्ट्र और प्रजा को देने वाली होती हैं। और यही अग्नियाँ
यदि पुरोहित द्वारा अर्चित न हों तो प्रसन्न नहीं होतीं और
यजमान को स्वर्ग लोक, तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से च्युत
कर देती हैं।
यह पुरोहित जो वैश्वानर अग्नि है पांच विघ्न कारक शक्तियाँ
रखता है, एक उसकी वाणी में और एक पैरों में, एक त्वचा
में, एक हृदय में और एक उपस्थ-इन्द्रिय में। इन जलती हुई
शक्तियों से वह राजा पर आक्रमण करता है। वाणी में जो
विघ्नकारक शक्ति है उसको वह यह कहकर शांत करता है,
“भगवन्, आप अब तक कहां रहे। नौकर लोगो, इनके लिये
तृण लाओ। यह जो पैरों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह
पैर धोने के लिये जल लाकर शांत करते हैं। यह जो उसकी
त्वचा में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह अलंकारों द्वारा शांत कर
रहा है। यह जो उसके हृदय में विघ्नकारक शक्ति है उसको
तर्पण करके शांत करता है। यह जो उसकी उपस्थ इन्द्रियों में
विघ्नकारक शक्ति है उसको वह घर में स्वच्छन्द निवास कराके
शांत करता है। वह इस प्रकार शांततनु और प्रसन्न होकर उस
को स्वर्ग को ले जाता है। और क्षत्र, बल, राष्ट्र, और प्रजा से
संपन्न करता है। यदि यह शांततनु और प्रसन्न न हो तो स्वर्ग
लोक से तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से उसको च्युत कर
देता है। (१)
२५—यहं जो पुरोहित अग्नि वैश्वानर है, इसमें पांच
विघ्नकारक शक्तियाँ होती हैं। जैसे समुद्रभूमि को घेर कर सुरक्षित
रखता है इसी प्रकार यह भी राजा को घेर कर सुरक्षित रखता
है।
जो राजा इस रहस्य को समझकर राष्ट्र के रक्षा करने
वाले ब्राह्मण को पुरोहित नियत करता है उसका राष्ट्र सुरक्षित
पाँचवाँ अध्याय ] ४८९
रहता है। वह आयु से पहले नहीं मरता, बुढ़ापे तक रहता है
और पूरी आयु पाता है। और वह कभी फिर न मरेगा
क्योंकि वह क्षत्र से क्षत्र को प्राप्त करता है और बल से,बल को
पाता है। जिसका पुरोहित ऐसा राष्ट्र का रक्षक पुरोहित है
उसकी प्रजा बिना किसी प्रकार के विरोध और दलबन्दी के उस
की आज्ञाओं को मानती है। (२)
२६—इस विषय में ऋषि का ऐसा कथन है :—
स इद् राजा प्रतिजन्यानि विश्वाशुष्मेण तस्थावभिवीर्येण। बृह-
स्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वलगूयति वन्दते पूर्वभाजम्। (ऋ० ४।५०।७)
जन्यानि का अर्थ है शत्रु। वह उनको क्षत्र और वीर्य से
जीतता है। "बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति" का अर्थ इस प्रकार
बृहस्पति देवों का पुरोहित है और राजाओं के मनुष्य पुरोहित
उन्हीं का अनुकरण करते हैं।
"जो अच्छी तरह पोषण करने वाले बृहस्पति को पोसते
हैं, " अर्थात् जो पोषण करने वाला पुरोहित है राजा उसका
पोषण करता है। "वलगूयति वन्दते पूर्वभाजं" का अर्थ इस
प्रकार है :—
पुरोहित पूर्वभाज है क्योंकि पहला भाग उसी का है।
राजा उसका सम्मान और उसको नमस्कार करता है। उसको
चुनता है।
स इत् क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्या इळा पिन्वते विश्वदानीम्।
तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन् ब्रह्मा राजनि पूर्वं एति ॥
( ऋ० ४।५०।८ )
'ओकस्' का अर्थ है घर। सुधित = सुहित के अर्थात्
प्रसन्न। इसलिये पहले पद का अर्थ हुआ कि पुरोहित प्रसन्न
होकर राजा के घर में रहता है। इडा का अर्थ है अन्न। उसको
सदा अन्न मिलता है। "उसको लोग स्वयं ही नमस्कार करते हैं,
४९० [ आठवीं पञ्चिका
जिसके राज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा होती है।” यहाँ ब्राह्मण
का अर्थ पुरोहित है। अर्थात् यह पुरोहित का अभिवादन है। (३)
२७—उसी ब्राह्मण को पुरोहित बनाना चाहिये जो तीन
पुरोहितों और पुरोधाताओं को जानता है। उन तीन पुरोहितों
में एक अग्नि है। पृथिवी पुरोधाता (नियुक्त करने वाला) है।
दूसरा पुरोहित वाय है। अन्तरिक्ष पुरधाता है। आदित्य
पुरोहित है और द्यौ पुरोधाता है। वही पुरोहित है, जो इसको
समझता है। जो इसको नहीं समझता वह पुरोहित नहीं है।
जिस राजा का ऐसा ब्राह्मण राष्ट्र का रक्षक पुरोहित हो,
उसके दूसरे राजा लोग मित्र हो जाते हैं और वह शत्रुओं को
जीत लेता है। वह क्षत्र से क्षत्र को और बल से बल को जीतता
है। जिस राजा का ऐसा राष्ट्र का रक्षक ब्राह्मण पुरोहित होता
है उसकी प्रजा उसको निरंतर और एकमन होकर मानती है।
पुरोहित बनाने का मंत्र यह है :—
भूर्भुवः स्वरो ममोऽहमस्मि स त्वं स त्वमस्यमोऽहं द्यौरहं पृथिवी। त्वं
सामाहमृक्त्वं तावेह संवहावहै पुराण्यस्मान्महाभयात् तनूरसि तन्वं
मे पाहि ॥१॥
या ओषधीः सोमराज्ञी र्बंहीः शत विचक्षणाः। ता मह्यमस्मिन्नासने-
ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥२॥
या ओषधीः सोनराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु । ता मह्यमस्मिन्नासने-
ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥३॥
अस्मिन् राष्ट्रे श्रियमावेश याम्यतो देवीः प्रतिपश्याम्यापः।
दक्षिणं पादमवनेनिजेऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं दधामि। सव्यं पादमवनेनिजे-
ऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं वर्धयामि ॥४॥
पूर्वमन्यमपरमन्यं पादाववनेनिजे देवा राष्ट्रस्य गुप्त्या अभयस्या-
वरुद्ध्यै । आपः पादावनेजनीर्द्विषंतं निर्दहंतु मे ॥५॥
पाँचवाँ अध्याय ] ४९१
भूसु॑र्वः स्वः, ओ३म् । वह मैं हूँ, यह त है । तू यह है ।
मैं वह हूँ । तू द्यौ है, मैं पृथ्वी हूँ । तू साम है, मैं ऋक् हूँ । हम
दोनों एक दूसरे को पुष्ट करें । हमको पुराने भयों से बचा
( जिनसे पुराने राजा पीड़ित हो चुके हैं ) । तू शरीर है, मेरे
शरीर की रक्षा कर ॥१॥
हे सैकड़ों औषधियो, जो तुम पर सोम राज करता है
तुम इस मेरी गद्दी पर मेरे लिये आनन्द दो ॥२॥
हे पृथ्वी पर विस्तृत ओषधियो, जिन तुम पर सोम राज
करता है आप मेरी इस गद्दी पर मुझे सुख दो ॥३॥
मैं इस राष्ट्र में शान्ति की स्थापना करता हूँ, इसके लिये मैं
दिव्य जलों की ओर देख रहा हूँ । ( पुरोहित के ) दाहिने पैर
को धोकर मैं राष्ट्र में इन्द्रिय (इन्द्र की शक्ति) को स्थापित करता
हूँ । बायें पैर को धोकर मैं उस इन्द्रिय की वृद्धि करता हूँ ॥४॥
हे देवो, मैं राज्य की रक्षा और अभय की प्राप्ति के लिये
( पुरोहित के ) पहले और दूसरे पगों को धोता हूँ । जिन जलों
से पग धोये गये हैं वह मेरे शत्रु को भस्म करें ॥५॥ (४)
२८—अब ब्रह्म-परिमर क्रिया कही जाती है । जो ब्रह्म-
परिमर क्रिया को जानता है उसके सब शत्रु और वैरी मर
जाते हैं । ब्रह्म है जो बहता है अर्थात् वायु । उसके चारों ओर
पांच देवता मरते हैं :—विद्युत् , वृष्टि, चंद्रमा, आदित्य, अग्नि ।
अब पानी नहीं बरसता तो विद्युत् विद्युत् में प्रविष्ट हो जाती
है और छिप जाती है । जब लोग शत्रु को न देखें तो राजा कहे,
“विद्युत के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायँगे, और छिप जायँगे ।
वे कभी शत्रु को न देखें ।” वह शीघ्र ही मर जाता है और वे
उसको देख नहीं पाते ।
वृष्टि बरस कर चंद्रमा में प्रविष्ट हो जाती है और छिप
जाती है । जब वह मर जाती है और अन्तर्ध्यान हो जाती है
४९२ [ आठवीं पञ्चिका
तो वे उसे नहीं देखते । जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "वृष्टि
के मरने से मेरे शत्रु मर जावें और वे उसको फिर न देख
सकें।" वह फौरन मर जाता है और वे उसको नहीं देख
सकते ।
अमावस को चन्द्रमा आदित्य में प्रविष्ट होता है और छिप
जाता है। वे उसे देख नहीं सकते क्योंकि वह मर जाता है
और छिप जाता है। जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "चन्द्रमा
के मरते ही मेरे शत्रु मर जायें और अन्तर्धान हो जायँ । वे
उसको न देख सकें।" वे फौरन उस शत्रु को न देखेंगे क्योंकि
वह मर जायगा ।
आदित्य अस्त होकर अग्नि में प्रविष्ट होता है। और छिप
जाता है। वे उसको नहीं देख पाते क्योंकि वह मर जाता है
और अन्तर्धान हो जाता है। जब वह न दीखे और लोप हो
जाय तो राजा कहे, "सूर्य्य के मरने से मेरे शत्रु भी मर
जायें और लोप हो जायँ । लोग उसे कभी न देख सकें।"
वे फौरन ही उसको न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा ।
अग्नि बुझ कर वायु में प्रविष्ट होती हैं और अन्तर्धान हो
जाती है। वे जब उसको न देखें और वह मर जाय तो राजा
कहे, "अग्नि के बुझने से मेरे शत्रु भी मर जायँ और कोई
लोग उनको न देख सकें।" बस उसके शत्रु मर जायँगे और
कोई उसको न देख सकेगा ।
अब इन पांचों देवताओं का पुनर्जन्म होता है। वायु से
अग्नि का । क्योंकि प्राण रूप बल से मथने से ( रगड़ने ) से
अग्नि पैदा होती है। उसको देखकर राजा कहे, "अग्नि फिर
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु फिर उत्पन्न न हो । वह दूर भाग जाय ।"
वह दूर भाग जाता है।
अग्नि से आदित्य उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,
दसवाँ अध्याय ] ४९३
"आदित्य उत्पन्न हो। मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग
जाय।" वह दूर भाग जायगा।
आदित्य से चंद्रमा उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,
"चंद्रमा उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग
जाय।" वह दूर भाग जायगा।
चन्द्रमा से वृष्टि होती है। उसको देखकर कहे, 'वृष्टि
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह
भाग जायगा।
वृष्टि से विद्युत् होता है। उसको देखकर कहे, "विद्युत्
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह
दूर भाग जायगा। इसको ब्रह्म-परिमर कहते हैं।
इस ब्रह्म-परिमर को कुषारु के बेटे मैत्रेय ने कृषि के लड़के
राजा सत्वन् से जो भर्ग गोत्र का था कहा। उसके पांच शत्रु
राजा मर गये और वह बड़ा हो गया।
यह उसका व्रत है:-"शत्रु के पूर्व न बैठे। जब वह समझ
ले कि यह खड़ा हुआ है तब खड़ा हो। अपने शत्रु के लेटने के
पहले न लेटे। जब वह समझे कि बैठा है तब बैठे। वह कभी
सोवे नहीं जब तक कि शत्रु न सोवे। जब वह समझे कि
शत्रु जग पड़ा तो जग पड़े। ऐसा करने से अगर शत्रु अश्म-
मूर्धा भी हो अर्थात् उसका पत्थर का भी सिर हो तो भी जल्दी
ही वह चूर-चूर हो जायगा।"
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका समाप्त हुई।
ऐतरेय ब्राह्मण सम्पूर्ण समाप्त हुआ।
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CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
ऐतरेय में प्रयुक्त कुछ पारिभाषिक शब्द
और व्युत्पत्तियाँ
आग्नीध्र—अग्नि रखने का स्थान। अग्नि कुण्ड।
अतिजगती—१३-१३-१३-१३ के क्रम से ५२ अक्षरों का छन्द।
अध्रिगु—वह व्यक्ति जो पशु को शान्त (चुप) करता है (२।७)।
अनद्धा—जो देव, पितर, या मनुष्यों में से किसी को आहुति
न दे (७।६)।
अनीजान—वह व्यक्ति जिसने यज्ञ अभी नहीं किया।
अनुचर—शस्त्र का पिछला भाग।
अनुमति—अमावस्या का उत्तरार्ध।
अनुष्टुभ्—८-८-८-८ अक्षरों से बने ३२ अक्षर का छन्द।
अनुस्तरणी—वह गौ जो मृत यजमान को चिता पर रखने के बाद
दान दी जाय (३।३२)।
अन्तर्याम—देखो उपांशु।
अभ्यावर्त्ति—बारबार आने वाले षडह आदि दिन।
अवभृथ—यज्ञ की अन्तिम क्रिया (७।१७)।
अविह्रुतपाठ—जिसमें एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से न मिलें।
अव्यूह—छन्दों के क्रम टूट जाने को कहते हैं, जैसे प्रातरनुवाक में
( गा-श्र-त्रि-बृ-उ-ज-पं )
( ४९५ )
( ४९६ )
अश्व—व्युत्पत्ति (५।१) ।
अहीनसंतति—वह सोम यज्ञ जिसमें कई दिन लगें, और एक दिन
और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रहे (६।१७) ।
आगू—पुरोहित का कहना—होता यक्षत, या, होतर्यज (२।२८) ।
आग्रन्थन—सादी गाँठ देना (५।१५) ।
आज्य—देवों के लिए जो घी वह आज्य है । ( देखो घृत )
आयुत—पितरों के लिए घी । ( देखो घृत )
आरम्भणीय—संवत्सर के आरम्भ होने पर किया जाने वाला कृत्य
जिसे "चतुर्विंश" भी कहते हैं (४।१२) ।
आहाव—आहाव, निविद और सूक्त ये आज्यशस्त्र के तीन भाग हैं ।
होता द्वारा शंसावोम् कहा जाना आहाव है । अध्वर्यु होता के इस
कहने पर शस्त्र जो कहे, वह प्रतिगार (२।३३) ।
आहुति = आहूति—जिसके द्वारा यजमान यज्ञ को बुलावे (१।२) ।
इष्टि—देव जिसके द्वारा यज्ञ खोजने की इच्छा करें, उसे इष्टि कहते
हैं (१।२) ।
इदादधि—दही से किया जाने वाला ऋतु (३।४०) ।
ईजान—वह व्यक्ति जिसने पहले यज्ञ किया ।
उदयनीय इष्टि—यज्ञ की अन्तिम इष्टि ।
उपगाता-वे व्यक्ति जो सामगान करने वालों के साथ पढ़ते
हैं (७।१) ।
उपनयमनी—लकड़ी का बना दूध पीने का चमसा ।
उपवसथ—सोमयाग से एक दिन पूर्व पशुबंधन (३।४०) ।
उपसद्—(१) घेरा, मुहासिरा, (२) कृत्य विशेष ।
उपसर्ग—( आधिश्रय करना )—पाँच हैं—प्रेचन, प्रचेतय, आयाहि-
, पित्रमःस्व, ऋतुश्छन्द शृते वृहत्, सुम्न आधेहि । इसी प्रकार
अन्य भी (४।४) ।
उपस्तरण—यज्ञ में चमचे से घी डालना ।
( ४९७ )
उपांशु—उपांशु और अन्तर्याम दो घड़े होते हैं। इनके ऊपर जो
प्याले रक्खे होते हैं, उन्हें उपांशु ग्रह, और अन्तर्याम ग्रह
कहते हैं (२।२१)।
उष्णिक्—७-७-७-७ अक्षरों से बना २८ अक्षर का छन्द।
एकधन = एकधना—वह जल जो यज्ञ के दिन ही प्रातःकाल लाया
जाता है।
एकाह—एक दिन में पूर्ण होने वाला सोमयज्ञ।
किंशारू—चावल की भूसी (२।६) (चावल के अंग—किंशारू,
तुषा, कण और कसार)।
कुहू—अमावस्या का पूर्वार्ध।
खर—प्रवृञ्जन स्थान (यज्ञ पात्र रखने की चबूतरी) (१।२२)।
गायत्री—८-८-८ के क्रम से तीन पाद वाले २४ अक्षरों का छन्द।
गोष्ठ—जहाँ पशु शाम को बँधते हैं।
घृत—देवों का घी आज्य, मनुष्यों का घृत, पितरों का आयुत और
गर्भस्थ जीवों का घी नवनीत कहलाता है। पिघला घी आज्य,
जमा हुआ घृत, आधा पिघला हुआ आयुत और मक्खन नवनी
कहलाता है।
चरु या ओदन—उबला चावल, जिसमें दूध और घी भी मिला
होता है।
चितैध—चिता का ईंधन (४।१०)।
जगती—१२-१२-१२-१२ अक्षरों से बने ४८ अक्षरों का छन्द।
जातवेद—अग्नि (उत्पन्न हुये को पाया)—व्युत्पत्ति (३।३६)।
जुष्टि—रियायती आहुति (१।३०)।
ज्योतिष्टोम—सोमयाग का प्रथम विभाग है। इसकी चार संस्थाएँ-
अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र हैं।
तूष्णींशंस—चुपचाप जाप या प्रार्थना (२।३१)।
तृच्—तीन ऋचाओं से मिल कर बने।
३२
( ४९८ )
दीक्षणीय इष्टि—यह केवल यज्ञ की तैयारी या भूमिका है ।
दूरोहण—स्वर्ग या सूर्य्य । व्युत्पत्ति ( ४।२० ) ।
त्रिष्टुभ्—११-११-११-११ अक्षरों से बने ४४ अक्षरों का छन्द ।
द्वादशाह—बारह दिनों का कृत्य ( ४।२३ ) ।
धाय्य—सामिधेनियों के बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र । व्युत्पत्ति देखो
( ३-१८ ) ।
नभाक—खोदने का कुदाल ( ६।२४ ) ।
नवनीत—गर्भस्थ जीवों के लिये घी ( देखो घृत ) ।
निह्नुति—पदों के अन्त के स्वरों की आवृत्ति को कहते हैं ( ५।२ ) ।
निर्ग्रन्थन—लपेट की गाँठ देना ( ५।१५ ) ।
निविद्—सोमपान के लिये देवताओं को आवाहन करने वाले ऐसे
मंत्र जिनमें देवताओं की स्तुति हो, निविद् कहलाते हैं ।
( ३।१० ) ।
न्यूंख—स्वर को उदात्त कर के पढ़ने की विशेष विधि ( ५।३ ) ।
न्यून—दस से एक कम=९ ( ६।६ ) ।
पंक्ति—१०-१०-१०-१० अक्षरों से बने ४० अक्षरों का छन्द ।
परांचिदिन—अकेले दिन ( ६।१८ ) ।
पांचजन्य—पांच—देव, मनुष्य, गन्धर्व, अप्सरा, सर्प, पितर
( ३।३१ ) ।
पुरोगव—नेता ( १।३० ) ।
पुरोडाश—इष्टियों में दी गई प्रधान हवि जो चावल के आटे को
गूँथ कर बनायी जाती है । पहले इसे लकड़ी के टुकड़े पर आह-
वनीय अग्नि में पकाते हैं, अन्त में कपालों पर ।
पुरोरुक्—उच्च स्वर से कहे जाने वाले पद ( तूष्णींशंस का उलटा )
( २-३६ ) ।
पृष्ठ—सामवेद के दो तृच् मिल कर पृष्ठ कहलाते हैं ( ३।२१ ) ।
( ४९९ )
प्रग्राह—पाठ की वह विधि जिसमें दो-तीन पदों के बाद ठहरना पड़ता
है ( ६।३२ ) ।
प्रणयन ( अग्नि )—अग्नि को उत्तर वेदी में ले जाना ।
प्रतिपद्—शस्त्र का पहला भाग ।
प्रतिष्ठा—पशु ठहराने का स्थान ( ३।२४ ) ।
प्रपदरीति—ऋचाओं के बीच बीच में अपनी ओर से कुछ पद मिला
कर पढ़ने की रीति ( ८।११ ) ।
प्रस्तर—कुशों का बंडल ।
प्रातरनुवाक्य—प्रातःकाल बोले जाने वाले अनुवाक्य ( २-१५ ) ।
प्रायणीय इष्टि—यज्ञ की प्रारम्भिक इष्टि ।
बृहती—६-६-६-६ अक्षरों से बने ३६ अक्षरों का छन्द ।
महानाम्नी—व्युत्पत्ति ( ५।७ )—( जिसके द्वारा इन्द्र ने महान्
बनाया ) ।
मानुष—मादुष—जो दोष के योग्य न हो । ( ३।३४ ) ।
यज्ञदोष—जग्ध, गीर्ण, वात ( ३।४६ ) ।
यूप—यज्ञशाला का खम्भा जिसमें पशु बाँधते हैं ।
योनि—बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र ( ३।३५ ) ।
रराटी—दर्भ की माला जो हविर्धान के बीच के खम्मों पर लटकी
होती है ।
राका—पूर्णिमा का पहला भाग ( पूर्वार्द्ध ) ।
रूपसमृद्ध—वे मंत्र रूप समृद्ध हैं, जिनमें उन मंत्रों से की जाने वाली
क्रिया की ओर भी संकेत हो ।
रोहित—( छन्द )—जिससे स्वर्ग पर चढ़ा जाय । व्युत्पत्ति
( ५।१० ) ।
वर = देवभजन = यज्ञ स्थान ( १।१३ ) ।
वषट्कार—तीन प्रकार के वज्र, धामञ्छद्, रिक्त ( ३।७ ) ।
वसतीवरि—वह जल जो यज्ञ के एक दिन पहले लाया जाता है ।
( ५०० )
वहतु—अतिथियों को भेंट में दी जाने वाली चीज़ें ( ४।७ ) ।
वह्नि—जो अगुआ हो । व्युत्पत्ति ( ६।१८ ) ।
बाण—इसके तीन भाग-अनीक, शल्य, और तेजन ।
वावाता—राजा की बीच की पत्नी ( पहली पत्नी महिषी, दूसरी
वावाता, तीसरी परिवृक्ति ) ।
विहृत पाठ—जिसमें एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से पाठ करते
समय मिल जायें ( ४।२ ) ।
व्यूह—छन्दों के क्रमशः ( ४-४ अक्षर ) बढ़ने को व्यूह कहते हैं ।
क्रम यह है—गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुभ्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुभ्,
जगती ( २।१८ ) ।
व्यूहछंदस्—तितर बितर हो जाना ।
शक्वरी—१४-१४-१४-१४ के क्रम से ५६ अक्षरों वाला छन्द ।
व्युत्पत्ति ( ५।७ ) ।
शस्त्र—बारह—आज्य, प्रउग, मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसि, अच्छा-
वाक्, मरुत्वतीय, निष्केवल्य, मैत्रावरुण, वैश्वदेव, अग्निमारुत
आदि ( ३।३६ ) ।
षडह—६ दिन का कृत्य ( ४।१५ ) ।
शुक्र = व्याहृति ( ५।३२ ) ।
संसवदोष—दो या अधिक पुरुषों के एक ही समय में निकट सोम-
यज्ञ करने में जो गड़बड़ी होती है वह संसवदोष है ।
संगविनी—धूप से बचने के लिए जहाँ पशु दोपहर को बाँधे जाते हैं ।
सदस्—उत्तरवेदी के दक्षिणपूर्वी कोने में स्थान विशेष ।
संपात—व्युत्पत्ति ( ४।३० ) ।
समानोदर्क—समान वाक्य पर समात होने वाला सूक्त ( ५।१ ) ।
साम—न्यायवाला ( व्युत्पत्ति ३।२३ ) । इसके पाँच भाग आहव,
प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार, निधन ।
( ५०१ )
सामिधेनी—वे मंत्र जिनके द्वारा समिधा अग्नि में छोड़ी जाती हैं ।
( अग्नि प्रज्वलित करते समय पढ़े जाने वाले मंत्र ) ।
सिमा—( सीमा से बाहर जो हुएं ) व्युत्पत्ति ( ५।७ ) ।
सिनीवाली—पूर्णिमा का दूसरा भाग ( उत्तरार्ध ) ।
स्वरसाम—व्युत्पत्ति ( ४।१६ ) ।
हविर्धान—गाड़ी जिस पर सोम या अन्य हवि उत्तर वेदी में लायी
जाती है ।
हविषपंचक—यज्ञ में छोड़ी जाने वाली चीज़ें—धान, करंभ, परिवाप,
पुरोडाश, पयस्या ( मट्ठा ) आदि ।
होता—जो देवताओं का आवाहन करे वह होता ( १।२ ) ।
ऐतिहासिक व्यक्ति
अग्नि ४५४ उदमय ४८३, ४८४.
अङ्ग ४८३ . उद्दालक आरुणि ४६५
अङ्गिरा २४६, २७६, ३१२, ३६६, उपाविः ७१
४७४ उशीनर ४७६
अजीगर्त ४३२, ४३३, ४३६, ऋषभ ४३७
४३७ एकादशाक्ष ३४६
अत्यराति ४८५, ४८६ ऐतरेय १६५, १६८, २१६, २३१
अत्रि ४८३, ४८४ ऐतश मुनि ४०१
अत्रेयि ४११ और्वाण गोत्र ४०१
अम्बाष्ठ्य ४८२ कक्षीवान् ५८, ३१३
अयास्य ४३३ कद्रु ३५७
अरुर्मघ ४४८ कवश (ष) १२३, ४५३, ४८१
अर्बुद ३५७ कश्यप ४४७, ४८२
अवत्सार ऋषि १३२ कुत्स ऋषि १४४
अश्व ३६७ कुरु पांचाल ४७६
अश्वतर ३६७ कुशिक ४३८
अष्टक ४३७ कुशारु ४६३
असितमृग ४४७ कृशानु १६०
आराहूल ४४२ कौषीतकि ऋषि ४२४
इलूषा १२३ ऋतुविद् जानकि ४५४
( ५०२ )