ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४९६ )
अश्व—व्युत्पत्ति (५।१) ।
अहीनसंतति—वह सोम यज्ञ जिसमें कई दिन लगें, और एक दिन
और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रहे (६।१७) ।
आगू—पुरोहित का कहना—होता यक्षत, या, होतर्यज (२।२८) ।
आग्रन्थन—सादी गाँठ देना (५।१५) ।
आज्य—देवों के लिए जो घी वह आज्य है । ( देखो घृत )
आयुत—पितरों के लिए घी । ( देखो घृत )
आरम्भणीय—संवत्सर के आरम्भ होने पर किया जाने वाला कृत्य
जिसे "चतुर्विंश" भी कहते हैं (४।१२) ।
आहाव—आहाव, निविद और सूक्त ये आज्यशस्त्र के तीन भाग हैं ।
होता द्वारा शंसावोम् कहा जाना आहाव है । अध्वर्यु होता के इस
कहने पर शस्त्र जो कहे, वह प्रतिगार (२।३३) ।
आहुति = आहूति—जिसके द्वारा यजमान यज्ञ को बुलावे (१।२) ।
इष्टि—देव जिसके द्वारा यज्ञ खोजने की इच्छा करें, उसे इष्टि कहते
हैं (१।२) ।
इदादधि—दही से किया जाने वाला ऋतु (३।४०) ।
ईजान—वह व्यक्ति जिसने पहले यज्ञ किया ।
उदयनीय इष्टि—यज्ञ की अन्तिम इष्टि ।
उपगाता-वे व्यक्ति जो सामगान करने वालों के साथ पढ़ते
हैं (७।१) ।
उपनयमनी—लकड़ी का बना दूध पीने का चमसा ।
उपवसथ—सोमयाग से एक दिन पूर्व पशुबंधन (३।४०) ।
उपसद्—(१) घेरा, मुहासिरा, (२) कृत्य विशेष ।
उपसर्ग—( आधिश्रय करना )—पाँच हैं—प्रेचन, प्रचेतय, आयाहि-
, पित्रमःस्व, ऋतुश्छन्द शृते वृहत्, सुम्न आधेहि । इसी प्रकार
अन्य भी (४।४) ।
उपस्तरण—यज्ञ में चमचे से घी डालना ।