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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

( ४९९ )
प्रग्राह—पाठ की वह विधि जिसमें दो-तीन पदों के बाद ठहरना पड़ता
है ( ६।३२ ) ।
प्रणयन ( अग्नि )—अग्नि को उत्तर वेदी में ले जाना ।
प्रतिपद्—शस्त्र का पहला भाग ।
प्रतिष्ठा—पशु ठहराने का स्थान ( ३।२४ ) ।
प्रपदरीति—ऋचाओं के बीच बीच में अपनी ओर से कुछ पद मिला
कर पढ़ने की रीति ( ८।११ ) ।
प्रस्तर—कुशों का बंडल ।
प्रातरनुवाक्य—प्रातःकाल बोले जाने वाले अनुवाक्य ( २-१५ ) ।
प्रायणीय इष्टि—यज्ञ की प्रारम्भिक इष्टि ।
बृहती—६-६-६-६ अक्षरों से बने ३६ अक्षरों का छन्द ।
महानाम्नी—व्युत्पत्ति ( ५।७ )—( जिसके द्वारा इन्द्र ने महान्
बनाया ) ।
मानुष—मादुष—जो दोष के योग्य न हो । ( ३।३४ ) ।
यज्ञदोष—जग्ध, गीर्ण, वात ( ३।४६ ) ।
यूप—यज्ञशाला का खम्भा जिसमें पशु बाँधते हैं ।
योनि—बीच में पढ़े जाने वाले मंत्र ( ३।३५ ) ।
रराटी—दर्भ की माला जो हविर्धान के बीच के खम्मों पर लटकी
होती है ।
राका—पूर्णिमा का पहला भाग ( पूर्वार्द्ध ) ।
रूपसमृद्ध—वे मंत्र रूप समृद्ध हैं, जिनमें उन मंत्रों से की जाने वाली
क्रिया की ओर भी संकेत हो ।
रोहित—( छन्द )—जिससे स्वर्ग पर चढ़ा जाय । व्युत्पत्ति
( ५।१० ) ।
वर = देवभजन = यज्ञ स्थान ( १।१३ ) ।
वषट्कार—तीन प्रकार के वज्र, धामञ्छद्, रिक्त ( ३।७ ) ।
वसतीवरि—वह जल जो यज्ञ के एक दिन पहले लाया जाता है ।