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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय
१५—जो ऋत्विज इस रहस्य को समझता हुआ यह चाहे
कि क्षत्रिय सब को जीत ले, सब लोकों को ले ले, और सब राजों
में श्रेष्ठ और बड़ा हो जाय, साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य,
वैराज्य, पारमेष्ठ्य, राज्य, माहाराज्य, आधिपत्य, प्राप्त कर
ले; सब जगह उसकी पहुँच हो, सब भूमि का मालिक
हो, पूर्ण आयु वाला हो, और पृथिवी पर समुद्र तक
राज्य करे और संशयरहित हो, उस ऋत्विज को चाहिये कि
उस क्षत्रिय का इन्द्र के महाभिषेक की रीति से अभिषेक करे।
और उससे यह शपथ ले कि "जिस रात्रि को तू पैदा हुआ
उससे लेकर जिस रात्रि को तू मरेगा उस घड़ी तक जो कुछ तू
ने लोक में सुकृत किया या आयु पाई या प्रजा मिली, उस सब
को मैं छीन लूँगा अगर तू ने मुझसे द्रोह किया !"
( ४७८ )

चौथा अध्याय ] ४७९
ऐसा जानने वाला क्षत्रिय अगर चाहे कि मैं सब को जीत
जाऊँ, सब लोक मुझे मिल जायँ, मैं सब राजों में श्रेष्ठ हो
जाऊँ, साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य, परमेष्ठ्य राज्य,
माहाराज्य, आधिपत्य प्राप्त हो जाय, सब भूमि, पूर्ण आयु,
मिल जाय और समुद्र तक पृथ्वी का एक मात्र राजा हो
जाऊँ तो वह बिना शंका किये श्रद्धा से ऐसी शपथ खाये कि
"अगर मैं तेरे साथ द्रोह करूँ तो मुझसे जन्म से मृत्यु तक
जो कुछ मैंने सुकृत किया या आयु और प्रजा हुई उसको तू
छीन लेना ।" (१)
१६—तब ऋत्विज कहे, "चार लकड़ियाँ लाओ, न्यग्रोध
की, उदुंबर की, अश्वत्थ की और प्लाक्ष की ।" जो न्यग्रोध
है वह वनस्पतियों में क्षत्रिय है। जो न्यग्रोध को लाता है, वह
मानों उसमें क्षत्र को धारण कराता है। उदुंबर वनस्पतियों में
भौज्य है। जो उदुम्बर लाता है वह उसमें भौज्य धारण कराता
है। अश्वत्थ वनस्पतियों में साम्राज्य है। जो अश्वत्थ को लाता
है वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। साक्ष वनस्पतियों
में स्वाराज्य और वैराज्य है। जो साक्ष को लाता है वह उसमें
स्वाराज्य और वैराज्य धारण कराता है।
अब उससे कहे, "चार औषधों (अन्नों) को लाओ, व्रीहि,
महाव्रीहि, प्रियंगू, यव ।" व्रीहि ओषधियों में क्षत्रिय है। जो
व्रीहि लाता है वह क्षत्रिय में क्षत्र को धारण कराता है। महा-
व्रीहि ओषधियों में साम्राज्य है। जो महाव्रीहि को लाता है
वह उसमें साम्राज्य को धारण कराता है। प्रियंगू (कांगुनी
ओषधियों में भौज्य है। जो प्रियंगू लाता है वह उसमें भौज्य
को धारण कराता है। जो यव है वह ओषधियों में सेनानी है।
जो यव को लाता है वह उसमें सेना के नेतृत्व को धारण
कराता है। (२)

४८० [ आठवाँ कण्डिका
७ १८, १९—अब वह उदुम्बर का सिंहासन लाता है जैसा
ऊपर की ब्राह्मण में कहा गया। उदुंबर का चमसा लावे या
उदुंबर का कोई और बरतन। और उदुम्बर की शाखा भी। इन
सब चीजों को (चार तरह के अन्नों को) उदुम्बर के चमसे या
पात्र में मिलाते हैं। इसके पश्चात् उस पर दही, शहद, घी और
धूप में बरसता हुआ जल डालते हैं। और सिंहासन को सम्बो-
धन करके कहते हैं :—
बृहत् और रथंतर तेरे दो अगले पाये हैं और वैरूप और
वैराज पिछले दो पाये। इत्यादि (देखो पृ० ४७३ से)
(१८, १९ वही हैं जो १२, १३, १४ हैं ऊपर देखो)। (३
४, ५)
२०—इस लोक में जो दही है वह मानो इन्द्रिय है। यह
जो दही से सींचता है वह क्षत्रिय में इन्द्रिय धारण कराता है।
औषध और वनस्पतियों में जो रस है वह शहद है। इसलिये
मधु से सींचकर क्षत्रिय में इन के रस को धारण कराता है।
यह जो घी है वह पशुओं का तेज है। यह जो घी से सींचता
है वह इस प्रकार क्षत्रिय में तेज धारण कराता है। यह जो
जल है यह इस लोक में अमृत है। यह जो जल से सींचता है
मानो उसमें अमृतत्व धारण कराता है।
जिसका अभिषेक हुआ वह अभिषेक करने वाले ब्राह्मण
को सोना, हजार गौयें, और चौकोर खेत दे। यह भी कहते हैं
कि अपरिमित दक्षिणा दे क्योंकि क्षत्रिय अपरिमित है और
अपरिमित दान देने से अपरिमित फल होगा।
अब वह राजा के हाथ में सुरा का प्याला देता है और यह
मंत्र पढ़ता है :—

चौथा अध्याय ] ४८१
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोमधारया इन्द्राय पातवे सुते ॥
( ऐ० ८।८ )
अब जो शेष रहे उसको इन दो मंत्रों को पढ़ कर पिये :—
(१) रसिनः सुतस्य यदिन्द्रो अपिबच्छचीभिः इदं तदस्य मनसा
शिवे न सोमं राजानिह भक्षयामि ॥
और (२) अभित्वा वृषभा सुते ···( ऋ० ८।४५।२२ )
सुरा में जो सोम का असर है उसको जैसे इंद्र के लिये
महाभिषेक हुआ उसी प्रकार राजा का महभिषेक करके
राजा को पिलाते हैं। सुरा को नहीं। और इन दो मंत्रों को
पढ़ते हैं :—
अपाम सोमम्···( ऋ० ८।४८।३ )
शन्नो भव चक्षसा···( ऋ० १०।३७।१० )
जिस प्रकार प्रिय पुत्र पिता का और प्रिय स्त्री पति का
आलिङ्गन करके आनन्दित होती है उसी प्रकार यह राजा भी
इन्द्र के समान महाभिषेक कराने के पश्चात् सोम या सुरा पान
करके या अन्नाद्य खाकर आनन्दित होता है और अपने को
भूल जाता है। (६)
२१—कवष के पुत्र तुर ने परीक्षित के लड़के जनमेजय का
वही राज्यभिषेक किया था जो इन्द्र का हुआ था। इसलिये
जनमेजय सर्वत्र विजयी हुआ और उसने अश्वमेध यज्ञ किया ।
इसके सम्बन्ध में यह गाथा कही जाती है :—
आसंदीवति धान्यादं रुक्मिणं हरितस्रजम् ।
अश्व बबंध सारंगं देवेभ्यो जनमेजयः ॥
“जनमेजय ने देवों के लिये तख्त के पास धान्य खाने वाले,
माथे पर चिह्न वाले और हरी माला वाले घोड़े को बांधा।”
३१

४८२ [ आठवीँ पञ्चिका
इसी इन्द्र के महाभिषेक से भृगु के लड़के च्यवन ने मनु के
पुत्र शर्यात का अभिषेक किया, इसलिये मनु के पुत्र शर्यात ने

  • ने पृथ्वी भर पर फिर कर उसको जीत लिया और अश्वमेध
    यज्ञ किया और देवों के यज्ञ में गृहपति बना । इसी इन्द्र के
    महाभिषेक से वाजरत्न के पुत्र सोमशुष्मा ने सत्राजित के पुत्र
    शतानीक का राज्याभिषेक किया । शतानीक ने पृथ्वी को घूम २
    कर जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया । इसी इन्द्र के महा-
    भिषेक से पर्वत और नारद ने अम्बाष्ठ्य का अभिषेक किया ।
    इसलिये अम्बाष्ठ्य ने फिर २ कर पृथ्वी को जीत लिया और
    स्वयं अश्वमेध यज्ञ किया ।
    इसी इन्द्र के महाभिषेक से पर्वत और नारद ने उग्रसेन
    के लड़के युधांश्रौष्टि का अभिषेक किया और इसने पृथ्वी भर
    को घूम फिर कर जीत लिया और अश्वमेध यज्ञ किया ।
    इसी इन्द्र के महाभिषेक से कश्यप ने, भुवन के पुत्र विश्व-
    कर्मा ने घूम फिर कर समस्त पृथ्वी को समुद्र के तट तक जीत
    लिया और अश्वमेध यज्ञ किया । कहते हैं कि विश्वकर्मा की
    प्रशंसा में पृथ्वी ने यह गीत गाया :—
    न मा मर्त्यः कश्चन दातुमर्हति ,
    विश्वकर्मन् भौवन मां दिदासित्थ ।
    निमंक्ष्येऽहं सलिलस्य मध्ये ,
    मोघस्त एष कश्यपायास संगरः ।
    “हे विश्वकर्मा, कोई मेरा दान नहीं कर सकता । तू ने
    मुझे दान कर दिया । मैं समुद्र में गिर जाऊँगी । तेरा कश्यप को
    देने की प्रतिज्ञा करना व्यर्थ है ।”
    इन्द्र के इसी महाभिषेक से वशिष्ठ ने पिजवन के पुत्र

चौथा अध्याय ] ४८३
सुदास का महाभिषेक किया और उसने पृथ्वी भर में घूम कर
विजय पाई और अश्वमेध यज्ञ किया ।
इन्द्र के इसी राज्याभिषेक से अंगिरस् के पुत्र संवर्त
ने अविक्षित के पुत्र मरुत्तम का अभिषेक किया और यह
सारी पृथ्वी पर घूमा, उसे विजय किया और उसने अश्वमेध
यज्ञ किया ।
इसी के विषय में यह श्लोक गाया जाता है,—
मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे ।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वे देवाः सभासदः ॥
"मरुत लोग मरुत के घर में अन्न बांटने वाले रहे । इसकी
सब कामनायें पूरी हुईं और विश्वेदेव वहाँ मौजूद थे ।” (७)
२२—इसी इन्द्र के अभिषेक से अत्रि के लड़के उद्मय ने
अंग का अभिषेक किया । उससे अंग ने पृथ्वी की विजय की
और अश्वमेध यज्ञ किया । उस अलोपांग ( नहीं लोप हुआ
कोई अंग जिसका ) ने एक बार कहा था, "हे ब्राह्मण, मैं तुम्हे
दस हज़ार हाथी और दस हज़ार दासियाँ देता हूँ, अगर तू
मुझे अपने यज्ञ में बुलावे ।” इसके सम्बन्ध में पाँच नीचे के
श्लोक कहे जाते हैं :—
याभिर्गोभिरुदमयं प्रैयमेधा अयाजयन् ।
द्वे द्वे सहस्रे बद्धानामात्रेयो मध्यतो ददात् ॥१॥
अष्टाशीति सहस्राणि श्वेतान् वैरोचनो हयान् ।
प्रष्ठीं निश्चृत्य प्रायच्छद् यजमाने पुरोहिते ॥२॥
देशाद् देशात् समोळ्हानां सर्वासामाव्य दुहितॄणां ।
दशाददात् सहस्राण्यात्रेयो निष्ककंठ्यः ॥३॥

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४८४ [ आठवीं पञ्चिका
दशनाग सहस्राणि दत्वात्रेयो वचत्नवे ।
श्रान्तः परिकुटान् प्रैप्सद् दानेनांगस्य ब्राह्मणः ॥४॥
शतं तुभ्यं शतं तुभ्यमिति स्मैव प्रताम्यति ।
सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा प्राणान्तस्म प्रतिपद्यते ॥५॥
अर्थ—प्रियमैध के लड़कों ने उदमय को जिन-जिन गायों
को देने के लिये कहा, अत्रि के लड़के उदमय ने मध्यसवन में
दो-दो हज़ार बड्वा ( गायों के गल्ले ) दिये ॥१॥
विरोचन के पुत्र ने ८८ हज़ार सफ़ेद घोड़ों की रस्सियाँ खोल
दीं और यजमान पुरोहित को दान कर दिया ॥२॥
अत्रि के लड़के ने देश-देश से जमा की हुई दस हज़ार
लड़कियों को जिनकी गर्दन में आभूषण पड़े थे दान कर
दिया ॥३॥
वचत्नुक्र देश में अत्रि के लड़के ने दस हज़ार हाथी दिये।
थके हुए ब्राह्मण ने अंग के दान को लेने के लिये नौकरों को
कहा ॥४॥
“सौ तुझको,” “सौ तुझको” ऐसा कहता-कहता वह थक
गया। तब उसने कहा “हज़ार तुझको,” “हज़ार तुझको” और
फिर भी थक कर सांस लेने ठहर गया ( क्योंकि दान के लिये
बहुत बाक़ी था ) ॥५॥ (८)
२३—इन्द्र के इसी महाभिषेक से ममता के लड़के दीर्घतमा
ने दुष्यन्त के लड़के भरत का अभिषेक किया। इससे भरत ने
सब पृथ्वी की परिक्रमा की और अश्वमेध यज्ञ किया। इसके
विषय में यह श्लोक हैं :-
हिरण्येन परीवृतान्कृष्णान् शुक्लदतो मृगान् ।
मष्णारे भरतो ददाच्छतं बद्धानि सप्त च ॥१॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

चौथा अध्याय ] ४८५
भरतस्यैष दौष्यंतेरग्निः साचिगुणे चितः ।
यस्मिन्सहस्रं ब्राह्मणा बद्धशो गात्रि मेजिरे ॥२॥
अष्टासप्ततिं भरतो दौष्यंतिर्यमुना मनुः ।
गंगायां वृत्रघ्ने बदनात्पंचपंचाशतं हयान् ॥३॥
त्रयस्त्रिंशच्छतं राजाऽश्वान् अबधाय मेध्यान् ।
दौष्यंतिरत्यगाद्राज्ञो मायां मायावत्तरः ॥४॥
महाकर्म भरतस्य न पूर्वे नापरे जनाः ।
दिवं मर्त्य इव हस्ताभ्यां नोदापुः पंच मानवाः ॥५॥
अर्थ—भरत ने मष्णर देश में १०७ काले और सफ़ेद दांतों
वाले, सोने से आभूषित हाथी दिये ॥१॥
जब दुष्यंत के पुत्र भरत ने साचीगुण नामी नगर में
अग्नि स्थापित की तो हज़ारों गायों के गल्ले ब्राह्मणों को दान
किये ॥२॥
दुष्यन्त के बेटे भरत ने ७८ घोड़े यमुना के किनारे और
५५ गंगा के किनारे इन्द्र के लिये बाँधे ॥३॥
दुष्यन्त के बेटे । राजा भरत ने ३३०० मेध्य घोड़ों को बांधा
और अपनी प्रवल माया के द्वारा माया वाले शत्रु को पराजित
कर दिया ॥४॥
जैसे पाँच प्रकार के आदमियों में से कोई भी अपने हाथों से
आकाश नहीं छू सकता इसी प्रकार भरत के महाकर्म को न
कोई पा सका, न पा सकेगा ॥५॥
इसी इन्द्र के महाभिषेक का उपदेश बृहदुक्थ ऋषि ने
दुर्मुख पांचाल को किया । इसी से दुर्मुख ने राजा बन कर
पृथ्वी भर का पर्यटन किया और उसको जीत लिया ।
वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने जानंतपि के लड़के अत्य-
राति को इसका उपदेश किया । इससे अत्यराति ने इस विद्या

ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का

४८६ [ आठवीं पञ्चिका
को ग्रहण करके पृथ्वी भर का भ्रमण किया और उसे जीत कर
राजा हो गया ।
वसिष्ठ गोत्री सत्यहव्य के पुत्र ने राजा से कहा, “तू ने
समुद्र के तट तक सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली । अब तू मुझे भी
( दक्षिणा देकर ) बड़ा बना ।” अत्यराति ने उत्तर दिया, “हे
ब्राह्मण, जब मैं उत्तर कुरुओं को जीत लूँगा तब तू पृथ्वी का
राजा होगा और मैं तेरा सेनापति होऊँगा ।”
सत्यहव्य के लड़के ने कहा, “यह देवक्षेत्र है । इसको
कोई नहीं जीत सकता । तूने मुझे धोखा दिया . इस लिये मैं
इसको तुझसे लिये लेता हूँ । जब अत्यराति से यह सब छीन
लिया गया और वह निःशुक्र हो गया तो शिन्य के पुत्र शुष्मिण
ने उसे मार डाला । इस लिये जो क्षत्रिय इस रहस्य को समझे
और जिसका अभिषेक हो जाय उसको चाहिये कि ब्राह्मण से
छल न करे । नहीं तो उसकी सम्पत्ति छिन जायगी और वह
मार डाला जायगा । (९)
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।

पाँचवाँ अध्याय
२४-अब पुरोहित के विषय में कहते हैं। देव उस राजा
का अन्न नहीं खाते जिसके पुरोहित न हो। इसलिये यज्ञ की
इच्छा करने वाला राजा पुरोहित को नियुक्त करे।
'देव मेरे अन्न को खावें' ऐसा सोचकर राजा पुरोहित को
नियुक्त करके स्वर्ग को ले जाने वाली अग्नियों को स्थापित करे।
पुरोहित उसका आहवनीय है। स्त्री गार्हपत्य है। पुत्र आन्वा-
हार्यपचन या दक्षिणाग्नि है। जो कुछ वह पुरोहित के लिये करता
है मानो आहवनीय में यज्ञ करता है। और जो स्त्री के लिये करता
है मानों गार्हपत्य अग्नि में यज्ञ करता है। और जो पुत्र के लिये
करता है मानों दक्षिणाग्नि में यज्ञ करता है। ये अग्नियाँ शांततनु
( विघ्न नाशक ) होकर पुरोहित से पूजी जाकर और यजमान
से प्रसन्न होकर उसको स्वर्गलोक में ले जाती हैं। और क्षत्र,
( ४८७ )

४८८ [ आठवाँ पञ्चिका
बल, राष्ट्र और प्रजा को देने वाली होती हैं। और यही अग्नियाँ
यदि पुरोहित द्वारा अर्चित न हों तो प्रसन्न नहीं होतीं और
यजमान को स्वर्ग लोक, तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से च्युत
कर देती हैं।
यह पुरोहित जो वैश्वानर अग्नि है पांच विघ्न कारक शक्तियाँ
रखता है, एक उसकी वाणी में और एक पैरों में, एक त्वचा
में, एक हृदय में और एक उपस्थ-इन्द्रिय में। इन जलती हुई
शक्तियों से वह राजा पर आक्रमण करता है। वाणी में जो
विघ्नकारक शक्ति है उसको वह यह कहकर शांत करता है,
“भगवन्, आप अब तक कहां रहे। नौकर लोगो, इनके लिये
तृण लाओ। यह जो पैरों में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह
पैर धोने के लिये जल लाकर शांत करते हैं। यह जो उसकी
त्वचा में विघ्नकारक शक्ति है उसको वह अलंकारों द्वारा शांत कर
रहा है। यह जो उसके हृदय में विघ्नकारक शक्ति है उसको
तर्पण करके शांत करता है। यह जो उसकी उपस्थ इन्द्रियों में
विघ्नकारक शक्ति है उसको वह घर में स्वच्छन्द निवास कराके
शांत करता है। वह इस प्रकार शांततनु और प्रसन्न होकर उस
को स्वर्ग को ले जाता है। और क्षत्र, बल, राष्ट्र, और प्रजा से
संपन्न करता है। यदि यह शांततनु और प्रसन्न न हो तो स्वर्ग
लोक से तथा क्षत्र, बल, राष्ट्र और प्रजा से उसको च्युत कर
देता है। (१)
२५—यहं जो पुरोहित अग्नि वैश्वानर है, इसमें पांच
विघ्नकारक शक्तियाँ होती हैं। जैसे समुद्रभूमि को घेर कर सुरक्षित
रखता है इसी प्रकार यह भी राजा को घेर कर सुरक्षित रखता
है।
जो राजा इस रहस्य को समझकर राष्ट्र के रक्षा करने
वाले ब्राह्मण को पुरोहित नियत करता है उसका राष्ट्र सुरक्षित

पाँचवाँ अध्याय ] ४८९
रहता है। वह आयु से पहले नहीं मरता, बुढ़ापे तक रहता है
और पूरी आयु पाता है। और वह कभी फिर न मरेगा
क्योंकि वह क्षत्र से क्षत्र को प्राप्त करता है और बल से,बल को
पाता है। जिसका पुरोहित ऐसा राष्ट्र का रक्षक पुरोहित है
उसकी प्रजा बिना किसी प्रकार के विरोध और दलबन्दी के उस
की आज्ञाओं को मानती है। (२)
२६—इस विषय में ऋषि का ऐसा कथन है :—
स इद् राजा प्रतिजन्यानि विश्वाशुष्मेण तस्थावभिवीर्येण। बृह-
स्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वलगूयति वन्दते पूर्वभाजम्। (ऋ० ४।५०।७)
जन्यानि का अर्थ है शत्रु। वह उनको क्षत्र और वीर्य से
जीतता है। "बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति" का अर्थ इस प्रकार
बृहस्पति देवों का पुरोहित है और राजाओं के मनुष्य पुरोहित
उन्हीं का अनुकरण करते हैं।
"जो अच्छी तरह पोषण करने वाले बृहस्पति को पोसते
हैं, " अर्थात् जो पोषण करने वाला पुरोहित है राजा उसका
पोषण करता है। "वलगूयति वन्दते पूर्वभाजं" का अर्थ इस
प्रकार है :—
पुरोहित पूर्वभाज है क्योंकि पहला भाग उसी का है।
राजा उसका सम्मान और उसको नमस्कार करता है। उसको
चुनता है।
स इत् क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्या इळा पिन्वते विश्वदानीम्।
तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन् ब्रह्मा राजनि पूर्वं एति ॥
( ऋ० ४।५०।८ )
'ओकस्' का अर्थ है घर। सुधित = सुहित के अर्थात्
प्रसन्न। इसलिये पहले पद का अर्थ हुआ कि पुरोहित प्रसन्न
होकर राजा के घर में रहता है। इडा का अर्थ है अन्न। उसको
सदा अन्न मिलता है। "उसको लोग स्वयं ही नमस्कार करते हैं,

४९० [ आठवीं पञ्चिका
जिसके राज में ब्राह्मण की प्रतिष्ठा होती है।” यहाँ ब्राह्मण
का अर्थ पुरोहित है। अर्थात् यह पुरोहित का अभिवादन है। (३)
२७—उसी ब्राह्मण को पुरोहित बनाना चाहिये जो तीन
पुरोहितों और पुरोधाताओं को जानता है। उन तीन पुरोहितों
में एक अग्नि है। पृथिवी पुरोधाता (नियुक्त करने वाला) है।
दूसरा पुरोहित वाय है। अन्तरिक्ष पुरधाता है। आदित्य
पुरोहित है और द्यौ पुरोधाता है। वही पुरोहित है, जो इसको
समझता है। जो इसको नहीं समझता वह पुरोहित नहीं है।
जिस राजा का ऐसा ब्राह्मण राष्ट्र का रक्षक पुरोहित हो,
उसके दूसरे राजा लोग मित्र हो जाते हैं और वह शत्रुओं को
जीत लेता है। वह क्षत्र से क्षत्र को और बल से बल को जीतता
है। जिस राजा का ऐसा राष्ट्र का रक्षक ब्राह्मण पुरोहित होता
है उसकी प्रजा उसको निरंतर और एकमन होकर मानती है।
पुरोहित बनाने का मंत्र यह है :—
भूर्भुवः स्वरो ममोऽहमस्मि स त्वं स त्वमस्यमोऽहं द्यौरहं पृथिवी। त्वं
सामाहमृक्त्वं तावेह संवहावहै पुराण्यस्मान्महाभयात् तनूरसि तन्वं
मे पाहि ॥१॥
या ओषधीः सोमराज्ञी र्बंहीः शत विचक्षणाः। ता मह्यमस्मिन्नासने-
ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥२॥
या ओषधीः सोनराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु । ता मह्यमस्मिन्नासने-
ऽच्छिद्रं शर्म यच्छत ॥३॥
अस्मिन् राष्ट्रे श्रियमावेश याम्यतो देवीः प्रतिपश्याम्यापः।
दक्षिणं पादमवनेनिजेऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं दधामि। सव्यं पादमवनेनिजे-
ऽस्मिन् राष्ट्र इंद्रियं वर्धयामि ॥४॥
पूर्वमन्यमपरमन्यं पादाववनेनिजे देवा राष्ट्रस्य गुप्त्या अभयस्या-
वरुद्ध्यै । आपः पादावनेजनीर्द्विषंतं निर्दहंतु मे ॥५॥

पाँचवाँ अध्याय ] ४९१
भूसु॑र्वः स्वः, ओ३म् । वह मैं हूँ, यह त है । तू यह है ।
मैं वह हूँ । तू द्यौ है, मैं पृथ्वी हूँ । तू साम है, मैं ऋक् हूँ । हम
दोनों एक दूसरे को पुष्ट करें । हमको पुराने भयों से बचा
( जिनसे पुराने राजा पीड़ित हो चुके हैं ) । तू शरीर है, मेरे
शरीर की रक्षा कर ॥१॥
हे सैकड़ों औषधियो, जो तुम पर सोम राज करता है
तुम इस मेरी गद्दी पर मेरे लिये आनन्द दो ॥२॥
हे पृथ्वी पर विस्तृत ओषधियो, जिन तुम पर सोम राज
करता है आप मेरी इस गद्दी पर मुझे सुख दो ॥३॥
मैं इस राष्ट्र में शान्ति की स्थापना करता हूँ, इसके लिये मैं
दिव्य जलों की ओर देख रहा हूँ । ( पुरोहित के ) दाहिने पैर
को धोकर मैं राष्ट्र में इन्द्रिय (इन्द्र की शक्ति) को स्थापित करता
हूँ । बायें पैर को धोकर मैं उस इन्द्रिय की वृद्धि करता हूँ ॥४॥
हे देवो, मैं राज्य की रक्षा और अभय की प्राप्ति के लिये
( पुरोहित के ) पहले और दूसरे पगों को धोता हूँ । जिन जलों
से पग धोये गये हैं वह मेरे शत्रु को भस्म करें ॥५॥ (४)
२८—अब ब्रह्म-परिमर क्रिया कही जाती है । जो ब्रह्म-
परिमर क्रिया को जानता है उसके सब शत्रु और वैरी मर
जाते हैं । ब्रह्म है जो बहता है अर्थात् वायु । उसके चारों ओर
पांच देवता मरते हैं :—विद्युत् , वृष्टि, चंद्रमा, आदित्य, अग्नि ।
अब पानी नहीं बरसता तो विद्युत् विद्युत् में प्रविष्ट हो जाती
है और छिप जाती है । जब लोग शत्रु को न देखें तो राजा कहे,
“विद्युत के मरने से मेरे शत्रु भी मर जायँगे, और छिप जायँगे ।
वे कभी शत्रु को न देखें ।” वह शीघ्र ही मर जाता है और वे
उसको देख नहीं पाते ।
वृष्टि बरस कर चंद्रमा में प्रविष्ट हो जाती है और छिप
जाती है । जब वह मर जाती है और अन्तर्ध्यान हो जाती है

४९२ [ आठवीं पञ्चिका
तो वे उसे नहीं देखते । जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "वृष्टि
के मरने से मेरे शत्रु मर जावें और वे उसको फिर न देख
सकें।" वह फौरन मर जाता है और वे उसको नहीं देख
सकते ।
अमावस को चन्द्रमा आदित्य में प्रविष्ट होता है और छिप
जाता है। वे उसे देख नहीं सकते क्योंकि वह मर जाता है
और छिप जाता है। जब वे उसे न देखें तो राजा कहे, "चन्द्रमा
के मरते ही मेरे शत्रु मर जायें और अन्तर्धान हो जायँ । वे
उसको न देख सकें।" वे फौरन उस शत्रु को न देखेंगे क्योंकि
वह मर जायगा ।
आदित्य अस्त होकर अग्नि में प्रविष्ट होता है। और छिप
जाता है। वे उसको नहीं देख पाते क्योंकि वह मर जाता है
और अन्तर्धान हो जाता है। जब वह न दीखे और लोप हो
जाय तो राजा कहे, "सूर्य्य के मरने से मेरे शत्रु भी मर
जायें और लोप हो जायँ । लोग उसे कभी न देख सकें।"
वे फौरन ही उसको न देखेंगे क्योंकि वह मर जायगा ।
अग्नि बुझ कर वायु में प्रविष्ट होती हैं और अन्तर्धान हो
जाती है। वे जब उसको न देखें और वह मर जाय तो राजा
कहे, "अग्नि के बुझने से मेरे शत्रु भी मर जायँ और कोई
लोग उनको न देख सकें।" बस उसके शत्रु मर जायँगे और
कोई उसको न देख सकेगा ।
अब इन पांचों देवताओं का पुनर्जन्म होता है। वायु से
अग्नि का । क्योंकि प्राण रूप बल से मथने से ( रगड़ने ) से
अग्नि पैदा होती है। उसको देखकर राजा कहे, "अग्नि फिर
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु फिर उत्पन्न न हो । वह दूर भाग जाय ।"
वह दूर भाग जाता है।
अग्नि से आदित्य उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,

दसवाँ अध्याय ] ४९३
"आदित्य उत्पन्न हो। मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग
जाय।" वह दूर भाग जायगा।
आदित्य से चंद्रमा उत्पन्न होता है। उसको देखकर कहे,
"चंद्रमा उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग
जाय।" वह दूर भाग जायगा।
चन्द्रमा से वृष्टि होती है। उसको देखकर कहे, 'वृष्टि
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह
भाग जायगा।
वृष्टि से विद्युत् होता है। उसको देखकर कहे, "विद्युत्
उत्पन्न हो, मेरा शत्रु उत्पन्न न हो। वह दूर भाग जाय।" वह
दूर भाग जायगा। इसको ब्रह्म-परिमर कहते हैं।
इस ब्रह्म-परिमर को कुषारु के बेटे मैत्रेय ने कृषि के लड़के
राजा सत्वन् से जो भर्ग गोत्र का था कहा। उसके पांच शत्रु
राजा मर गये और वह बड़ा हो गया।
यह उसका व्रत है:-"शत्रु के पूर्व न बैठे। जब वह समझ
ले कि यह खड़ा हुआ है तब खड़ा हो। अपने शत्रु के लेटने के
पहले न लेटे। जब वह समझे कि बैठा है तब बैठे। वह कभी
सोवे नहीं जब तक कि शत्रु न सोवे। जब वह समझे कि
शत्रु जग पड़ा तो जग पड़े। ऐसा करने से अगर शत्रु अश्म-
मूर्धा भी हो अर्थात् उसका पत्थर का भी सिर हो तो भी जल्दी
ही वह चूर-चूर हो जायगा।"
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण की आठवीं पञ्चिका समाप्त हुई।
ऐतरेय ब्राह्मण सम्पूर्ण समाप्त हुआ।

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ऐतरेय में प्रयुक्त कुछ पारिभाषिक शब्द
और व्युत्पत्तियाँ
आग्नीध्र—अग्नि रखने का स्थान। अग्नि कुण्ड।
अतिजगती—१३-१३-१३-१३ के क्रम से ५२ अक्षरों का छन्द।
अध्रिगु—वह व्यक्ति जो पशु को शान्त (चुप) करता है (२।७)।
अनद्धा—जो देव, पितर, या मनुष्यों में से किसी को आहुति
न दे (७।६)।
अनीजान—वह व्यक्ति जिसने यज्ञ अभी नहीं किया।
अनुचर—शस्त्र का पिछला भाग।
अनुमति—अमावस्या का उत्तरार्ध।
अनुष्टुभ्—८-८-८-८ अक्षरों से बने ३२ अक्षर का छन्द।
अनुस्तरणी—वह गौ जो मृत यजमान को चिता पर रखने के बाद
दान दी जाय (३।३२)।
अन्तर्याम—देखो उपांशु।
अभ्यावर्त्ति—बारबार आने वाले षडह आदि दिन।
अवभृथ—यज्ञ की अन्तिम क्रिया (७।१७)।
अविह्रुतपाठ—जिसमें एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से न मिलें।
अव्यूह—छन्दों के क्रम टूट जाने को कहते हैं, जैसे प्रातरनुवाक में
( गा-श्र-त्रि-बृ-उ-ज-पं )
( ४९५ )

( ४९६ )
अश्व—व्युत्पत्ति (५।१) ।
अहीनसंतति—वह सोम यज्ञ जिसमें कई दिन लगें, और एक दिन
और दूसरे दिनों में सिलसिला जारी रहे (६।१७) ।
आगू—पुरोहित का कहना—होता यक्षत, या, होतर्यज (२।२८) ।
आग्रन्थन—सादी गाँठ देना (५।१५) ।
आज्य—देवों के लिए जो घी वह आज्य है । ( देखो घृत )
आयुत—पितरों के लिए घी । ( देखो घृत )
आरम्भणीय—संवत्सर के आरम्भ होने पर किया जाने वाला कृत्य
जिसे "चतुर्विंश" भी कहते हैं (४।१२) ।
आहाव—आहाव, निविद और सूक्त ये आज्यशस्त्र के तीन भाग हैं ।
होता द्वारा शंसावोम् कहा जाना आहाव है । अध्वर्यु होता के इस
कहने पर शस्त्र जो कहे, वह प्रतिगार (२।३३) ।
आहुति = आहूति—जिसके द्वारा यजमान यज्ञ को बुलावे (१।२) ।
इष्टि—देव जिसके द्वारा यज्ञ खोजने की इच्छा करें, उसे इष्टि कहते
हैं (१।२) ।
इदादधि—दही से किया जाने वाला ऋतु (३।४०) ।
ईजान—वह व्यक्ति जिसने पहले यज्ञ किया ।
उदयनीय इष्टि—यज्ञ की अन्तिम इष्टि ।
उपगाता-वे व्यक्ति जो सामगान करने वालों के साथ पढ़ते
हैं (७।१) ।
उपनयमनी—लकड़ी का बना दूध पीने का चमसा ।
उपवसथ—सोमयाग से एक दिन पूर्व पशुबंधन (३।४०) ।
उपसद्—(१) घेरा, मुहासिरा, (२) कृत्य विशेष ।
उपसर्ग—( आधिश्रय करना )—पाँच हैं—प्रेचन, प्रचेतय, आयाहि-
, पित्रमःस्व, ऋतुश्छन्द शृते वृहत्, सुम्न आधेहि । इसी प्रकार
अन्य भी (४।४) ।
उपस्तरण—यज्ञ में चमचे से घी डालना ।

( ४९७ )
उपांशु—उपांशु और अन्तर्याम दो घड़े होते हैं। इनके ऊपर जो
प्याले रक्खे होते हैं, उन्हें उपांशु ग्रह, और अन्तर्याम ग्रह
कहते हैं (२।२१)।
उष्णिक्—७-७-७-७ अक्षरों से बना २८ अक्षर का छन्द।
एकधन = एकधना—वह जल जो यज्ञ के दिन ही प्रातःकाल लाया
जाता है।
एकाह—एक दिन में पूर्ण होने वाला सोमयज्ञ।
किंशारू—चावल की भूसी (२।६) (चावल के अंग—किंशारू,
तुषा, कण और कसार)।
कुहू—अमावस्या का पूर्वार्ध।
खर—प्रवृञ्जन स्थान (यज्ञ पात्र रखने की चबूतरी) (१।२२)।
गायत्री—८-८-८ के क्रम से तीन पाद वाले २४ अक्षरों का छन्द।
गोष्ठ—जहाँ पशु शाम को बँधते हैं।
घृत—देवों का घी आज्य, मनुष्यों का घृत, पितरों का आयुत और
गर्भस्थ जीवों का घी नवनीत कहलाता है। पिघला घी आज्य,
जमा हुआ घृत, आधा पिघला हुआ आयुत और मक्खन नवनी
कहलाता है।
चरु या ओदन—उबला चावल, जिसमें दूध और घी भी मिला
होता है।
चितैध—चिता का ईंधन (४।१०)।
जगती—१२-१२-१२-१२ अक्षरों से बने ४८ अक्षरों का छन्द।
जातवेद—अग्नि (उत्पन्न हुये को पाया)—व्युत्पत्ति (३।३६)।
जुष्टि—रियायती आहुति (१।३०)।
ज्योतिष्टोम—सोमयाग का प्रथम विभाग है। इसकी चार संस्थाएँ-
अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी और अतिरात्र हैं।
तूष्णींशंस—चुपचाप जाप या प्रार्थना (२।३१)।
तृच्—तीन ऋचाओं से मिल कर बने।
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