ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पहला अध्याय ] १७१
और यजमान के लिये बड़ा कष्टदायक होगा । इसलिये निविद्
पढ़ते हुये दो पदों को मिलाना नहीं चाहिये ।
केवल दो पदों को मिलाना चाहिये 'प्रेदं ब्रह्म', प्रेदं क्षत्र' ।
ऐसा करने से ब्रह्म और क्षत्र को जोड़ता है । इससे ब्रह्म और
क्षत्र जुड़ जाते हैं ।
निविद् के लिये तीन मंत्रों से अधिक के सूक्त चुनें, क्योंकि
निविद् के पद सूक्त के भिन्न भिन्न मन्त्रों के अनुकूल होने
चाहिये । इसलिये निविद् के लिये तीन या चार मन्त्रों से अधिक
के सूक्त चुनने चाहिये । निविद् के द्वारा स्तोत्र बढ़ जाता है ।
तीसरे सवन में निविद् को एक मन्त्र शेष रहने पर कहे ।
अगर दो मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहेगा तो उत्पत्ति की शक्ति
को नष्ट कर देगा और गर्भो को बालक से शून्य कर देगा ।
इसलिये तीसरे सवन में एक मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहे ।
निविद् को सूक्त से आगे न जाने दे । जिस सूक्त से निविद्
आगे निकल जाय तो फिर उसको पीछे न लौटावे क्योंकि
उसका स्थान नष्ट हो गया । अब दूसरे देवता का और दूसरे
छन्द का एक सूक्त चुने और उसमें निविद् रक्खे ।
दूसरे निविद् सूक्त को पढ़ने से पहले ऋग्वेद मंडल १० का
५७वां सूक्त पढ़े :-
“मा प्रगाम पथो वयं” इत्यादि ।
“हम मार्ग से न भटकें” इत्यादि ।
क्योंकि जो यज्ञ में भूल जाता है वह मानों मार्ग से भटक
जाता है ।
“मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः” ( ऋ० १०।५७।१ का दूसरा पद )
पढ़ कर वह यजमान को यज्ञ में भूल करने से बचा लेता है ।
“मान्तः स्थुर्नो अरातयः” ( ऋ० १०।५७।१ का तीसरा पद )
पढ़ने से वह शत्रुओं को हराकर मार भगाता है ।
१७२ [ तीसरी पञ्चिका
“यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः। तमाहुतं निशीमहि”
इसमें 'तन्तु' का अर्थ है सन्तान । क्योंकि इसको पढ़कर
होता यजमान की सन्तान को फैलाता है (संतनोति) ।
(ऋ० १०।५७।३)
“मनो न्वाहुवामहे नाराशंसेन सोमेन” । (ऋ० १०।५७।३)
यह मन्त्र पढ़ता है क्योंकि मन से ही यज्ञ ताना जाता है ।
मन से ही किया जाता है। यही उसका (निविद् के सूक्त से
आगे निकल जाने में जो भूल हुई उसका) प्रायश्चित्त है। (११)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त
दूसरा अध्याय
१२—कहते हैं कि देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना होनी
चाहिये । एक छन्द को दूसरे छन्द में रखना चाहिये । प्रातः
सवन में होता तीन अक्षर का 'शोंसावोम्' कहता है और अध्वर्यु
पांच अक्षर का “'शंसामोदैवोम्” कहता है । इस प्रकार आठ
अक्षर हो जाते हैं। आठ अक्षर की गायत्री होती है। इस प्रकार
प्रातः सवन में पहले इसको गायत्री बना देते हैं। प्रातः सवन
के अन्त में होता चार अक्षरों का “उक्थं वाचि" कहता है । इस
पर अध्वर्यु चार अक्षरों का "ओमुक्थशः" कहता है । इस
प्रकार प्रातः सवन के आरंभ और अन्त में गायत्री की कल्पना
हो जाती है ।
दोपहर के सवन में होता छः अक्षरों का "अध्वर्योशोंसावोम्”
कहता है । इस पर अध्वर्यु पांच अक्षरों का 'शंसामोदैवोम्'
कहता है । इस प्रकार ग्यारह अक्षर हो जाते हैं । ग्यारह अक्षरं
का त्रिष्टुभ् होता है । इस प्रकार दोपहर के सवन के पहले
त्रिष्टुभू की कल्पना हो जाती है। सवन के अन्त में होता सात
अक्षरों का "उक्थं वाचि इन्द्राय" कहता है । अध्वर्यु चार
( १७३ )
१७४ [ तीसरी पञ्चिका
अक्षरों का “ओ३मुक्थाशाः” कहता है। यह ग्यारह अक्षर हो
जाते हैं। ग्यारह अक्षरों का त्रिष्टुभ् होता है। इस प्रकार दोपहर
के सवन के आरंभ और अन्त में त्रिष्टुभ् की कल्पना हो
जाती है।
तीसरे सवन के आरंभ में होता सात अक्षर का “अध्वर्योशो
शोंसावोम्” कहता है। अध्वर्यु पांच अक्षर का “शंसामो
दैवोम्” कहता है। यह बारह अक्षर हो जाते हैं। बारह अक्षर
की जगती होती है। इस प्रकार तृतीय सवन के आदि में जगती
छन्द की कल्पना हो जाती है। तृतीय सवन के अन्त में होता
ग्यारह अक्षर का “उक्थं वाचि इन्द्राय देवेभ्यः”, अध्वर्यु एक
अक्षर का ‘ओम्’ कहता है। इस प्रकार बारह अक्षर हो जाते
हैं। बारह अक्षरों की जगती होती है। इस प्रकार तीसरे
सवन के आरंभ और अन्त दोनों में जगती की कल्पना की
जाती है।
ऋषि ने इसको देखा और कहा :—
यद् गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभाद्वा त्रैष्टुभं निरतक्षत। यद् वा
जगज् जगत्याहितं पदं य इत्तद् विदुस्ते अमृतत्वमानशुः॥
(ऋ० १।१६४।२३)
“जो गायत्री को गायत्री पर, रखना जानते हैं, जिनको
ज्ञान है कि त्रिष्टुभ् से त्रिष्टुभ् निकलता है और जगती जगती
में रक्खा जाता है वह अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।”
इस प्रकार जो इस रहस्य को समझता है वह छन्द में
छन्द को रखता है और देवताओं के लिये वैश्यों की कल्पना
करता है। (१)
१३—प्रजापति ने देवों के लिये यज्ञ और छन्दों के भाग
अलग अलग कर दिये। उसने प्रातः सवन में अग्नि और
वसुओं के लिये गायत्री छन्द दिया। दोपहर के सवन में इन्द्र
दूसरा अध्याय ] १७५
और रुद्रों के लिये त्रिष्टुभ् को, विश्वेदेवों और आदित्यों के
लिये तीसरे सवन में जगती को दिया ।
उसका अपना छन्द अनुष्टुभ् था । उसको उसने अन्तिम
मंत्र में जो 'अच्छावाक' का मंत्र है कर दिया । इस पर अनुष्टुभ्
ने कहा, "तू देवों में बड़ा पापी है कि तूने अपने ही मुझ
अनुष्टुभ् छन्द को अन्त की अच्छावाकीय ऋचा में ढकेल
दिया। उसने भूल स्वीकार कर ली और उसने अपना सोम यज्ञ
लिया और अनुष्टुभ् को उस के पहले ही अर्थात् मुख पर ही
रख दिया । इसलिये सब सवनों में पहले अनुष्टुभ् रखा जाता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह पहला और मुख्य हो
जाता है और श्रेष्ठता को प्राप्त होता है ।
प्रजापति ने अपने ही सोमयाग में ऐसा किया । इसलिये
ऐसा करने से यजमान यज्ञ का स्वामी हो जाता है और यज्ञ
ठीक हो जाता है। जब कभी यजमान इस प्रकार यज्ञ का स्वामी
होकर यज्ञ करता है वह यज्ञ जनता के लिये होता है। (२)
१४—अग्नि देवताओं का होता था । मृत्यु उसके लिये
बहिष्पवमान स्तोत्र में बैठा छिपा रहा । अनुष्टुभ् छन्द में
आज्य शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु को जीता। मृत्यु आज्य
में छिप रहा । प्र-उग शस्त्र का आरंभ करके उसने मृत्यु को
परास्त किया ।
दोपहर के सवन में वह मृत्यु (अग्नि के लिये) पवमान में
बैठा रहा । उसने अनुष्टुभ् के साथ मरुत्वतीय शस्त्र आरंभ करके
मृत्यु को जीता। वह उस दोपहर के सवन में बृहती छन्दों में
न बैठ सका। क्योंकि बृहती प्राण हैं। इस प्रकार मृत्यु प्राणों
को न ले सका। इसीलिये होता दोपहर के सवन में बृहती छन्द
में स्तोत्रिय के द्वारा कहता है । बृहती प्राण हैं ऐसा करने का
प्रयोजन ही प्राणों की रक्षा है ।
१७६ [ तीसरी पञ्चिका
तीसरे सवन में मृत्यु अग्नि के लिये पवमान स्तोत्र में छिपा
रहा। अनुष्टुभ् के साथ वैश्वदेव शस्त्र आरंभ करके उसने मृत्यु
को जीता। मृत्यु यज्ञायज्ञीय में जा छिपा। वैश्वानरीय अग्नि-
मारुत सूक्त का आरंभ करके उसने मृत्यु को जीतां। वैश्वानरीय
सूक्त वज्र है। यज्ञायज्ञीय साम प्रतिष्ठा है। वैश्वानरीय सूक्त
को पँढ़ कर वह मृत्यु को अपने स्थान से निकाल देता है। मृत्यु
के सब पाशों और सब गदाओं ( स्थाणून् ) को पार
करके अग्नि छूट आया। जो होता इस रहस्य को समझता
है वह सब झंझटों से छूट जाता है और पूरी आयु प्राप्त
करता है। (३)
१५—इन्द्र ने वृत्र को मार कर यह सोचा कि शायद मैं
इसको न हरा सका, और दूर-दूर तक फिरता रहा। यहाँ तक
कि वह बहुत दूर देश में पहुँचा।
यह सब से दूर जगह अनुष्टुभ् है। वाणी ही अनुष्टुभ्
है। वह (इन्द्र) वाणी में प्रवेश करके वहीं पड़ा रहा। सब
प्राणी अलग अलग होकर उसको तलाश करते रहे। पितरों ने
उसको एक दिन पहले ढूँढ़ लिया और देवों ने एक दिन पीछे।
इसीलिये पितरों के लिये कृत्य एक दिन पहले किया जाता है
और देवों के लिये एक दिन पीछे।
उन्होंने कहा, "हम सोम निचोड़ें। इन्द्र हमारे पास शीघ्र
ही आयेगा"। उन्होंने कहा "अच्छा", और सोम निचोड़ा।
और नीचे का मंत्र पढ़कर उसको सोम के पास लाये :—
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि। तुविकूर्मिमृतीषहमन्द्र
शविष्ठ सत्वते ॥ (ऋ० ८।६८।१)
नीचे के मंत्र से इन्द्र 'सुत' शब्द के द्वारा देवताओं पर
प्रकट हुआ :—
दूसरा अध्याय ] १७५
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते ॥
( ऋ० ८।२।१ )
नीचे के मन्त्र से उन्होंने उसे यज्ञ के मध्य में बिठायाः—
इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शन्तम शन्तमाभिर-
भिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥ ( ऋ० ८।५३।५ )
जो इस रहस्य को समझता है अपने यज्ञ को इन्द्र के सामने
करता है और इन्द्र के कारण उसका यज्ञ सफल हो जाता है । (४)
१६—जब इन्द्र ने वृत्र को मारा तो सब देवताओं ने जाना
कि वह मार न सका और वह भाग गये । केवल मरुत् जो
उसी के सम्बन्धी हैं न भागे । ऊपर के मंत्र में जो “स्वापयः”
“मरुतों” का वर्णन है वह प्राण हैं । प्राणों ने इन्द्र को न छोड़ा ।
इसलिये 'स्वापि' युक्त प्रगाथ बोला जाता है । अर्थात् “आस्वापे
स्वापिभिः” । जब इस प्रगाथ के बाद इन्द्र के लिये मंत्र पढ़ा
जाता है तो इसी को “मरुत्वतीय शस्त्र” कहते हैं । यदि 'स्वापि
युक्त' यह प्रगाथ बोला जाता है तो “मरुत्वतीय शस्त्र ही बन
जाता है” । (५)
१७—अब ब्रह्मणस्पति के प्रगाथ को बोलता है । ब्रह्मणस्पति
को पुरोहित बनाकर देवों ने स्वर्ग को जीता और इस लोक को
भी । इस लिये यजमान भी बृहस्पति को पुरोहित बनाकर स्वर्ग
लोक को जीत लेता है और इस लोक को भी ।
यह दोनों प्रगाथ स्तुति-शून्य होते हैं । उनको दुहरा कर
पढ़ा जाता है ( चौथे पाद को तीन-तीन बार पढ़ने से दो मंत्रों
के तीन मंत्र या तृच् हो जाते हैं ) ।
यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब अन्य कोई मन्त्र स्तुति-
शून्य होते हुये दुहराये नहीं जाते तो यह दोनों प्रगाथ स्तुति-
शून्य होते हुये क्यों दुहराये जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि
जो मरुत्वतीय शस्त्र है, वह पवमान उक्थ वाला है । यह स्तोत्र
१२
१७८ [ तीसरी पञ्चिका
के छः मंत्रों, बृहती के छः मंत्रों और त्रिष्टुभ् के तीन मंत्रों में
गाया जाता है। इस प्रकार दोपहर के सवन के पवमान स्तोत्र
में तीन छन्द और पंद्रह मंत्र होते हैं। यहां प्रश्न यह है कि
यह तीन छन्दों वाला और पंद्रह मन्त्रों वाला दोपहर के सवन
का पवमान अनुशस्त कैसे होता है ! इसका उत्तर यह है कि
प्रतिपद् तृच् ( ऋ० ८।६८।१-३ ) की अन्तिम दो ऋचायें गायत्री
छन्द में हैं ( पहली ऋचा अनुष्टुभ् में है ) और प्रतिपद् के
पीछे के मंत्र भी गायत्री छन्द में हैं। इस प्रकार पवमान स्तोत्र
के गायत्री मंत्र अनुशस्त हो जाते हैं। इन दोनों प्रगाथों द्वारा
बृहती अनुशस्त होती हैं।
इन बृहती मंत्रों को सामगान करने वाले रौरव और यौधा-
जय स्वरों में तीन बार दोहरा कर पढ़ते हैं। इसलिये ये दो
प्रगाथ स्तुति-शून्य होकर भी दोहरा कर पढ़े जाते हैं। इस
प्रकार शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है।
दो धाय्य त्रिष्टुभ् में हैं और निविद् का सूक्त भी। इन
मंत्रों से त्रिष्टुभ् अनुशस्त होते हैं। इस प्रकार जो इस रहस्य
को समझता है उसके लिये तीन छंद और पंद्रह मंत्रों वाले
पवमान अनुशस्त होते हैं। (६)
१८—वह धाय्यों को पढ़ता है। प्रजापति ने धाय्यों के द्वारा
इन लोकों में जिस जिस चीज़ की कामना की उसका पान किया
( अधयत् ) । इसी प्रकार जो यजमान इस रहस्य को समझता
है वह इन धाय्यों के द्वारा जिस जिस कामना को करता है
उसका इन लोकों में पान करता है ( धयति ) ( धय से धाय्य
बना है ) ।
धाय्य क्या हैं ? जहाँ जहाँ देवों ने यज्ञ में छिद्र पाये वहां
उनको धाय्यों से छिपा दिया। इस लिये उनको धाय्य कहते
पांचवाँ अध्याय ] १७९
हैं ( 'धा' रखना से )। जो इस रहस्य को समझता है उसका
यज्ञ बिना छिद्र या त्रुटि के पूरा हो जाता है।
जिस प्रकार कपड़े को सुई से सीते हैं इसी प्रकार यज्ञ (के
फटे हुये भाग) को धाय्यों से सीते हैं। इसीलिए इनको धाय्य
कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उस यज्ञ (का फटा
भाग) इन धाय्यों द्वारा सिल जाता है।
यह जो धाय्य हैं वे उपसदों के उक्थ हैं।
नीचे का अग्नि का मन्त्र पहले उपसद् का उक्थ है :—
अग्निनेंता भग इव क्षितीनां दैवीनां देव ऋतुपा ऋतावा। स
वृत्रहा सनयो विश्ववेदाः पर्षद्विश्वाति दुरिता गृणन्तम् ॥
( ऋ० ३।२०।४ )
नीचे का सोम का मंत्र दूसरे उपसद् का उक्थ है :—
त्वं सोम ऋतुभिः सुक्रतुर्भूस्त्वं दक्षैः सुदक्षो विश्ववेदाः। त्वं वृषा
वृषत्वेभिर्महित्वा द्युम्नेभिर्द्युम्न्यभवो नृचक्षाः॥ ( ऋ० १।६१।२ )
नीचे का विष्णु का मंत्र तीसरे उपसद् का उक्थ है :—
पिन्वन्त्यपो मरुतः सुदानवः पयोघृतवद् विदथेष्वारुवः। अत्यं न
मिहे वि नयन्ति वाजिनमुत्सं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितम् ॥
( ऋ० १।६४।६ )
सोम यज्ञ के द्वारा जिस किसी लोक की कामना करके उसे
जीतता है वह जो इस रहस्य को समझता है धाय्यों को पढ़कर
इन उपसदों द्वारा विजय पाता है।
कुछ लोगों का कहना है कि ( "मिन्वन्त्यपो" इत्यादि के
स्थान में ) नीचे का मंत्र पढ़ना चाहिये :—
तान् वो महो मरुत एव यान् वो विष्णोरेषस्य प्रभृथे हवामहे।
हिरण्यवर्णान् ककुहान् यतस्रुचो ब्रह्मयन्तः शंस्यं राध ईमहे ॥
( ऋ० २।३४।११ )
१८० [ तीसरी पञ्चिका
उनका कहना है कि हमने भरतों को इस प्रकार पढ़ते सुना
है। लेकिन यह बात माननीय नहीं है। यदि होता इसको पढ़ेगा
तो मेघ को रोक देगा। क्योंकि पर्जन्य वृष्टि का स्वामी है।
अगर “पिन्वन्त्यपो” पढ़ेगा तो मेघ अवश्य बरसेगा क्योंकि
इस मंत्र में “अत्यं न मिहे” पद में मेघ की ओर संकेत है और
पहले पद में मरुतों की ओर। 'विनियन्ति' विष्णु के लिये है इसका
अर्थ है 'विक्रांत'। 'विक्रांत' वाला विष्णु है (जो तीन पग चला)।
'वाजिन' इन्द्र के लिये है। इसमें चार पद हैं, एक वर्षा के लिये,
दूसरा मरुतों के लिये तीसरा विष्णु के लिये और चौथा इन्द्र के
लिये। यद्यपि यह तीसरे सवन की है लेकिन दोपहर के सवन
में पढ़ी जाती है। इसीलिये भरतों के पशु जो शाम को गोष्ठ
में होते हैं दोपहर को संगविनी (दोपहर को धूप से बचने के
स्थान) में आ जाते हैं। 'पिन्वन्त्यपो" यह जगती छन्द है।
पशु भी जगती है। यजमान का आत्मा दोपहर है। इस प्रकार
यजमान में पशुओं को धारण कराता है। (७)
१९-वह मरुत्वतीय प्रगाथ को पढ़ता है।
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत। वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्व-
ज्रेण शतपर्वणा ॥ (ऋ० ८।८६।३)
मरुत पशु हैं। पशु ही प्रगाथ हैं। अर्थात् प्रगाथ पशुओं की
प्राप्ति के लिये हैं।
वह नीचे का सूक्त पढ़ता है:--
“जनिष्ठा उग्रः सहसे तुराय"...इत्यादि (ऋ० १०।७३।१-११)
यह यजमान के जन्म के लिये हैं। इससे वह देवयोनि अर्थात्
यज्ञ से यजमान को पैदा करता है। इससे विजय होती है।
इससे यजमान जीत जाता है। अन्यथा पराजित रहता है।
इस सूक्त का ऋषि “गौरिवीति” है। इस शक्ति के पुत्र
गौरिवीति ने स्वर्ग लोक के पास इस सूक्त का दर्शन किया
दूसरा अध्याय ] १८१
और इससे स्वर्ग को पाया। इस लिये यजमान भी इसके द्वारा
स्वर्ग लोक को पाता है।
इस सूक्त के आधे मंत्रों को पढ़कर आधों को छोड़ देता
है और उनके बीच में निविद् रखता है। यह निविद् स्वर्ग को
चढ़ने के लिये है। यह निविद् स्वर्ग की सीढ़ी है। इसको ठहर-
ठहर कर पढ़ना चाहिये जैसे सीढ़ी पर ठहर-ठहर कर चढ़ते
हैं। इस प्रकार जो यजमान उसका प्रिय हो उसको वह स्वर्ग-
लोक को साथ ले चलता है। जो स्वर्ग की कामना करे वह इसको
साथ लेकर चले।
अगर होता यजमान को हानि पहुँचाना चाहे और सोचे
कि क्षत्रिय से वैश्य का हनन करा दूँ तो वह सूक्त में (पहले,
मध्य में और अन्त में) तीन बार निविद् कहे। क्योंकि निविद्
क्षत्रिय है और सूक्त वैश्य। इस प्रकार वह जिसको चाहे उसके
वैश्यों को क्षत्रियों द्वारा मरवा दे। इस प्रकार वह क्षत्रिय के द्वारा
वैश्यों को मरवाता है।
अगर वह चाहे कि वैश्य द्वारा क्षत्रिय मारा जाय तो सूक्त
में निविद् के तीन वार टुकड़े कर दें। निविद् क्षत्रिय है। सूक्त
वैश्य है। इस प्रकार जिसको चाहे उस क्षत्रिय को वैश्य द्वारा
मरवा दे।
अगर वह चाहे कि यजमान को दोनों ओर से वैश्यों या
सम्बन्धियों से अलग कर दूँ तो निविद् के "शंसावोम्" द्वारा
दो टुकड़े कर दे। इस प्रकार वह यजमान को उसके वैश्यों
(सम्बन्धियों) से दोनों ओर अलग कर देगा (अर्थात् पूर्वजों
और सन्तान दोनों) से। ऐसा वह करे जिसकी कामना दुष्ट
हो। स्वर्ग की कामना वाला ठीक ठीक रीति से करे।
वह इस मन्त्र से समाप्त करता है :-
१८२ [ तीसरी पञ्चिका
वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयोनाधमानाः । अप
ध्वान्तमूर्णु हि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान् ॥
( ऋ० १०।७३।११ )
प्रिय विचार वाले ऋषि लोग सुन्दर परों वाले पक्षियों के
समान इन्द्र के पास गये । और प्रार्थना की कि जो अन्धकार में
छिपा है उसे खोल दे । आँख को ( प्रकाश से ) भर दे । और
रस्सी से बँधे हुये जैसे हमको मुक्त कर दे ।”
जब कहे "अप ध्वान्तमूर्णु हि" ( अँधेरे से हटा ) उस समय
मन में विचार करे कि अँधेरे से हट रहा हूँ । इस प्रकार वह
अँधेरे से हट जायगा । जब कहे “पूर्धि चक्षुः” (आँख को प्रकाश
से भर दे ) तो दोनों आँखें मले । जो इस रहस्य को समझता
है उसकी आँखें बुढापे तक ठीक रहती हैं । "मुमुग्ध्यस्मान्
निधयेव बद्धान्” में निधि का अर्थ है पाश या रस्सी । रस्सी से
बँधे हुओं के समान । (८)
२०—इन्द्र जब वृत्र को मारने लगा तो उसने सब देवताओं
से कहा, "मेरे पास रहो । मेरी मदद करो ।” उन्होंने ऐसा ही
किया । वे उसे मारने को दौड़े । उसने समझा कि यह मुझे
मारने आते हैं । उसने सोचा, "मैं इनको डरा दूँ ।” उसने उनकी
ओर फुसकार मार दी । वह फुसकार से डर कर भाग गये ।
मरुतों ने उस ( इन्द्र ) को न छोड़ा । उन्होंने उससे कहा,
“भगवन् मारो ! मारो !! अपने वीर्य का परिचय दो ।” एक
ऋषि ने इसको देखा और इस मंत्र को पढ़ा :—
"वृत्रस्य त्वा श्वसथादीषमाणा विश्वेदेवा अजहुर्ये सखायः ।
मरुद्भिरिन्द्र सख्यं ते अस्त्वथेमा विश्वाः पृतना जयासि ।”
( ऋ० ८।६६।७ )
“वृत्र के फुसकार मारने पर सब देवते जो तेरे साथ थे और
दूसरा अध्याय ] १८३
तेरे मित्र थे भाग गये । हे इन्द्र, अगर तुझे मरुतों की दोस्ती
मिल जाय तो तू इन सब युद्धों में जीत जाये ।”
इन्द्र ने सोचा, “सचमुच मरुत् मेरे सचिव हैं। ये मुझे प्यार
करते हैं। मैं इनको अपने उक्थ में साझी बना लूं ।” उसने
उनको इस उक्थ में साझी बनाया । पहले निष्केवल्य उक्थ में
इन्द्र और मरुत दोनों साझी थे। अब मरुतों के लिये मरुत्वतीय
शस्त्र अलग बना दिया गया । मरुतों का भाग यह है कि अध्वर्यु
मरुत्वतीय ग्रह को ले, होता मरुत्वतीय प्रगाथ, मरुत्वतीय सूक्त
और मरुत्वतीय निविद् को पढ़े । मरुत्वतीय शस्त्र को पढ़ कर
मरुत्वती याज्य को पढ़े। इस प्रकार इन मरुतों की भक्ति करता
है। और देवतों को उनके भागों के अनुकूल प्रसन्न करता है।
मरुत्वतीय याज्य यह है :—
“ये त्वा हि हत्ये मघवन्नवर्धन् ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ ।
ये त्वा नूतमनुमदन्ति विप्राः पिवेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः”
( ऋ० ३।४७।४ )
“हे मघवन्, जिन मरुतों ने तुझे अहि ( वृत्र ) के मारने में
सहायता दी; हे हरि अर्थात् घोड़ों वाले इन्द्र, जिन मरुतों ने
तुझे शम्बर के युद्ध में सहायता दी, और जो विप्र तुझे अब
प्रसन्न करते हैं उन मरुतों के साथ गणयुक्त होकर तू सोम पी ।”
जिस जिस युद्ध में इन्द्र ने विजय पाई और अपने वीर्य का
परिचय दिया वहीं वहीं उसने मरुतों को अपना साथी बताया
और उनके साथ सोमपान किया । (९)
२१—जब इन्द्र ने वृत्र को मार डाला और सब युद्धों को
जीत लिया तो वह प्रजापति के पास गया और बोला, “मैं तुझ
जैसा होना चाहता हूँ। मैं बड़ा होना चाहता हूँ ।” प्रजापति ने
कहा, “कः अहम्, मैं कौन हूँ ?” इन्द्र ने कहा, “वही है जो तूने
कहा ( प्रजापति ने कहा “कः”, इन्द्र ने कहा तू “कः” है) ।
१८४ [ तीसरी पञ्चिका
तभी से प्रजापति का ‘कः’ नाम हो गया। प्रजापति “कः” है।
इन्द्र का नाम महेन्द्र है क्योंकि वह बड़ा हो गया।
इन्द्र ने महान् होकर देवतों से कहा, “मेरा स्वागत करो,
ऐसा जैसा वह लोग चाहते हैं, जो वैभवशील हैं या जो महान्
हो जाते हैं”। उन्होंने कहा, “तुम्हीं बताओ कि किस प्रकार
किया जाय अर्थात् तुम क्या चाहते हो?” उसने कहा, सोम
का माहेन्द्र ग्रह दो, सबनों में दोपहर का सबन दो। उक्थों में
निष्केवल्य दो, छन्दों में त्रिष्टुभू दो। सामों में पृष्ठ दो”।
( सामवेद के दो तृच् मिलकर पृष्ठ होते हैं)। उन्होंने यह सब
दे दिये। जो इस रहस्य को समझता है उसको भी देवते यही
देते हैं। देवों ने उससे कहा, “तुमने सब कुछ ले लिया। कुछ
हमको भी दो”। उसने कहा, “नहीं, तुमको क्यों दें?” देवों ने
कहा, “हे मघवन् हमको भी दो”। उसने उनकी ओर आँख
मार दी (देखा)। (१०)
२२—देव बोले, “इंद्र की प्रासहा नाम की वावाता स्त्री
बहुत प्यारी है, उसी से पूछें।” (राजा की बड़ी स्त्री महिषी
कहलाती है। उससे निचली वावाता। उससे निचली परिवृक्ति)।
उन्होंने उससे पूछा। उसने कहा, “कल सबेरे बताऊँगी”।
क्योंकि स्त्रियां जो पतियों से पूछना होता है रात को पूछती
हैं। प्रातःकाल को देव उसके पास गये। उसने इनसे नीचे का
मंत्र पढ़ा :—
यद्वांवान पुरुतमं पुराषालावृत्रहेन्द्रो नामान्यप्राः । अचेति प्रास-
हस्पतिस्तुविष्मान्यदीमुशमसि कर्तवे करत्तत् ॥ (ऋ० १०।७४।६)
“अपने यश से संसार को भरने वाले, युद्धों में जीतने वाले,
वृत्र को मारने वाले इन्द्र ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसके
द्वारा वह प्रासह का पति और बलवान हुआ उसीसे हम इच्छा
दूसरा अध्याय ] १८५
करते हैं। वह हमारी याचना को पूरी करे" । ( 'प्रासहस्पति'
का अर्थ है 'प्रासहा' का पति और शक्ति का पति ) ।
"यदीमुशमसि कर्तवे करत् तत्" का अर्थ है कि जो कुछ हम
कहेंगे वह करेगा।
ऐसा उसने कहा। देवों ने कहा, "इसमें उस रानी को भी
भाग दो जिसे अब तक कोई भाग नहीं मिला"। उन्होंने ऐसा
ही किया और एक भाग दिया। इस लिये ऊपर की ऋचा
निष्केवल्य शस्त्र का भाग है।
प्रासहा नाम की इन्द्र की वावाता प्यारी रानी सेना है।
'कः' नाम प्रजापति उस (स्त्री) का ससुर है। इसलिये यदि कोई
चाहे कि उसकी सेना विजयी हो जाय तो युद्ध की सीमा के
पार जाकर एक कुश ले और दोनों सिरे तोड़ कर शत्रु की ओर
फेंक दे और यह कहे "प्रासहे कस्त्वा पश्यति" ( हे प्रासहा,
तुझे कौन देखता है या तुझे प्रजापति देखता है। जो इस रहस्य
को समझता है वह यदि अपनी सेना को जिताना चाहे तो एक
तृण लेकर दोनों सिरे तोड़कर शत्रु पर फेंक दे और कहे "प्रासहे
कस्त्वा पश्यति"। तो वह सेना छिन्न भिन्न हो जायगी जैसे
ससुर के सामने आते ही पुत्र-वधू शरमा जाती है।
इन्द्र ने उन देवों से कहा, "इस शस्त्र में आपको भी भाग
मिलेगा'। देवों ने कहा "निष्केवल्यशस्त्र में विराट् छंद में आज्य
शस्त्र हमारा भाग हो"। विराट् में तैंतीस अक्षर होते हैं। देव
भी तैंतीस होते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजा-
पति और वषट्कार। देवता अक्षर अक्षर बाँट लेते हैं और
अक्षर अक्षर करके देवपात्र से पीते और संतुष्ट होते हैं।
यदि कोई होता चाहे कि यजमान को घर से वंचित कर दे
तो विराट् छंद में आज्य न पढ़े, किसी और छंद अर्थात् गायत्री
१८६ [ तीसरी पञ्चिका
या त्रिष्टुभ् में पढ़े। और यजमान घर आदि से वंचित रह
जायगा।
यदि होता यजमान को घर से मुक्त करना चाहे तो विराट्
छन्द के नीचे के मंत्र से याज्य पढ़े और उसे अवश्य घर की
प्राप्ति हो जायगी :—
पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्य्यश्वाद्रिः। सोतुर्बाहुभ्यां
सुयतो नार्वा ॥ (११) ( ऋ० ७।२२।१ )
२३—पहले ऋक् और साम अलग अलग थे। 'सा' ऋक्
था “अमः” साम था। 'सा' जो ऋक् थी उसने 'अमः' नाम के
साम से कहा “हम दोनों एक दूसरे के साथ प्रसंग करें कि
सन्तान हो जाय।” साम ने कहा, “नहीं, मेरी महिमा बड़ी है।”
तब ऋक् दो हो गईं और उन्होंने साम से वही बात कही।
उसने नहीं माना। तब ऋक् तीन हो गईं। तीनों वही बोलीं।
इस प्रकार साम तीनों ऋचाओं से मिल गया। इसलिये तीन
ऋचाओं को पढ़ते हैं, और तीन ऋचाओं से आरंभ करते हैं।
इसीलिये एक आदमी के कई स्त्रियां होती हैं और एक स्त्री के
कई पति नहीं होते। 'सा' और 'अमः' से मिलकर साम बन
गया। जो इस रहस्य को समझता है वह सामन या न्यायवाला
हो जाता है। जो बड़े पद को प्राप्त होता है उसे साम कहते हैं
और जो न्याय-शून्य होता है उसे असामन्य कहते हैं। यह निंदा
वाचक है।
वे दोनों अर्थात् साम और ऋक् पाँच पाँच भाग करके
बनाये गये। (१) आहव और हिंकार, (२) प्रस्ताव और पहली
ऋचा, (३) उद्गीथ और दूसरी ऋचा, (४) प्रतिहार और
तीसरी ऋचा (५) निधन और वषट्कार। यह हुये पांच भाग।
इसीलिये कहते हैं कि यज्ञ पांच भाग वाला है। पशु पांच भाग
वाले हैं (४ पैर और एक मुँह)।
दूसरा अध्याय ] १८७
ऋक् और साम दोनों में पांच पांच भाग हैं। यह विराट्
के अन्तर्गत हैं) क्योंकि विराट् के दश भाग होते हैं। इसलिये
कहते हैं कि यज्ञ दस भाग वाले विराट् में स्थापित है। स्तोत्रिय
आत्मा है। अनुरूप प्रजा है, धय्या पत्नी है। पशु प्रगाथ हैं।
और सूक्त घर हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह इस लोक
और परलोक दोनों में प्रजा और पशुओं के साथ अपने घरों में
रहता है। (१२)
२४—वह स्तोत्रिय को कहता है। स्तोत्रिय आत्मा है। वह
मध्यम आवाज से कहता है। इससे वह अपने लिये आत्मा को
बना लेता है।
वह अनुरूप को कहता है। अनुरूप प्रजा है। उसको उच्च
स्वर से पढ़ना चाहिये। उससे वह अपनी सन्तान को अपनी
अपेक्षा अधिक सुखी बनाता है।
वह धाय्या को पढ़ता है। धाय्या स्त्री है। धाय्या को बहुत
नीचे स्वर से पढ़ना चाहिये। जो उस रहस्य को समझकर धाय्या
को बहुत नीचे स्वर से पढ़ता है उसकी स्त्री घर में उससे अप्रिय
नहीं बोलती।
वह प्रगाथ को बोलता है। इसको स्वर सहित पढ़ना
चाहिये। पशु ही स्वर हैं। पशु ही प्रगाथ हैं। वह पशुओं की
प्राप्ति के लिये है।
अब वह इस सूक्त को पढ़ता है :—
इन्द्रस्य नु वीर्याणि—इत्यादि (ऋ० १।३२।१-१५)
यह निष्केवल्य शस्त्र का सूक्त इन्द्र को प्रिय है। इसका
ऋषि हिरण्यस्तूप है। इस सूक्त से आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ने
इन्द्र को प्रसन्न किया और परम धाम को पाया जो इस रहस्य
को समझता है वह इन्द्र को प्रसन्न करता और परमधाम को
प्राप्त होता है।
१८८ [ तीसरी पञ्चिका
गृह ही प्रतिष्ठा हैं। यह सूक्त प्रतिष्ठा है इसलिये बड़ी प्रतिष्ठा-
युक्त वाणी से सूक्त को पढ़ना चाहिये। यदि किसी के पशु दूर-
दूर चर रहे हों तो वह उनको घर लाना चाहता है। घर ही
पशुओं की प्रतिष्ठा अर्थात् ठहराने की जगह है। (१३)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ
तीसरा अध्याय
२५—सोम राजा दूसरे लोक में था। देवों और ऋषियों
दोनों ने सोचा कि सोम राजा कैसे हम तक आवे। उन्होंने कहा,
"छन्दो, तुम सोम राजा को हम तक लाओ।" वह मान गये
और सुपर्ण ( पक्षी ) बन कर उड़े। चूंकि वह सुपर्ण बन कर
उड़े इसलिये इस घटना को आख्यान के जानने वाले सौपर्ण-
आख्यान कहते हैं। जो छन्द सोम राजा को लेने उड़े थे वह चार
अक्षर के थे। क्योंकि तब चार अक्षर के ही छन्द थे। जगती
अपने चार अक्षरों से सबसे पहले उठी। वह आधी दूर उड़कर
ही थक गई, उसके तीन अक्षर जाते रहे। वह एक अक्षर की
रह गई तब उसने ( स्वर्ग से ) दीक्षा और तप लिये और इस
लोक को लौट आई। जिसके पशु होते हैं वह दीक्षा और तप
वाला होता है। पशु जगती के हैं। जगती उनको अपने साथ
लाई थी।
अब त्रिष्टुभ् उड़ा। वह आधी से अधिक दूर जाकर थक
गया और उसका एक अक्षर जाता रहा। उसके तीन अक्षर रह
गये। और ( स्वर्ग से ) दक्षिणा को लेकर लौट आया। इसलिये
( १८९ )
१९० [ तीसरी पञ्चिका
दक्षिणा दोपहर के सवन में होती हैं जो त्रिष्टुभ् का सदन है।
क्योंकि त्रिष्टुभ् ही तो उसे लाई थी। (१)
२५—तब देवों ने कहा, "गायत्री, तू इस सोम राजा को
ला।" उसने कहा, "अच्छा, लेकिन तुम सब मेरे जाने और
लौट आने के लिये स्वस्ति बोलते रहना।" उन्होंने कहा,
"अच्छा"। वह उड़ी और ये सब "प्र च च" स्वस्ति कहते रहे।
इसलिये यदि कोई अपना प्यारा यात्रा करने जाये तो उसके
आराम से जाने और आराम से लौटने के लिये 'प्र च च' ऐसा
स्वस्ति वचन बोलना चाहिये। तो वह आराम से जायगा और
आराम से लौट आवेगा।
गायत्री ने ऊपर जाकर सोम के संरक्षकों को डरा दिया
और सोम को अपने पैरों और चोंच से पकड़ लिया। और उन
अक्षरों को भी जो दो पहले छन्द छोड़ आये थे। सोम के
पालक कृशानु ने एक तीर छोड़ा और उस के बाँयें पैर का
नाखून गिर गया। वह नाखून शल्यक् (सेही) हो गया।
नाखून से जो वशा या चर्बी गिरी वह वशा (बकरी) हो
गई। इसलिये वशा हवि के तुल्य है।
तीर की जो नौक थी वह न काटने वाला सर्प (निर्दंशी)
हो गयी। और जिस बल से तीर छोड़ा गया उससे स्वज नामी
सर्प हुआ। जो पंख थे उनसे (अश्वत्थ की) हिलनेवाली
शाखायें। स्नायु अर्थात् नसों से गंडूपद (केंचुए) कीड़े। तीर
के तेज से अंधाहि (अंधा सांप) उत्पन्न हुआ (कृशानु के)
तीर का यह हाल हुआ। (२)
३६—गायत्री ने जिस भाग को सीधे पैर से पकड़ा वह
प्रातः सवन हुआ। गायत्री ने उसको अपना स्थान बना लिया।
तभी से प्रातः सवन सब से अच्छा समझा जाता है। और