ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] १७५
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते ॥
( ऋ० ८।२।१ )
नीचे के मन्त्र से उन्होंने उसे यज्ञ के मध्य में बिठायाः—
इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शन्तम शन्तमाभिर-
भिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥ ( ऋ० ८।५३।५ )
जो इस रहस्य को समझता है अपने यज्ञ को इन्द्र के सामने
करता है और इन्द्र के कारण उसका यज्ञ सफल हो जाता है । (४)
१६—जब इन्द्र ने वृत्र को मारा तो सब देवताओं ने जाना
कि वह मार न सका और वह भाग गये । केवल मरुत् जो
उसी के सम्बन्धी हैं न भागे । ऊपर के मंत्र में जो “स्वापयः”
“मरुतों” का वर्णन है वह प्राण हैं । प्राणों ने इन्द्र को न छोड़ा ।
इसलिये 'स्वापि' युक्त प्रगाथ बोला जाता है । अर्थात् “आस्वापे
स्वापिभिः” । जब इस प्रगाथ के बाद इन्द्र के लिये मंत्र पढ़ा
जाता है तो इसी को “मरुत्वतीय शस्त्र” कहते हैं । यदि 'स्वापि
युक्त' यह प्रगाथ बोला जाता है तो “मरुत्वतीय शस्त्र ही बन
जाता है” । (५)
१७—अब ब्रह्मणस्पति के प्रगाथ को बोलता है । ब्रह्मणस्पति
को पुरोहित बनाकर देवों ने स्वर्ग को जीता और इस लोक को
भी । इस लिये यजमान भी बृहस्पति को पुरोहित बनाकर स्वर्ग
लोक को जीत लेता है और इस लोक को भी ।
यह दोनों प्रगाथ स्तुति-शून्य होते हैं । उनको दुहरा कर
पढ़ा जाता है ( चौथे पाद को तीन-तीन बार पढ़ने से दो मंत्रों
के तीन मंत्र या तृच् हो जाते हैं ) ।
यहाँ कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि जब अन्य कोई मन्त्र स्तुति-
शून्य होते हुये दुहराये नहीं जाते तो यह दोनों प्रगाथ स्तुति-
शून्य होते हुये क्यों दुहराये जाते हैं ? इसका उत्तर यह है कि
जो मरुत्वतीय शस्त्र है, वह पवमान उक्थ वाला है । यह स्तोत्र
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