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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

पहला अध्याय ] १७१
और यजमान के लिये बड़ा कष्टदायक होगा । इसलिये निविद्
पढ़ते हुये दो पदों को मिलाना नहीं चाहिये ।
केवल दो पदों को मिलाना चाहिये 'प्रेदं ब्रह्म', प्रेदं क्षत्र' ।
ऐसा करने से ब्रह्म और क्षत्र को जोड़ता है । इससे ब्रह्म और
क्षत्र जुड़ जाते हैं ।
निविद् के लिये तीन मंत्रों से अधिक के सूक्त चुनें, क्योंकि
निविद् के पद सूक्त के भिन्न भिन्न मन्त्रों के अनुकूल होने
चाहिये । इसलिये निविद् के लिये तीन या चार मन्त्रों से अधिक
के सूक्त चुनने चाहिये । निविद् के द्वारा स्तोत्र बढ़ जाता है ।
तीसरे सवन में निविद् को एक मन्त्र शेष रहने पर कहे ।
अगर दो मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहेगा तो उत्पत्ति की शक्ति
को नष्ट कर देगा और गर्भो को बालक से शून्य कर देगा ।
इसलिये तीसरे सवन में एक मन्त्र शेष रहने पर निविद् कहे ।
निविद् को सूक्त से आगे न जाने दे । जिस सूक्त से निविद्
आगे निकल जाय तो फिर उसको पीछे न लौटावे क्योंकि
उसका स्थान नष्ट हो गया । अब दूसरे देवता का और दूसरे
छन्द का एक सूक्त चुने और उसमें निविद् रक्खे ।
दूसरे निविद् सूक्त को पढ़ने से पहले ऋग्वेद मंडल १० का
५७वां सूक्त पढ़े :-
“मा प्रगाम पथो वयं” इत्यादि ।
“हम मार्ग से न भटकें” इत्यादि ।
क्योंकि जो यज्ञ में भूल जाता है वह मानों मार्ग से भटक
जाता है ।
“मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः” ( ऋ० १०।५७।१ का दूसरा पद )
पढ़ कर वह यजमान को यज्ञ में भूल करने से बचा लेता है ।
“मान्तः स्थुर्नो अरातयः” ( ऋ० १०।५७।१ का तीसरा पद )
पढ़ने से वह शत्रुओं को हराकर मार भगाता है ।