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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

श्री काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ७८
याज्ञवल्क्यस्मृतिः
विज्ञानेश्वरप्रणीत 'मिताक्षरा'-व्याख्या 'प्रकाश'
हिन्दीव्याख्यया च विभूषिता

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है; यह एक सादा/खाली भूरा कागज़ (ब्लैंक पेज) है।

॥ श्रीः ॥
काशी संस्कृत ग्रन्थमाला
१७८
श्रीमद्योगीश्वरमहर्षियाज्ञवल्क्यप्रणीता
याज्ञवल्क्यस्मृतिः
विज्ञानेश्वरप्रणीत 'मिताक्षरा' व्याख्यया
'प्रकाश' हिन्दीव्याख्यया च विभूषिता
हिन्दीव्याख्याकार
डॉ० उमेशचन्द्र पाण्डेय
एम० ए०, पी-एच० डी० साहित्यरत्न
प्रस्तावना-लेखक
श्री नारायण मिश्र, एम० ए०
संस्कृत तथा पालिविभाग
भारती महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
चौखम्भा संस्कृत संस्थान
भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा प्रचारक
पोस्ट बाक्स नं० ११३९
के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन, ( गोलघर समीप मेदागिन )
वाराणसी-२२१००१ ( भारत )

प्रकाशक : चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
मुद्रक : श्रीगोकुल मुद्रणालय, वाराणसी
संस्करण : पञ्चम, वि० सं० २०५०
मूल्य : रु० २५०-००
© चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
इस ग्रन्थ के परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल-पाठ
एवं टीका, परिशिष्ट आदि के सर्वाधिकार
प्रकाशक के अधीन हैं ।
फोन : ३३३४४५
ग्रन्थ प्राप्तिस्थान
चौखम्भा संस्कृत भवन
पोस्ट बाक्स नं० ११६०
चौक, ( चित्रा सिनेमा के सामने )
वाराणसी-२२१००१ ( भारत )
फोन : ३२०४१४

THE
KASHI SANSKRIT SERIES
178


YĀJÑAVALKYASMṚTI
Of
YOGĪSHWARA YĀJÑAVALKYA
With the Mitākṣarā Commentary
of
VIJÑĀNESHWAR
Edited with
The ‘Prakash’ Hindī Commentary
By
Dr. UMESH CHANDRA PĀNDEY
M. A., Ph. D., Śāhityaratna
Preface by
ŚRĪ NĀRĀYAṆA MIŚRA, M. A.
Bhāratī Mahāvidyālaya B. H. U., Varanasi.
CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN
Publishers and Distributors of Oriental Cultural Literature
Post Box No. 1139
K. 37/116, Gopal Mandir Lane ( Golghar Near Maidagin )
VARANASI-221 001 ( INDIA )

© Chaukhambha Sanskrit Sansthan, Varanasi
Phone : 333445
Fifth Edition : 1994
Also can be had of
CHAUKHAMBHA SANSKRIT BHAWAN
Post Box No. 1160
Chowk (Opposite Chitra Cinema)
VARANASI-221001
Phone : 320414

प्रस्तावना
श्री नारायण मिश्र
संस्कृत तथा पालि विभाग :
भारती महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
श्रुति-स्मृती चक्षुषी द्वे द्विजानां न्याय-वर्त्मनि ।
मार्गे मुह्यन्ति तद्धीनाः प्रपतन्तिः पथश्च्युताः ॥
(बृहस्पति-स्मृति, संस्कार-काण्ड, श्लो० ११)
इस अमर आत्मा को जन्म-जन्मान्तर तक अत्यन्त कठोर तपस्या करने के
बाद मानव-शरीर में प्रवेश और उस शरीर के माध्यम से अपने को इस प्रपञ्च
से विमुक्त करने का अवसर प्राप्त होता है। परन्तु खेद का विषय है कि
मानव-शरीर में गर्भाशय से निःसरण के साथ-साथ ही इस (आत्मा) की
कर्त्तव्य-बुद्धि विस्मृति के गर्त में विलीन हो जाती है। जिस उद्देश्य से यह आत्मा
मानव-शरीर के अधिगम के लिए कठोर प्रयास करती रहती है उस उद्देश्य की
पूर्त्ति आकाश-पुष्पायित सी हो जाती है। इसी कारण से जन्म लेते ही जीवात्मा
को पुनः रोना ही पड़ता है। अपने कर्त्तव्य के विस्मरण के कारण जीवात्मा के
विलाप का निम्न-लिखित पद्य में बहुत ही मार्मिक रूप में प्रतिपादन किया गया है-
जातो मृतश्च कतिधा न कति स्तनानां
पीतम्पयो न कलिताः कति मातरो न ।
उत्पत्य बन्ध-विधुतावधुना यतिष्ये
इत्यस्य विप्लवमुपैति बहिर्मनीषा ॥
कर्म चक्र में इस प्रकार अनादि काल से परिभ्रमण-शील जीवात्मा की उपर्युक्त
परिदेवना से आर्द्र हृदय वाले परमर्षियों ने अपने ज्ञान-दीप में प्रतिभासमान
परम्परागत अखण्ड ज्ञान-राशि-स्वरूप वेद को जीवात्मा के कर्त्तव्य के परिज्ञान के
लिए अभिव्यक्त किया। परन्तु वेद भी कुछ ही विवेकी पुरुषों के लिए उपयोगी
सिद्ध हुआ न कि सर्व-साधारण के लिए। अतः करुणा-प्रवण मनु आदि महर्षियों
ने अपने वैदिक-विज्ञान को सर्व-साधारणोपयोगी बनाने के लिए धर्मशास्त्र का
निर्माण किया। इस धर्मशास्त्र में धर्म-शासक ऋषि के द्वारा प्रायेण वैदिक-ज्ञान
की ही स्मृति होने के कारण इसे (धर्म-शास्त्र को) स्मृति-शब्द से भी अभिहित
किया जाता है (धर्मशास्त्रन्तु वै स्मृतिः-मनु० २।१०) ।
यद्यपि स्मृति-ग्रन्थों में कुछ ऐसे भी तत्त्व हैं जो वर्त्तमान वेद में उपलब्ध
नहीं होते तथाऽपि उन तत्त्वों के वैदिक-ज्ञान पर ही निर्भर होने का अनुमान
किया जाता है।¹ यद्यपि धर्म के प्रतिष्ठित व्याख्याता जैमिनि ने यह भी माना है
१. द्रष्टव्य—"श्रुति-स्मृति-विरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी।"— जाबाल-स्मृति
"श्रुत्या सह विरोधे तु बाध्यते विषयं विना।"—भविष्य-पुराण
—मनु. २।१३ की व्याख्या में कुल्लूकभट्ट द्वारा उद्धृत ।
२ या० भू०

( २ )
कि यदि स्मृति में कहीं वेद-विरुद्ध विषय हो तो उसे प्रमाण नहीं मानना चाहिए
( 'विरोधे त्वनपेक्षम् ०" जै० सू० १।३।३॥ ) तथापि विचार करने पर यह प्रतीत
होता है कि यदि वर्त्तमान वेद में अनुपलब्ध परन्तु अविरुद्ध स्मार्त्त-मत के मूल-
भूत वैदिक-विधि का अनुमान हो सकता है तो क्या वर्त्तमान-वेद-विरुद्ध
स्मार्त्तसिद्धान्तों से उनके मूल-भूत वेद का अनुमान नहीं किया जा सकता है ?
वेदोक्तियों में आपन्न परस्पर विरोध तो विकल्प में ही पर्यवसन्न होता है न
कि उससे वेद पर कुछ आक्षेप माना जाता है, जैसा मनु ने भी कहा है--
श्रुति-द्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ ।
उभावपि हि तौ धर्मौ सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥ ( मनु० २।१४ )
स्मृति ( धर्म-शास्त्र ) का प्रतिपाद्य विषय
धर्म-शास्त्र के प्रतिपाद्य-विषय का संकेत आङ्गिरस स्मृति में इस प्रकार
किया गया है—
“यत्पूर्वमृषिभिः प्रोक्तन्धर्म-शास्त्रमनुत्तमम् ।
तत्प्रमाणन्तु सर्वेषाँल्लोक-धर्मानुवर्णनम् ॥” (आङ्गिरस-स्मृति १।८)
इसका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण, १ क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र एवम् वर्ण-सङ्कर
के आजीवन कर्त्तव्य का अनुविधान ही धर्मशास्त्र का लक्ष्य है । इसी से यह भी
स्पष्ट है कि 'धर्म-शास्त्र' शब्द में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द का अर्थ क्या है ।
विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में धर्म का विभाजन निम्न-लिखित रूप में किया
है—"अत्र च धर्मशब्दः षड्विध-स्मार्त-धर्म-विषयः । तद्यथाः-वर्ण-धर्मः,
आश्रम-धर्मः, वर्णाश्रम-धर्मः, गुण-धर्मः निमित्त-धर्मः, साधारण-धर्मश्चेति ।
( मिताक्षरा—१।१ ) ।
( १ ) वर्ण-धर्म का निर्देश भगवद्गीता में बहुत ही स्पष्ट रूप में किया गया
है । श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार ब्राह्मण-वर्ण के धर्म ये हैं-
शमो दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म-कर्म स्वभावजम् ॥ ( गीता-१८।४२)
श्रीमद्भागवत ने ब्राह्मण-वर्ण के धर्म का परिगणन निम्नोक्त रूप में किया है—
शमो दमः तपः शौचं सन्तोषः क्षान्तिरार्जवम् ।
१. “भगवन्सर्व-वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।
अन्तर-प्रभवाणां च धर्मान्नो वक्तुमर्हसि ॥”—मनु० सं १।२
“वर्णाः ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्राः ।......तेषाम् अन्तर-प्रभवाणां च सङ्कीर्ण-जातीनां
चापि अनुलोभ-प्रतिलोमजानां च अम्बष्ठ-क्षत्तृ-कर्ण-प्रभृतीनां.........यथावत् यो धर्मो
यस्य वर्णस्य येन प्रकारेणार्हतीत्यनेन आश्रम-धर्मादीनामपि प्रश्नः ।’
—मन्वर्थ-मुक्तावली १।२
“वर्णाश्रमेतराणां हि ब्रूहि धर्मानशेषतः” ! —या० स्मृ० १।२

( ३ )
ज्ञानं दयाऽच्युतात्मत्वं सत्यञ्च ब्रह्म-लक्षणम्¹ ॥
(श्रीमद्भागवत-७।११।२१)
मनु का कथन निम्न-लिखित है—
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानम्प्रतिग्रहञ्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ (मनु० १।८८)
क्षत्रिय-धर्म का गीतोक्त स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है—
शौर्यं तेजो धृतिः दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वर-भावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४३)
श्रीमद्भागवतोक्त क्षात्र-धर्म अधोलिखित हैं—
शौर्यंॱवीर्यं धृतिस्तेजः त्यागश्चात्म-जयः क्षमा ।
ब्रह्मण्यता प्रसादश्च सत्यञ्च क्षत्र-लक्षणम् ॥
(श्रीमद्भागवत-७।११।२२)
मनूक्त क्षत्रिय-धर्म का स्वरूप इस प्रकार है—
प्रजानां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियाणां समासतः ॥ (मनु० १।८९)
वैश्य-धर्म का वर्णन गीता में इस प्रकार किया गया है—
कृषि-गौरक्ष्य-वाणिज्यं वैश्य-कर्म स्वभावजम् ॥
(गीता-१८।४४ क ख)
श्रीमद्भागवत में वैश्य-धर्म का विवरण निम्न-लिखित रूप में प्रस्तुत किया
गया है—
देव-गुर्वच्युते भक्तिस्त्रि-वर्ग-परिपोषणम् ।
आस्तिक्यमुद्यमो नित्यं नैपुण्यं वैश्य-लक्षणम् ॥
(श्रीमद्भागवत ७।११।२३)
मनु-प्रतिपादित वैश्य-धर्म का स्वरूप निम्न-निर्दिष्ट है—
पशूनां रक्षणन्दानमिज्याध्ययनमेव च।
वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ (मनु० १।९०)
शूद्र-धर्म का वर्णन भी गीता में है—
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ (गीता-१८।४४ ग घ)
तथा—
शूद्रस्य सन्नतिः शौचं सेवाॱस्वामिन्यमायया ।
अमन्त्र-यज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गो-विप्र-रक्षणम् ॥
(श्रीमद्भागवत-७।११।२४)


१. श्रीमद्भागवत के सभी श्लोक श्रद्धेय डा० सिद्धेश्वर भट्टाचार्य जी के 'The
Philosophy of the श्रीमद्भागवत' से उद्धृत किए गये हैं, एतदर्थ मैं उनका
ऋणी हूँ।
२ प्र० या०