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सर्वकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 782 में से

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पृष्ठ 7

प्रस्तावना
श्री नारायण मिश्र
संस्कृत तथा पालि विभाग :
भारती महाविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
श्रुति-स्मृती चक्षुषी द्वे द्विजानां न्याय-वर्त्मनि ।
मार्गे मुह्यन्ति तद्धीनाः प्रपतन्तिः पथश्च्युताः ॥
(बृहस्पति-स्मृति, संस्कार-काण्ड, श्लो० ११)
इस अमर आत्मा को जन्म-जन्मान्तर तक अत्यन्त कठोर तपस्या करने के
बाद मानव-शरीर में प्रवेश और उस शरीर के माध्यम से अपने को इस प्रपञ्च
से विमुक्त करने का अवसर प्राप्त होता है। परन्तु खेद का विषय है कि
मानव-शरीर में गर्भाशय से निःसरण के साथ-साथ ही इस (आत्मा) की
कर्त्तव्य-बुद्धि विस्मृति के गर्त में विलीन हो जाती है। जिस उद्देश्य से यह आत्मा
मानव-शरीर के अधिगम के लिए कठोर प्रयास करती रहती है उस उद्देश्य की
पूर्त्ति आकाश-पुष्पायित सी हो जाती है। इसी कारण से जन्म लेते ही जीवात्मा
को पुनः रोना ही पड़ता है। अपने कर्त्तव्य के विस्मरण के कारण जीवात्मा के
विलाप का निम्न-लिखित पद्य में बहुत ही मार्मिक रूप में प्रतिपादन किया गया है-
जातो मृतश्च कतिधा न कति स्तनानां
पीतम्पयो न कलिताः कति मातरो न ।
उत्पत्य बन्ध-विधुतावधुना यतिष्ये
इत्यस्य विप्लवमुपैति बहिर्मनीषा ॥
कर्म चक्र में इस प्रकार अनादि काल से परिभ्रमण-शील जीवात्मा की उपर्युक्त
परिदेवना से आर्द्र हृदय वाले परमर्षियों ने अपने ज्ञान-दीप में प्रतिभासमान
परम्परागत अखण्ड ज्ञान-राशि-स्वरूप वेद को जीवात्मा के कर्त्तव्य के परिज्ञान के
लिए अभिव्यक्त किया। परन्तु वेद भी कुछ ही विवेकी पुरुषों के लिए उपयोगी
सिद्ध हुआ न कि सर्व-साधारण के लिए। अतः करुणा-प्रवण मनु आदि महर्षियों
ने अपने वैदिक-विज्ञान को सर्व-साधारणोपयोगी बनाने के लिए धर्मशास्त्र का
निर्माण किया। इस धर्मशास्त्र में धर्म-शासक ऋषि के द्वारा प्रायेण वैदिक-ज्ञान
की ही स्मृति होने के कारण इसे (धर्म-शास्त्र को) स्मृति-शब्द से भी अभिहित
किया जाता है (धर्मशास्त्रन्तु वै स्मृतिः-मनु० २।१०) ।
यद्यपि स्मृति-ग्रन्थों में कुछ ऐसे भी तत्त्व हैं जो वर्त्तमान वेद में उपलब्ध
नहीं होते तथाऽपि उन तत्त्वों के वैदिक-ज्ञान पर ही निर्भर होने का अनुमान
किया जाता है।¹ यद्यपि धर्म के प्रतिष्ठित व्याख्याता जैमिनि ने यह भी माना है
१. द्रष्टव्य—"श्रुति-स्मृति-विरोधे तु श्रुतिरेव गरीयसी।"— जाबाल-स्मृति
"श्रुत्या सह विरोधे तु बाध्यते विषयं विना।"—भविष्य-पुराण
—मनु. २।१३ की व्याख्या में कुल्लूकभट्ट द्वारा उद्धृत ।
२ या० भू०