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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages
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भूमिका ७९
से बाहर हैं पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि के अभाव को इस प्रमाण द्वारा
ग्रहण नहीं किया जा सकता है।
इनके मत में यह अनुपलब्ध अर्थात् अभाव चार प्रकार का होता
है-(1) प्राग्-अभाव (2) प्रध्वंस-अभाव (3) अत्यन्त-अभाव तथा (4)
अन्योन्य-अभाव। इन चारों प्रकार का अभावों को हम अनुपलब्धिप्रमाण से
ही ग्रहण कर सकते हैं।
चित्र-१३
अनुपलब्धि प्रमाण
1 | 2 | 3 | 4
प्राक्-अभाव | प्रध्वंस-अभाव | अत्यन्त-अभाव | अन्योन्य-अभाव
(उत्पत्ति से पहले | (निर्माण के बाद | (कालत्रय में रहने वाला | (एक वस्तु में अन्य
मृत्पिण्ड में कार्य | दण्ड आदि से विनष्ट | अभाव - यथा वायु | वस्तु का यथा-घट
रूप घट का अभाव) | घट का अभाव) | में रूप का) | में पट का)
उपर्युक्त प्रदर्शन से स्पष्ट है कि किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पहले
अपने कारण में स्थितिरूप अभाव का ज्ञान 'प्राग्-अभाव' है जो
अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्राह्य होगा। जैसे-घट के निर्माण से पूर्व वह
अपने कारणरूप मृत्पिण्ड में विद्यमान रहता है, किन्तु दृश्यमानजगत् में
उसका अभाव प्रतीत होता है। अतः इस अभाव को केवल अनुपलब्धि
प्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं।
इसीप्रकार किसी वस्तु के निर्माण के बाद कारणविशेष से विनष्ट होने
के पश्चात् होने वाले अभाव को 'प्रध्वंसाभाव' कहा जाएगा जो अनुपलब्धि
प्रमाण से ही ग्रहण किया जा सकता है। जैसे-घट के बनने के बाद किसी
व्यक्ति द्वारा उसे डण्डे से तोड़ देने के परिणामस्वरूप होने वाला अभाव
प्रध्वंसाभाव होगा।
इसके अतिरिक्त जो भूत-भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान
रहने वाला है, इसप्रकार के अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं जिसे हम
अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्रहण कर सकते हैं। इस अभाव को वायु में रूप
के अभावरूप उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, क्योंकि वायु में रूप
(दिखायी देने) का गुण नहीं होता और यह अभाव तीनों कालों में रहने
वाला है। अतः अत्यन्ताभाव की कोटि में आएगा।

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८० वेदान्तसार
चतुर्थ, अन्योन्याभाव एक वस्तु में दूसरी वस्तु के अभाव को कहते हैं।
जैसे घट में कभी भी पट विद्यमान नहीं रह सकता। अतः इसप्रकार के
अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'अनुपलब्धि' नामक षष्ठप्रमाण की
आवश्यकता होगी ही, क्योंकि उक्त चारों प्रकार के अभावों के ज्ञान को
हम प्रत्यक्षादि शेष पाँच प्रमाणों द्वारा ग्रहण नहीं कर सकते हैं।
(१५) कार्यकारणसिद्धान्त- कार्यकारणसिद्धान्त भारतीय दर्शनशास्त्र
का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यही सिद्धान्त किसी भी दर्शन की सृष्टिप्रक्रिया
का मुख्य आधार है। चार्वाकदर्शन को छोड़कर प्रायः सभी दर्शनों ने इस
विषय पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षरूप से विचार किया है। पुनरपि सांख्य एवं
न्यायदर्शन में इस सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा की गई है।
कार्यकारणसिद्धान्त को लेकर प्रचलित मतों को मुख्यरूप से तीन श्रेणियों में
विभाजित किया जा सकता है-
(क) सत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से
ही सत् कार्य की उत्पत्ति हो सकती है। इसलिए उत्पत्ति से पहले कार्य
अपने कारण में विद्यमान रहता है। इस मान्यता को सांख्यदर्शन ने
विस्तारपूर्वक प्रस्थापित किया, जिसे सत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है।
(ख) असत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार-उत्पत्ति से पहले
कार्य का अपने कारण में प्राग्भाव रहता है। अतः असत् कारण से सत् कार्य
की उत्पत्ति होती है। इस मान्यता के अनुसार कारणविशेष से कार्यविशेष
स्वभाववश उत्पन्न होता है। इसमें किसी अन्य हेतु की परिकल्पना उचित
नहीं है। इस सिद्धान्त के मानने वालों में न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध तथा
मीमांसादर्शन विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं।
(ग) सत् से असत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण)
से असत् (कार्य) की उत्पत्ति होती है। वेदान्तदर्शन ने इसी मान्यता को
प्रस्थापित किया, क्योंकि यह दर्शन सत् ब्रह्म से असत् जगत् की उत्पत्ति को
स्वीकार करता है। यही सिद्धान्त इसकी सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है।
यहाँ किसी भी कार्य की उत्पत्ति के लिए मूल आधारभूत कारण उपादान है,
जैसे घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी। साथ ही जिनके सहयोग से कार्य उत्पन्न
होता है, वे निमित्तकारण कहलाते हैं, जैसे-कुम्हार, तुरी, वेमा आदि।

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भूमिका ८१
वेदान्तदर्शन ब्रह्म को दृश्यमानजगत् का उपादान और निमित्त दोनों कारण
मानता है। ठीक उसीप्रकार जैसे-मकड़ी स्वयं द्वारा बनाए गए जाले के लिए
उपादान और निमित्त दोनों कारण होती है, क्योंकि जाले के निर्माण में काम
आने वाला मुख्य आधाररूप तरलपदार्थ मकड़ी के शरीर से निकलता है।
इस दृष्टि से मकड़ी जाल की उपादानकारण हुई तथा अपने पैरों द्वारा जाले
की संरचना करने के कारण यही मकड़ी निमित्तकारण भी बनी।
विद्वानों ने इसे सत्कार्यवाद का द्वितीयरूप विवर्तवाद नाम दिया, जिसकी
स्थापना के लिए वेदान्तदर्शन मायावाद का आश्रय लेता है। इसका विस्तृत
वर्णन हम सृष्टिप्रक्रिया में आगे करेंगे। उनके मत में-जब वस्तु अपने
स्वरूप का परित्याग किए बिना ही दूसरे रूप में प्रतीत होने लगती है, तो
यह विवर्त कहलाता है तथा इस सिद्धान्त को विवर्तवाद कहते हैं। इसका
उदाहरण रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के रूप में दिया जाता है, क्योंकि उस
स्थिति में रस्सी अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही सर्प के रूप में
प्रतीत होने लगती है और यह प्रतीति वस्तुतः मिथ्या होती है।
ब्रह्म में दिखायी देने वाली जगत् की प्रतीति को भी वेदान्त इसीप्रकार
विवर्त के रूप में स्वीकार करता है। इसप्रकार निष्कर्षरूप में हम कह सकते
हैं कि वेदान्त यद्यपि सत्कार्यवाद को स्वीकार करता है, क्योंकि यह
सत्तत्त्वब्रह्म से मिथ्याजगत् की उत्पत्ति को मानता है, तथापि इसका
सत्कार्यवाद सांख्य के सत्कार्यवाद से भिन्न है, क्योंकि सांख्य सत्कार्यवाद
के परिणामवादी स्वरूप को मान्यता प्रदान करता है, जैसे दूध से दही का
बनना। इस प्रसंग में यह ध्यातव्य है कि वेदान्तदर्शन ने दूध के परिवर्तितरूप
दही को अयथार्थ माना है। उनके अनुसार हम इसे दही सम्बोधन तो करते
हैं, किन्तु वास्तव में यह दूध ही है, मात्र अवस्था एवं कालभेद के कारण
इसे नया नाम दिया गया है।
कुछ विद्वानों ने सांख्य के परिणामवाद को विवर्तवाद का पूर्वभूमि भी
माना है। उनके मत में जिसप्रकार दूसरी मञ्जिल पर पहुँचने के लिए पूर्व
मञ्जिल को पार करना पड़ता है। उसीप्रकार विवर्तवाद तक पहुँचने के लिए
परिणामवाद की मञ्जिल तय करनी पड़ती है-
विवर्तभावस्य हि पूर्वभूमिः वेदान्तवादे परिणामवादः।
व्यवस्थितेऽस्मिन् परिणामवादे स्वयं समायाति विवर्तवादः॥
(सर्वज्ञात्ममुनि-संक्षेपशारीरक-2/69)

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८२ वेदान्तसार
(१६) समष्टि-व्यष्टि सिद्धान्त-वेदान्तदर्शन एवं इसकी सृष्टि-प्रक्रिया
को भलीभाँति समझने के लिए इसमें प्रतिपादित समष्टि-व्यष्टि के सिद्धान्त
को समझना आवश्यक है। जिसका हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं।
इस दर्शन के अनुसार-एक का कथन करने की विवक्षा में व्यष्टि तथा
समूह का कथन करने की विवक्षा होने पर समष्टि अभिप्राय होता है। इसे
उदाहरण द्वारा हम इसप्रकार समझ सकते हैं। जब हम किसी व्यक्ति विशेष
के बारे में कुछ कहते हैं तो यह व्यष्टि कहलाएगा, किन्तु जब हम लोगों
के समूह को इंगित करते हैं तो यह समष्टि माना जाएगा।
वेदान्तदर्शन में इन दोनों शब्दों का अनेकशः प्रयोग किया गया है।
आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में इन शब्दों की इसप्रकार व्याख्या की है-
"यथा वृक्षाणां समष्ट्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा जलानां
समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगताज्ञानानां
समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्व व्यपदेशः।।"
अर्थात् जिसप्रकार वृक्षों को समुदाय की दृष्टि से 'वन' कहकर एक
संख्यासूचक शब्द का व्यवहार करते हैं अथवा जिसप्रकार जल के कणों के
समूह की विवक्षा में 'जलाशय' ऐसा कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक
संख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को समष्टि कहा
जाता है। यह वस्तुतः इस सबमें ऐक्य का सूचक है।
अन्तर केवल इतना है कि व्यष्टि की अपेक्षा यहाँ समष्टि को उत्कृष्ट
अथवा उन्नत उपाधि वाली कहा है, क्योंकि समष्टि रागादिदोष से शून्य
शुद्धसत्त्वप्रधान होती है (इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना)।
इसीलिए यहाँ व्यष्टिगत अज्ञान की अपेक्षा समष्टिगत अज्ञान को उत्कृष्ट
बताया गया है, क्योंकि इसमें विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। वस्तुतः
यहाँ अज्ञान में स्थित सत्त्वगुण, रजस् एवं तमस् को अभिभूत किए रहता है,
स्वयं पराभूत नहीं होता है।
उत्कृष्ट उपाधि से युक्त चैतन्य को इसीकारण सर्वज्ञाता, सबका ईश्वर
सर्वनियन्ता, अव्यक्त, अन्तर्यामी तथा संसार का कारणरूप कहा गया है।
सबका मूलभूतकारण होने से ईश्वर की यह समष्टि कारणशरीर, आनन्द की
प्रचुरता होने के कारण आनन्दमयकोष तथा स्थूल एवं सूक्ष्मजगत् प्रपञ्च का
लयस्थान होने के कारण सुषुप्ति कहलाती है।

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भूमिका ८३
इसीप्रकार किसी वन के वृक्षों को यदि हम अलग-अलग कहना चाहें
तो वृक्ष कहा जाएगा। साथ ही जलाशय में स्थित जल को अलग-अलग
कहने की दृष्टि से 'अनेक जल' ऐसा प्रयोग करेंगे। ठीक उसीप्रकार अज्ञान
को व्यष्टिरूप में कहने की इच्छा से 'अनेक अज्ञान' कहकर उसमें बहुत्व
का व्यवहार करेंगे। अतः सिद्ध होता है कि व्यक्तिगत तथा समुदायगत
व्यापक भाव के कारण ही अनेकता (व्यष्टि) तथा एकता (समष्टि) का
व्यवहार किया जाता है। अज्ञान की यह व्यष्टि, समष्टि की अपेक्षा निकृष्ट
उपाधि से युक्त होने के कारण मलिनसत्त्वप्रधान मानी गयी है।
साथ ही इस निकृष्ट उपाधि से आवृत्त चैतन्य में अल्पज्ञता, अनीश्वरत्व
आदि गुण होने के कारण तथा एक ही अज्ञान को प्रकाशित करने वाला
होने से 'प्राज्ञ' कहा गया है। इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ (जीव) में
केवल समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों एक हैं, क्योंकि
चैतन्य दोनों में विद्यमान है।
अज्ञान की निकृष्ट उपाधि से युक्त इस जीव की यह उपाधि, अहंकार
आदि का कारण होने से 'कारणशरीर' आनन्द का प्राचुर्य तथा शुद्धचैतन्य
को कोष के समान ढक लेने से 'आनन्दमयकोष' एवं स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्च का
लयस्थान होने के कारण 'सुषुप्ति' कहलाती है।
वेदान्त की दृष्टि में सृष्टिविकास की तीन दशाओं में आत्मा और जगत्
के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं, जिन्हें तीन अवस्था (सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत)
तीन शरीर (कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल) तथा प्रपञ्च कोषों को आनन्दमय,
विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय) नामों से व्यवहृत किया जाता है। इन
सभी स्थितियों में समष्टि-व्यष्टिगत भेद से चैतन्य को अलग-अलग नामों
से कहा जाता है। इसका मुख्यकारण भिन्न-भिन्न स्थितियों में अलग-अलग
शरीर के प्रति चैतन्य का अहंभाव रहता है।
जैसे-समष्टि में कारणशरीर के प्रति चैतन्य को अहंभाव के कारण इसे
ईश्वर, इसी स्थिति में सूक्ष्मशरीर के प्रति उसके अहंभाव के कारण इसे
हिरण्यगर्भ तथा स्थूलशरीर के प्रति विद्यमान अहंभाव के कारण इसे
वैश्वानर या विराद् इस नाम से जाना जाता है।
इसके विपरीत व्यष्टिदशा में कारणशरीर के प्रति चैतन्य के अहंभाव के
कारण इसे 'प्राज्ञ', सूक्ष्मशरीर के प्रति अहंभाव के कारण 'तैजस्' तथा
स्थूलशरीर के प्रति अहंकार के कारण इसे 'विश्व' कहा जाता है। इस

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८४ $\hspace{10cm}$ वेदान्तसार
सम्पूर्ण भिन्नता का मूल आधार समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद ही है, जो मात्र
समुदाय एवं वैयक्तिक दृष्टि है। तात्त्विकदृष्टि से इसमें कोई अन्तर नहीं है।
उपर्युक्त सम्पूर्ण स्थिति को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं—
चित्र-१४
समष्टि $\qquad$ $\fbox{तुरीय (ब्रह्म)}$ $\qquad$ व्यष्टि
शुद्धसत्त्वप्रधान अविद्या से आवृत्त $\qquad$ मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त
अहंभाव
ईश्वर $\longleftrightarrow$ कारणशरीर में आनन्दमय कोष $\longleftrightarrow$ प्राज्ञ (जीव) — सुषुप्ति अवस्था
हिरण्यगर्भ $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ सूक्ष्मशरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव तैजस् — स्वप्नावस्था
$\fbox{विज्ञानमय मनोमय प्राणमय कोष}$
वैश्वानर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ स्थूल शरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ विश्व — जाग्रदावस्था
अन्नमय कोष
$\fbox{भोगायतन}$
समष्टि व्यष्टि एवं इनके अभेद को विभिन्न उदाहरणों द्वारा इसप्रकार भी
प्रदर्शित किया जा सकता है—
चित्र १५
$\fbox{तात्त्विक दृष्टि से अभेद}$
वन $\longleftarrow \hspace{7cm} \longrightarrow$ वृक्ष
जलाशय $\longleftarrow \hspace{6.5cm} \longrightarrow$ जल
वनगत आकाश $\longleftarrow \hspace{5.5cm} \longrightarrow$ वृक्षगत आकाश
जलाशयगत आकाश $\hspace{4.5cm} \longrightarrow$ जलगत आकाश
व्यक्ति समूह (भीड़) $\longleftarrow \hspace{4.5cm} \longrightarrow$ व्यक्ति
$\fbox{समष्टि}$ $\hspace{8cm}$ $\fbox{व्यष्टि}$
(१७) सत्ता के त्रिविधरूप—वेदान्तदर्शन तीन प्रकार की सत्ता को
मान्यता प्रदान करता है—(1) प्रातिभासिक (2) व्यावहारिक

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भूमिका ८५


(3) पारमार्थिक सत्ता। ये तीनों वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया को समझने में
सहायक हैं। अतः हम यहाँ इनका संक्षिप्तपरिचय प्रस्तुत कर रहे हैं-
(क) प्रातिभासिक सत्ता-उसे कहते हैं जो प्रतीति के समय तो सत्य
प्रतीत होती है, किन्तु कुछ समय के बाद किसी अन्य ज्ञान द्वारा बाधित हो
जाती है। जैसे-रस्सी में साँप की प्रतीति। अनेकबार मार्ग में पड़ी हुई रस्सी
को हम अन्धकार आदि के कारण सर्प समझ लेते हैं, किन्तु अगले ही क्षण
प्रकाश आदि होने से रस्सी की यथार्थसत्ता का ज्ञान होता है। अतः अन्धकार
आदि के कारण भ्रान्तिवश रस्सी में जो सर्पज्ञान था, वह यथार्थस्थिति
(रज्जु) का ज्ञान होने पर बाधित हो जाता है। इसलिए किसी पदार्थ में
अन्यपदार्थ की काल्पनिकसत्ता बाधित होने से पूर्व जितने समय तक
विद्यमान रहती है। उसे वेदान्तदर्शन ने प्रतिभासिकसत्ता कहा है। यह प्रतीति
वस्तुतः अज्ञानादि के कारण कल्पित होती है, जो उत्तरकाल में यथार्थज्ञान
के साथ समाप्त हो जाती है। वेदान्त की दृष्टि में सीपी में चाँदी की प्रतीति
भी वस्तुतः ऐसी ही 'प्रतिभासिक सत्ता' है। जो यथार्थज्ञान के साथ स्वतः
समाप्त हो जाती है।
(ख) व्यावहारिक सत्ता-इसके अन्तर्गत इसप्रकार के विषय आते हैं
जो व्यवहार के समय सत् प्रतीत होते हैं। प्रत्यक्षरूप से देखने पर उनकी
सत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु ब्रह्मज्ञान की स्थिति में इसका बाध
हो जाता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-यह जगत् एकान्ततः सत्य न होकर
केवल व्यवहारकाल में सत्य होता है (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-2/1/14)। अतः
इसे व्यावहारिक सत्ता वाला कहा जाएगा। संसार के घट-पट आदि सभी
पदार्थ दूसरे शब्दों में सम्पूर्णजगत् इसका उदाहरण है। प्रातिभासिक सत्ता की
अपेक्षा इसका अस्तित्व अधिक लम्बे समय तक बना रहता है। अतः
अधिक स्थायी है, किन्तु इसे पूर्णतया सत्य नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मज्ञान
होने पर सम्पूर्ण संसार एवं उसमें स्थित सभी पदार्थों का मिथ्यात्व
स्वतःसिद्ध हो जाता है।
(ग) पारमार्थिक सत्ता-वेदान्तदर्शन के अनुसार यह पूर्णतया सत्य और
शाश्वत है। भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों कालों में इसका अस्तित्व
विद्यमान रहता है। यह भौतिकपदार्थों की सत्ता से विलक्षण है। संसार के
घट-पट आदि पदार्थ आज हैं कल नहीं रहेंगे, अतः अनित्य हैं। इसीलिए
उनकी सत्ता व्यावहारिक कही गई है, पारमार्थिक नहीं। इसके विपरीत

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८६ वेदान्तसार
वेदान्त का ब्रह्म तीनों कालों में अवस्थित रहता है। उसमें किसी भी समय
किसी भी प्रकार का विकार परिलक्षित नहीं होता। इसीकारण वह अविकारी
है। अतः एकमात्र ब्रह्म की ही पारमार्थिकसत्ता बतायी गयी है। उपर्युक्त
विवरण को संक्षेप में इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है-
चित्र १६
सत्ता के विविध रूप
┌───────────────┬────────────────┬───────────────┐
प्रातिभासिक व्यावहारिक पारमार्थिक
│ │ │
(रज्जु में सर्प की प्रतीति घट-पट आदि ब्रह्म
सीप में चाँदी की प्रतीति) व्यावहारिक जगत् │
│ │ ┌─────┴──────┐
┌───┴───────────────┐ ┌─┴───────────────┐ │ नित्य शाश्वत│
│क्षणिक अस्तित्व, यथार्थज्ञान│ │अपेक्षाकृत अधिक लम्बे│ │त्रिकालिक, स्थिति│
│के बाद समाप्ति │ │समय तक अस्तित्व, │ └────────────┘
└───────────────────┘ │ब्रह्मज्ञान होने पर समाप्ति│
└─────────────────┘
(१८) जीव की अवस्थाएँ-वेदान्तदर्शन के प्रसिद्ध आचार्य गौडपाद ने
जीव की चार अवस्थाओं को मान्यता प्रदान की है-(अ) जाग्रत, (ब)
स्वप्न (स) सुषुप्ति (द) तुरीय। इनमें चतुर्थ, तुरीय अवस्था के सम्बन्ध में
विद्वानों में मतभेद है। उनके मत में इस अवस्था में तो जीव शुद्धचैतन्य-
स्वरूप ही हो जाता है। इसलिए इसे जीव की अवस्था न मानकर ब्रह्म की
अवस्था कहना चाहिए। पुनरपि व्यावहारिकजीव की जाग्रत, स्वप्न एवं
सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ तो निर्विवाद रूप से स्वीकार्य हैं। अतः हम इनका
यहाँ विस्तार से उल्लेख कर रहे हैं-
(अ) जाग्रत् अवस्था-इस अवस्था में जीव अपने मन एवं इन्द्रियों के
माध्यम से बाह्यसांसारिकपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें स्थूल शरीर,
इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि सभी सचेष्ट रहते हैं। इनके द्वारा जीव बाह्य पदार्थों
का ज्ञान प्राप्त करता है तथा उनका उपभोग भी करता है। इस अवस्था में
जीव अन्नमयकोष में आबद्ध रहता है। आचार्य सुरेश्वर इस अवस्था का
विवरण इसप्रकार प्रस्तुत करते हैं-
बाह्यान्तःकरणैरेव देवतानुग्रहान्वितैः।
स्वं स्वं च विषयज्ञानं तज्जागरितमुच्यते॥ (पञ्चीकरण वार्तिक-२९)
अर्थात् इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण
अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से युक्त होकर अपने-अपने विषय को ग्रहण

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भूमिका ८७
करते हैं। जीव का व्यवहार मुख्यरूप से बाह्यसांसारिकपदार्थों के साथ रहता
है। उनका ज्ञान प्राप्त करके उनके उपभोगादि में ही जीव की रुचि रहती है।
(ब) स्वप्नावस्था-इस अवस्था में जीव की इन्द्रियाँ एवं शरीर दोनों
विश्राम करते हैं, किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। जाग्रत अवस्था में
मन पर पड़े हुए संस्कारों को लेकर वह काल्पनिकजगत् की संरचना करता
है। इसमें जीव विज्ञानमय, मनोमय, एवं प्राणमय कोशों से आबद्ध होता है
तथा उसका सम्बन्ध सूक्ष्मशरीर के साथ रहता है। मन की वासना के
अनुरूप कार्य करने के कारण इसे अन्तःप्रज्ञ भी कहते हैं। सूक्ष्मविषयों का
उपभोग करने से इसको 'प्रविविक्तभुक्' भी कहा जाता है। आचार्य शङ्कर
के अनुसार-जाग्रत् अवस्था में इन्द्रिय, मन और बुद्धि बाह्य एवं अन्तः
आलोक से आलोकित रहती हैं, जबकि स्वप्नावस्था में इन्द्रियाँ विश्राम
करती हैं। सूर्य के प्रकाश का अभाव हो जाता है। उस समयं एकमात्र
विशुद्ध आत्मज्योतिः विद्यमान रहती है। जाग्रत अवस्था के साथ इस अवस्था
का एक यह भी अन्तर है कि वहाँ बाह्यसांसारिकपदार्थ विद्यमान रहते हैं,
जबकि इस अवस्था में वे सभी पदार्थ काल्पनिक होते हैं।
(स) सुषुप्ति अवस्था-इस अवस्था में जीव का सम्पर्क न तो बाह्य
सांसारिकपदार्थों से होता है और न ही वह स्वप्निल संसार में विचरण करता
है, अपितु इसमें वह आनन्द का भोक्ता बनकर चेतोमुख रहता है। जाग्रत्
एवं स्वप्नावस्था में वह सुख-दुःख दोनों का अनुभव करता है, जबकि इस
अवस्था में आनन्द का ही प्राचुर्य रहता है। इस सम्बन्ध में उपनिषदकार का
कथन है-
“सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति।”
(कैवल्योपनिषद्-13)
इस अवस्था में स्थूलशरीर (ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि आदि
कुछ भी कार्य नहीं करते हैं। साथ ही प्रमाणप्रमेय का व्यवहार भी समाप्त
हो जाता है। इसमें बुद्धि अविद्या में इसप्रकार स्थित रहती है जैसे, वट वृक्ष
के बीज में वृक्ष। आनन्दमयकोष में आबद्ध यह अवस्था वस्तुतः मोक्ष से
पूर्व की अवस्था कही जा सकती है-
ज्ञानेनानुपसंहारो बुद्धेः कारणतास्थितिः।
वट बीजे वटस्यैव सुषुप्तिरभिधीयते।। (पञ्चीकरणवार्तिक, 42)
(द) तुरीयावस्था-इस अवस्था में सब प्रकार के प्रपञ्चों की पूर्णतया
शान्ति हो जाती है। यह नित्यशुद्धचैतन्य ब्रह्म की निर्लिप्त अवस्था है। इसमें

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८८ वेदान्तसार

वह शान्त, शिव एवं अद्वैतरूप में विद्यमान रहता है। इसमें उसे न स्वप्न
आते हैं और न निद्रा, अपितु विपरीत ज्ञानों का क्षय होने के कारण
जीवात्मा तुरीयपद को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में जीव की सभी
वासनाएँ विनष्ट हो जाती हैं। सभीप्रकार के कोशों से मुक्त वह ब्रह्म हो
जाता है।
(१९) सृष्टिप्रक्रिया-वेदान्तदर्शन सम्पूर्णसृष्टि का एकमात्र कारण
सच्चिदानन्दस्वरूप, अवाङ्मनसगोचर अखिलाधार परंब्रह्म को स्वीकार
करता है। उसके अनुसार ब्रह्म इस जगत् का उपादानकारण भी है और
निमित्तकारण भी। अपने इस कथन को समझाने के लिए वह मकड़ी का
उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसप्रकार एक मकड़ी (लूता) अपने शरीर के
चेतन अंश के प्राधान्य के कारण जाले का उपादानकारण कहलाती है, ठीक
उसीप्रकार वही मकड़ी अपने शरीर की प्रधानता के कारण जाले का
निमित्तकारण भी बनती है।
वैसे ही अपनी अत्यन्त शक्तिसम्पन्न, स्वाभाविक एवं अनिर्वचनीय
आवरण व विक्षेपशक्तिसम्पन्न माया से युक्त ब्रह्म एक से अधिक होने का
संकल्प करता है। 'एकोऽहं बहुस्याम' इत्यादि श्रुति इस तथ्य में प्रमाणरूप
से प्रस्तुत की जा सकती है। ब्रह्म के इस संकल्प के साथ ही वेदान्त की
सृष्टिप्रक्रिया का प्रारम्भ हो जाता है। वेदान्त के. अनुसार-व्यक्ति की
श्वासोच्छ्वासप्रक्रिया के समान सम्पूर्णसृष्टिप्रक्रिया भी अत्यन्त स्वाभाविक है
जो स्वतः उसीप्रकार होती है, जिसप्रकार किसी पुरुष के शरीर से केश,
लोम आदि उत्पन्न होते हैं।
इस दर्शन की मान्यता के अनुसार-सृष्टि का क्रमिकविकास होता है,
जिसे सूक्ष्मतम (कारणावस्था), सूक्ष्म तथा स्थूल तीन श्रेणियों में विभाजित
किया जा सकता है। सृष्टि के संकल्प से युक्त ब्रह्म, जब अपनी शक्ति
शुद्धसत्त्वप्रधान माया (अज्ञान) से आच्छादित होता है तो 'ईश्वर' संज्ञा प्राप्त
करता है। यह ईश्वर ही वस्तुतः सृष्टि का मुख्यकारण होने से 'कारणशरीर'
कहलाता है। आनन्द की प्रचुरता के कारण वही 'आनन्दमय कोष' भी है।
इसके विपरीत मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छन्न ब्रह्म की जीव संज्ञा होती
है। यह जीव व्यष्टिरूप तथा ईश्वर समष्टिरूप कहा गया है। समष्टिव्यष्टि
के अतिरिक्त इन दोनों में यहाँ मूलतः कोई विशेषभेद नहीं माना गया है।
ईश्वरसंज्ञक कारणशरीर से सर्वप्रथम सूक्ष्म आकाश उत्पन्न होता है। जो
अनन्त, सूक्ष्म, लघु तथा सर्वव्यापक माना गया है। इसी क्रम में आकाश से
वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी की उत्पत्ति मानी

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भूमिका ८९

गयी है। वेदान्त में माया अथवा अज्ञान को सत्त्व, रजस्, तमस् तीनों गुणों
की सम अवस्था माना गया है। अतः इसके प्रभाव से उत्पन्न आकाशादि
सृष्टि में इन तीनों गुणों की स्थिति की विद्यमानता को स्वीकार किया गया
है। आकाशादि में जड़ता उनमें तमोगुण की प्रधानता को सिद्ध करती है।
वेदान्त के अनुसार-कारणशरीर से उत्पन्न आकाशादि सूक्ष्मभूततन्मात्र या
अपञ्चीकृतभूत कहलाते हैं।
यह दर्शन पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा इन पाँचों सूक्ष्मतन्मात्राओं से महाभूतों
की उत्पत्ति स्वीकार करता है। इसके अनुसार आकाश में शब्द, वायु में
स्पर्श, अग्नि में रूप, जल में रस तथा पृथिवी में गन्ध नामक गुण विद्यमान
रहते हैं, किन्तु पञ्चीकृतभूतों में इनकी स्थिति इसप्रकार रहती है-आकाश
में शब्द, वायु में शब्द एवं स्पर्श, अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप, जल में
शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध।
वेदान्त में स्थूलसृष्टि का चरमविकास क्रमशः ब्रह्माण्ड (चौदह भुवन)
भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् इत्यादि सात ऊर्ध्वलोक तथा
अतल, वितल, सुतल, तलातल रसातल, महातल और पाताल आदि सप्त
अधःलोकों के रूप में होता है। साथ ही इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से ही
समस्त सांसारिक भोग्यपदार्थों एवं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की सृष्टि होती
है। इसे स्थूलसृष्टि का चरमविकास कहा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत आकाशादि सूक्ष्मभूतों से यह दर्शन सत्रह
अवयवों वाले सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति को भी स्वीकार करता है। जिनमें
आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सात्त्विक अंशों से क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसना और घ्राण इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। ये सभी सूक्ष्म
इन्द्रियाँ क्रमशः अपने-अपने विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को
ग्रहण करती हैं।
इसीप्रकार आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से क्रमशः वाक्, पाणि,
पाद, पायु और उपस्थ ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। जो क्रमशः वाणी,
आदान-प्रदान, गमन, मलोत्सर्जन तथा सन्तति उत्पन्न करना आदि कार्यों को
सम्पादित करती हैं।
ठीक इसीप्रकार आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सम्मिलित रजोंऽशों से
प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पञ्चवायुओं की उत्पत्ति होती है।
जो वस्तुतः स्थूलशरीर की शक्ति हैं तथा अणुरूप में शरीर के विभिन्न
अंगों में व्याप्त हैं। साथ ही आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सम्मिलित

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९० वेदान्तसार
सात्त्विक अंशों से निश्चयात्मिकाबुद्धि तथा संकल्पविकल्पात्मक मन का
उद्भव माना गया है।
पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और मन ये सत्रह अवयव ही
सूक्ष्मशरीर का निर्माण करते हैं। इस सूक्ष्मशरीर में विज्ञानमय, मनोमय तथा
प्राणमय तीन कोष होते हैं। इनमें पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ और बुद्धिरूप विज्ञानमय
कोष से आवृत्त हुआ चैतन्य ही समस्त व्यावहारिककार्यों को सम्पादित करता
है। मन से युक्त पञ्चज्ञानेन्द्रियों से निर्मित मनोमयकोष जीव की इच्छाशक्ति
का प्रतीक है। पञ्चप्राण एवं पञ्चकर्मेन्द्रियों से युक्त प्राणमयकोष में
क्रियाशीलता की प्रधानता रहती है। इसप्रकार ये तीनों कोष स्थूलशरीर के
माध्यम से विभिन्नकार्यों को सम्पन्न करते हैं।
जैसाकि हम पूर्व में ही उल्लेख कर चुके हैं, सृष्टिप्रक्रिया में सृष्टि का
चरमविकास स्थूलशरीर है। जिसका निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों- आकाश,
वायु, अग्नि, जल और पृथिवी द्वारा होता है। इस स्थूलशरीर के चार प्रकार
होते हैं- जरायुज (मनुष्य, पशु आदि) अण्डज (पक्षी, सर्पादि), स्वेदज
(जूँ, मच्छर आदि) तथा उद्भिज्ज (लता, वृक्षादि)।
वेदान्त के अनुसार-सृष्टि का अभिप्राय किसी नये पदार्थ का उत्पन्न
होना नहीं है, अपितु यह तो मात्र अव्यक्त की स्थिति से व्यक्त दशा को
प्राप्त करना है। ब्रह्म की आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियों द्वारा
सम्पूर्ण सृष्टिप्रक्रिया सम्पादित की जाती है। इनमें आवरणशक्ति ब्रह्म के
यथार्थरूप को ठीक वैसे ही आच्छादित कर देती है जैसे, सामने पड़ी हुई
रस्सी अन्धकारादि के कारण रस्सी प्रतीत नहीं होती। साथ ही दूसरी विक्षेप
शक्ति उस आच्छादितवस्तु ब्रह्म में नवीनवस्तु संसार की, ठीक उसीप्रकार
उद्भावना करती है जैसे-रस्सी में सर्प की प्रतीति।
माया नामक शक्ति के कारण एक ही ब्रह्म में अनेकरूपात्मक जगत् की
प्रतीति कैसे हो सकती है? इसके उत्तर में आचार्यों द्वारा यह दृष्टान्त दिया
गया है। ठीक उसीप्रकार जैसे, तिमिररोग के कारण द्रष्टा को एक ही
चन्द्रमा अनेकरूपों वाला दिखायी देता है वैसे, ही अविद्या (माया) के
कारण कल्पित नामरूपादि के रूप में ब्रह्म के विभिन्न परिणाम दिखायी देते
हैं।
इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को चित्र के माध्यम से अपेक्षाकृत अधिक सरलतापूर्वक
समझा जा सकता है-

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भूमिका ९१
चित्र १७
ब्रह्म तुरीयावस्था
शुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
सूक्ष्मतम सृष्टि
समष्टि ← ईश्वर — कारण शरीर — जीव → व्यष्टि
एकोऽहं बहुस्याम् आनन्दमय कोष ब्रह्म
शरीर के केश, लोम के समान ↓
स्वाभाविकरूप में सृष्टि की उत्पत्ति सुषुप्ति अवस्था ज्ञान
आकाश गुण
अपञ्चीकृत
सूक्ष्म भूतों आकाश (शब्द)
की उत्पत्ति वायु पञ्चीकृत वायु (शब्द, स्पर्श)
↓
अग्नि महाभूत अग्नि (शब्द, स्पर्श, रूप)
↓
जल पञ्चीकरण जल (शब्द स्पर्श, रूप, रस)
↓
पृथ्वी प्रक्रिया द्वारा पृथ्वी (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध)

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९२ वेदान्तसार
[चित्र/फ्लोचार्ट : वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया]
┌───────────────────────────────┐ ┌──────────────────────────────┐
│ अपञ्चीकृत महाभूतों से सूक्ष्म सृष्टि │ │ पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूल सृष्टि │
└──────────────┬────────────────┘ │ १४ भुवन (ब्रह्माण्ड) │
│ └──────────────┬───────────────┘
┌──────────────┴───────────────────────────┐ │
│ नासिका गुदा सम्पूर्णशरीर उदर कण्ठस्थानी │ ┌────────────┴───────────┐
│ प्राण अपान व्यान समान उदान │ │ सप्तऊर्ध्व लोक सप्तअधःलोक │
└──────────────┬──────────────────────────┘ │(भू भुवःस्वः आदि) (अतलवितलादि) │
│ └────────────┬───────────┘
┌──────────┐ │ पञ्चप्राण रजॊऽशो से पृथक्-पृथक् ┌─────────┐ ┌───────┴──────┐ ┌─────────────┐
│स्वप्नावस्था│ │ │प्रणमयकोष│ │समस्त सांसारिक│ │ प्राणियों के │
└──────────┘ │ └─────────┘ │ भोग्य पदार्थ │ │ स्थूल शरीर │
श्रोत्र आकाश उपस्थ आनन्द सन्तानोत्पत्ति└──────────────┘ └──────┬──────┘
┌────┐त्वक् ┌───────────┐वायु ┌───────────┐पायु मलोत्सर्जन ┌──────┴──────┐
│ │ │सात्त्विक अंशों│ │रजॊऽशों से │ │ अन्नमय कोष │
│ग्रहण│चक्षु │से अलग- │अग्नि│अलग-अलग │पाद चलना └──────┬──────┘
│करना│रसना │अलग │जल │पञ्चकर्मेन्द्रियाँ│पाणि आदान प्रदान │ जरायुज
│ │घ्राण │पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ│पृथिवि └───────────┘वाक् बोलना │ अण्डज
└────┘ └─────┬─────┘ │ स्वेदज
┌─────────┐ ┌─────┴───────┐ ┌────────────┐ │ उद्भिज्ज
│विज्ञानमय│ │सभी के सत्त्वांशों│ │जाग्रतावस्था│ ▼
│ कोष │ │से मिलकर │ └────────────┘ ┌──────────────┐
└────┬────┘ │अन्तःकरण │ │ जीवों के अनेक│
│ └──────┬──────┘ ┌────────────┐ │ प्रकार काकारण│
│ │ │ मनोमयकोष │ └──────┬───────┘
│ └──────────┼────────────┘ │
│ │ ┌────────────────────┴───┐
┌────┴────────────┐ ┌─────────┴──────┐ │ अशुद्धि की न्यूनाधिकता │
│ निश्चयात्मिका बुद्धि │ │ संशयात्मक मन │ │ अविद्या की विचित्रता │
└─────────────────┘ └────────────────┘ └────────────────────────┘
( वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया )
(२०) अध्यारोप-अपवाद- ये दोनों वेदान्तदर्शन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त हैं, क्योंकि यहाँ परमब्रह्म एवं जगत् पर विचार करने के ये ही
मुख्य आधार हैं। अतः इस प्रसङ्ग में इनकी विवेचना आवश्यक है।
अध्यारोप एवं अपवाद वस्तुतः ऐसे सिद्धान्त हैं, जिनके द्वारा प्रत्यक्ष से
अप्रत्यक्ष का, ज्ञात से अज्ञात का, मूर्त से अमूर्त का बोध होता है।
इसमें प्रथम अध्यारोप द्वारा वस्तु में अवस्तु का आरोप किया जाता है,
जैसे-रज्जु में सर्प का आरोप। यह आरोप वस्तुतः मिथ्याज्ञान है, जिसका
बाद में 'अपवाद' विधि द्वारा निराकरण कर दिया जाता है। ऐसा करने से
वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। सम्पूर्ण वेदान्तदर्शन इन्हीं दो

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भूमिका ९३
सिद्धान्तों पर टिका हुआ है। आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में अध्यारोप की
इसप्रकार व्याख्या की है-
“असर्पभूतायां रज्जौ सर्पारोपवद् वस्तुन्यवस्त्वारोपोऽध्यारोपः।
वस्तु सच्चिदानन्दानन्ताद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादिसकलजडसमूहोऽवस्तु।”
अर्थात् वस्तु में अवस्तु का आरोप ही अध्यारोप है तथा एकमात्र
सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही वस्तुतः वस्तु है। इसके अतिरिक्त अज्ञानादि
सम्पूर्ण जड़समूह जिसके कारण इस मिथ्याजगत् की प्रतीति होती है; वह
अवस्तु है। कुछ आचार्यों ने इसीको 'अध्यास' की संज्ञा भी प्रदान की है।
वेदान्त अध्यारोप (अध्यास) का मूलकारण अज्ञान को मानता है। इसके
प्रभाव से देखने वाला व्यक्ति वस्तु के वास्तविकस्वरूप को जानने में
असमर्थ रहता है तथा वस्तु में अवस्तु की परिकल्पना करके भ्रमित रहता है
इस विषय में आचार्य शङ्कर का मत है-
अतस्मिंस्तद्बुद्धिः प्रभवति विमूढस्य तमसा।
विवेकाभावाद्वै स्फुरति भुजगे रज्जुधिषणा॥ (विवेकचूड़ामणि-140)
संक्षेप में अज्ञान के कारण मूढ़पुरुष किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु
की परिकल्पना कर लेता है। जैसे, विवेक के अभाव से रज्जु को सर्प
समझ लेना। इसीको यहाँ अध्यारोप या अध्यास कहा गया है। जिसप्रकार
अनेकबार बादलों में सूर्य घिरा होने पर हमें वह दिखायी नहीं पड़ता है,
ठीक वैसे ही मोया (अज्ञान) से आवृत्त हुए ब्रह्म का हमें प्रत्यक्ष नहीं होता
है, अपितु उसके स्थान पर हमें माया की विक्षेप नामक शक्ति से दृश्यमान
मिथ्या जगत् की प्रतीति होती है। इसप्रकार अध्यारोप के कारण जीव वस्तु
के वास्तविकरूप को जानने में असमर्थ रहता है और वह सत् को असत्
मान बैठता है, यही मिथ्याज्ञान उसके सांसारिकबन्धन का कारण बनता है।
बन्धन के कारण इस मिथ्याज्ञान को विनष्ट करने के लिए वेदान्तदर्शन
में सद् गुरु की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है, जो अधिकारी शिष्य को
'अपवाद' पद्धति से उपदेश प्रदान करता है। जिससे शिष्य को वास्तविकता
का ज्ञान हो जाता है और वह ब्रह्म को ही एकमात्र वास्तविकसत्ता मान
लेता है तथा सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व भी उसे हस्तामलकवत् प्रतीत होने
लगता है। उसकी यह कल्पना रज्जु में की गई सर्प की भ्रान्ति के पश्चात्
प्रकाश से होने वाली सर्पत्व की प्रतीति की समाप्ति के समान कही जा

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९४ वेदान्तसार
सकती है। जहाँ उसे रज्जु, रज्जुरूप में ही प्रतीत होती है। इसीप्रकार विवेक
द्वारा ब्रह्म में मिथ्याप्रपञ्च सम्बन्धी अध्यारोप की निवृत्ति होने पर एकमात्र
ब्रह्म की सत्ता ही रह जाती है। इसी प्रक्रिया को वेदान्त 'अपवाद' कहता है।
आचार्य सदानन्द वेदान्तसार में इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं-
“अपवादो नाम रज्जुविवर्तस्य सर्पस्य रज्जुमात्रत्वाद् वस्तुविवर्तस्या-
वस्तुनोऽज्ञानादेः प्रपञ्चस्य वस्तुमात्रत्वम्।”
(२१) सविकल्पक एवं निर्विकल्पक समाधि- मुक्ति की दिशा में
जीव के लिए समाधि की उपयोगिता एवं महत्त्व को प्रायः सभी दर्शनों ने
स्वीकार किया है। वेदान्तदर्शन ने भी इसका उल्लेख किया है।
तदनुसार-ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था को समाधि कहते हैं। इसके आठ अङ्ग
होते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और
समाधि। इनमें से समाधि साधक की उत्कृष्ट अवस्था भी मानी गई है। इसे
(क) सविकल्पक (ख) निर्विकल्पक मुख्यरूप से दो भागों में विभाजित
किया गया है।
सविकल्पकसमाधि में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों की स्वतन्त्र स्थिति
का ज्ञान बना रहता है। इस अवस्था में साधक को अपने अस्तित्व का भान
रहता है। साथ ही उसे अद्वैतवस्तु ब्रह्म की भी प्रतीति होती रहती है तथा
उस ज्ञान का भी वह दर्शन अथवा अनुभूति करता है, जिसके कारण उसे
ब्रह्मतत्त्व की प्रतीति हुई है। उसकी इस स्थिति को एक उदाहरण द्वारा
भलीप्रकार समझा जा सकता है-
जिसप्रकार मिट्टी का हाथी देखने वाले को हाथी की प्रतीति होने पर भी
उसके मिथ्या होने का बोध बना रहता है, सत्यता वहाँ मिट्टी की ही होती
है। ठीक उसीप्रकार सर्वव्यापक, अक्षर, मायातीत परब्रह्मरूप चित्तवृत्ति से
आकारित ज्ञाता, ज्ञान एवं ज्ञेय की प्रतीति होने पर भी वह उसे असत्य
मानता है, सत्यता केवल परब्रह्म की स्वीकार करता है। इसी मनःस्थिति
किंवा अनुभूति को दर्शन की भाषा में 'सविकल्पक समाधि' कहा गया है।
आचार्य सदानन्द का इस विषय में कथन है- सविकल्पको नाम
ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयनपेक्षयाऽद्वितीयवस्तुनि तदाकाराकारितायाश्चित्तवृत्तेरव-
स्थानम् मृण्मयमजादिभानेऽपि मृद्भावन्वद् द्वैतभानेऽप्यद्वैतवस्तुभासदेः

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भूमिका ९५
निरन्तर ध्यान करने के परिणामस्वरूप जब साधक को ज्ञाता, ज्ञान आदि
विकल्पों का भान नहीं रहता है तथा उसकी चित्तवृत्ति एकमात्र अद्वितीय
वस्तु ब्रह्म में ही एकीभाव को प्राप्त कर लेती है, उसे अपना व ज्ञान दोनों
में से किसी का बोध नहीं रहता। उसी स्थिति को दर्शन निर्विकल्पक
समाधि कहता है। यही साधक की उत्कृष्टतमस्थिति है। इसे उदाहरण द्वारा
हम इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं-
जिसप्रकार पानी में घुल जाने पर नमक के अस्तित्व की प्रतीति
प्रत्यक्षतः नहीं होती है, जबकि उसका अस्तित्व विद्यमान रहता है। ठीक
इसीप्रकार जब चित्तवृत्ति उस अद्वितीयवस्तु ब्रह्म के साथ आत्यन्तिक तादात्म्य
को प्राप्त कर लेती है। उससमय चित्तवृत्ति का अस्तित्व होने पर साधक को
उसकी प्रतीति नहीं होती, एकमात्र ब्रह्म का ही बोध होता है। बस यही
निर्विकल्पक समाधि कहलाती है। इस विषय में विद्यारण्यस्वामी कहते हैं-
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम्।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते॥
अर्थात् जिससमय चित्त, ध्याता एवं ध्यान की प्रतीति का परित्याग करके
एकमात्र ध्येय ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति करता है, उसे समाधि कहते हैं। इस
अवस्था में चित्त वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान पूर्णतया निश्चल
हो जाता है। आचार्य सदानन्द इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं-
“निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयापेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा
कारितायाश्चित्तवृत्तितितरामेकाकीभावेनावस्थानम्”
अर्थात् ज्ञाता एवं ज्ञान आदि के भेद का लोप होकर एकमात्र अद्वैतवस्तु
ब्रह्म में तदाकार आकारित चित्तवृत्ति का एकीभाव ही निर्विकल्पक समाधि
अथवा ज्ञान कहलाता है।
(२२) जीवन्मुक्त का लक्षण-चार्वाक को छोड़कर सभी
भारतीयदर्शनों की मान्यता है कि संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने किए हुए
कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यह फल शुभ, अशुभ अथवा शुभाशुभ
किसी भी प्रकार का हो सकता है, किन्तु कोई भी साधक विवेकज्ञान द्वारा
इस कर्मफल को भस्मसात् करने में समर्थ है। मुण्डकोपनिषद् का यह कथन
भी इसकी पुष्टि में प्रमाण है-

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९६ वेदान्तसार
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ (2/2/8)
अर्थात् परमब्रह्म के साक्षात्कार के पश्चात् साधक की अज्ञानग्रन्थि विनष्ट
हो जाती है तथा उसके सभीप्रकार के कर्म क्षीण होकर सभी संशय दूर हो
जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी अग्नि द्वारा ईंधन को भस्मसात् करने का
उदाहरण देते हुए ज्ञानरूपी अग्नि से सभीप्रकार के कर्मों को जला डालने
की बात कही गयी है-
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा। (4/37)
फल की दृष्टि से कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया
है-(1) सञ्चितकर्म, (2) क्रियमाणकर्म, (3) प्रारब्धकर्म। अनादिकाल से
किए गए कर्म जिनका फल अभी प्राप्त नहीं हुआ है, सञ्चितकर्म कहलाते
हैं। मन, वाणी, कर्म द्वारा वर्तमानजन्म में किए जा रहे कर्म क्रियमाणकर्मों
की श्रेणी में आते हैं, क्रियापूर्ण होने पर ये ही सञ्चितकर्मों की कोटि में
आ जाते हैं। चिरकाल के सञ्चितकर्म जब फलोन्मुख होकर शुभाशुभ फल
प्रदान करने में तत्पर हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्धकर्म कहा जाता है।
सञ्चित, क्रियमाण तथा प्रारब्धकर्मों का चक्र व्यक्ति के जीवन में
निरन्तर चलता रहता है, किन्तु इस कर्मबन्धन से छुटकारा ज्ञान के उदय या
फल के भोग द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। वेदान्त ज्ञान को मुक्ति का
एकमात्र साधन मानता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-'जिसप्रकार आग के बिना
भोजन नहीं पकाया जा सकता है, उसीप्रकार ज्ञान के बिना मोक्षप्राप्ति
असम्भव है।' यहाँ ज्ञान से अभिप्राय ब्रह्मज्ञान से ग्रहण करना चाहिए,
क्योंकि वेदान्त अज्ञान को अनर्थ का मूलकारण स्वीकार करता है। वेदान्त
के अनुसार यह अज्ञान ही जीव में अनेकप्रकार की भ्रान्तियाँ उत्पन्न करता
है, जो उसके बन्धन का कारण बनती हैं।
अज्ञान से उत्पन्न इन सभी भ्रान्तियों का निवारण सद्गुरु के मार्गदर्शन
एवं उपदेश द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सम्भव है। अज्ञान. के विनष्ट होने पर जीव
को आत्मबोध ठीक उसीप्रकार हो जाता है, जैसे बादलों के हट जाने पर
सूर्य का प्रकाश हो जाता है, किन्तु ज्ञान का प्रकाश होने पर साधक को
तुरन्त मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि उसे अपने पूर्वजन्मों के सञ्चितकर्मों के
फल को भोगना पड़ता है।

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भूमिका ९७
शङ्कराचार्य के मतानुसार ब्रह्मज्ञान होने के पश्चात् भी साधक को प्रारब्ध
कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उनके अनुसार जिसप्रकार कुम्हार बर्तन
बनाने वाले चक्र (कुलाल) में दण्ड द्वारा गति उत्पन्न करता है; बाद में
दण्ड हटाने पर भी वह स्वतः वेगपूर्वक चलता रहता है। वह वेग की
समाप्ति पर ही रुकता है। ठीक उसीप्रकार विपाक की ओर उन्मुख प्रारब्ध
कर्मों का क्षय उनके भोग के बाद ही होता है, पहले नहीं।
इसी बात को उन्होंने बाण का उदाहरण देकर भी समझाया है।
जिसप्रकार धनुष से छोड़ा गया बाण अपनी गति समाप्त करने पर ही रुकता
है। उसीप्रकार प्रारब्धकर्मों का क्षय भी उनका उपभोग करने के बाद ही
होता है। इसलिए जो गीता अथवा उपनिषद्ग्रन्थों में कर्मों के भस्मसात् होने
की बात कही गयी है, वहाँ उनका अभिप्राय क्रियमाणकर्म से ही ग्रहण
करना चाहिए, प्रारब्ध या सञ्चितकर्मों से नहीं।
इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जीवन्मुक्त अपने शरीर एवं इन्द्रियों
द्वारा पूर्व-वासनाओं के प्रभाव से कर्म करता है तथा प्रारब्धकर्मों का भोग
करता है। वह ज्ञान की दृष्टि से ही समस्त कर्मफलों का उपभोग करता है,
क्योंकि इस स्थिति में वह सम्पूर्ण सांसारिक व्यवहार को मिथ्याप्रपञ्च के
रूप में ही देखता है, वास्तविक रूप में नहीं। इसे जादूगर (इन्द्रजालिक) के
दृष्टान्त द्वारा सरलतापूर्वक समझाया जा सकता है-
मंच के ऊपर जादूगर जो भी प्रपञ्च प्रदर्शित करता है। वह वस्तुतः
असत्य ही होता है, किन्तु उसके मिथ्यात्व की प्रतीति केवल जादूगर को ही
होती है, अन्यों को नहीं। वहाँ उपस्थित सभी दर्शक उसके द्वारा प्रदर्शित
समस्तप्रपञ्च में परमार्थ अर्थात् सत्यतत्त्व का ही दर्शन करते हैं। ठीक
इसीप्रकार जीवन्मुक्त संसार के पदार्थों के मिथ्यात्व को जानने के कारण
उनमें लिप्त नहीं होता है। इस कारण वह आँखों वाला होते हुए भी आँखों
वाला नहीं होता तथा कानों वाला होते हुए भी कानों वाला नहीं होता है।
उसकी स्थिति कमल के पत्ते पर रखी जल की बूँद के समान होती है जो
संसार में रहते हुए भी उसमें लिप्त नहीं रहता है, स्वयं को पृथक् बनाए
रखता है।
जीवन्मुक्त की अवस्था में साधक यद्यपि अपने शरीर को धारण किए
रहता है, किन्तु वास्तव में वह देह के प्रति अभिमान का ही परित्याग कर
देता है। वह सभीप्रकार के विरोधों एवं द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है। उसका

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९८ वेदान्तसार
शत्रु, मित्र, मान, अपमान, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि भावनाएँ पूर्णतया
शान्त हो जाती हैं। सामान्य लोगों के व्यवहार की अपेक्षा जगत् के प्रति
इसका व्यवहार विलक्षण होता है। जीवन्मुक्त के व्यवहार के सम्बन्ध में
शङ्कराचार्य का कथन है-
सुषुप्तवज्जाग्रति यो न पश्यति
द्वयं च पश्यन्नपि चाद्वयत्वतः।
तथा च कुर्वन्नपि निष्क्रियश्च यः
स आत्मविन्नान्य इतीह निश्चयः॥ (उपदेशसाहस्री-5)
यम-नियमों के अनुष्ठान द्वारा वह अशुभकर्मों का परित्याग कर शुभ
कर्मों में प्रवृत्त रहता है। अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान साधक के लिए पुण्य
सञ्चय का कार्य करता है। शुभकर्मों के प्रति प्रवृत्ति ही उसके ब्रह्म
साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। उसका शरीर प्रारब्धकर्मफल भोगने
पर्यन्त ही विद्यमान रहता है। प्रारब्धकर्मों के पूर्णक्षय के साथ ही उसका
शरीरपात हो जाता है तथा वह पूर्णकाम, आप्तकाम और निष्काम बन जाता
है। अन्ततः सभीप्रकार की इच्छाओं से मुक्त होने पर वह ब्रह्म ही बन जाता
है।
जीवन्मुक्त की मोक्षावस्था के बारे में आचार्यों का कथन है कि
जिसप्रकार वायु पुष्प के मध्य में स्थित गन्धकोष से गंध लेकर बहता है।
उसीप्रकार सामान्यरूप से लिङ्गशरीर, मनसहित इन्द्रियों को ग्रहण करके एक
शरीर का परित्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है, किन्तु जीवन्मुक्त का
न केवल प्रारब्धकर्मों के उपभोग से स्थूलशरीर, अपितु अज्ञान के हेतु रूप
में अविद्यमान होने के कारण सूक्ष्मशरीर, यहाँ तक कि ज्ञान के उदय से
कारणशरीर भी विनष्ट हो जाता है। इसप्रकार इन तीनों शरीरों के समाप्त
होने से साधक देहमुक्त होकर परमब्रह्म में ठीक उसीप्रकार विलीन हो जाता
है, जैसे- तप्ततवे पर गिरी जल की बूँदें उसी में समा जाती हैं या समुद्र में
उठने वाली लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं। जिसप्रकार लहरों के समुद्र
में समा जाने पर समुद्र और लहरों में किसीप्रकार का कोई भेद नहीं रहता
है, ठीक उसीप्रकार जीवन्मुक्त एवं परमब्रह्म में कोई भेद नहीं रहता है।
(२३) आत्मविषयक विभिन्न मत-आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में
बौद्ध, चार्वाक एवं मीमांसक आचार्यों के आत्मविषयक मतमतान्तरों को
प्रस्तुत करते हुए वेदान्त की दृष्टि से यथार्थरूप में आत्मतत्त्व का प्रतिपादन