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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 98 of 314

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८४ $\hspace{10cm}$ वेदान्तसार
सम्पूर्ण भिन्नता का मूल आधार समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद ही है, जो मात्र
समुदाय एवं वैयक्तिक दृष्टि है। तात्त्विकदृष्टि से इसमें कोई अन्तर नहीं है।
उपर्युक्त सम्पूर्ण स्थिति को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं—
चित्र-१४
समष्टि $\qquad$ $\fbox{तुरीय (ब्रह्म)}$ $\qquad$ व्यष्टि
शुद्धसत्त्वप्रधान अविद्या से आवृत्त $\qquad$ मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त
अहंभाव
ईश्वर $\longleftrightarrow$ कारणशरीर में आनन्दमय कोष $\longleftrightarrow$ प्राज्ञ (जीव) — सुषुप्ति अवस्था
हिरण्यगर्भ $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ सूक्ष्मशरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव तैजस् — स्वप्नावस्था
$\fbox{विज्ञानमय मनोमय प्राणमय कोष}$
वैश्वानर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ स्थूल शरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ विश्व — जाग्रदावस्था
अन्नमय कोष
$\fbox{भोगायतन}$
समष्टि व्यष्टि एवं इनके अभेद को विभिन्न उदाहरणों द्वारा इसप्रकार भी
प्रदर्शित किया जा सकता है—
चित्र १५
$\fbox{तात्त्विक दृष्टि से अभेद}$
वन $\longleftarrow \hspace{7cm} \longrightarrow$ वृक्ष
जलाशय $\longleftarrow \hspace{6.5cm} \longrightarrow$ जल
वनगत आकाश $\longleftarrow \hspace{5.5cm} \longrightarrow$ वृक्षगत आकाश
जलाशयगत आकाश $\hspace{4.5cm} \longrightarrow$ जलगत आकाश
व्यक्ति समूह (भीड़) $\longleftarrow \hspace{4.5cm} \longrightarrow$ व्यक्ति
$\fbox{समष्टि}$ $\hspace{8cm}$ $\fbox{व्यष्टि}$
(१७) सत्ता के त्रिविधरूप—वेदान्तदर्शन तीन प्रकार की सत्ता को
मान्यता प्रदान करता है—(1) प्रातिभासिक (2) व्यावहारिक