वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 93 of 314
Read in contextभूमिका ७९
से बाहर हैं पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि के अभाव को इस प्रमाण द्वारा
ग्रहण नहीं किया जा सकता है।
इनके मत में यह अनुपलब्ध अर्थात् अभाव चार प्रकार का होता
है-(1) प्राग्-अभाव (2) प्रध्वंस-अभाव (3) अत्यन्त-अभाव तथा (4)
अन्योन्य-अभाव। इन चारों प्रकार का अभावों को हम अनुपलब्धिप्रमाण से
ही ग्रहण कर सकते हैं।
चित्र-१३
अनुपलब्धि प्रमाण
1 | 2 | 3 | 4
प्राक्-अभाव | प्रध्वंस-अभाव | अत्यन्त-अभाव | अन्योन्य-अभाव
(उत्पत्ति से पहले | (निर्माण के बाद | (कालत्रय में रहने वाला | (एक वस्तु में अन्य
मृत्पिण्ड में कार्य | दण्ड आदि से विनष्ट | अभाव - यथा वायु | वस्तु का यथा-घट
रूप घट का अभाव) | घट का अभाव) | में रूप का) | में पट का)
उपर्युक्त प्रदर्शन से स्पष्ट है कि किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पहले
अपने कारण में स्थितिरूप अभाव का ज्ञान 'प्राग्-अभाव' है जो
अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्राह्य होगा। जैसे-घट के निर्माण से पूर्व वह
अपने कारणरूप मृत्पिण्ड में विद्यमान रहता है, किन्तु दृश्यमानजगत् में
उसका अभाव प्रतीत होता है। अतः इस अभाव को केवल अनुपलब्धि
प्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं।
इसीप्रकार किसी वस्तु के निर्माण के बाद कारणविशेष से विनष्ट होने
के पश्चात् होने वाले अभाव को 'प्रध्वंसाभाव' कहा जाएगा जो अनुपलब्धि
प्रमाण से ही ग्रहण किया जा सकता है। जैसे-घट के बनने के बाद किसी
व्यक्ति द्वारा उसे डण्डे से तोड़ देने के परिणामस्वरूप होने वाला अभाव
प्रध्वंसाभाव होगा।
इसके अतिरिक्त जो भूत-भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान
रहने वाला है, इसप्रकार के अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं जिसे हम
अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्रहण कर सकते हैं। इस अभाव को वायु में रूप
के अभावरूप उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, क्योंकि वायु में रूप
(दिखायी देने) का गुण नहीं होता और यह अभाव तीनों कालों में रहने
वाला है। अतः अत्यन्ताभाव की कोटि में आएगा।