वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextभूमिका ८३
इसीप्रकार किसी वन के वृक्षों को यदि हम अलग-अलग कहना चाहें
तो वृक्ष कहा जाएगा। साथ ही जलाशय में स्थित जल को अलग-अलग
कहने की दृष्टि से 'अनेक जल' ऐसा प्रयोग करेंगे। ठीक उसीप्रकार अज्ञान
को व्यष्टिरूप में कहने की इच्छा से 'अनेक अज्ञान' कहकर उसमें बहुत्व
का व्यवहार करेंगे। अतः सिद्ध होता है कि व्यक्तिगत तथा समुदायगत
व्यापक भाव के कारण ही अनेकता (व्यष्टि) तथा एकता (समष्टि) का
व्यवहार किया जाता है। अज्ञान की यह व्यष्टि, समष्टि की अपेक्षा निकृष्ट
उपाधि से युक्त होने के कारण मलिनसत्त्वप्रधान मानी गयी है।
साथ ही इस निकृष्ट उपाधि से आवृत्त चैतन्य में अल्पज्ञता, अनीश्वरत्व
आदि गुण होने के कारण तथा एक ही अज्ञान को प्रकाशित करने वाला
होने से 'प्राज्ञ' कहा गया है। इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ (जीव) में
केवल समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों एक हैं, क्योंकि
चैतन्य दोनों में विद्यमान है।
अज्ञान की निकृष्ट उपाधि से युक्त इस जीव की यह उपाधि, अहंकार
आदि का कारण होने से 'कारणशरीर' आनन्द का प्राचुर्य तथा शुद्धचैतन्य
को कोष के समान ढक लेने से 'आनन्दमयकोष' एवं स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्च का
लयस्थान होने के कारण 'सुषुप्ति' कहलाती है।
वेदान्त की दृष्टि में सृष्टिविकास की तीन दशाओं में आत्मा और जगत्
के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं, जिन्हें तीन अवस्था (सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत)
तीन शरीर (कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल) तथा प्रपञ्च कोषों को आनन्दमय,
विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय) नामों से व्यवहृत किया जाता है। इन
सभी स्थितियों में समष्टि-व्यष्टिगत भेद से चैतन्य को अलग-अलग नामों
से कहा जाता है। इसका मुख्यकारण भिन्न-भिन्न स्थितियों में अलग-अलग
शरीर के प्रति चैतन्य का अहंभाव रहता है।
जैसे-समष्टि में कारणशरीर के प्रति चैतन्य को अहंभाव के कारण इसे
ईश्वर, इसी स्थिति में सूक्ष्मशरीर के प्रति उसके अहंभाव के कारण इसे
हिरण्यगर्भ तथा स्थूलशरीर के प्रति विद्यमान अहंभाव के कारण इसे
वैश्वानर या विराद् इस नाम से जाना जाता है।
इसके विपरीत व्यष्टिदशा में कारणशरीर के प्रति चैतन्य के अहंभाव के
कारण इसे 'प्राज्ञ', सूक्ष्मशरीर के प्रति अहंभाव के कारण 'तैजस्' तथा
स्थूलशरीर के प्रति अहंकार के कारण इसे 'विश्व' कहा जाता है। इस