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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 103 of 314

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Page 103

भूमिका ८९

गयी है। वेदान्त में माया अथवा अज्ञान को सत्त्व, रजस्, तमस् तीनों गुणों
की सम अवस्था माना गया है। अतः इसके प्रभाव से उत्पन्न आकाशादि
सृष्टि में इन तीनों गुणों की स्थिति की विद्यमानता को स्वीकार किया गया
है। आकाशादि में जड़ता उनमें तमोगुण की प्रधानता को सिद्ध करती है।
वेदान्त के अनुसार-कारणशरीर से उत्पन्न आकाशादि सूक्ष्मभूततन्मात्र या
अपञ्चीकृतभूत कहलाते हैं।
यह दर्शन पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा इन पाँचों सूक्ष्मतन्मात्राओं से महाभूतों
की उत्पत्ति स्वीकार करता है। इसके अनुसार आकाश में शब्द, वायु में
स्पर्श, अग्नि में रूप, जल में रस तथा पृथिवी में गन्ध नामक गुण विद्यमान
रहते हैं, किन्तु पञ्चीकृतभूतों में इनकी स्थिति इसप्रकार रहती है-आकाश
में शब्द, वायु में शब्द एवं स्पर्श, अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप, जल में
शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध।
वेदान्त में स्थूलसृष्टि का चरमविकास क्रमशः ब्रह्माण्ड (चौदह भुवन)
भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् इत्यादि सात ऊर्ध्वलोक तथा
अतल, वितल, सुतल, तलातल रसातल, महातल और पाताल आदि सप्त
अधःलोकों के रूप में होता है। साथ ही इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से ही
समस्त सांसारिक भोग्यपदार्थों एवं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की सृष्टि होती
है। इसे स्थूलसृष्टि का चरमविकास कहा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत आकाशादि सूक्ष्मभूतों से यह दर्शन सत्रह
अवयवों वाले सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति को भी स्वीकार करता है। जिनमें
आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सात्त्विक अंशों से क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसना और घ्राण इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। ये सभी सूक्ष्म
इन्द्रियाँ क्रमशः अपने-अपने विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध को
ग्रहण करती हैं।
इसीप्रकार आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से क्रमशः वाक्, पाणि,
पाद, पायु और उपस्थ ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। जो क्रमशः वाणी,
आदान-प्रदान, गमन, मलोत्सर्जन तथा सन्तति उत्पन्न करना आदि कार्यों को
सम्पादित करती हैं।
ठीक इसीप्रकार आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सम्मिलित रजोंऽशों से
प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान इन पञ्चवायुओं की उत्पत्ति होती है।
जो वस्तुतः स्थूलशरीर की शक्ति हैं तथा अणुरूप में शरीर के विभिन्न
अंगों में व्याप्त हैं। साथ ही आकाशादि पञ्चतन्मात्राओं के सम्मिलित