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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 94 of 314

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८० वेदान्तसार
चतुर्थ, अन्योन्याभाव एक वस्तु में दूसरी वस्तु के अभाव को कहते हैं।
जैसे घट में कभी भी पट विद्यमान नहीं रह सकता। अतः इसप्रकार के
अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'अनुपलब्धि' नामक षष्ठप्रमाण की
आवश्यकता होगी ही, क्योंकि उक्त चारों प्रकार के अभावों के ज्ञान को
हम प्रत्यक्षादि शेष पाँच प्रमाणों द्वारा ग्रहण नहीं कर सकते हैं।
(१५) कार्यकारणसिद्धान्त- कार्यकारणसिद्धान्त भारतीय दर्शनशास्त्र
का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यही सिद्धान्त किसी भी दर्शन की सृष्टिप्रक्रिया
का मुख्य आधार है। चार्वाकदर्शन को छोड़कर प्रायः सभी दर्शनों ने इस
विषय पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षरूप से विचार किया है। पुनरपि सांख्य एवं
न्यायदर्शन में इस सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा की गई है।
कार्यकारणसिद्धान्त को लेकर प्रचलित मतों को मुख्यरूप से तीन श्रेणियों में
विभाजित किया जा सकता है-
(क) सत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से
ही सत् कार्य की उत्पत्ति हो सकती है। इसलिए उत्पत्ति से पहले कार्य
अपने कारण में विद्यमान रहता है। इस मान्यता को सांख्यदर्शन ने
विस्तारपूर्वक प्रस्थापित किया, जिसे सत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है।
(ख) असत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार-उत्पत्ति से पहले
कार्य का अपने कारण में प्राग्भाव रहता है। अतः असत् कारण से सत् कार्य
की उत्पत्ति होती है। इस मान्यता के अनुसार कारणविशेष से कार्यविशेष
स्वभाववश उत्पन्न होता है। इसमें किसी अन्य हेतु की परिकल्पना उचित
नहीं है। इस सिद्धान्त के मानने वालों में न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध तथा
मीमांसादर्शन विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं।
(ग) सत् से असत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण)
से असत् (कार्य) की उत्पत्ति होती है। वेदान्तदर्शन ने इसी मान्यता को
प्रस्थापित किया, क्योंकि यह दर्शन सत् ब्रह्म से असत् जगत् की उत्पत्ति को
स्वीकार करता है। यही सिद्धान्त इसकी सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है।
यहाँ किसी भी कार्य की उत्पत्ति के लिए मूल आधारभूत कारण उपादान है,
जैसे घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी। साथ ही जिनके सहयोग से कार्य उत्पन्न
होता है, वे निमित्तकारण कहलाते हैं, जैसे-कुम्हार, तुरी, वेमा आदि।