Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 109 of 314

Read in context
Page 109

भूमिका ९५
निरन्तर ध्यान करने के परिणामस्वरूप जब साधक को ज्ञाता, ज्ञान आदि
विकल्पों का भान नहीं रहता है तथा उसकी चित्तवृत्ति एकमात्र अद्वितीय
वस्तु ब्रह्म में ही एकीभाव को प्राप्त कर लेती है, उसे अपना व ज्ञान दोनों
में से किसी का बोध नहीं रहता। उसी स्थिति को दर्शन निर्विकल्पक
समाधि कहता है। यही साधक की उत्कृष्टतमस्थिति है। इसे उदाहरण द्वारा
हम इसप्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं-
जिसप्रकार पानी में घुल जाने पर नमक के अस्तित्व की प्रतीति
प्रत्यक्षतः नहीं होती है, जबकि उसका अस्तित्व विद्यमान रहता है। ठीक
इसीप्रकार जब चित्तवृत्ति उस अद्वितीयवस्तु ब्रह्म के साथ आत्यन्तिक तादात्म्य
को प्राप्त कर लेती है। उससमय चित्तवृत्ति का अस्तित्व होने पर साधक को
उसकी प्रतीति नहीं होती, एकमात्र ब्रह्म का ही बोध होता है। बस यही
निर्विकल्पक समाधि कहलाती है। इस विषय में विद्यारण्यस्वामी कहते हैं-
ध्यातृध्याने परित्यज्य क्रमाद्ध्येयैकगोचरम्।
निवातदीपवच्चित्तं समाधिरभिधीयते॥
अर्थात् जिससमय चित्त, ध्याता एवं ध्यान की प्रतीति का परित्याग करके
एकमात्र ध्येय ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति करता है, उसे समाधि कहते हैं। इस
अवस्था में चित्त वायुरहित स्थान में रखे दीपक के समान पूर्णतया निश्चल
हो जाता है। आचार्य सदानन्द इसका इसप्रकार उल्लेख करते हैं-
“निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयापेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा
कारितायाश्चित्तवृत्तितितरामेकाकीभावेनावस्थानम्”
अर्थात् ज्ञाता एवं ज्ञान आदि के भेद का लोप होकर एकमात्र अद्वैतवस्तु
ब्रह्म में तदाकार आकारित चित्तवृत्ति का एकीभाव ही निर्विकल्पक समाधि
अथवा ज्ञान कहलाता है।
(२२) जीवन्मुक्त का लक्षण-चार्वाक को छोड़कर सभी
भारतीयदर्शनों की मान्यता है कि संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने किए हुए
कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यह फल शुभ, अशुभ अथवा शुभाशुभ
किसी भी प्रकार का हो सकता है, किन्तु कोई भी साधक विवेकज्ञान द्वारा
इस कर्मफल को भस्मसात् करने में समर्थ है। मुण्डकोपनिषद् का यह कथन
भी इसकी पुष्टि में प्रमाण है-