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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 106 of 314

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Page 106

९२ वेदान्तसार
[चित्र/फ्लोचार्ट : वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया]
┌───────────────────────────────┐ ┌──────────────────────────────┐
│ अपञ्चीकृत महाभूतों से सूक्ष्म सृष्टि │ │ पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूल सृष्टि │
└──────────────┬────────────────┘ │ १४ भुवन (ब्रह्माण्ड) │
│ └──────────────┬───────────────┘
┌──────────────┴───────────────────────────┐ │
│ नासिका गुदा सम्पूर्णशरीर उदर कण्ठस्थानी │ ┌────────────┴───────────┐
│ प्राण अपान व्यान समान उदान │ │ सप्तऊर्ध्व लोक सप्तअधःलोक │
└──────────────┬──────────────────────────┘ │(भू भुवःस्वः आदि) (अतलवितलादि) │
│ └────────────┬───────────┘
┌──────────┐ │ पञ्चप्राण रजॊऽशो से पृथक्-पृथक् ┌─────────┐ ┌───────┴──────┐ ┌─────────────┐
│स्वप्नावस्था│ │ │प्रणमयकोष│ │समस्त सांसारिक│ │ प्राणियों के │
└──────────┘ │ └─────────┘ │ भोग्य पदार्थ │ │ स्थूल शरीर │
श्रोत्र आकाश उपस्थ आनन्द सन्तानोत्पत्ति└──────────────┘ └──────┬──────┘
┌────┐त्वक् ┌───────────┐वायु ┌───────────┐पायु मलोत्सर्जन ┌──────┴──────┐
│ │ │सात्त्विक अंशों│ │रजॊऽशों से │ │ अन्नमय कोष │
│ग्रहण│चक्षु │से अलग- │अग्नि│अलग-अलग │पाद चलना └──────┬──────┘
│करना│रसना │अलग │जल │पञ्चकर्मेन्द्रियाँ│पाणि आदान प्रदान │ जरायुज
│ │घ्राण │पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ│पृथिवि └───────────┘वाक् बोलना │ अण्डज
└────┘ └─────┬─────┘ │ स्वेदज
┌─────────┐ ┌─────┴───────┐ ┌────────────┐ │ उद्भिज्ज
│विज्ञानमय│ │सभी के सत्त्वांशों│ │जाग्रतावस्था│ ▼
│ कोष │ │से मिलकर │ └────────────┘ ┌──────────────┐
└────┬────┘ │अन्तःकरण │ │ जीवों के अनेक│
│ └──────┬──────┘ ┌────────────┐ │ प्रकार काकारण│
│ │ │ मनोमयकोष │ └──────┬───────┘
│ └──────────┼────────────┘ │
│ │ ┌────────────────────┴───┐
┌────┴────────────┐ ┌─────────┴──────┐ │ अशुद्धि की न्यूनाधिकता │
│ निश्चयात्मिका बुद्धि │ │ संशयात्मक मन │ │ अविद्या की विचित्रता │
└─────────────────┘ └────────────────┘ └────────────────────────┘
( वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया )
(२०) अध्यारोप-अपवाद- ये दोनों वेदान्तदर्शन के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण
सिद्धान्त हैं, क्योंकि यहाँ परमब्रह्म एवं जगत् पर विचार करने के ये ही
मुख्य आधार हैं। अतः इस प्रसङ्ग में इनकी विवेचना आवश्यक है।
अध्यारोप एवं अपवाद वस्तुतः ऐसे सिद्धान्त हैं, जिनके द्वारा प्रत्यक्ष से
अप्रत्यक्ष का, ज्ञात से अज्ञात का, मूर्त से अमूर्त का बोध होता है।
इसमें प्रथम अध्यारोप द्वारा वस्तु में अवस्तु का आरोप किया जाता है,
जैसे-रज्जु में सर्प का आरोप। यह आरोप वस्तुतः मिथ्याज्ञान है, जिसका
बाद में 'अपवाद' विधि द्वारा निराकरण कर दिया जाता है। ऐसा करने से
वस्तु के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान हो जाता है। सम्पूर्ण वेदान्तदर्शन इन्हीं दो