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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

तुरीय निरूपण

१६८ वेदान्तसार
(३) चैतन्य से प्रकाशित विलीन हुई ये अन्तःकरण की सूक्ष्मातिसूक्ष्म
वृत्तियाँ ही कारणशरीर या सुषुप्ति अवस्था में ईश्वर एवं जीव को आनन्द
का अनुभव कराने में सहायक होती हैं।
(४) चैतन्य से आलोकित अज्ञान की ये वृत्तियाँ स्वप्न एवं जाग्रत
अवस्था में अन्तःकरण के रूप में विकसित होती हैं, किन्तु सुषुप्ति अवस्था
में इनका निर्माण नहीं होता, अपितु वहाँ ये बीज में वृक्ष के समान
सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूप में विद्यमान रहती हैं।
(५) प्रस्तुत गद्यखण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-३२
सुषुप्तिः अवस्थायाम्
↓
(क) एतौ ईश्वर-प्राज्ञौ
चैतन्यदीप्ताभिः अतिसूक्ष्माभिः
अज्ञान वृत्तिभिः आनन्दं अनुभवतः
चित्र-३३
(ख) माया - समष्टिः व्यष्टिः -अविद्या
↓ ↓
वन वृक्ष
↓ ↓
वन से अवच्छिन्न आकाश अभेदः वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश
↓ ↓
जलाशय जल
↓ ↓
जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में प्रतिबिम्बित आकाश
↓ ↓
वत् (समान) वत् (समान)
↓ ↓
ईश्वरः प्राज्ञः
विद्यते
अवतरणिका- तदनन्तर ईश्वर एवं प्राज्ञ से भिन्न चतुर्थ शुद्धचैतन्य
अथवा तुरीय के विषय में कहते हैं-
वनवृक्षतदवच्छिन्नाकाशयोर्जलाशयजलतद्ग तप्रतिबिम्बाकाशयोर्वाधारभू
तानुपहिताकाशवदनयोरज्ञानतदुपहितचैतन्ययोराधारभूतं यदनुपहितं चैतन्यं

तुरीय-निरूपण १६१
तत्तूरीयमित्युच्यते “शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्त” इत्यादिश्रुतेः। इदमेव तुरीयं
शुद्धचैतन्यमज्ञानादितदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं
सन्महावाक्यस्य वाच्यं विविक्तं सल्लक्ष्यमिति चोच्यते॥९॥
पदच्छेद-वन-वृक्ष-तद्-अवच्छिन्न-आकाशयोः जलाशय-जल- तद्गत-
प्रतिबिम्ब- आकाशयोः वा आधारभूत-अनुपहित-आकाशवद् अनयोः अज्ञान
तद् उपहित चैतन्ययोः आधारभूतम् यद् अनुपहितम् चैतन्यम्, तत् तुरीयम्
इति उच्यते। “शिवम् अद्वैतम् चतुर्थम् मन्यते” इत्यादि श्रुतेः।
इदम् एव तुरीयम् शुद्धचैतन्यम् अज्ञान-आदि, तद् उपहित चैतन्याभ्याम्
तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सन् महावाक्यस्य वाच्यम्, विविक्तम् सत्
लक्ष्यम् इति च उच्यते॥९॥
अनुवाद–वन में स्थित आकाश एवं वृक्ष में स्थित आकाश अथवा
जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित होने वाले दोनों आकाशों के आधार,
उपाधिरहित महा आकाश के समान, समष्टिव्यष्टिगत इन दोनों अज्ञानों एवं
इनकी उपाधियों से युक्त ईश्वर और प्राज्ञ दोनों चैतन्यों का आधार
उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है। वही 'तुरीय' इस नाम से भी कहा जाता है।
'अद्वैतब्रह्म को ही चतुर्थ मानते हैं' इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है)।
यही 'तुरीय' उपाधिरहित शुद्धचैतन्य (ब्रह्म), अज्ञान आदि एवं उनकी
उपाधि से युक्त दो चैतन्यों (ईश्वर और जीव) के साथ 'तप्त लोहपिण्ड के
समान' जो एकत्वसूचक व्यवहार होता है। वही महावाक्य (तत्त्वमसि) का
वाच्यार्थ है। जो अनेकत्व की विवक्षा होने पर (महावाक्य) का लक्ष्यार्थ
इसीरूप में कहा जाता है।
'चन्द्रिका'–यहाँ तक वर्णित समष्टिगत अज्ञान, व्यष्टिगत अज्ञान एवं इन
दोनों की उपाधियों से युक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य, इन सभी का मुख्य
आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म को बताते हुए उदाहरण देकर
समझाते हैं कि जिसप्रकार समष्टिरूप वन में स्थित अनेकवृक्षों से आच्छादित
आकाश तथा व्यष्टिरूप वृक्ष के द्वारा आच्छादित आकाश, इसीप्रकार
समष्टिरूप जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल की व्यष्टि, एक बूँद
में प्रतिबिम्बित आकाश, इन सभी का आधार समस्तप्रकार की उपाधियों से
रहित महा आकाश है। ठीक उसीप्रकार समष्टिव्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों
उपाधियों से विशिष्ट ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्यों का एकमात्र आधार

१७० वेदान्तसार
विशुद्धचैतन्य परंब्रह्म ही है। इसीको वेदान्त ने 'तुरीय' अर्थात् चतुर्थ संज्ञा
प्रदान की है।
परमविशुद्धचैतन्य को 'तुरीय' कहने पर विभिन्न आचार्यों ने
अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। जैसे (1) शङ्कराचार्य के अनुसार प्राज्ञ,
तेजस् और विश्व की अपेक्षा चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहा जाता
है। (2) सुषुप्ति, स्वप्न और जाग्रत इन तीन अवस्थाओं से भिन्न अर्थात्
चतुर्थ होने के कारण इसे 'तुरीय' कहते हैं। (3) आपदेव ने अविद्या, ईश्वर
और प्राज्ञ की अपेक्षा चतुर्थ होने से इसे 'तुरीय' माना है। प्रस्तुत ग्रन्थ में
उक्त सभी का प्रतिपादन किया गया है। अतः इन सभी दृष्टियों से शुद्ध
चैतन्य का 'तुरीय' नाम उचित ही है।
इसी क्रम में अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार 'शिवम्' इत्यादि
श्रुतिवचन प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। 'शिव' शब्द यहाँ परंब्रह्म शुद्ध
चैतन्य के लिए प्रयुक्त हुआ है। सभी वेदान्तशास्त्रों ने प्रायः विशुद्ध ब्रह्म
अथवा अद्वैत ब्रह्म को ही चतुर्थ माना है। प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को चित्र
के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है-
चित्र-३४
यथा
वन से वृक्ष से
अवच्छिन्न आकाश
आधारभूत महाकाश
जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश जल में
तथैव
समष्टि विषयक अज्ञान आधारभूत शुद्ध ब्रह्म व्यष्टि विषयक अज्ञान
तदुपहित ईश्वर जीव तदुपहित
चैतन्य चैतन्य
चतुर्थ-तुरीय-चतुर्थ
तत्पश्चात् प्रस्तुत खण्ड के द्वितीय अंश को स्पष्ट करते हैं-

तुरीय-निरूपण १७१
जैसाकि अनुबन्धचतुष्टय में विषय नामक अनुबन्ध का प्रतिपादन करते
हुए ग्रन्थकार ने कहा कि जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करना ही
इस ग्रन्थ का विषय है-'विषयो जीवब्रह्मैक्यं शुद्धचैतन्यं प्रमेयं तत्रैव
वेदान्तानां तात्पर्यात्।' किन्तु अज्ञान की समष्टिव्यष्टि के विवेचन में मुख्य
प्रतिपाद्यविषय कहीं विस्मृत न हो जाए, इस दृष्टि से ग्रन्थकार प्रस्तुत
गद्यखण्ड में विशुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित समष्टिरूप ईश्वर एवं
मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित व्यष्टिरूप जीव या प्राज्ञरूप चैतन्य
तथा तुरीयरूप विशुद्धचैतन्य, परमब्रह्म ये तीनों तात्त्विकदृष्टि से एक हैं,
क्योंकि इन तीनों में चैतन्य समानरूप से विद्यमान है। ऐसा कहकर ब्रह्म और
जीव की एकता प्रतिपादित करते हैं।
इसी अभिप्राय को समझाने के लिए ग्रन्थकार 'तप्तायः पिण्ड' का
उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। किसी लोहे के टुकड़े को आग में गर्म करके पूरी
तरह लाल कर लेते हैं। इस स्थिति में लोहे के भार आदि पार्थिव अंश के
विद्यमान रहते हुए भी इसमें अग्नि के गुण दाहकता आदि से युक्त होने के
कारण, इसे हम आग का गोला भी कहते हैं, किन्तु उससे जलने पर 'लोहे
के टुकड़े से जल गया' इसप्रकार व्यवहार करते हैं। यहाँ अग्नि लोहे में
व्याप्यव्यापकभाव से विद्यमान होने से दोनों की अभिन्नता का प्रतिपादन
वाच्यार्थ होगा।
प्रस्तुत अंश के अभिप्राय एवं ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों के
आशय को समझने के लिए हमें पहले तीन शब्दशक्तियों को समझना
होगा-(1) अभिधा (2) लक्षणा और (3) व्यञ्जना। इनमें अभिधा-शब्द
के साक्षात् संकेतित अर्थ को कहती है। जैसे- गङ्गायां घोषः उदाहरण में
इसका साक्षात् संकेतित अर्थ है-'जल प्रवाह में बस्ती' (घोष)। यह
संकेतित अर्थ मुख्यार्थ या वाच्यार्थ कहलाएगा; जिसका प्रतिपादन अभिधा
शब्दशक्ति के माध्यम से किया जाता है।
मुख्य अर्थ का बाध होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन द्वारा लक्षणा शब्द
शक्ति अन्य अर्थ की प्रतीति कराती है, जिसे लक्ष्यार्थ कहा जाता है।
जैसे-उपर्युक्त उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' में बस्ती का जलप्रवाह में रहना
असम्भव होने से मुख्यार्थबाध हुआ। अतः प्रयोजनवश लक्षणा शब्दशक्ति
द्वारा हमें तत्सम्बद्ध अन्य 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है तथा यह
तटरूप अर्थ ही लक्ष्यार्थ कहलाता है। तत्पश्चात् व्यञ्जना शब्दशक्ति द्वारा
उस बस्ती में शीतत्व पावनत्व की प्रतीति करायी जाती है। यह शीतत्व
पावनत्व रूप अर्थ व्यङ्ग्यार्थ कहलाएगा।
'तपे हुए लोहे के टुकड़े' (तप्तायः पिण्ड) रूप प्रस्तुत उदाहरण में
दाहकता अग्नि का धर्म है जो लोहे के टुकड़े में समा गया है। इसलिए

१७२ वेदान्तसार
लोहपिण्ड और अग्नि इन दोनों की अभिन्नता यहाँ वाच्यार्थ मानी जाएगी,
जिसकी प्रतीति में अभिधा शब्दशक्ति सहायक होती है। जबकि यहाँ ‘अयः
पिण्ड’ द्वारा अपने से सम्बद्ध अग्नि का लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया
जाता है। अतः लोहपिण्ड एवं अग्नि में भिन्नता की प्रतीति का लक्षणा
शब्दशक्ति द्वारा बोध कराया जाता है। अतः लोहपिण्ड और अग्नि में
भिन्नता की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा होगी तथा इन दोनों की यह
भिन्नता ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगी।
ठीक इसीप्रकार तत्त्वमसि इत्यादि महाकाव्य में अज्ञानोपहित चैतन्य एवं
तुरीयरूप चैतन्य में अभिन्नता का प्रतिपादन वाच्यार्थ होगा तथा इन दोनों की
भिन्नता की प्रतीति कराना ही यहाँ लक्ष्यार्थ कहलाएगा, जिसकी प्रतीति
कराने में लक्षणा शब्दशक्ति सहायक होगी।
ग्रन्थ के अन्त में प्रतिपादित महावाक्यों ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि में इन तीनों
की इस एकता का प्रतिपादन ही वाच्यार्थरूप में किया गया है। इसके
अतिरिक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य की अपेक्षा विशुद्धचैतन्य की भिन्नता
का प्रतिपादन ही इस महावाक्य या महावाक्यों का लक्ष्यार्थ माना जाएगा।
विशेष-(1) साहित्यदर्पणकार ने लक्षणा का लक्षण इसप्रकार किया
है-
“मुख्यार्थबाधे तद्युक्तो ययाऽन्योऽर्थः प्रतीयते।
रूढेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणाशक्तिरर्पिता।।”
(2) तुरीय-चतुर+छ (चतुरश्छयतावाद्याक्षर लोपश्च) वार्तिक से च लोप।
(3) प्रस्तुत खण्ड के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा
सकता है-

चित्र-३५

विशुद्ध सत्त्वप्रधान अज्ञान          शुद्ध चैतन्य          मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान
से उपहित समष्टि                                          से उपहित व्यष्टि
|                                                        |
ईश्वर ―――― तत्                 तुरीय                    त्वम् ―――― जीव
(चतुर्थ)
┌─────────────────┐                                      ┌─────────────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            तत्त्वमसि                 │ भिन्नता की प्रतीति  │
└────────┬────────┘                ↓                     └────────┬────────┘
(वाच्यार्थ)            व्याप्यव्यापकभाव                 (लक्ष्यार्थ)
┌────────┴────────┐                ↓                     ┌────────┴────────┐
│ अभिन्नता की प्रतीति │            (लोहपिण्ड)                │ भिन्नता की प्रतीति  │
└─────────────────┘                ↓                     └─────────────────┘
(अग्नि)