वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुरीय-निरूपण १६१
तत्तूरीयमित्युच्यते “शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्त” इत्यादिश्रुतेः। इदमेव तुरीयं
शुद्धचैतन्यमज्ञानादितदुपहितचैतन्याभ्यां तप्तायः पिण्डवदविविक्तं
सन्महावाक्यस्य वाच्यं विविक्तं सल्लक्ष्यमिति चोच्यते॥९॥
पदच्छेद-वन-वृक्ष-तद्-अवच्छिन्न-आकाशयोः जलाशय-जल- तद्गत-
प्रतिबिम्ब- आकाशयोः वा आधारभूत-अनुपहित-आकाशवद् अनयोः अज्ञान
तद् उपहित चैतन्ययोः आधारभूतम् यद् अनुपहितम् चैतन्यम्, तत् तुरीयम्
इति उच्यते। “शिवम् अद्वैतम् चतुर्थम् मन्यते” इत्यादि श्रुतेः।
इदम् एव तुरीयम् शुद्धचैतन्यम् अज्ञान-आदि, तद् उपहित चैतन्याभ्याम्
तप्त-अयः पिण्डवद् अविविक्तम् सन् महावाक्यस्य वाच्यम्, विविक्तम् सत्
लक्ष्यम् इति च उच्यते॥९॥
अनुवाद–वन में स्थित आकाश एवं वृक्ष में स्थित आकाश अथवा
जलाशय एवं जल में प्रतिबिम्बित होने वाले दोनों आकाशों के आधार,
उपाधिरहित महा आकाश के समान, समष्टिव्यष्टिगत इन दोनों अज्ञानों एवं
इनकी उपाधियों से युक्त ईश्वर और प्राज्ञ दोनों चैतन्यों का आधार
उपाधिरहित शुद्धचैतन्य है। वही 'तुरीय' इस नाम से भी कहा जाता है।
'अद्वैतब्रह्म को ही चतुर्थ मानते हैं' इत्यादि श्रुतिवचन (इसमें प्रमाण है)।
यही 'तुरीय' उपाधिरहित शुद्धचैतन्य (ब्रह्म), अज्ञान आदि एवं उनकी
उपाधि से युक्त दो चैतन्यों (ईश्वर और जीव) के साथ 'तप्त लोहपिण्ड के
समान' जो एकत्वसूचक व्यवहार होता है। वही महावाक्य (तत्त्वमसि) का
वाच्यार्थ है। जो अनेकत्व की विवक्षा होने पर (महावाक्य) का लक्ष्यार्थ
इसीरूप में कहा जाता है।
'चन्द्रिका'–यहाँ तक वर्णित समष्टिगत अज्ञान, व्यष्टिगत अज्ञान एवं इन
दोनों की उपाधियों से युक्त ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्य, इन सभी का मुख्य
आधार उपाधिरहित शुद्धचैतन्यरूप ब्रह्म को बताते हुए उदाहरण देकर
समझाते हैं कि जिसप्रकार समष्टिरूप वन में स्थित अनेकवृक्षों से आच्छादित
आकाश तथा व्यष्टिरूप वृक्ष के द्वारा आच्छादित आकाश, इसीप्रकार
समष्टिरूप जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल की व्यष्टि, एक बूँद
में प्रतिबिम्बित आकाश, इन सभी का आधार समस्तप्रकार की उपाधियों से
रहित महा आकाश है। ठीक उसीप्रकार समष्टिव्यष्टिगत अज्ञान एवं इन दोनों
उपाधियों से विशिष्ट ईश्वर एवं प्राज्ञरूप चैतन्यों का एकमात्र आधार