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वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-

८४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
विशेष से रस उपलब्ध होता है, अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से
गन्ध उपलब्ध होता है और अनेक द्रव्यों के संयोग और गन्ध विशेष से
गन्ध उपलब्ध होता है ॥ ९ ॥
शङ्का-पाषाणादि में जो गन्ध है वह तो नासिका से उपलब्ध नहीं होता,
तब नवम सूत्र का व्याख्यान कैसे ठीक माना जाय ? उत्तर-
१६७-तस्याऽभावादव्यभिचारः ॥ १० ॥
( तस्य ) उस गन्ध विशेष के ( अभावात् ) उद्भूत न होने से ( अव्य-
भिचारः ) नियम का भङ्ग नहीं होता ॥
पाषाणादि में गन्ध है तो सही परन्तु छिपा हुवा है इस लिये उपलब्ध
नहीं होता, तब नवम सूत्र का व्याख्यान शङ्का के योग्य नहीं रहता । यदि
पाषाण में सर्वथा गन्ध न होता तो पाषाण के भस्म में गन्ध क्यों उपलब्ध
होता । भेद केवल इतना है कि वही गन्ध जो पाषाण में छिपा हुवा है,
पाषाण के भस्म में प्रकट वा उद्भूत होने से उपलब्ध होने लगता है ॥१०॥
क्यों जी ! जैसे रूप, रस, गन्ध और स्पर्श; इन सब गुणों की उपलब्धि
में एक एक इन्द्रिय से उपलब्ध होना कारण बताया गया, क्या इसी प्रकार
संख्या परिमाण आदि गुणों की उपलब्धि में भी कोई कारण कहा जा
सक्ता है ? उत्तर, हां-
१६८-संख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ
परत्वापरत्वे कर्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षु-
षाणि ॥ ११ ॥
( संख्याः ) संख्यायें, ( परिमाणानि ) परिमाण, ( पृथक्त्वं ) पृथक्
होना, ( संयोगविभागौ ) संयोग और विभाग, (परत्वापरत्वे) परला होना
और वरला होना, ( कर्म ) कर्म, ( च ) और स्नेह, द्रवता और वेग; ये
सब भी (रूपिद्रव्यसमवायात्) रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध होने
से (चाक्षुषाणि) आंख से उपलब्ध होने वाले हैं ॥
जिस प्रकार रूप गुण आंख से उपलब्ध होता है इसी प्रकार संख्यायें
भी आंख से उपलब्ध होती हैं क्योंकि संख्यायें भी रूपवाले द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखती हैं, तथा जैसे रूप का आंख से ग्रहण होता है

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चतुर्थाध्याय १ आन्हिक ८५
वैसे ही परिमाणों ( लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, नीचाई, मोटाई ) का
भी आंख से ग्रहण होता है क्योंकि लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण भी
रूपवाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । तथा पृथक् होना गुण
भी आंख से ग्रहण किया जाता है और संयोग और विभाग भी आंख
से ग्रहण होते हैं क्योंकि पृथक्ता, संयोग और विभाग भी रूपवाले
द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखते हैं । ऐसे ही परे होना वा वरे होना
भी रूप वाले द्रव्यों के साथ समवाय सम्बन्ध रखने से चक्षु द्वारा ही उप-
लब्ध होता है। ऐसे ही कर्म भी चक्षु द्वारा उपलब्ध होता है क्योंकि कर्म
भी रूपवाले द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध रखता है। इस सूत्र में चकार से
( स्नेह ) चिकनाई, ( द्रवत्व ) गीलापन, और ( वेग ) धक्का; इन का ग्रहण
है क्योंकि चिकनाई, तरी और धक्का; ये सब भी रूपवाले द्रव्यों के साथ
समवाय सम्बन्ध रखते हैं ॥ ११ ॥
१६६-अरूपिष्वचाक्षुषाणि ॥ १२ ॥
( अरूपिषु ) रूपरहित द्रव्यों में ( अचाक्षुषाणि ) [ संख्या आदि गुण ]
आंख से ग्रहण नहीं किये जाते ॥
जो पदार्थ रूपरहित हैं अर्थात् चक्षु का विषय नहीं हैं उन में संख्या,
परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियोग, परत्व, अपरत्व, कर्म, स्नेह, द्रवत्व और
वेग; ये सब गुण भी चक्षु का विषय नहीं होते ॥ १२ ॥
१७०-एतेन गुणत्वे भावे च सर्वेन्द्रियं
ज्ञानं व्याख्यातम् ॥ १३ ॥
( एतेन ) इसी से ( गुणत्वे ) गुणत्व जाति में ( च ) और ( भावे )
सत्ता में ( सर्वेन्द्रियम् ) सब इन्द्रियों से होने वाला ( ज्ञानम् ) ज्ञान ( व्याख्या-
तम् ) कहा गया समझना चाहिये ॥
जिस प्रकार चक्षुर्ग्राह्य द्रव्यों में संख्या आदि गुण आंख का विषय होते
हैं तथा रूपरहित द्रव्यों में आंख का विषय नहीं होते, इसी प्रकार गुणत्व
जाति और सत्ता में भी सर्वेन्द्रिय ज्ञान की व्याख्या होगई समझनी चाहिये ॥१३॥
इस आह्निक में पृथिवी आदि सब भावों का मूल कारण तथा उन की
परोक्षता और अपरोक्षता शङ्का समाधानपूर्वक परीक्षित की गई ॥
इति चतुर्थाध्याये प्रथममाह्निकम्
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

८६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
अथ द्वितीयमान्हिकम्
प्रश्न-प्रकृति के होने में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्यों को लिङ्ग बताया
गया वह, कै प्रकार का होता है ? उत्तर-
१७१-तत्पुनः पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं त्रिविधं
शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ॥ १ ॥
( तत् ) वह ( पृथिव्यादि कार्यद्रव्यं ) पृथिवी आदि कार्यद्रव्य ( पुनः )
फिर ( शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञकम् ) शरीर, इन्द्रिय और विषय नाम वाला
( त्रिविधम् ) तीन प्रकार का है ॥
पृथिवी आदि कार्य पदार्थ, जो प्रकृति के होने में लिङ्ग हैं, तीन ३
प्रकार के होते हैं:-१-शरीररूप २-इन्द्रियरूप ३-विषयरूप ॥
इस दर्शन में जो पृथिवी आदि कार्य द्रव्य कहे गये हैं वे शरीर, इन्द्रिय
और विषय भेद से तीन ३ प्रकार के होते हैं, उन में से शरीर = भोक्ता के
भोग का स्थान कहाता है, इन्द्रिय = शरीर के आश्रय से रहता हुवा अपने
से छूने वाले विषय में प्रत्यक्ष प्रतीति का साधन कहाता है और विषय =
इन्द्रियों से भिन्न, आत्मा के उपभोग का साधन द्रव्य विषय कहाता है । इस
प्रकार पृथिवी तीन प्रकार की है, जल तीन प्रकार का, तेज तीन प्रकार का,
वायु तीन प्रकार का और आकाश दो प्रकार का होता है (क्योंकि आकाश
शरीर रूप नहीं होता ) । काल एक प्रकार का होता है ( क्योंकि काल न
शरीर रूप होता, न इन्द्रिय रूप होता, केवल विषय रूप होता है) । दिशा
भी एक प्रकार की होती है ॥
हम लोगों के शरीर = देह, नाक इन्द्रिय, मिट्टी पत्थर आदि विषय; यह
तीन प्रकार की पृथिवी है । जलस्थ प्राणियों के शरीर, रसना इन्द्रिय,
नदी समुद्र हिमालय इत्यादि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का जल है ।
तेजोमण्डल में रहने वाले प्राणियों का शरीर, आंख इन्द्रिय, पृथिवी आकाश
उदर और खानि में उत्पन्न अग्नि विषय, इस रीति से तीन प्रकार का तेज
है । वायुमण्डलस्थ प्राणियों का शरीर, सब शरीर में रहने वाली त्वक्
इन्द्रिय, वृक्षादि को हिलाने वाला तथा शरीर के भीतर घूमने वाला वायु